भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४१६

(६) स 'तथा' इत्यधीते । शृणोति च । तत्रैव जरां गच्छति । तत्तु किल शास्त्रं शास्त्रान्तरानुबन्धि । सर्वमेव वाङ्मयमविदित्वा न तत्त्वतोऽ- धिगंस्यते । भवतु, कालेन बहुनाल्पेन वा तदर्थाधिगतिः । अधिगतशास्त्रेण चादावेव पुत्रदारमपि न विश्वास्यम् । आत्मकुक्षेरपि कृते तण्डुलैरियद्भि- रियानोदनः संपद्यते । इयत ओदनस्य पाकायैतावदिन्धनं पर्याप्तमिति मानोन्मानपूर्वकं देयम् । उत्थितेन च राज्ञा क्षालिताक्षालिते मुखे

(९) तथा तथैवास्तु ! तत्रैव दण्डनीत्यध्ययने । जरां गच्छति-वृद्धत्वं प्राप्नोति । शास्त्रान्तरानुबन्धि-अन्यशास्त्रापेक्षि । वाङ्मयं शास्त्रम् । तत्त्वतो याथा- तथ्‍येन । अधिगंस्यते-सम्यग् ज्ञानं भविष्यति । तदर्थाधिगतिः-तदर्थबोधः । अधि- गतं सम्यग् ज्ञातं शास्त्रं येन तेन; जनेनेति शेषः । आदावेव प्रथममेव । विश्वास्यं विश्वसनीयम् । आत्मकुक्षेः स्वोदरस्य । कृते निमित्तम् । इयद्भिः इयत्परिमाणैः । इयान् इयत्परिमाणः । इयतः इयत्परिमाणस्य । एतावत् एतत्परिमाणम् । इन्धनं काष्ठम् । मानं प्रस्थादिकृतम् , उन्मानं तुलादण्डकृतम् , तत्पूर्वकम् , प्रस्थेन तुलया वा परिमाप्येति भावः । उत्थितेन शय्याया इति शेषः । क्षालिताक्षालिते-कार्य- त्वरया किञ्चित् क्षालिते किञ्चिदक्षालिते मुखे-इत्यस्य विशेषणम् । अभ्यन्तरीकृत्य

है । तुम उनको छोड़कर दण्डनीतिका ही अध्ययन करो । इस विद्याको आचार्य विष्णु- गुप्त तथा चाणक्यने अपने-अपने शिष्योंको अर्थात् यथाक्रम राजपुत्रोंको और चन्द्रगुप्त मौर्यको समझानेके लिये केवल छः सहस्र श्लोकोंमें ही रच दिया है । बस, यदि इसे तुम जान लो और इसके अनुसार चलो तो जो चाहोगे सो प्राप्त कर लोगे—सब सिद्धियाँ इसीमें निहित हैं । (९) उस धूर्तके इस उपदेशपर जब शिष्य कह देता है कि 'मैं ऐसा ही यथावत् करूँगा' तथा वह दण्डनीति पढ़ने एवं सुनने लगता है तो केवल उसी दण्डनीतिको जानते- जानते वह वृद्ध हो जाता है और फिर भी उसे कुछ लाभ नहीं होता । जब वह शिष्य दण्डनीतिके मन्थनमें घबड़ाता है तो धूर्त उसे समझाता है और कहता है—देखो, एक शास्त्रका सम्बन्ध दूसरे शास्त्रसे होता है अतः जब तक तुम सकल शास्त्र न पढ़ोगे तब तक कुछ लाभ न होगा—कुछ समझमें न आवेगा । मान लो, कुछ समय माथापच्ची करके दण्डनीति कुछ समझमें आ भी गयी तो क्या ! उस दण्डनीतिका प्रथम उपदेश है कि अपनी पत्नी और पुत्र पर भी विश्वास न करो । एक आदमीका पेट भरनेके लिए इतने चावलोंसे इतना भात तैयार होता है । इतना चावल पकानेमें इतनी लकड़ी लगती है अतः उतना चावल और लकड़ी नाप- जोखकर रसोईदारको देना चाहिये । सूर्योदयसे पहले उठकर राजाको आय-व्यय समझना

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