भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४३१ ( १८) द्यूतेऽपि द्रव्यराशेस्तृणवत्त्यागादनुपमानमाशयौदार्यम्, जयपराजययानवस्थानाद्धर्षविषादयोरविधेयत्वम्, पौरुषैकनिमित्तस्याम- र्षस्य वृद्धिः, अक्षहस्तभूम्यादिगोचराणामत्यन्तदुरुपलक्ष्याणां कूटकर्म- णामुपलक्षणादनन्तबुद्धिनैपुण्यम्, एकविषयोपसंहाराच्चित्तस्यातिचित्र- मैकाग्रथम्, अध्यवसायसहचरेषु साहसेष्वरतिः, अतिकर्कशपुरुषप्रतिसं- सर्गादनन्यधर्षणीयता मानावधारणमकृपणं च शरीरवापनमिति । ( १६) उत्तमाङ्गोपभोगेऽप्यर्थधर्मयोः सफलीकरणम्, पुष्कलः पुरुषाभिमानः, भावज्ञानकौशलम्, अलोभक्लिष्टमाचेष्टितम्, अखिलासु ( १८) अनुपमानमतुलनीयम् । आशयस्य चिंदौचित्तस्यम् । जयपराजययोः अनवस्थानात् अनिश्चितत्वात् । अविधेयत्वम् अवशीभूतत्वम् । एकस्मिन् विषये उपसंहारात् अभिनिवेशात् । एकाग्रस्य भाव एकाग्रथम् । साहसेषु साहसकर्मसु अरतिः अप्रीतिः । अनन्यधर्षणीयता अन्यानभिभवनीयता । अकृपणं दैन्यरहितम्, शरीरवापनं शरीरधारणम् । ( १९) पुष्कलः अतिशोभनः । अलब्धोपलब्धीत्यादि—अलब्धस्य वस्तुनो लब्धिर्लाभः, लब्धस्य अनुरक्षणं पालनं, रक्षितस्योपभोगः, भुक्तस्यानुसन्धानं स्मरणं, रुष्टस्य क्रुद्धस्य च अनुनयः समाधानमित्यादिषु विषयेषु अजस्रं निरन्तरम् आखेटसे उत्साहशक्ति भी बढ़ती जाती है जिससे रिपुगणोंमें भय उत्पन्न करनेके अनेक तरीके ज्ञात हो जाते हैं। (१८) इसी रीतिसे द्यूत-क्रीडासे भी संसारकी सभी वस्तुओंको तृणके सदृश त्यागने की शक्ति प्राप्त होती है। जय-पराजयका भी कोई निश्चय नहीं रहता कि कौन कब विजित होगा अथवा किसकी कब जय होगी ? जुआ खेलने वाला हर्ष-विमर्षके विषादोंसे दूर रहता है। इससे पौरुष बढ़ानेवाले अमर्षकी उत्पत्ति होती है। जुआ खेलनेसे हस्त- कौशल आदि पाण्डित्य का अनुभव होता है। ये बातें ऐसे जानना अति कठिन है। बुद्धिमें नैपुण्य आता है। एक ही कार्यमें मन लगानेसे मनमें आश्चर्यसे एकाग्रता-स्रोत उत्पन्न होता है। उद्योगके सहायक कामोंमें बुद्धिकी लगन बढ़ती है। जुआ खेलनेमें एकसे एक कठोर पुरुषोंका संपर्क हो जाता है जिससे मन इतना दृढ़ हो जाता है कि किसीके विचलित करने पर भी विचलित नहीं होता है। जुआ खेलने से स्वाभिमानका भाव उदय होता है एवं दीनतारहित जीवन व्यतीत करनेकी क्षमता आती है। अतः जुआ खेलना श्रेयस्कर है। (१९) इसी प्रकारसे अच्छी-अच्छी अंगनाओंके साथ रमण करनेसे भी धर्म और अर्थकी प्राप्ति होती है, जीवन सफल होता है। ऐसा करनेसे प्रबल पौरुषाभिमान बढ़ता है। Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu