दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
पृष्ठ 439, कुल 474 में से
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अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४३६ धानकौशलैः, चिकित्सामुखेनामयोपबृंहणैरन्यैश्चाभ्युपायैरश्मकेन्द्रप्रयुक्ता- स्तीक्ष्णरसदायः प्रक्षपितप्रवीरमनन्तवर्मकटकं जर्जरमकुर्वन् । ( २५ ) अथ वसन्तभानुर्भानुवर्माणं नाम वानवास्यं प्रोत्साह्यान- न्तवर्म्मणा व्यग्राहयत् । तत्परामृष्टराष्ट्रपर्यन्तञ्चानन्तवर्मा तमभियोक्तुं बल- समुत्थानमकरोत् । सर्वसामन्तेभ्यश्चाश्मकेन्द्रः प्रागुपेत्यास्य प्रियतरोऽ- भूत् । अपरेऽपि सामन्ताः समगंसत । गत्वा चाभ्यर्णे नर्मदारोधसि न्यविशन् । तस्मिंश्चावसरे महासामन्तस्य कुन्तलपतेरवन्तिदेवस्यात्म- नाटकीयां क्ष्मातलोर्वशीं नाम चन्द्रपालितादिभिरतिप्रशस्तनृत्यकौशला- माहूयानन्तवर्मा नृत्यमद्राक्षीत् । अतिरक्तश्च भुक्तवानिमां मधुमत्ताम् । तीक्ष्णरसं विषं ददातीति तीक्ष्णरसद्ः स आदिर्येषां ते । प्रक्षपिता विनाशिताः प्रवीरा योधा यस्य तत् । जर्जरं शिथिलम् । ( २५ ) वसन्तभानुः अश्मकेन्द्रः । वानवास्यो वनप्रदेशाधिपतिः । व्यग्राहयत् विग्रहं कारितवान् । तत्परामृष्टेति-तेन वानवास्येन परामृष्टो गृहीतो राष्ट्रस्य स्वरा- ज्यस्य पर्यन्तः प्रान्तभागो यस्य सः । तम् अश्मकेन्द्रम् । सर्वसामन्तेभ्य इत्यत्र पञ्चमीविभक्तिः । अस्य वानवास्यस्य । समगंसत मिलिता अभवन् । अभ्यर्णे समीपवर्त्तिनि । नर्मदारोधसि नर्मदातीरे । आत्मनाटकीयां स्वनर्त्तकीम् । मधुमत्तां मद्यपानप्रमत्ताम् । इस्तेमाल करते ही वे लोग मर जाते थे। इस रीति से अश्मकेश के द्वारा प्रेषित राजदूतों ने गुप्तारूपेण तीक्ष्ण विषाक्त रसों से तथा कुटिल नीतियों से अनेक धोखेवाली चालों से अनन्तवर्मा के समस्त सैन्य-बल को एवं राज्याधिकारी समुदाय को जर्जर बनाकर नष्ट भ्रष्ट कर दिया । ( २५ ) तत्पश्चात्—वसन्तभानु ने भीलों के अधिपति भानुवर्मा को उभाड़ कर अनन्तवर्मासे लड़ा दिया । अनन्तवर्माने सम्पूर्ण राष्ट्रकी शक्ति भानुवर्माको पराजित करनेमें लगा दी । इधर अपने सभी सामन्तों को साथ लेकर वसन्तभानु अनन्तवर्मा से मिल गया और उसे हाथमें करके उसका प्रियपात्र हो गया । तब अन्य सामन्तगण भी अनन्तवर्मा की सहायता करने आ गये । सभी सामन्तों ने रेवा नदी के पुण्य तट पर अपनी छावनियाँ फेंकीं । उस समय वहाँ पर महासामन्त कुन्तलदेशाधिपति अवन्तिदेवकी रङ्गशालाओं बनायीं वेश्या नर्तन कर रही थी। वह वेश्या सुन्दरता में भूतल पर उर्वशी के समान थी । अनन्तवर्मा उसका नृत्य देखने में तल्लीन था । चन्द्रपालित आदि भी उसी के समीप बैठे हुए थे । मधुपान करके मदोन्मत्त होकर उस समय वे सब उस पर आसक्त हो रहे थे । उसी समय अश्मकेश ने कुन्तलपति अवन्तिदेव को अलग एकान्त में ले जाकर कहा—