दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 474 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४४३ ( २८ ) 'किमीया जात्यास्य माता' इत्यनुयुक्ते मयामुनोक्तम्-'पाट- लिपुत्रस्य वणिजो वैश्रवणस्य दुहितरि सागरदत्तायां कोसलेन्द्रात्कुसुम- धन्वनोऽस्य माता जाता' इति । 'यद्येवमेतन्मातुर्मत्पितुश्चैको मातामहः' इति सस्नेहं तमहं सस्वजे । वृद्धेनोक्तम्-'सिन्धुदत्तपुत्राणां कतमस्ते पिता' इति । 'सुश्रुतः' इत्युक्ते सोऽत्यहृष्यत् । अहं तु 'तं नयावलिप्तम- श्मकनयेनैवोन्मूल्य बालमेनं पित्र्ये पदे प्रतिष्ठापयेयम्' इति प्रतिज्ञाय 'कथमस्यैनां क्षुधं क्षपयेयम्' इत्यचिन्तयम् । तावदापतितौ च कस्यापि व्याधस्य त्रीनिषूनतीत्य द्वौ मृगौ स च व्याधः । तस्य हस्तादवशिष्ट- ( २८ ) किमीया जात्येति-कस्येयमिति किमीया कस्या जातेरुत्पन्नेत्यर्थः । अनुयुक्ते पृष्टे । मया विश्रुतेनेत्यर्थः । अमुना नालीजङ्घेन । तं बालकम् । सिन्धु- दत्तेति सिन्धुदत्तस्य बहवः पुत्रास्तेषु तव पिता कतमः किंनामक इति । तम् अश्मकेन्द्रम् । नयावलिप्तम् नीतिगर्वितम् । अश्मकनयेन पाषाणोन्मूलनन्यायेन । अश्मकमिति पाठे तु नयेन नीत्येति सम्बन्धः अस्य बालस्य । क्षुधं क्षुधाम् । क्षपयेयम् नाशयेयम् । तावत्-एतस्मिन्नन्तरे । त्रीन् इषून् बाणत्रयमित्यर्थः । जिससे हमारे प्राण बच गये । अब इस अनाथ राजकुमार के आप ही संरक्षक हैं, आप ही इसे पालें ।' इतना कह कर वह खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर तकने लगा । ( २८ ) हमने पूछा-'यह बालक किस जाति का है ?' तब उसने उत्तर दिया- 'पाटलिपुत्र के वैश्य वैश्रवण की पुत्री सागरदत्ता के साथ कोशल देश के स्वामी महाराज कुसुमधन्वा का संसर्ग होने पर इसकी माता का जन्म हुआ था।' इस बात को श्रवण कर हमने कहा- 'तब तो इसकी माता और हमारे पिता दोनों के मातामह एक ही थे।' बस, हमने उस बालक को छाती से लगा लिया । वृद्ध ने पूछा-'सिन्धुदत्त के पुत्रों में से कौन व्यक्ति आपके पिता थे ।' हमने कहा- 'सुश्रुत' यह बात श्रवण कर वह परम मुदित हो गया । तब हमने मन ही मन में प्रतिज्ञा की कि 'मैं इस नीति से दर्पित अश्मक देश के स्वामी को नीति की शक्ति से नष्ट कर डालूंगा तथा इस बालक को इसके पिता के सिंहासन पर अवश्य बैठाऊँगा।' उसी समय दो हिरण दौड़ते हुए हमारे पास आये । वे एक बहेलिये के तीन बाणों से बचकर भाग निकले थे । उसी समय वह व्याध भी वहाँ पर आकर उपस्थित हो गया । उसके पास दो बाण और भी शेष बचे थे । बस हमने उससे धनुष-बाण ले लिए और उन मृगों पर चला दिये । उनमें से एक की देह पर वह बाण ऊपर लगे हुए पक्ष तक छिद गया तथा दूसरे की देह में हमारा बाण ऐसा छिदा कि आर-पार कर गया । उन दोनों मृगों में से एक मृग हमने बहेलिये को दे दिया और २६ द० कु० उ० Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu