दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
पृष्ठ 453, कुल 474 में से
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अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४५३ ( ३५ ) अपि च दुर्घटकूटकोटिघटनापाटवप्रकटशाठ्यनिष्ठुराश्मक- घटघट्टनात्मानं मां मन्यध्वमस्य रक्षितारम् । रक्षानिर्वेशश्वास्य स्वसेयं सुभ्रूरभ्यनुज्ञाता सह्यमार्यया' इति । श्रुत्वैतत् 'अहो भाग्यवान्भोजवंशः, यस्य त्वमार्यादत्तो नाथः' इत्यप्रीयन्त प्रकृतयः । सा तु वाचामगोचरां हर्षावस्थामस्पृशन्मे श्वश्रूः । तदहरेव च यथावद्ग्राहयन्मञ्जुवादिनीपा- णिपल्लवम् । प्रपन्नायां च यामिन्यां सम्यगेव बिलं प्रत्यपूरयम् । अलब्ध- ( ३५ ) दुर्घटेति—दुर्घटाया दुःसाध्यायाः कूटकोटेः कपटसमूहस्य पाटवेन नैपुण्येन प्रकटं व्यक्तं शाठ्यं धूर्त्तत्वं यस्य तथाभूतो निष्ठुरो निर्दयो योऽश्मको वसन्तभानुः स एव घटस्तस्य घट्टनं स्फोटनं तदेव आत्मा यस्य तम् । अश्मके- न्द्रस्य कपटचेष्टितं मयैवावगतमिति भावः । अस्य बालकस्य । रक्षानिर्वेशः रक्ष- णपारिश्रमिकम् । स्वसा भगिनी । अभ्यनुज्ञाता दातुं स्वीकृता । आर्यया देव्या । वाचामगोचराम् अनिर्वाच्याम् । अस्पृशत् प्राप्तवती । तदहरेव तस्मिन्नेव दिने । यथावत् यथाविधि । प्रपन्नायाम् उपस्थितायाम् । अलब्धेति-न लब्धं दृष्टं रन्ध्रं छिद्रं दोषा येन सः । नष्टस्य अदर्शनं गतस्य मुष्टौ करमध्ये चिन्ता नष्टानि वस्तूनि करे एव पश्यामीत्यादिकथनः प्रकाशनेः । अभ्युपायेति अन्योपायनिर्व- र्त्तितैः । उपायान्तरेण नष्टमाविष्कृत्य स्वमुष्टावेव पश्यामीति ख्यापयतीति भावः । भाव से दुर्गादेवी को प्रणाम करती हुई प्रजा से हमने कहा—'भगवती विन्ध्यवासिनी दुर्गादेवी ने हमारे द्वारा आप लोगों को आदेश दिया है कि मैंने दया करके व्याघ्ररूप धारण कर कुमार की रक्षा की है, आज मैं इसे आप लोगों के हाथों में समर्पित करती हूँ। अब आज से आप लोग इसे मेरा पुत्र समझें।' ततः हमने पुनः कहा— ( ३५ ) इन समस्त दुर्घट छलों की योजनाओं के नैपुण्य से जिसकी शठता प्रकट हो चुकी है तथा इस निर्दय वसन्तभानु के कल्पित विचारों को नष्ट करने वाले एवं इस कुमार के रक्षक हम हैं। हमारे पौरुष के उपहारस्वरूप महादेवी वसुन्धरा ने इसकी बहिन को हमें दे दिया है। यह श्रवण कर सब लोग परमानन्दित हो गये और बोले— 'यह भोजकुल धन्य है जिसके अधिपति आप हैं। आप को स्वयं भगवती ने हम सबके रक्षार्थ भेजा है। हमारी सास भी अकथनीय हर्ष में डूब गयीं। उन्हों ने उसी दिन हमारे साथ अपनी पुत्री मंजुवादिनी का परिणय कर दिया। जब रात्रि हुई तब मैने उस सुरंग को भली भाँति बन्द कर दिया। जनसाधारण हमारे इस छद्म व्यवहार को न जान सके । उन्हें इस बात पर अति आश्चर्य हुआ कि उस मन्दिर में खाने-पीने का कुछ साधन न
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