भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri.Funding: MIDF बालविबोधिनीव्याख्यासहितम्। ४६१ जनः सुखेन निवत्स्यति न चेद्भवानीत्रिशूलवश्यो भविष्यति । भवान्या च ममेत्याज्ञप्तमस्ति यदेकवारं सर्वेषां कथय । अतोऽस्माकं युष्माभिः सह मैत्रीमवबुद्ध्यास्मन्मुखेन सर्वेभ्योऽपि गदितम् । वार्तामिमामाकर्ण्य तेऽस्म- केन्द्रान्तरङ्गभृत्या राजसूनोर्भवानीवरं विदित्वा पूर्वमेव भिन्नमनस आ- सन् । विशेषतश्च मदीयमिति वचनं श्रुत्वा ते सर्वेऽपि मद्वशे समभवन् । (२) एवं सर्वमपि वृत्तान्तमवबुद्ध्याश्मकेन्द्रेण व्यचिन्ति- 'यद्रा- जसूनोर्मौलाः प्रजास्ताः सर्वा अप्येनमेव प्रभुमभिलषन्ति । मदीयश्च बाह्य आभ्यन्तरो भृत्यवर्गो भिन्नमना इव लक्ष्यते । एवं यद्यहं क्षमामवलम्ब्य गृह एव स्थास्यामि तत उत्पन्नोपजापं स्वराज्यमपि परित्रातुं न शक्ष्यामि । अतो यावता भिन्नचित्तेन मदवबोधकं प्रकटयता मद्धलेन सह मिथोवचनं न संजातं तावतैव तेन साकं विग्रहं रचयामि इत्येवं विहिते सोऽवश्यं भास्करवर्माणमनुयास्यति । भूयसीं प्रभूताम् । प्रवृत्तिं सम्मानम् । भवानीत्रिशू- लवश्यो भवान्या विनाश्यः । अवबुध्य विचार्य । भिन्नमनसः चञ्चलचित्ताः । (२) मौलाः प्रजाः-प्रधानप्रकृतयः । एवं विश्रुतम् । क्षमामवलम्ब्य- युद्धमकृत्वा । उत्पन्नोपजापं जनितभेदम् । परित्रातुं रक्षितुम् । मदवबोधकम् मम हृदयज्ञापकं वचनम् । प्रकटयता प्रकाशयता । मद्धलेन मम सैन्येन । मिथोवचनम् अश्मकेन्द्रके अन्तरङ्ग सेवकगण राजपुत्र पर भवानीका अनुग्रह जानकर प्रथमसे ही अन्य- मनस्क हो रहे थे। मेरे वचनोंको सुनकर वे लोग सब मेरे वशीभूत हो गये । (२) अश्मकेन्द्रने इन सब वृत्तोंको सुनकर विचारा-'राजपुत्रकी जितनी मुख्य प्रजा है, वह सबकी सब उसी राजपुत्रको राजा बनानेकी इच्छा कर रही है। मेरे बाह्य और अन्तरङ्ग सेवकगण अन्यमनस्क दीख रहे हैं। ऐसो दशामें यदि मैं शान्ति रखकर घर में बैठा रहूँगा तो, ये लोग भेदभाव करके मुझे अपने राज्यपर प्रभुत्व करनेके अयोग्य बना देंगे-अपने राज्यपर शासन करने योग्य न रह जाऊँगा । अतएव जब तक अन्यमनस्क सेवक, मेरी अवज्ञा करनेवाले, मेरी अन्य प्रजाके साथ एकान्तमें बातचीत करने न पायें तबतक मैं उन प्रजाओं को साथ लेकर युद्ध छेड़ दूँ। ऐसी स्थितिपर वह राजपुत्र मेरे साथ युद्धमें एक क्षण भी नहीं टिकेगा । ऐसा निश्चय करके अन्यायसे प्राप्त परराज्यके पापसे प्रेरित होकर अश्मकेन्द्र सेनाके साथ मेरी सेनाकी ओर आया मानो, वह मृत्युके मुखकी ओर आ रहा था। राजपुत्र, अश्मकेन्द्रको आगे आते जानकर, अग्रसर हो गया । और मैं अश्मकेन्द्रकी ओर ही घोड़ेपर सवार होकर दौड़ गया। तब उसकी सम्पूर्ण सेना यह सोचने लगी कि, अवश्य यह भवानीके दिव्यवरकी शक्ति है कि, वह एकाकी हमारी अपरिमित Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu