देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 103, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 103
| ९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| तदाहं तामसं रूपं कृत्वा तत्र समागता।<br>दर्शने पुरतस्तस्य ध्यातं तत्तेन यादृशम्॥ ८९ | उस समय उस दैत्यने जिस रूपमें मेरा ध्यान किया था, उसी तामसरूपमें उसे दर्शन देनेहेतु उसके समक्ष मैं प्रकट हुई॥ ८९॥ |
| सिंहोपरि स्थिता तत्र तमवोचं दयान्विता।<br>वरं ब्रूहि महाभाग ददामि तव सुव्रत॥ ९० | उस समय सिंहपर आरूढ़ हुई मैंने दयापूर्वक उससे कहा—हे महाभाग! तुम वरदान माँगो; हे सुव्रत! मैं तुम्हें यथेच्छ वरदान दूँगी॥ ९०॥ |
| इति श्रुत्वा वचो देव्या दानवः प्रेमपूरितः।<br>प्रदक्षिणां प्रणामं च चकार त्वरितस्तदा॥ ९१<br><br>दृष्ट्वा रूपं मदीयं स प्रेमोत्फुल्लविलोचनः।<br>हर्षाश्रूपूर्णनयनस्तुष्टाव स च मां तदा॥ ९२ | वह दानव देवीका यह वचन सुनकर प्रेमविह्वल हो उठा और उसने तत्काल प्रणाम और प्रदक्षिणा की। मेरा रूप देखते ही प्रेमभावनाके कारण प्रफुल्लित नेत्रोंवाला तथा हर्षातिरेकके कारण अश्रुपूरित नयनोंवाला वह दानव मेरी स्तुति करने लगा॥ ९१-९२॥ |
| हयग्रीव उवाच<br>नमो देव्यै महामाये सृष्टिस्थित्यन्तकारिणि।<br>भक्तानुग्रहचतुरे कामदे मोक्षदे शिवे॥ ९३ | **हयग्रीव बोला—**हे महामाये! हे जगत्का सृजन-पालन-संहार करनेवाली! हे भक्तोंपर कृपा करनेमें निपुण! हे सकल कामनाप्रदायिनि! हे मोक्षदायिनि! हे शिवे! आप देवीको नमस्कार है॥ ९३॥ |
| धराम्बुतेजःपवनखपञ्चानां च कारणम्।<br>त्वं गन्धरसरूपाणां कारणं स्पर्शशब्दयोः॥ ९४ | पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश—इन पाँच महाभूतोंका कारण आप ही हैं तथा गन्ध, रस, रूप, स्पर्श एवं शब्द—इन तत्त्वोंका कारण भी आप ही हैं॥ ९४॥ |
| घ्राणं च रसना चक्षुस्त्वक्श्रोत्रमिन्द्रियाणि च।<br>कर्मेन्द्रियाणि चान्यानि त्वत्तः सर्वं महेश्वरि॥ ९५ | हे महेश्वरि! नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान—ये ज्ञानेन्द्रियाँ तथा हाथ, पैर, वाक्, लिंग, गुदा—ये कर्मेन्द्रियाँ आपसे ही उत्पन्न हैं॥ ९५॥ |
| देव्युवाच<br>किं तेऽभीष्टं वरं ब्रूहि वाञ्छितं यद्ददामि तत्।<br>परितुष्टास्मि भक्त्या ते तपसा चाद्भुतेन च॥ ९६ | **देवी बोलीं—**तुम्हारा क्या अभीष्ट है? जो कुछ भी तुम्हारा अभिलषित वर हो, माँग लो। मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगी; क्योंकि मैं तुम्हारी अनन्य भक्ति तथा अद्भुत तपस्यासे अतिशय प्रसन्न हूँ॥ ९६॥ |
| हयग्रीव उवाच<br>यथा मे मरणं मातर्न भवेत्तत्तथा कुरु।<br>भवेयममरो योगी तथाजेयः सुरासुरैः॥ ९७ | **हयग्रीव बोला—**हे माता! आप मुझे वैसा वरदान दें, जिससे मेरी मृत्यु कभी न हो और देव-दानवोंद्वारा अपराजेय रहता हुआ मैं सदाके लिये अमर योगी हो जाऊँ॥ ९७॥ |
| देव्युवाच<br>जातस्य हि ध्रुवं मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।<br>मर्यादा चेदृशी लोके भवेच्च कथमन्यथा॥ ९८ | **देवी बोलीं—**जन्म लेनेवालेकी मृत्यु निश्चित है और मरनेवालेका जन्म भी निश्चित है। लोकमें स्थापित इस प्रकारकी मर्यादाका उल्लंघन कैसे सम्भव है?॥ ९८॥ |
| एवं त्वं निश्चयं कृत्वा मरणे राक्षसोत्तम।<br>वरं वरय चेष्टं ते विचार्य मनसा किल॥ ९९ | अतएव हे दानवश्रेष्ठ! मृत्युको अवश्यम्भावी जानकर अपने मनमें सम्यक् विचार करके तुम अन्य यथेच्छ वर माँग लो॥ ९९॥ |