भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० ५ ]प्रथम स्कन्ध९३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः कोपयुता जाता महालक्ष्मी तमोगुणा।<br>तामसी तु तदा शक्तिस्तस्या देहे समाविशत्॥ ७८इसी विचार-मन्थनके परिणामस्वरूप लक्ष्मीजी कोपाविष्ट हो गयीं और तब उनके शरीरमें तमोगुणसम्पन्न तामसी शक्ति व्याप्त हो गयी॥ ७८॥
केनचित्कालयोगेन देवकार्यार्थसिद्धये।<br>प्रविष्टा तामसी शक्तिस्तस्या देहेऽतिदारुणा॥ ७९तदनन्तर किसी दैवयोगके प्रभावसे देवताओंके कार्य-साधनके उद्देश्यसे ही उनके शरीरमें अत्यन्त उग्र तामसी शक्ति प्रविष्ट हुई॥ ७९॥
तामस्याविष्टदेहा सा चुकोपातिशयं तदा।<br>शनकैः समुवाचेदमिदं पततु ते शिरः॥ ८०तब लक्ष्मीजीके शरीरमें तामसी शक्तिका समावेश हो जानेके कारण वे अत्यन्त क्रोधित हो उठीं और उन्होंने मन्द स्वरमें यह कहा—'तुम्हारा यह सिर कटकर गिर जाय'॥ ८०॥
स्त्रीस्वभावाच्च भावित्वात्कालयोगाद्विनिर्गतः।<br>अविचार्य तदा दत्तः शापः स्वसुखनाशनः॥ ८१<br><br>सपत्नीसम्भवं दुःखं वैधव्यादधिकं त्विति।<br>विचिन्त्य मनसेत्युक्तं तामसीशक्तियोगतः॥ ८२स्त्रीस्वभावके कारण, भावीवश तथा संयोगसे बिना सोचे-समझे ही लक्ष्मीजीने अपने ही सुखको विनष्ट करनेवाला शाप दे दिया। सौतके व्यवहारादिसे उत्पन्न होनेवाला दुःख वैधव्यसे भी बढ़कर होता है। मनमें ऐसा सोचकर तथा शरीरपर तामसी शक्तिका प्रभाव रहनेके कारण उन्होंने ऐसा कह दिया था॥ ८१-८२॥
अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभता।<br>अशौचं निर्दयत्वं च स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः॥ ८३मिथ्याचरण, साहस, माया, मूर्खता, अतिलोभ, अपवित्रता तथा दयाहीनता—ये स्त्रियोंके स्वाभाविक दोष हैं॥ ८३॥
सशीर्षं वासुदेवं तं करोम्यद्य यथा पुरा।<br>शिरोऽस्य शापयोगेन निमग्नं लवणाम्बुधौ॥ ८४अब मैं उन वासुदेवको पूर्वकी भाँति सिरयुक्त कर देती हूँ। इनका सिर पूर्वशापके कारण लवणसागरमें डूब गया है॥ ८४॥
अन्यच्च कारणं किञ्चिद्वर्त्तते सुरसत्तमाः।<br>भवतां च महत्कार्यं भविष्यति न संशयः॥ ८५हे श्रेष्ठ देवताओ! इस घटनाके होनेमें एक अन्य भी कारण है। आपलोगोंका महान् कार्य अवश्य सिद्ध होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ ८५॥
पुरा दैत्यो महाबाहुर्हयग्रीवोऽतिविश्रुतः।<br>तपश्चक्रे सरस्वत्यास्तीरे परमदारुणम्॥ ८६प्राचीन कालमें महाबाहु एवं अति प्रसिद्ध हयग्रीव नामवाला एक दानव था, जो सरस्वतीनदीके तटपर बहुत कठोर तपस्या करने लगा॥ ८६॥
जपनेकाक्षरं मन्त्रं मायाबीजात्मकं मम।<br>निराहारो जितात्मा च सर्वभोगविवर्जितः॥ ८७वह दैत्य आहारका त्यागकर समस्त इन्द्रियोंको वशमें करके तथा सभी प्रकारके भोगैश्वर्यसे दूर रहते हुए मेरे मायाबीजात्मक एकाक्षर मन्त्र (ह्रीं)-का जप करता रहा॥ ८७॥
ध्यायन्मां तामसीं शक्तिं सर्वभूषणभूषिताम्।<br>एवं वर्षसहस्रं च तपश्चक्रेऽतिदारुणम्॥ ८८इस प्रकार समस्त आभूषणोंसे विभूषित मेरी तामसी शक्तिका सतत ध्यान करता हुआ वह एक हजार वर्षोंतक कठोर तप करता रहा॥ ८८॥