भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 889 में से

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| ९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |

| मूर्धा गतः क्वाम्ब हरेर्न विद्मो<br>नान्योऽस्त्युपायः खलु जीवनेऽद्य।<br>यथा सुधा जीवनकर्मदक्षा<br>तथा जगज्जीवितदासि देवि ॥ ६८ | हे अम्ब! भगवान् विष्णुका सिर छिन्न होकर कहाँ चला गया—यह हम नहीं जानते हैं और इस समय इन्हें जीवित करनेके लिये अन्य कोई युक्ति भी नहीं सूझ रही है। हे देवि! मृत प्राणीको जीवित करनेमें जिस प्रकार अमृत समर्थ है, उसी प्रकार समग्र संसारकी आप जीवनदात्री हैं॥ ६८॥ | | सूत उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी गुणातीता महेश्वरी।<br>प्रसन्ना परमा माया वेदैः साङ्गैश्च सामगैः ॥ ६९ | सूतजी बोले—हे मुनियो! इस प्रकार सामगान-निपुण सांगवेदोंद्वारा स्तुति किये जानेसे गुणातीता, महेश्वरी, परात्परा महामाया भगवती प्रसन्न हो गयीं॥ ६९॥ | | तानुवाच तदा वाणी चाकाशस्थाशरीरिणी।<br>देवान्प्रति सुखैः शब्दैर्जनानन्दकरी शुभा ॥ ७० | उसी समय देवताओंको सुख प्रदान करनेवाले शब्दोंसे युक्त और भक्तजनोंको आनन्दित करनेवाली आकाशस्थित अशरीरिणी शुभ वाणीने उनसे कहा॥ ७०॥ | | मा कुरुध्वं सुराश्चिन्तां स्वस्थास्तिष्ठन्तु चामराः।<br>स्तुताहं निगमैः कामं सन्तुष्टास्मि न संशयः ॥ ७१ | हे देवताओ! आप लोग किसी प्रकारकी चिन्ता न करें और स्वस्थचित्त रहें। हे अमरगण! इन वेदोंके भावपूर्ण स्तवनसे मैं परम प्रसन्न हो गयी हूँ, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है॥ ७१॥ | | यः पुमान्मानुषे लोके स्तौत्येतां मामकीं स्तुतिम्।<br>पठिष्यति सदा भक्त्या सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ ७२ | मनुष्यलोकमें जो प्राणी इस स्तुतिसे मेरी आराधना करेगा अथवा भक्तिपूर्वक इसका पाठ करेगा, उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जायँगी॥ ७२॥ | | शृणोति वा स्तोत्रमिदं मदीयं<br>भक्त्या त्रिकालं सततं नरो यः।<br>विमुक्तदुःखः स भवेत्सुखी च<br>वेदोक्तमेतन्ननु वेदतुल्यम् ॥ ७३ | जो मनुष्य त्रिकाल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) मेरी स्तुतिको नित्य भक्तिपूर्वक सुनेगा, वह सभी दुःखोंसे विमुक्त होकर परम सुखी हो जायगा। वेदोंद्वारा उच्चारित किये जानेके कारण यह स्तुति वेदोंके समान ही है॥ ७३॥ | | शृण्वन्तु कारणं चाद्य यद्गतं वदनं हरेः।<br>अकारणं कथं कार्यं संसारेऽत्र भविष्यति ॥ ७४ | हे देवो! अब आप विष्णुके शिरोच्छेदका कारण सुनिये; क्योंकि इस लोकमें बिना कारण कोई कार्य कैसे हो सकता है?॥ ७४॥ | | उदधेस्तनयां विष्णुः संस्थितामन्तिके प्रियाम्।<br>जहास वदनं वीक्ष्य तस्यास्तत्र मनोरमम् ॥ ७५ | एक बार अपने समीप बैठी हुई अपनी प्रियतमा सागरपुत्री लक्ष्मीका चित्ताकर्षक मुख देखकर भगवान् विष्णु हँस पड़े॥ ७५॥ | | तया ज्ञातं हरिनूनं कथं मां हसति प्रभुः।<br>विरूपं हरिणा दृष्टं मुखं मे केन हेतुना ॥ ७६<br><br>विनापि कारणेनाद्य कथं हास्यस्य सम्भवः।<br>सपत्नीव कृता तेन मन्येऽन्या वरवर्णिनी ॥ ७७ | उन्होंने सोचा कि भगवान् विष्णु मुझे देखकर क्यों हँस पड़े? मेरे मुखमें विष्णुजीद्वारा दोष देखे जानेका आखिर क्या कारण हो सकता है? और फिर बिना किसी कारणके उनका हँसना सम्भव नहीं हो सकता। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने किसी अन्य सुन्दर स्त्रीको मेरी सौत बना लिया है॥ ७६-७७॥ |

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