भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 889 में से

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पृष्ठ 100

| अ० ५ ] | प्रथम स्कन्ध | ९१ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
न किं जानासि त्वं जननि मधुजिन्मौलिपतनं<br>शिवे किं वा ज्ञात्वा विविदिषसि शक्तिं मधुजितः।<br>हरेः किं वा मातर्दुरितततिरेषा बलवती<br>भवत्याः पादाब्जे भजननिपुणे क्वास्ति दुरितम्॥ ६२हे जननि! क्या आप भगवान् विष्णुके शिरोच्छेदनकी घटना नहीं जानती हैं? हे शिवे! अथवा क्या यह जानकर भी आप मधुजित् विष्णुकी शक्तिकी परीक्षा करना चाहती हैं? हे माता! अथवा क्या यह विष्णुके महान् पापसमूहका फल है? किंतु आपके चरणकमलोंका भजन करनेमें निपुण प्राणीसे तो पाप हो ही नहीं सकता॥ ६२॥
उपेक्षा किं चेयं तव सुरसमूहेऽतिविषमा<br>हरेर्मूर्ध्नो नाशो मतमिह महाश्चर्यजनकम्।<br>महद्दुःखं मातस्त्वमसि जननच्छेदकुशला<br>न जानीमो मौलेर्विघटनविलम्बः कथमभूत्॥ ६३हे माता! आप इस देवसमूहकी भारी उपेक्षा क्यों कर रही हैं? भगवान् विष्णुके मस्तक कटनेकी घटना हमारे लिये अत्यन्त आश्चर्यजनक तथा महान् कष्टदायक बात है। हे माता! आप जननरूपी दुःखका नाश करनेमें कुशल हैं, अब हम यह नहीं जान पा रहे हैं कि विष्णुके सिर-संयोजनमें विलम्ब क्यों हो रहा है?॥ ६३॥
ज्ञात्वा दोषं सकलसुरतापादितं देवि चित्ते<br>किं वा विष्णावमरजनितं दुष्कृतं पातितं ते।<br>विष्णोर्वा किं समरजनितः कोऽपि गर्वोऽतिवेगा-<br>च्छेत्तुं मातस्तव विलसितं नैव विद्मोऽत्र भावम्॥ ६४हे देवि! सभी देवताओंके देवताभिमानरूपी दोषको अपने मनमें समझकर आपने ही ऐसा किया है, अथवा देवजन्य दुष्कृतको विष्णुमें स्थापित किया है, अथवा विष्णुको संग्राम-विजय करनेका अहंकार हो गया था, जिसे अतिशीघ्र दूर करनेके लिये आपने यह लीला रची है। हे माता! हम आपके मनोभावोंको समझनेमें पूर्णतया असमर्थ हैं॥ ६४॥
किं वा दैत्यैः समरविजितैस्तीर्थदेशे सुरम्ये<br>घोरं तप्त्वा भगवति वरं लब्धवद्भिर्भवत्याः।<br>अन्तर्धानं गमितमधुना विष्णुशीर्षं भवानि<br>द्रष्टुं किं वा विगतशिरसं वासुदेवं विनोदः॥ ६५हे भगवति! अथवा युद्धमें पराभूत किये गये दैत्योंने किसी मनोहर तीर्थमें घोर तपस्या करके आपसे वरदान प्राप्त कर लिया है, जो विष्णुके सिर कटनेका कारण बना। हे भवानि! अथवा विष्णुको सिरविहीनरूपमें देखनेके लिये आप इस समय कोई विनोद कर रही हैं॥ ६५॥
सिन्धोः पुत्र्यां रोषिता किं त्वमाद्ये<br>  कस्मादेनां प्रेक्षसे नाथहीनाम्।<br>क्षन्तव्यस्ते स्वांशजातापराधो<br>  व्युत्थाप्यैनं मोदितां मां कुरुष्व॥ ६६हे आद्ये! आप सिंधुसुता लक्ष्मीपर किसी कारणसे आक्रोशित तो नहीं हैं। आप उन्हें स्वामीविहीन किसलिये देखना चाह रही हैं? आप अपने ही अंशसे प्रादुर्भूत लक्ष्मीका अपराध क्षमा करें और भगवान् विष्णुको जीवनदान देकर रमाको प्रसन्न कर दें॥ ६६॥
एते सुरास्त्वां सततं नमन्ति<br>  कार्येषु मुख्याः प्रथितप्रभावाः।<br>शोकार्णवात्तारय देवि देवा-<br>  नुत्थाप्य देवं सकलाधिनाथम्॥ ६७जगत्के समस्त कार्योंको सम्पादित करनेमें प्रमुख भूमिकावाले अतिशय प्रभावशाली ये देवता आपको निरन्तर नमस्कार करते हैं। हे देवि! सर्वलोकाधिपति विष्णुको जीवित करके आप देवताओंको शोकसागरसे पार कीजिये॥ ६७॥
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