देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| त्वमुद्गीथेऽर्धमात्रासि गायत्री व्याहृतिस्तथा।<br>जया च विजया धात्री लज्जा कीर्तिः स्पृहा दया॥ ५५ | ॐकारमें अर्धमात्राके रूपमें आप ही विराजमान हैं। आप गायत्री, भूः, भुवः, स्वः आदि व्याहृति, जया, विजया, धात्री, लज्जा, कीर्ति, स्पृहा एवं दया सभी कुछ हैं॥ ५५॥ |
| त्वां संस्तुमोऽम्ब भुवनत्रयसंविधान-<br>दक्षां दयारसयुतां जननीं जनानाम्।<br>विद्यां शिवां सकललोकहितां वरेण्यां<br>वाग्बीजवासनिपुणां भवनाशकर्त्रीम्॥ ५६ | हे अम्ब! आप तीनों लोकोंके रचना-तन्त्रमें दक्ष, करुणरससे युक्त, सभी प्राणियोंकी माँ, विद्या, कल्याणी, सभी प्राणियोंकी हितसाधिका, सर्वश्रेष्ठ, वाग्बीजमन्त्रमें वास करनेमें निपुण तथा संसारका क्लेश दूर करनेवाली हैं; आपकी हम स्तुति करते हैं॥ ५६॥ |
| ब्रह्मा हरः शौरिसहस्रनेत्र-<br>वाग्वह्निसूर्या भुवनाधिनाथाः।<br>ते त्वत्कृताः सन्ति ततो न मुख्या<br>माता यतस्त्वं स्थिरजङ्गमानाम्॥ ५७ | ब्रह्मा, शंकर, विष्णु, इन्द्र, सरस्वती, अग्नि, सूर्य तथा सभी भुवनोंके स्वामी आपके द्वारा ही निर्मित किये गये हैं। अतः उनकी अपनी कोई विशेषता नहीं है; आप ही सभी चराचर जगत्की माता हैं॥ ५७॥ |
| सकलभुवनमेतत्कर्तुकामा यदा त्वं<br>सृजसि जननि देवान्विष्णुरुद्राजमुख्यान्।<br>स्थितिलयजननं तैः कारयस्येकरूपा<br>न खलु तव कथंचिद्देवि संसारलेशः॥ ५८ | हे जननि! जब आप जगत्की रचनाकी कामना करती हैं, तब आप सर्वप्रथम ब्रह्मा, विष्णु, महेश—इन प्रमुख देवोंका सृजन करती हैं। उन्हींके माध्यमसे एकमात्र आप ही जगत्का सृजन, पालन एवं संहारकार्य पूर्ण कराती हैं। हे देवि! आपमें संसारका लेशमात्र भी नहीं रहता॥ ५८॥ |
| न ते रूपं वेत्तुं सकलभुवने कोऽपि निपुणो<br>न नाम्नां संख्यां ते कथितुमिह योग्योऽस्ति पुरुषः।<br>यदल्पं कीलालं कलयितुमशक्तः स तु नरः<br>कथं पारावाराकलनचतुरः स्यादृतमतिः॥ ५९ | हे देवि! सम्पूर्ण संसारमें ऐसा कोई भी निपुण प्राणी नहीं है, जो आपके रूपको जान सके और न तो ऐसा कोई योग्य मनुष्य है, जो आपके नामोंकी संख्याकी गणना करनेमें समर्थ हो। जो थोड़ेसे जलका सन्तरण करनेमें असमर्थ हो, वह बुद्धिसम्पन्न मनुष्य भला महासागरको पार करनेमें कुशल कैसे होगा?॥ ५९॥ |
| न देवानां मध्ये भगवति तवानन्तविभवं<br>विजानात्येकोऽपि त्वमिह भुवनैकासि जननी।<br>कथं मिथ्या विश्वं सकलमपि चैका रचयसि<br>प्रमाणं त्वेतस्मिन्निगमवचनं देवि विहितम्॥ ६० | हे भगवति! आपके अन्तहीन वैभवको जान सकनेमें देवताओंमें कोई भी समर्थ नहीं है। एकमात्र आप समस्त विश्वकी माता हैं। आप अकेले ही इस सम्पूर्ण मिथ्या जगत्की रचना कैसे करती हैं? हे देवि! एकमात्र वेदवाक्य ही आपके इस सृष्टि-कार्यकी प्रामाणिकता सिद्ध करते हैं॥ ६०॥ |
| निरीहैवासि त्वं निखिलजगतां कारणमहो<br>चरित्रं ते चित्रं भगवति मनो नो व्यथयति।<br>कथंकारं वाच्यः सकलनिगमागोचरगुण-<br>प्रभावः स्वं यस्मात्स्वयमपि न जानासि परमम्॥ ६१ | हे भगवति! समग्र जगत्की परम कारणस्वरूपा होती हुई भी आप इच्छारहित हैं। अहो! आपका अद्भुत चरित्र हमारे मनको विस्मित कर देता है। समस्त वेदोंसे भी अज्ञेय आपके गुणों एवं प्रभावोंका वर्णन हमलोग भला किस प्रकार कर सकते हैं; क्योंकि स्वयं आप भी अपने परमतत्त्वको नहीं जानतीं॥ ६१॥ |