देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 98, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 98
| अ० ५ ] | प्रथम स्कन्ध | ८९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देहवान्सुखदुःखानां भोक्ता नैवात्र संशयः।<br>यथा कालवशात्कृत्तं शिरो मे शम्भुना पुरा॥ ४४<br>तथैव लिङ्गपातश्च महादेवस्य शापतः।<br>तथैवाद्य हरेर्मूर्धा पतितो लवणाम्भसि॥ ४५ | प्रत्येक प्राणी काल-क्रमके अनुसार सुख-दुःख भोगता ही है; इसमें कोई सन्देह नहीं है। जिस प्रकार पूर्वकालमें कालकी प्रेरणासे शंकरजीने मेरा मस्तक काट दिया था, उसी प्रकार शापके कारण शिवजीका लिंग कटकर गिर गया था और उसी प्रकार आज विष्णुका सिर [कटकर] लवणसागरमें जा गिरा है॥ ४४-४५॥ |
| सहस्रभगसंप्राप्तिर्दुःखं चैव शचीपतेः।<br>स्वर्गाद् भ्रंशस्तथा वासः कमले मानसे सरे॥ ४६ | [दैवयोगसे ही] इन्द्रको भी सहस्र भगोंकी प्राप्ति हुई। उन्हें दुःख भोगना पड़ा। वे स्वर्गसे च्युत हो गये और मानसरोवरके कमलमें रहने लगे॥ ४६॥ |
| एते दुःखस्य भोक्तारः केन दुःखं न भुज्यते।<br>संसारेऽस्मिन्महाभागास्तस्माच्छोकं त्यजन्तु वै॥ ४७<br>चिन्तयन्तु महामायां विद्यादेवीं सनातनीम्।<br>सा विधास्यति नः कार्यं निर्गुणा प्रकृतिः परा॥ ४८<br>ब्रह्मविद्यां जगद्धात्रीं सर्वेषां जननीं तथा।<br>यया सर्वमिदं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥ ४९ | इस संसारमें जब इन महाभाग देवताओंको भी दुःखका भोग करनेके लिये विवश होना पड़ा तो फिर दुःख भोगनेसे भला कौन वंचित रह सकता है? अतएव आपलोग शोकका परित्याग कर दें और उन महामाया, विद्यारूपा, सनातनी, ब्रह्मविद्या तथा जगत्को धारण करनेवाली देवीका ध्यान कीजिये, जिनके द्वारा यह चराचर सम्पूर्ण त्रिलोक व्याप्त है। वे निर्गुणा परा प्रकृति हमलोगोंका समस्त कार्य सिद्ध कर देंगी॥ ४७-४९॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा वै सुरान्वेधा निगमानादिदेश ह।<br>देहयुक्तानस्थितानग्रे सुरकार्यार्थसिद्धये॥ ५० | **सूतजी बोले—**हे मुनियो! देवताओंसे इस प्रकार कहकर ब्रह्माजीने कार्यकी सिद्धिकी कामनासे अपने सम्मुख सशरीर विद्यमान वेदोंको आदेश दिया॥ ५०॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>स्तुवन्तु परमां देवीं ब्रह्मविद्यां सनातनीम्।<br>गूढाङ्गीं च महामायां सर्वकार्यार्थसाधनीम्॥ ५१ | **ब्रह्माजी बोले—**आपलोग समस्त कार्योंको सिद्ध करनेवाली, पराम्बा, ब्रह्मविद्या, सनातनी तथा निगूढ़ अंगोंवाली महामायाका स्तवन कीजिये॥ ५१॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य वेदाः सर्वाङ्गसुन्दराः।<br>तुष्टुवुर्ज्ञानगम्यां तां महामायां जगत्स्थिताम्॥ ५२ | उनका यह वचन सुनकर समस्त सुन्दर अंगोंवाले वेद जगत्की आधारस्वरूपा तथा ज्ञानगम्या उन महामायाकी स्तुति करने लगे॥ ५२॥ |
| वेदा ऊचुः<br>नमो देवि महामाये विश्वोत्पत्तिकरे शिवे।<br>निर्गुणे सर्वभूतेशि मातः शङ्करकामदे॥ ५३ | **वेदोंने कहा—**हे देवि! हे महामाये! हे विश्वोत्पत्तिकारिणि! हे शिवे! हे निर्गुणे! हे सर्वभूतेश! हे शिवकामार्थ-प्रदायिनि माता! आपको नमस्कार है॥ ५३॥ |
| त्वं भूमिः सर्वभूतानां प्राणाः प्राणवतां तथा।<br>धीः श्रीः कान्तिः क्षमा शान्तिः श्रद्धा मेधा धृतिः स्मृतिः॥ ५४ | आप सभी प्राणियोंको आश्रय देनेके लिये पृथ्वीस्वरूपा हैं तथा प्राणधारियोंमें<br>बुद्धि, श्री, कान्ति, क्षमा, शान्ति,<br>एवं स्मृति सब कुछ आप ही हैं। |