देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 97, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 97
| ८८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दृष्ट्वा कबन्धं विष्णोस्ते विस्मिताः सुरसत्तमाः।<br>चिन्तासागरमग्नाश्च रुरुदुः शोककर्शिताः॥ ३२ | भगवान् विष्णुका सिरविहीन धड़ देखकर वे श्रेष्ठ देवता अत्यन्त विस्मित हुए और चिन्तासागरमें निमग्न होकर शोकाकुल हो [इस प्रकार] विलाप करने लगे—॥ ३२॥ |
| हा नाथ किं प्रभो जातमत्यद्भुतममानुषम्।<br>वैशसं सर्वदेवानां देवदेव सनातन॥ ३३ | हे नाथ! हे प्रभो! यह कैसी विचित्र अलौकिक घटना हो गयी? हे देवाधिदेव! हे सनातन! हम सभी देवताओंके लिये तो यह बात विनाशकारी है॥ ३३॥ |
| मायेयं कस्य देवस्य यया तेऽद्य शिरो हृतम्।<br>अच्छेद्यस्त्वमभेद्योऽसि अप्रदाह्योऽसि सर्वदा॥ ३४ | यह किस देवताकी माया है, जिसके द्वारा आपके सिरका हरण कर लिया गया। आप तो सर्वदा अच्छेद्य, अभेद्य और अदाह्य हैं॥ ३४॥ |
| एवं गते त्वयि विभो मरिष्यन्ति च देवताः।<br>कीदृशस्त्वयि नः स्नेहः स्वार्थेनैव रुदामहे॥ ३५ | हे विभो! इस प्रकार आपके चले जानेपर हम देवता तो मृत्युको प्राप्त हो जायेंगे। हमलोगोंके प्रति आपका कैसा स्नेह था। हमलोग स्वार्थके कारण ही रुदन कर रहे हैं॥ ३५॥ |
| नायं विघ्नः कृतो दैत्यैर्न यक्षैर्न च राक्षसैः।<br>देवैरेव कृतः कस्य दूषणं च रमापते॥ ३६ | संकटकी यह स्थिति न तो दैत्योंने, न यक्षोंने और न राक्षसोंने ही पैदा की है, अपितु हम देवताओंने ही यह विघ्न उत्पन्न किया है; तथापि हे रमापते! इसमें किसका दोष समझा जाय?॥ ३६॥ |
| पराधीनाः सुराः सर्वे किं कुर्मः क्व व्रजाम च।<br>शरणं नैव देवेश सुराणां मूढचेतसाम्॥ ३७ | हम सभी देवता पराश्रित हैं। हम इस समय क्या करें और कहाँ जायें? हे देवेश! हम मूढ़ बुद्धिवाले देवताओंके लिये अब कहीं भी कोई शरण नहीं है॥ ३७॥ |
| न चैषा सात्त्विकी माया राजसी न च तामसी।<br>यया छिन्नं शिरस्तेऽद्य मायेशस्य जगद्गुरोः॥ ३८ | यह कोई सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी माया भी नहीं है, जिसके द्वारा आप मायापति जगद्गुरुका सिर काटा गया है॥ ३८॥ |
| क्रन्दमानांस्तदा दृष्ट्वा देवाञ्छिवपुरोगमान्।<br>बृहस्पतिस्तदोवाच शमयन्वेदवित्तमः॥ ३९<br><br>रुदितेन महाभागाः क्रन्दितेन तथापि किम्।<br>उपायश्चात्र कर्तव्यः सर्वथा बुद्धिगोचरः॥ ४०<br><br>दैवं पुरुषकारश्च देवेश सदृशावुभौ।<br>उपायश्च विधातव्यो दैवात्फलति सर्वथा॥ ४१ | तब शिवसहित समस्त देवताओंको करुण क्रन्दन करते हुए देखकर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ देवगुरु बृहस्पतिने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—हे महाभागो! अब इस प्रकार क्रन्दनसे क्या लाभ है? इस समय तो विवेकका आश्रय लेकर कोई उपाय करना चाहिये। हे देवेन्द्र! भाग्य एवं पुरुषार्थ—दोनों ही समान श्रेणीके हैं फिर भी उपाय करना ही चाहिये और वह दैवयोगसे ही सफल होता है॥ ३९—४१॥ |
| इन्द्र उवाच<br>दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम्।<br>विष्णोरपि शिरश्छिन्नं सुराणां चैव पश्यताम्॥ ४२ | **इन्द्र बोले—**अनर्थकारी पुरुषार्थको धिक्कार है, मैं तो दैवको श्रेष्ठतर मानता हूँ; क्योंकि हम देवताओंके देखते-देखते विष्णुका सिर कट गया॥ ४२॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं कालेनापादितं च यत्।<br>शुभं वाप्यशुभं वापि दैवं कोऽतिक्रमेत्पुनः॥ ४३ | **ब्रह्माजी बोले—**कालद्वारा जो भी शुभाशुभ कर्मोंका फल निर्धारित है, उसे अवश्य ही भोगना पड़ता है; भाग्यका अतिक्रमण कौन कर सकता है?॥ ४३॥ |