देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| ९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| त्वमुद्गीथेऽर्धमात्रासि गायत्री व्याहृतिस्तथा।<br>जया च विजया धात्री लज्जा कीर्तिः स्पृहा दया॥ ५५ | ॐकारमें अर्धमात्राके रूपमें आप ही विराजमान हैं। आप गायत्री, भूः, भुवः, स्वः आदि व्याहृति, जया, विजया, धात्री, लज्जा, कीर्ति, स्पृहा एवं दया सभी कुछ हैं॥ ५५॥ |
| त्वां संस्तुमोऽम्ब भुवनत्रयसंविधान-<br>दक्षां दयारसयुतां जननीं जनानाम्।<br>विद्यां शिवां सकललोकहितां वरेण्यां<br>वाग्बीजवासनिपुणां भवनाशकर्त्रीम्॥ ५६ | हे अम्ब! आप तीनों लोकोंके रचना-तन्त्रमें दक्ष, करुणरससे युक्त, सभी प्राणियोंकी माँ, विद्या, कल्याणी, सभी प्राणियोंकी हितसाधिका, सर्वश्रेष्ठ, वाग्बीजमन्त्रमें वास करनेमें निपुण तथा संसारका क्लेश दूर करनेवाली हैं; आपकी हम स्तुति करते हैं॥ ५६॥ |
| ब्रह्मा हरः शौरिसहस्रनेत्र-<br>वाग्वह्निसूर्या भुवनाधिनाथाः।<br>ते त्वत्कृताः सन्ति ततो न मुख्या<br>माता यतस्त्वं स्थिरजङ्गमानाम्॥ ५७ | ब्रह्मा, शंकर, विष्णु, इन्द्र, सरस्वती, अग्नि, सूर्य तथा सभी भुवनोंके स्वामी आपके द्वारा ही निर्मित किये गये हैं। अतः उनकी अपनी कोई विशेषता नहीं है; आप ही सभी चराचर जगत्की माता हैं॥ ५७॥ |
| सकलभुवनमेतत्कर्तुकामा यदा त्वं<br>सृजसि जननि देवान्विष्णुरुद्राजमुख्यान्।<br>स्थितिलयजननं तैः कारयस्येकरूपा<br>न खलु तव कथंचिद्देवि संसारलेशः॥ ५८ | हे जननि! जब आप जगत्की रचनाकी कामना करती हैं, तब आप सर्वप्रथम ब्रह्मा, विष्णु, महेश—इन प्रमुख देवोंका सृजन करती हैं। उन्हींके माध्यमसे एकमात्र आप ही जगत्का सृजन, पालन एवं संहारकार्य पूर्ण कराती हैं। हे देवि! आपमें संसारका लेशमात्र भी नहीं रहता॥ ५८॥ |
| न ते रूपं वेत्तुं सकलभुवने कोऽपि निपुणो<br>न नाम्नां संख्यां ते कथितुमिह योग्योऽस्ति पुरुषः।<br>यदल्पं कीलालं कलयितुमशक्तः स तु नरः<br>कथं पारावाराकलनचतुरः स्यादृतमतिः॥ ५९ | हे देवि! सम्पूर्ण संसारमें ऐसा कोई भी निपुण प्राणी नहीं है, जो आपके रूपको जान सके और न तो ऐसा कोई योग्य मनुष्य है, जो आपके नामोंकी संख्याकी गणना करनेमें समर्थ हो। जो थोड़ेसे जलका सन्तरण करनेमें असमर्थ हो, वह बुद्धिसम्पन्न मनुष्य भला महासागरको पार करनेमें कुशल कैसे होगा?॥ ५९॥ |
| न देवानां मध्ये भगवति तवानन्तविभवं<br>विजानात्येकोऽपि त्वमिह भुवनैकासि जननी।<br>कथं मिथ्या विश्वं सकलमपि चैका रचयसि<br>प्रमाणं त्वेतस्मिन्निगमवचनं देवि विहितम्॥ ६० | हे भगवति! आपके अन्तहीन वैभवको जान सकनेमें देवताओंमें कोई भी समर्थ नहीं है। एकमात्र आप समस्त विश्वकी माता हैं। आप अकेले ही इस सम्पूर्ण मिथ्या जगत्की रचना कैसे करती हैं? हे देवि! एकमात्र वेदवाक्य ही आपके इस सृष्टि-कार्यकी प्रामाणिकता सिद्ध करते हैं॥ ६०॥ |
| निरीहैवासि त्वं निखिलजगतां कारणमहो<br>चरित्रं ते चित्रं भगवति मनो नो व्यथयति।<br>कथंकारं वाच्यः सकलनिगमागोचरगुण-<br>प्रभावः स्वं यस्मात्स्वयमपि न जानासि परमम्॥ ६१ | हे भगवति! समग्र जगत्की परम कारणस्वरूपा होती हुई भी आप इच्छारहित हैं। अहो! आपका अद्भुत चरित्र हमारे मनको विस्मित कर देता है। समस्त वेदोंसे भी अज्ञेय आपके गुणों एवं प्रभावोंका वर्णन हमलोग भला किस प्रकार कर सकते हैं; क्योंकि स्वयं आप भी अपने परमतत्त्वको नहीं जानतीं॥ ६१॥ |
| अ० ५ ] | प्रथम स्कन्ध | ९१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न किं जानासि त्वं जननि मधुजिन्मौलिपतनं<br>शिवे किं वा ज्ञात्वा विविदिषसि शक्तिं मधुजितः।<br>हरेः किं वा मातर्दुरितततिरेषा बलवती<br>भवत्याः पादाब्जे भजननिपुणे क्वास्ति दुरितम्॥ ६२ | हे जननि! क्या आप भगवान् विष्णुके शिरोच्छेदनकी घटना नहीं जानती हैं? हे शिवे! अथवा क्या यह जानकर भी आप मधुजित् विष्णुकी शक्तिकी परीक्षा करना चाहती हैं? हे माता! अथवा क्या यह विष्णुके महान् पापसमूहका फल है? किंतु आपके चरणकमलोंका भजन करनेमें निपुण प्राणीसे तो पाप हो ही नहीं सकता॥ ६२॥ |
| उपेक्षा किं चेयं तव सुरसमूहेऽतिविषमा<br>हरेर्मूर्ध्नो नाशो मतमिह महाश्चर्यजनकम्।<br>महद्दुःखं मातस्त्वमसि जननच्छेदकुशला<br>न जानीमो मौलेर्विघटनविलम्बः कथमभूत्॥ ६३ | हे माता! आप इस देवसमूहकी भारी उपेक्षा क्यों कर रही हैं? भगवान् विष्णुके मस्तक कटनेकी घटना हमारे लिये अत्यन्त आश्चर्यजनक तथा महान् कष्टदायक बात है। हे माता! आप जननरूपी दुःखका नाश करनेमें कुशल हैं, अब हम यह नहीं जान पा रहे हैं कि विष्णुके सिर-संयोजनमें विलम्ब क्यों हो रहा है?॥ ६३॥ |
| ज्ञात्वा दोषं सकलसुरतापादितं देवि चित्ते<br>किं वा विष्णावमरजनितं दुष्कृतं पातितं ते।<br>विष्णोर्वा किं समरजनितः कोऽपि गर्वोऽतिवेगा-<br>च्छेत्तुं मातस्तव विलसितं नैव विद्मोऽत्र भावम्॥ ६४ | हे देवि! सभी देवताओंके देवताभिमानरूपी दोषको अपने मनमें समझकर आपने ही ऐसा किया है, अथवा देवजन्य दुष्कृतको विष्णुमें स्थापित किया है, अथवा विष्णुको संग्राम-विजय करनेका अहंकार हो गया था, जिसे अतिशीघ्र दूर करनेके लिये आपने यह लीला रची है। हे माता! हम आपके मनोभावोंको समझनेमें पूर्णतया असमर्थ हैं॥ ६४॥ |
| किं वा दैत्यैः समरविजितैस्तीर्थदेशे सुरम्ये<br>घोरं तप्त्वा भगवति वरं लब्धवद्भिर्भवत्याः।<br>अन्तर्धानं गमितमधुना विष्णुशीर्षं भवानि<br>द्रष्टुं किं वा विगतशिरसं वासुदेवं विनोदः॥ ६५ | हे भगवति! अथवा युद्धमें पराभूत किये गये दैत्योंने किसी मनोहर तीर्थमें घोर तपस्या करके आपसे वरदान प्राप्त कर लिया है, जो विष्णुके सिर कटनेका कारण बना। हे भवानि! अथवा विष्णुको सिरविहीनरूपमें देखनेके लिये आप इस समय कोई विनोद कर रही हैं॥ ६५॥ |
| सिन्धोः पुत्र्यां रोषिता किं त्वमाद्ये<br> कस्मादेनां प्रेक्षसे नाथहीनाम्।<br>क्षन्तव्यस्ते स्वांशजातापराधो<br> व्युत्थाप्यैनं मोदितां मां कुरुष्व॥ ६६ | हे आद्ये! आप सिंधुसुता लक्ष्मीपर किसी कारणसे आक्रोशित तो नहीं हैं। आप उन्हें स्वामीविहीन किसलिये देखना चाह रही हैं? आप अपने ही अंशसे प्रादुर्भूत लक्ष्मीका अपराध क्षमा करें और भगवान् विष्णुको जीवनदान देकर रमाको प्रसन्न कर दें॥ ६६॥ |
| एते सुरास्त्वां सततं नमन्ति<br> कार्येषु मुख्याः प्रथितप्रभावाः।<br>शोकार्णवात्तारय देवि देवा-<br> नुत्थाप्य देवं सकलाधिनाथम्॥ ६७ | जगत्के समस्त कार्योंको सम्पादित करनेमें प्रमुख भूमिकावाले अतिशय प्रभावशाली ये देवता आपको निरन्तर नमस्कार करते हैं। हे देवि! सर्वलोकाधिपति विष्णुको जीवित करके आप देवताओंको शोकसागरसे पार कीजिये॥ ६७॥ |
| ९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| मूर्धा गतः क्वाम्ब हरेर्न विद्मो<br>नान्योऽस्त्युपायः खलु जीवनेऽद्य।<br>यथा सुधा जीवनकर्मदक्षा<br>तथा जगज्जीवितदासि देवि ॥ ६८ | हे अम्ब! भगवान् विष्णुका सिर छिन्न होकर कहाँ चला गया—यह हम नहीं जानते हैं और इस समय इन्हें जीवित करनेके लिये अन्य कोई युक्ति भी नहीं सूझ रही है। हे देवि! मृत प्राणीको जीवित करनेमें जिस प्रकार अमृत समर्थ है, उसी प्रकार समग्र संसारकी आप जीवनदात्री हैं॥ ६८॥ | | सूत उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी गुणातीता महेश्वरी।<br>प्रसन्ना परमा माया वेदैः साङ्गैश्च सामगैः ॥ ६९ | सूतजी बोले—हे मुनियो! इस प्रकार सामगान-निपुण सांगवेदोंद्वारा स्तुति किये जानेसे गुणातीता, महेश्वरी, परात्परा महामाया भगवती प्रसन्न हो गयीं॥ ६९॥ | | तानुवाच तदा वाणी चाकाशस्थाशरीरिणी।<br>देवान्प्रति सुखैः शब्दैर्जनानन्दकरी शुभा ॥ ७० | उसी समय देवताओंको सुख प्रदान करनेवाले शब्दोंसे युक्त और भक्तजनोंको आनन्दित करनेवाली आकाशस्थित अशरीरिणी शुभ वाणीने उनसे कहा॥ ७०॥ | | मा कुरुध्वं सुराश्चिन्तां स्वस्थास्तिष्ठन्तु चामराः।<br>स्तुताहं निगमैः कामं सन्तुष्टास्मि न संशयः ॥ ७१ | हे देवताओ! आप लोग किसी प्रकारकी चिन्ता न करें और स्वस्थचित्त रहें। हे अमरगण! इन वेदोंके भावपूर्ण स्तवनसे मैं परम प्रसन्न हो गयी हूँ, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है॥ ७१॥ | | यः पुमान्मानुषे लोके स्तौत्येतां मामकीं स्तुतिम्।<br>पठिष्यति सदा भक्त्या सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ ७२ | मनुष्यलोकमें जो प्राणी इस स्तुतिसे मेरी आराधना करेगा अथवा भक्तिपूर्वक इसका पाठ करेगा, उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जायँगी॥ ७२॥ | | शृणोति वा स्तोत्रमिदं मदीयं<br>भक्त्या त्रिकालं सततं नरो यः।<br>विमुक्तदुःखः स भवेत्सुखी च<br>वेदोक्तमेतन्ननु वेदतुल्यम् ॥ ७३ | जो मनुष्य त्रिकाल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) मेरी स्तुतिको नित्य भक्तिपूर्वक सुनेगा, वह सभी दुःखोंसे विमुक्त होकर परम सुखी हो जायगा। वेदोंद्वारा उच्चारित किये जानेके कारण यह स्तुति वेदोंके समान ही है॥ ७३॥ | | शृण्वन्तु कारणं चाद्य यद्गतं वदनं हरेः।<br>अकारणं कथं कार्यं संसारेऽत्र भविष्यति ॥ ७४ | हे देवो! अब आप विष्णुके शिरोच्छेदका कारण सुनिये; क्योंकि इस लोकमें बिना कारण कोई कार्य कैसे हो सकता है?॥ ७४॥ | | उदधेस्तनयां विष्णुः संस्थितामन्तिके प्रियाम्।<br>जहास वदनं वीक्ष्य तस्यास्तत्र मनोरमम् ॥ ७५ | एक बार अपने समीप बैठी हुई अपनी प्रियतमा सागरपुत्री लक्ष्मीका चित्ताकर्षक मुख देखकर भगवान् विष्णु हँस पड़े॥ ७५॥ | | तया ज्ञातं हरिनूनं कथं मां हसति प्रभुः।<br>विरूपं हरिणा दृष्टं मुखं मे केन हेतुना ॥ ७६<br><br>विनापि कारणेनाद्य कथं हास्यस्य सम्भवः।<br>सपत्नीव कृता तेन मन्येऽन्या वरवर्णिनी ॥ ७७ | उन्होंने सोचा कि भगवान् विष्णु मुझे देखकर क्यों हँस पड़े? मेरे मुखमें विष्णुजीद्वारा दोष देखे जानेका आखिर क्या कारण हो सकता है? और फिर बिना किसी कारणके उनका हँसना सम्भव नहीं हो सकता। मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने किसी अन्य सुन्दर स्त्रीको मेरी सौत बना लिया है॥ ७६-७७॥ |
| अ० ५ ] | प्रथम स्कन्ध | ९३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः कोपयुता जाता महालक्ष्मी तमोगुणा।<br>तामसी तु तदा शक्तिस्तस्या देहे समाविशत्॥ ७८ | इसी विचार-मन्थनके परिणामस्वरूप लक्ष्मीजी कोपाविष्ट हो गयीं और तब उनके शरीरमें तमोगुणसम्पन्न तामसी शक्ति व्याप्त हो गयी॥ ७८॥ |
| केनचित्कालयोगेन देवकार्यार्थसिद्धये।<br>प्रविष्टा तामसी शक्तिस्तस्या देहेऽतिदारुणा॥ ७९ | तदनन्तर किसी दैवयोगके प्रभावसे देवताओंके कार्य-साधनके उद्देश्यसे ही उनके शरीरमें अत्यन्त उग्र तामसी शक्ति प्रविष्ट हुई॥ ७९॥ |
| तामस्याविष्टदेहा सा चुकोपातिशयं तदा।<br>शनकैः समुवाचेदमिदं पततु ते शिरः॥ ८० | तब लक्ष्मीजीके शरीरमें तामसी शक्तिका समावेश हो जानेके कारण वे अत्यन्त क्रोधित हो उठीं और उन्होंने मन्द स्वरमें यह कहा—'तुम्हारा यह सिर कटकर गिर जाय'॥ ८०॥ |
| स्त्रीस्वभावाच्च भावित्वात्कालयोगाद्विनिर्गतः।<br>अविचार्य तदा दत्तः शापः स्वसुखनाशनः॥ ८१<br><br>सपत्नीसम्भवं दुःखं वैधव्यादधिकं त्विति।<br>विचिन्त्य मनसेत्युक्तं तामसीशक्तियोगतः॥ ८२ | स्त्रीस्वभावके कारण, भावीवश तथा संयोगसे बिना सोचे-समझे ही लक्ष्मीजीने अपने ही सुखको विनष्ट करनेवाला शाप दे दिया। सौतके व्यवहारादिसे उत्पन्न होनेवाला दुःख वैधव्यसे भी बढ़कर होता है। मनमें ऐसा सोचकर तथा शरीरपर तामसी शक्तिका प्रभाव रहनेके कारण उन्होंने ऐसा कह दिया था॥ ८१-८२॥ |
| अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभता।<br>अशौचं निर्दयत्वं च स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः॥ ८३ | मिथ्याचरण, साहस, माया, मूर्खता, अतिलोभ, अपवित्रता तथा दयाहीनता—ये स्त्रियोंके स्वाभाविक दोष हैं॥ ८३॥ |
| सशीर्षं वासुदेवं तं करोम्यद्य यथा पुरा।<br>शिरोऽस्य शापयोगेन निमग्नं लवणाम्बुधौ॥ ८४ | अब मैं उन वासुदेवको पूर्वकी भाँति सिरयुक्त कर देती हूँ। इनका सिर पूर्वशापके कारण लवणसागरमें डूब गया है॥ ८४॥ |
| अन्यच्च कारणं किञ्चिद्वर्त्तते सुरसत्तमाः।<br>भवतां च महत्कार्यं भविष्यति न संशयः॥ ८५ | हे श्रेष्ठ देवताओ! इस घटनाके होनेमें एक अन्य भी कारण है। आपलोगोंका महान् कार्य अवश्य सिद्ध होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ ८५॥ |
| पुरा दैत्यो महाबाहुर्हयग्रीवोऽतिविश्रुतः।<br>तपश्चक्रे सरस्वत्यास्तीरे परमदारुणम्॥ ८६ | प्राचीन कालमें महाबाहु एवं अति प्रसिद्ध हयग्रीव नामवाला एक दानव था, जो सरस्वतीनदीके तटपर बहुत कठोर तपस्या करने लगा॥ ८६॥ |
| जपनेकाक्षरं मन्त्रं मायाबीजात्मकं मम।<br>निराहारो जितात्मा च सर्वभोगविवर्जितः॥ ८७ | वह दैत्य आहारका त्यागकर समस्त इन्द्रियोंको वशमें करके तथा सभी प्रकारके भोगैश्वर्यसे दूर रहते हुए मेरे मायाबीजात्मक एकाक्षर मन्त्र (ह्रीं)-का जप करता रहा॥ ८७॥ |
| ध्यायन्मां तामसीं शक्तिं सर्वभूषणभूषिताम्।<br>एवं वर्षसहस्रं च तपश्चक्रेऽतिदारुणम्॥ ८८ | इस प्रकार समस्त आभूषणोंसे विभूषित मेरी तामसी शक्तिका सतत ध्यान करता हुआ वह एक हजार वर्षोंतक कठोर तप करता रहा॥ ८८॥ |
| ९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| तदाहं तामसं रूपं कृत्वा तत्र समागता।<br>दर्शने पुरतस्तस्य ध्यातं तत्तेन यादृशम्॥ ८९ | उस समय उस दैत्यने जिस रूपमें मेरा ध्यान किया था, उसी तामसरूपमें उसे दर्शन देनेहेतु उसके समक्ष मैं प्रकट हुई॥ ८९॥ |
| सिंहोपरि स्थिता तत्र तमवोचं दयान्विता।<br>वरं ब्रूहि महाभाग ददामि तव सुव्रत॥ ९० | उस समय सिंहपर आरूढ़ हुई मैंने दयापूर्वक उससे कहा—हे महाभाग! तुम वरदान माँगो; हे सुव्रत! मैं तुम्हें यथेच्छ वरदान दूँगी॥ ९०॥ |
| इति श्रुत्वा वचो देव्या दानवः प्रेमपूरितः।<br>प्रदक्षिणां प्रणामं च चकार त्वरितस्तदा॥ ९१<br><br>दृष्ट्वा रूपं मदीयं स प्रेमोत्फुल्लविलोचनः।<br>हर्षाश्रूपूर्णनयनस्तुष्टाव स च मां तदा॥ ९२ | वह दानव देवीका यह वचन सुनकर प्रेमविह्वल हो उठा और उसने तत्काल प्रणाम और प्रदक्षिणा की। मेरा रूप देखते ही प्रेमभावनाके कारण प्रफुल्लित नेत्रोंवाला तथा हर्षातिरेकके कारण अश्रुपूरित नयनोंवाला वह दानव मेरी स्तुति करने लगा॥ ९१-९२॥ |
| हयग्रीव उवाच<br>नमो देव्यै महामाये सृष्टिस्थित्यन्तकारिणि।<br>भक्तानुग्रहचतुरे कामदे मोक्षदे शिवे॥ ९३ | **हयग्रीव बोला—**हे महामाये! हे जगत्का सृजन-पालन-संहार करनेवाली! हे भक्तोंपर कृपा करनेमें निपुण! हे सकल कामनाप्रदायिनि! हे मोक्षदायिनि! हे शिवे! आप देवीको नमस्कार है॥ ९३॥ |
| धराम्बुतेजःपवनखपञ्चानां च कारणम्।<br>त्वं गन्धरसरूपाणां कारणं स्पर्शशब्दयोः॥ ९४ | पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश—इन पाँच महाभूतोंका कारण आप ही हैं तथा गन्ध, रस, रूप, स्पर्श एवं शब्द—इन तत्त्वोंका कारण भी आप ही हैं॥ ९४॥ |
| घ्राणं च रसना चक्षुस्त्वक्श्रोत्रमिन्द्रियाणि च।<br>कर्मेन्द्रियाणि चान्यानि त्वत्तः सर्वं महेश्वरि॥ ९५ | हे महेश्वरि! नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान—ये ज्ञानेन्द्रियाँ तथा हाथ, पैर, वाक्, लिंग, गुदा—ये कर्मेन्द्रियाँ आपसे ही उत्पन्न हैं॥ ९५॥ |
| देव्युवाच<br>किं तेऽभीष्टं वरं ब्रूहि वाञ्छितं यद्ददामि तत्।<br>परितुष्टास्मि भक्त्या ते तपसा चाद्भुतेन च॥ ९६ | **देवी बोलीं—**तुम्हारा क्या अभीष्ट है? जो कुछ भी तुम्हारा अभिलषित वर हो, माँग लो। मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगी; क्योंकि मैं तुम्हारी अनन्य भक्ति तथा अद्भुत तपस्यासे अतिशय प्रसन्न हूँ॥ ९६॥ |
| हयग्रीव उवाच<br>यथा मे मरणं मातर्न भवेत्तत्तथा कुरु।<br>भवेयममरो योगी तथाजेयः सुरासुरैः॥ ९७ | **हयग्रीव बोला—**हे माता! आप मुझे वैसा वरदान दें, जिससे मेरी मृत्यु कभी न हो और देव-दानवोंद्वारा अपराजेय रहता हुआ मैं सदाके लिये अमर योगी हो जाऊँ॥ ९७॥ |
| देव्युवाच<br>जातस्य हि ध्रुवं मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।<br>मर्यादा चेदृशी लोके भवेच्च कथमन्यथा॥ ९८ | **देवी बोलीं—**जन्म लेनेवालेकी मृत्यु निश्चित है और मरनेवालेका जन्म भी निश्चित है। लोकमें स्थापित इस प्रकारकी मर्यादाका उल्लंघन कैसे सम्भव है?॥ ९८॥ |
| एवं त्वं निश्चयं कृत्वा मरणे राक्षसोत्तम।<br>वरं वरय चेष्टं ते विचार्य मनसा किल॥ ९९ | अतएव हे दानवश्रेष्ठ! मृत्युको अवश्यम्भावी जानकर अपने मनमें सम्यक् विचार करके तुम अन्य यथेच्छ वर माँग लो॥ ९९॥ |
| अ० ५ ] | प्रथम स्कन्ध | ९५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हयग्रीव उवाच<br>हयग्रीवाच्च मे मृत्युर्नान्यस्माज्जगदम्बिके।<br>इति मे वाञ्छितं कामं पूरयस्व मनोगतम्॥ १०० | हयग्रीव बोला—हे जगदम्बे! मेरी मृत्यु हयग्रीवसे ही हो, किसी अन्यसे नहीं। मेरी इसी मनोवांछित कामनाको आप पूर्ण करें॥ १००॥ |
| देव्युवाच<br>गृहं गच्छ महाभाग कुरु राज्यं यथासुखम्।<br>हयग्रीवादृते मृत्युर्न ते नूनं भविष्यति॥ १०१ | देवी बोलीं—हे महाभाग! अपने घर जाकर अब तुम सुखपूर्वक राज्य करो। हयग्रीवके अतिरिक्त अन्य किसीसे भी तुम्हारी कदापि मृत्यु नहीं होगी॥ १०१॥ |
| इति दत्त्वा वरं तस्मा अन्तर्धानं गता तथा।<br>मुदं परमिकां प्राप्य सोऽपि स्वभवनं गतः॥ १०२ | उस दैत्यको यह वरदान देकर मैं अन्तर्धान हो गयी और वह भी परम प्रसन्न होकर अपने घर लौट गया॥ १०२॥ |
| स पीडयति दुष्टात्मा मुनीन् वेदांश्च सर्वशः।<br>न कोऽपि विद्यते तस्य हन्ताद्य भुवनत्रये॥ १०३ | वह दुष्टात्मा इस समय मुनिजनों तथा वेदोंको हर प्रकारसे पीड़ित कर रहा है और तीनों लोकोंमें कोई भी ऐसा नहीं है, जो उसका संहार कर सके॥ १०३॥ |
| तस्माच्छीर्षं हयस्यास्य समुद्धृत्य मनोहरम्।<br>देहेऽत्र विशिरोविष्णोस्त्वष्टा संयोजयिष्यति॥ १०४ | अतः त्वष्टा इस अश्वका मनोहर सिर अलग करके उसे इन सिरविहीन विष्णुके धड़पर संयोजित कर देंगे॥ १०४॥ |
| हयग्रीवोऽथ भगवान्हनिष्यति तमासुरम्।<br>पापिष्ठं दानवं क्रूरं देवानां हितकाम्यया॥ १०५ | तत्पश्चात् देवताओंके कल्याणार्थ भगवान् हयग्रीव उस पापात्मा, अत्यन्त क्रूर तथा दानवी स्वभाववाले महा असुर हयग्रीवका संहार करेंगे॥ १०५॥ |
| सूत उवाच<br>एवं सुरांस्तदाभाष्य शर्वाणी विरराम ह।<br>देवास्तदातिसन्तुष्टास्तमूचुर्देवशिल्पिनम् ॥ १०६ | सूतजी बोले—देवताओंसे इस प्रकार कहकर भगवती शान्त हो गयीं और इसके बाद देवगण परम सन्तुष्ट होकर देवशिल्पी विश्वकर्मासे बोले॥ १०६॥ |
| देवा ऊचुः<br>कुरु कार्यं सुराणां वै विष्णोः शीर्षाभियोजनम्।<br>दानवप्रवरं दैत्यं हयग्रीवो हनिष्यति॥ १०७ | देवताओंने कहा—आप विष्णुके धड़पर घोड़ेका सिर जोड़कर देवताओंका कार्य कीजिये। वे भगवान् हयग्रीव ही दानवश्रेष्ठ दैत्यका वध करेंगे॥ १०७॥ |
| सूत उवाच<br>इति श्रुत्वा वचस्तेषां त्वष्टा चातित्वरान्वितः।<br>वाजिशीर्षं चकत्ताशु खड्गेन सुरसन्निधौ॥ १०८<br>विष्णोः शरीरे तेनाशु योजितं वाजिमस्तकम्।<br>हयग्रीवो हरिर्जातो महामायाप्रसादतः॥ १०९ | सूतजी बोले—देवताओंका यह वचन सुनकर विश्वकर्माने अतिशीघ्रतापूर्वक अपने खड्गसे देवताओंके सामने ही घोड़ेका सिर काटा। तत्पश्चात् उन्होंने घोड़ेका वह सिर अविलम्ब विष्णुभगवान्के शरीरमें संयोजित कर दिया और इस प्रकार महामाया भगवतीकी कृपासे वे भगवान् विष्णु हयग्रीव हो गये॥ १०८-१०९॥ |
| कियता तेन कालेन दानवो मददर्पितः।<br>निहतस्तरसा संख्ये देवानां रिपुरोजसा॥ ११० | कुछ समय बाद उन भगवान् हयग्रीवने अहंकारके मदमें चूर उस देवशत्रु दानवका युद्धभूमिमें अपने तेजसे वध कर दिया॥ ११०॥ |
| य इदं शुभमाख्यानं शृण्वन्ति भुवि मानवाः।<br>सर्वदुःखविनिर्मुक्तास्ते भवन्ति न संशयः॥ १११ | इस संसारमें जो प्राणी इस पवित्र कथाका श्रवण करते हैं, वे समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं; इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है॥ १११॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां प्रथमस्कन्धे हयग्रीवावतारकथनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
| ९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| महामायाचरित्रञ्च पवित्रं पापनाशनम्।<br><br>पठतां शृण्वतां चैव सर्वसम्पत्तिकारकम्॥ ११२ | महामाया भगवतीका चरित्र अति पावन है तथा पापोंका नाश कर देता है। इस चरित्रका पाठ तथा श्रवण करनेवाले प्राणियोंको सभी प्रकारकी सम्पदाएँ अनायास ही प्राप्त हो जाती हैं॥ ११२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां प्रथमस्कन्धे हयग्रीवावतारकथनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
शेषशायी भगवान् विष्णुके कर्णमलसे मधु-कैटभकी उत्पत्ति तथा उन दोनोंका ब्रह्माजीसे युद्धके लिये तत्पर होना
| ऋषय ऊचुः<br>सौम्य यच्च त्वया प्रोक्तं शौरेर्युद्धं महार्णवे।<br>मधुकैटभयोः सार्धं पञ्चवर्षसहस्रकम्॥ १ | **ऋषिगण बोले—**हे सौम्य! आपने मधु और कैटभके साथ भगवान् विष्णुद्वारा महासिन्धुमें पाँच हजार वर्षोंतक युद्ध किये जानेकी पहले चर्चा की थी॥ १॥ |
| कस्मात्तौ दानवौ जातौ तस्मिन्नेकार्णवे जले।<br>महावीर्यौ दुराधर्षौ देवैरपि सुदुर्जयौ॥ २ | महावीर्यसम्पन्न, किसीसे भी पराभूत न होनेवाले तथा देवताओंसे भी अपराजेय वे दोनों दानव उस एकार्णवके जलमें किससे प्रादुर्भूत हुए?॥ २॥ |
| कथं तावसुरौ जातौ कथं च हरिणा हतौ।<br>तदाचक्ष्व महाप्राज्ञ चरितं परमाद्भुतम्॥ ३ | वे असुर क्यों उत्पन्न हुए तथा भगवान्के द्वारा उनका वध क्यों किया गया? हे महामते! आप यह परम अद्भुत आख्यान हमको सुनाइये॥ ३॥ |
| श्रोतुकामा वयं सर्वे त्वं वक्ता च बहुश्रुतः।<br>दैवाच्चात्रैव संजातः संयोगश्च तथावयोः॥ ४ | हमलोग यह कथा सुननेको इच्छुक हैं और आप अति प्रसिद्ध वक्ता हैं। हमारा और आपका यह सम्पर्क दैवयोगसे ही हुआ है॥ ४॥ |
| मूर्खेण सह संयोगो विषादपि सुदुर्ज्जरः।<br>विज्ञेन सह संयोगः सुधारससमः स्मृतः॥ ५ | मूर्खके साथ स्थापित किया गया सम्पर्क विषसे भी अधिक अनिष्टकर होता है और इसके विपरीत विद्वानोंका सम्पर्क पीयूषरसके तुल्य माना गया है॥ ५॥ |
| जीवन्ति पशवः सर्वे खादन्ति मेहयन्ति च।<br>जानन्ति विषयाकारं व्यवायसुखमद्भुतम्॥ ६<br><br>न तेषां सदसज्ज्ञानं विवेको न च मोक्षदः।<br>पशुभिस्ते समा ज्ञेया येषां न श्रवणादरः॥ ७ | पशु भी जीवनयापन करते हैं, वे भी आहार ग्रहण करते हैं, मल-मूत्रादिका विसर्जन करते हैं और विषयासक्त होकर इन्द्रियजन्य सुखकी अनुभूति करते हैं; किंतु उनमें अच्छे-बुरेका लेशमात्र भी ज्ञान नहीं होता तथा वे मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले विवेकसे भी रहित होते हैं। अतएव उत्तम बातोंको सुननेमें जो लोग श्रद्धा-भाव नहीं रखते, उन्हें पशु-तुल्य ही समझना चाहिये॥ ६-७॥ |
अ० ६ ] प्रथम स्कन्ध ९७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मृगाद्याः पशवः केचिज्जानन्ति श्रावणं सुखम्।<br>अश्रोत्राः फणिनश्चैव मुमुहुर्नादपानतः॥ ८ | मृग आदि बहुत-से पशु श्रवण-सुखका अनुभव करते हैं और कानविहीन सर्प भी ध्वनि सुनकर मुग्ध हो जाते हैं॥ ८॥ |
| पञ्चानामिन्द्रियाणां वै शुभे श्रवणदर्शने।<br>श्रवणाद्वस्तुविज्ञानं दर्शनाच्चित्तरञ्जनम्॥ ९ | पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंमें श्रवणेन्द्रिय तथा दर्शनेन्द्रिय—दोनों ही शुभ होती हैं; क्योंकि सुननेसे वस्तुओंका ज्ञान प्राप्त होता है और देखनेसे मनोरंजन होता है॥ ९॥ |
| श्रवणं त्रिविधं प्रोक्तं सात्त्विकं राजसं तथा।<br>तामसं च महाभाग सुज्ञैरुक्तं निश्चयान्वितम्॥ १० | हे महाभाग! विद्वानोंने निर्धारित करके कहा है कि सात्त्विक, राजस तथा तामस भेदानुसार श्रवण तीन प्रकारका होता है॥ १०॥ |
| सात्त्विकं वेदशास्त्रादि साहित्यं चैव राजसम्।<br>तामसं युद्धवार्ता च परदोषप्रकाशनम्॥ ११ | वेद-शास्त्रादिका श्रवण सात्त्विक, साहित्यका श्रवण राजस तथा युद्धसम्बन्धी बातों एवं दूसरोंकी निन्दाका श्रवण तामस कहा गया है॥ ११॥ |
| सात्त्विकं त्रिविधं प्रोक्तं प्रज्ञावद्भिश्च पण्डितैः।<br>उत्तमं मध्यमं चैव तथैवाधममित्युत॥ १२ | प्रज्ञावान् पण्डितोंद्वारा सात्त्विक श्रवणके भी उत्तम, मध्यम तथा अधम—ये तीन प्रकार बताये गये हैं॥ १२॥ |
| उत्तमं मोक्षफलदं स्वर्गदं मध्यमं तथा।<br>अधमं भोगदं प्रोक्तं निर्णीय विदितं बुधैः॥ १३ | उत्तम श्रवण मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला, मध्यम श्रवण स्वर्ग देनेवाला तथा अधम श्रवण भोगोंकी उपलब्धि करानेवाला कहा गया है। विद्वानोंने अच्छी तरह सोच-समझकर ऐसा निर्धारण किया है॥ १३॥ |
| साहित्यं चैव त्रिविधं स्वीयायां चोत्तमं स्मृतम्।<br>मध्यमं वारयोषायां परोढायां तथाधमम्॥ १४ | साहित्य भी तीन प्रकारका होता है। जिस साहित्यमें स्वकीया नायिकाका वर्णन हो वह उत्तम, जिस साहित्यमें वेश्याओंका वर्णन हो वह मध्यम तथा जिस साहित्यमें परस्त्रीवर्णन हो, वह अधम साहित्य कहा गया है॥ १४॥ |
| तामसं त्रिविधं ज्ञेयं विद्वद्भिः शास्त्रदर्शिभिः।<br>आततायिनियुद्धं यत्तदुत्तममुदाहृतम्॥ १५<br><br>मध्यमं चापि विद्वेषात्पाण्डवानां तथारिभिः।<br>अधमं निर्निमित्तं तु विवादे कलहे तथा॥ १६ | शास्त्रोंके परम निष्णात विद्वानोंने तामस श्रवणके तीन भेद बतलाये हैं। किसी पापाचारीके संहारसे सम्बन्धित युद्धवर्णनका श्रवण उत्तम, कौरव-पाण्डवोंकी तरह द्वेषके कारण शत्रुतामें युद्धवर्णनका श्रवण मध्यम तथा अकारण विवाद एवं कलहसे हुए युद्धके वर्णनका श्रवण अधम कहा गया है॥ १५-१६॥ |
| तदत्र श्रवणं मुख्यं पुराणस्य महामते।<br>बुद्धिप्रवर्धनं पुण्यं ततः पापप्रणाशनम्॥ १७ | हे महामते! इनमें पुराणोंके श्रवणकी ही प्रधानता मानी गयी है; क्योंकि इनके श्रवणसे बुद्धिका विकास होता है, पुण्य प्राप्त होता है और समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं॥ १७॥ |
| तदाख्याहि महाबुद्धे कथां पौराणिकीं शुभाम्।<br>श्रुतां द्वैपायनात्पूर्वं सर्वार्थस्य प्रसाधिनीम्॥ १८ | अतएव हे महामते! पूर्वकालमें द्वैपायन महर्षि व्याससे सुनी हुई समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाली परम पवित्र पौराणिक कथा कहिये॥ १८॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—4 A
९८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ६
९८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ६
| सूत उवाच<br>यूयं धन्या महाभागा धन्योऽहं पृथिवीतले।<br>येषां श्रवणबुद्धिश्च ममापि कथने किल॥ १९ | सूतजी बोले—हे महाभाग! इस पृथ्विलोकमें आप-लोग धन्य हैं और मैं भी धन्य हूँ; क्योंकि आपलोगोंमें कथा-श्रवणके प्रति और मुझमें कथा-वाचनके प्रति विवेक जाग्रत् हुआ है॥ १९॥ |
| पुरा चैकार्णवे जाते विलीने भुवनत्रये।<br>शेषपर्यङ्कसुप्ते च देवदेवे जनार्दने॥ २०<br><br>विष्णुकर्णमलोद्भूतौ दानवौ मधुकैटभौ।<br>महाबलौ च तौ दैत्यौ विवृद्धौ सागरे जले॥ २१ | पूर्वकालमें प्रलयावस्थामें जब तीनों लोक महाजलराशिमें विलीन हो गये और देवाधिदेव भगवान् विष्णु शेष-शय्यापर सो गये तब विष्णुके कानोंकी मैलसे मधु-कैटभ नामक दो दानव उत्पन्न हुए और वे महाबली दैत्य उस महासागरमें बढ़ने लगे॥ २०-२१॥ |
| क्रीडमानौ स्थितौ तत्र विचरन्तावितस्ततः।<br>तावेकदा महाकायौ क्रीडासक्तौ महार्णवे॥ २२<br><br>चिन्तामवापतुश्चित्ते भ्रातराविव संस्थितौ।<br>नाकारणं भवेत्कार्यं सर्वत्रैषा परम्परा॥ २३ | वे दोनों दैत्य क्रीडा करते हुए उसी सागरमें इधर-उधर भ्रमण करते रहे। एक बार क्रीडापरायण विशाल शरीरवाले उन दोनों भाइयोंने विचार किया कि बिना किसी कारणके कोई भी कार्य नहीं होता; यह एक सार्वत्रिक परम्परा है॥ २२-२३॥ |
| आधेयं तु विनाधारं न तिष्ठति कथञ्चन।<br>आधाराधेयभावस्तु भाति नो चित्तगोचरः॥ २४ | बिना किसी आधारके आधेयकी सत्ता कदापि सम्भव नहीं है; अतः आधार-आधेयका भाव हमारे मनमें बार-बार आता रहता है॥ २४॥ |
| क्व तिष्ठति जलं चेदं सुखरूपं सुविस्तरम्।<br>केन सृष्टं कथं जातं मग्नावावाञ्जले स्थितौ॥ २५ | अति विस्तारवाला तथा सुखद यह जल किस आधारपर स्थित है? किसने इसका सृजन किया? यह किस प्रकार उत्पन्न हुआ और इस जलमें निमग्न हमलोग कैसे स्थित हैं?॥ २५॥ |
| आवां वा कथमुत्पन्नौ केन वोत्पादितावुभौ।<br>पितरौ क्वेति विज्ञानं नास्ति कामं तथावयोः॥ २६ | हम दोनों कैसे पैदा हुए और किसने हम दोनोंको उत्पन्न किया? हमारे माता-पिता कौन हैं?—इस बातका भी कोई ज्ञान हम दोनोंको नहीं है॥ २६॥ |
| सूत उवाच<br>एवं कामयमानौ तौ जग्मतुर्न विनिश्चयम्।<br>उवाच कैटभस्तत्र मधुं पार्श्वे स्थितं जले॥ २७ | सूतजी बोले—इस प्रकार चिन्तन करते हुए वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँचे, तब कैटभने जलके भीतर अपने पास स्थित मधुसे कहा॥ २७॥ |
| कैटभ उवाच<br>मधो वामत्र सलिले स्थातुं शक्तिर्महाबला।<br>वर्तते भ्रातरचला कारणं सा हि मे मता॥ २८ | कैटभ बोला—हे भाई मधु! हम दोनोंके इस जलमें स्थित रहनेका कारण कोई अचल महाबली शक्ति है, ऐसा ही मैं मानता हूँ॥ २८॥ |
| तया ततमिदं तोयं तदाधारं च तिष्ठति।<br>सा एव परमा देवी कारणञ्च तथावयोः॥ २९ | उसीसे समुद्रका सम्पूर्ण जल व्याप्त है और उसी शक्तिके आधारपर यह जल टिका हुआ है तथा वे ही परात्परा देवी हम दोनोंकी भी स्थितिका कारण हैं॥ २९॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—4 B
अ० ६ ] प्रथम स्कन्ध ९९
| एवं विबुध्यमानौ तौ चिन्ताविष्टौ यदासुरौ।<br>तदाकाशे श्रुतं ताभ्यां वाग्बीजं सुमनोहरम्॥ ३० | इस प्रकार विविध चिन्तन करते हुए वे दोनों दानव जब सचेत हुए तब उन्हें आकाशमें अत्यन्त मनोहारी वाग्बीजस्वरूप (ऐं) वाणी सुनायी पड़ी॥ ३०॥ |
| गृहीतं च ततस्ताभ्यां तस्याभ्यासो दृढः कृतः।<br>तदा सौदामनी दृष्टा ताभ्यां खे चोत्थिता शुभा॥ ३१ | उसे सुनकर उन दोनोंने सम्यक् रूपसे हृदयंगम कर लिया और वे उसका दृढ़ अभ्यास करने लगे। तदनन्तर उन्हें आकाशमें कौंधती हुई सुन्दर विद्युत् दिखलायी पड़ी॥ ३१॥ |
| ताभ्यां विचारितं तत्र मन्त्रोऽयं नात्र संशयः।<br>तथा ध्यानमिदं दृष्टं गगने सगुणं किल॥ ३२ | तब उन्होंने सोचा कि निःसन्देह यह मन्त्र ही है और यह सगुण ध्यान ही आकाशमें प्रत्यक्ष दृष्टिगत हुआ है॥ ३२॥ |
| निराहारौ जितात्मानौ तन्मनस्कौ समाहितौ।<br>बभूवतुर्विचिन्त्यैवं जपध्यानपरायणौ॥ ३३ | तदनन्तर वे दोनों दैत्य आहारका परित्यागकर इन्द्रियोंको आत्मनियन्त्रित करके उसी विद्युज्ज्योतिमें मन केन्द्रित किये हुए समाधिस्थ भावसे जप-ध्यान करनेमें लीन हो गये॥ ३३॥ |
| एवं वर्षसहस्रं तु ताभ्यां तप्तं महत्त्पः।<br>प्रसन्ना परमा शक्तिर्जाता सा परमा तयोः॥ ३४ | इस प्रकार उन दोनोंने एक हजार वर्षोंतक कठोर तपस्या की, जिससे वे परात्परा शक्ति उन दोनोंपर अतिशय प्रसन्न हो गयीं॥ ३४॥ |
| खिन्नौ तौ दानवौ दृष्ट्वा तपसे कृतनिश्चयौ।<br>तयोरनुग्रहार्थाय वागुवाचाशरीरिणी॥ ३५ | घोर तपस्याके लिये अपने निश्चयपर दृढ़ रहनेवाले उन दोनों दानवोंको अत्यन्त परिश्रान्त देखकर उनपर कृपाके निमित्त यह आकाशवाणी हुई॥ ३५॥ |
| वरं वां वाञ्छितं दैत्यौ ब्रूतं परमसम्मतम्।<br>ददामि परितुष्टास्मि युवयोस्तपसा किल॥ ३६ | हे दैत्यो! तुम दोनोंकी कठोर तपश्चर्यासे मैं परम प्रसन्न हूँ। अतएव तुम दोनों अपना मनोवांछित वरदान माँगो; मैं अवश्य दूँगी॥ ३६॥ |
| सूत उवाच<br>इति श्रुत्वा तु तां वाणीं दानवावूचतुस्तदा।<br>स्वेच्छया मरणं देवि वरं नौ देहि सुव्रते॥ ३७ | **सूतजी बोले—**तदनन्तर उस आकाशवाणीको सुनकर उन दानवोंने कहा—हे देवि! हमारी मृत्यु हमारे इच्छानुसार हो; हे सुव्रते! हमें आप यही वरदान दीजिये॥ ३७॥ |
| वागुवाच<br>वाञ्छितं मरणं दैत्यौ भवेद्वां मत्प्रसादतः।<br>अजेयौ देवदैत्यैश्च भ्रातरौ नात्र संशयः॥ ३८ | **वाणीने कहा—**हे दैत्यो! मेरी कृपासे अब तुम दोनों अपनी इच्छासे ही मृत्युको प्राप्त होओगे। दानव और देवता कोई भी तुम दोनों भाइयोंको पराजित नहीं कर सकेंगे; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३८॥ |
| सूत उवाच<br>इति दत्तवरौ देव्या दानवौ मददर्पितौ।<br>चक्रतुः सागरे क्रीडां यादोगणसमन्वितौ॥ ३९ | **सूतजी बोले—**भगवतीसे ऐसा वरदान प्राप्तकर वे दोनों दैत्य मदोन्मत्त होकर उस महासागरमें जलचर जीवोंके साथ क्रीड़ातत्पर हो गये॥ ३९॥ |
| कालेन कियता विप्रा दानवाभ्यां यदृच्छया।<br>दृष्टः प्रजापतिर्ब्रह्मा पद्मासनगतः प्रभुः॥ ४० | हे विप्रो! कुछ समय व्यतीत होनेपर उन दानवोंने संयोगवश जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीको कमलके आसनपर बैठे हुए देखा॥ ४०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—4 C
| १०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
|---|
| दृष्ट्वा तु मुदितावास्तां युद्धकामौ महाबलौ।<br>तमूचतुस्तदा तत्र युद्धं नौ देहि सुव्रत॥ ४१<br><br>नोचेत्पद्मं परित्यज्य यथेष्टं गच्छ माचिरम्।<br>यदि त्वं निर्बलश्चासि क्व योग्यं शुभमासनम्॥ ४२<br><br>वीरभोग्यमिदं स्थानं कातरोऽसि त्यजाशु वै।<br>तयोरिति वचः श्रुत्वा चिन्तामाप प्रजापतिः॥ ४३<br><br>दृष्ट्वा च बलिनौ वीरौ किं करोमीति तापसः।<br>चिन्ताविष्टस्तदा तस्थौ चिन्तयन्मनसा तदा॥ ४४ | उन्हें देखकर युद्धकी लालसासे वे दोनों महाबली दैत्य प्रसन्न हो उठे और ब्रह्माजीसे बोले—हे सुव्रत! आप हमलोगोंके साथ युद्ध कीजिये; अन्यथा यह पद्मासन छोड़कर आप अविलम्ब जहाँ जाना चाहें, वहाँ चले जाइये। यदि आप दुर्बल हैं तो इस शुभ आसनपर बैठनेका आपका अधिकार कहाँ! कोई वीर ही इस आसनका उपभोग कर सकता है। आप कायर हैं, अतः अतिशीघ्र इस आसनको छोड़ दीजिये। उन दोनों दैत्योंकी यह बात सुनकर प्रजापति ब्रह्मा चिन्तामें पड़ गये। तब उन दोनों बलशाली वीरोंको देखकर ब्रह्माजी चिन्ताकुल हो उठे और मन-ही-मन सोचने लगे कि मुझ-जैसा तपस्वी इनका क्या कर सकता है?॥ ४१—४४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे मधुकैटभयोर्युद्धोद्योगवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
o
अथ सप्तमोऽध्यायः
ब्रह्माजीका भगवान् विष्णु तथा भगवती योगनिद्राकी स्तुति करना
| सूत उवाच<br>तौ वीक्ष्य बलिनौ ब्रह्मा तदोपायानचिन्तयत्।<br>सामदानभिदादींश्च युद्धान्तान्सर्वतन्त्रवित्॥ १ | सूतजी बोले—तदनन्तर उन दोनों वीरोंको देखकर सर्वशास्त्रवेत्ता ब्रह्माजी साम, दान, भेद आदि नीतियोंके माध्यमसे युद्धकी समाप्तिके उपायोंको सोचने लगे॥ १॥ |
|---|---|
| न जानेऽहं बलं नूनमेतयोर्वा यथातथम्।<br>अज्ञाते तु बले कामं नैव युद्धं प्रशस्यते॥ २ | इनके वास्तविक बलका मुझे कोई ज्ञान नहीं है। नीतिके अनुसार जिसके बलकी जानकारी न हो, उसके साथ युद्ध करना कदापि उचित नहीं होता॥ २॥ |
| स्तुतिं करोमि चेदद्य दुष्टयोर्मदमत्तयोः।<br>प्रकाशितं भवेन्नूनं निर्बलत्वं मया स्वयम्॥ ३<br><br>वधिष्यति तदैकोऽपि निर्बलत्वे प्रकाशिते।<br>दानं नैवाद्य योग्यं वा भेदः कार्यो मया कथम्॥ ४<br><br>विष्णुं प्रबोधयाम्यद्य शेषे सुप्तं जनार्दनम्।<br>चतुर्भुजं महावीर्यं दुःखहा स भविष्यति॥ ५ | यदि मैं इस समय इन मदोन्मत्त दुष्ट दानवोंकी स्तुति करता हूँ तो इससे स्वयं मेरे द्वारा अपनी निर्बलता प्रकाशित होगी। निर्बलता प्रदर्शित करनेपर इनमेंसे कोई एक ही मेरा वध कर देगा। इनके साथ इस समय मैं न तो दाननीति और न तो भेदनीतिको ही उपयुक्त समझ रहा हूँ। अतः इस समय उचित यही है कि मैं शेषनागपर सोये हुए चतुर्भुज एवं पराक्रमी भगवान् विष्णुको जगाऊँ। वे मेरी विपत्ति अवश्य ही दूर करेंगे॥ ३—५॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा पद्मनालगतोऽब्जजः।<br>जगाम शरणं विष्णुं मनसा दुःखनाशकम्॥ ६ | मनमें ऐसा सोचकर कमलनालका आश्रय लेकर पद्मयोनि ब्रह्माजी मन-ही-मन दुःखनाशक विष्णुके शरणागत हो गये॥ ६॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—4 D
अ० ७ ] प्रथम स्कन्ध १०१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तुष्टाव बोधनार्थं तं शुभैः सम्बोधनैर्हरिम्।<br>नारायणं जगन्नाथं निस्पन्दं योगनिद्रया॥ ७ | वे शुभ सम्बोधनोंके द्वारा योगनिद्राके कारण स्पन्दनरहित उन नारायण जगत्पति भगवान् विष्णुको जगानेके लिये उनकी स्तुति करने लगे॥ ७॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>दीननाथ हरे विष्णो वामनोत्तिष्ठ माधव।<br>भक्तार्तिहृद्धृषीकेश सर्वावास जगत्पते॥ ८<br><br>अन्तर्यामिन्नमेयात्मन्वासुदेव जगत्पते।<br>दुष्टारिनाशनैकाग्रचित्त चक्रगदाधर॥ ९<br><br>सर्वज्ञ सर्वलोकेश सर्वशक्तिसमन्वित।<br>उत्तिष्ठोत्तिष्ठ देवेश दुःखनाशन पाहि माम्॥ १० | ब्रह्माजी बोले— हे दीनानाथ! हे हरे! हे विष्णो! हे वामन! हे माधव! भक्तोंकी पीड़ा हरनेवाले हे हृषीकेश! हे सर्वव्यापिन्! हे जगत्पते! हे अनन्तस्वरूप! हे वासुदेव! हे अन्तर्यामिन्! हे जगत्के स्वामी! हे दुष्टों तथा शत्रुओंका संहार करनेमें एकाग्र चित्तवाले! हे चक्रधर! हे गदाधर! हे सर्वज्ञ! हे सर्वलोकेश! हे सर्वशक्तिसम्पन्न! हे देवेश! हे दुःखनाशन! अब आप उठिये, उठिये और मेरी रक्षा कीजिये॥ ८—१०॥ |
| विश्वम्भर विशालाक्ष पुण्यश्रवणकीर्तन।<br>जगद्योने निराकार सर्गस्थित्यन्तकारक॥ ११<br><br>इमौ दैत्यौ महाराज हन्तुकामौ मदोद्धतौ।<br>न जानास्यखिलाधार कथं मां सङ्कटे गतम्॥ १२ | हे विश्वम्भर! हे विशालाक्ष! हे पुण्यश्रवण-कीर्तन! हे जगत्स्रष्टा! हे निराकार! हे सृष्टि-पालन-संहारके कारक! हे महाराज! ये दोनों मदोन्मत्त दानव मेरा वध करना चाहते हैं। हे सर्वाधार! मैं इस समय संकटग्रस्त हूँ; क्या आप यह नहीं जानते?॥ ११-१२॥ |
| उपेक्षसेऽतिदुःखार्तं यदि मां शरणं गतम्।<br>पालकत्वं महाविष्णो निराधारं भवेत्ततः॥ १३ | हे महाविष्णो! मैं इस समय दुःखसे अत्यधिक पीड़ित हूँ और आपके शरणागत हूँ। ऐसी स्थितिमें यदि आप मेरी उपेक्षा करेंगे तो आपका जगत्पालनका नियम निरर्थक हो जायगा॥ १३॥ |
| एवं स्तुतोऽपि भगवान् न बुबोध यदा हरिः।<br>योगनिद्रासमाक्रान्तस्तदा ब्रह्मा ह्यचिन्तयत्॥ १४<br><br>नूनं शक्तिसमाक्रान्तो विष्णुर्निद्रावशं गतः।<br>जजागार न धर्मात्मा किं करोम्यद्य दुःखितः॥ १५<br><br>हन्तुकामावुभौ प्राप्तौ दानवौ मदगर्वितौ।<br>किं करोमि क्व गच्छामि नास्ति मे शरणं क्वचित्॥ १६ | इस प्रकार स्तुति करनेपर भी जब योगनिद्रामें लीन भगवान् विष्णु नहीं जगे, तब ब्रह्माजीने विचार किया कि भगवान् विष्णु अवश्य ही शक्तिके अधीन होकर योगनिद्राके वशमें हो गये हैं, जिससे ये धर्मात्मा नहीं जग रहे हैं। अब दुःखसे पीड़ित मैं इस समय क्या करूँ? अहंकारके मदमें चूर वे दोनों दानव मुझे मारनेके उद्देश्यसे यहाँ आ गये हैं। अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? अब तो मुझे शरण देनेवाला कोई भी नहीं है॥ १४—१६॥ |
| इति संचिन्त्य मनसा निश्चयं प्रतिपद्य च।<br>तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः॥ १७ | इस प्रकार मन-ही-मन सोचते हुए वे एक निष्कर्षपर पहुँचकर एकाग्रचित्त हो उन भगवती योगनिद्राकी स्तुति करने लगे॥ १७॥ |
| विचार्य मनसाप्येवं शक्तिर्मे रक्षणे क्षमा।<br>यया ह्यचेतनो विष्णुः कृतोऽस्ति स्पन्दवर्जितः॥ १८ | उन्होंने अपने मनमें यह दृढ़ विचार रख लिया कि वे ही महाशक्ति मेरी रक्षा करनेमें समर्थ हैं; जिन्होंने भगवान् विष्णुको भी चेतनाहीन तथा निःस्पन्द कर दिया है॥ १८॥ |
| १०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यसुर्यथा न जानाति गुणाञ्छब्दादिकानिह।<br>तथा हरिर्न जानाति निद्रामीलितलोचनः॥ १९ | इस लोकमें जैसे मृत प्राणीको शब्द आदि गुणोंका आभास नहीं हो पाता, उसी प्रकार निद्राके कारण अपने नेत्र मूँदे हुए भगवान् विष्णु कुछ भी जान सकनेमें असमर्थ हैं॥ १९॥ |
| न जहाति यतो निद्रां बहुधा संस्तुतोऽप्यसौ।<br>मन्ये नास्य वशे निद्रा निद्रायं वशीकृतः॥ २० | मेरे द्वारा नानाविध स्तुति किये जानेपर भी भगवान् विष्णु निद्राका त्याग नहीं कर रहे हैं। अतएव मैं मानता हूँ कि निद्रा इनके अधीन नहीं है, अपितु निद्राके द्वारा ही ये वशीभूत कर लिये गये हैं॥ २०॥ |
| यो यस्य वशमापन्नः स तस्य किङ्करः किल।<br>तस्माच्च योगनिद्रेयं स्वामिनी मापतेर्हरेः॥ २१ | जो प्राणी जिस किसीके वशमें हो जाता है, वह निश्चय ही उसीका दास बन जाता है। अतः ये योगनिद्रा ही लक्ष्मीपति विष्णुकी स्वामिनी हो गयी हैं॥ २१॥ |
| सिन्धुजाया अपि वशे यया स्वामी वशीकृतः।<br>नूनं जगदिदं सर्वं भगवत्या वशीकृतम्॥ २२ | जिस शक्तिके द्वारा सिन्धुपुत्री लक्ष्मीके वशमें रहनेवाले भगवान् विष्णु भी वशीभूत कर लिये गये हैं, उन्हीं भगवतीने निश्चितरूपसे इस जगत्को अपने अधीन कर रखा है॥ २२॥ |
| अहं विष्णुस्तथा शम्भुः सावित्री च रमाप्युमा।<br>सर्वे वयं वशे यस्या नात्र किञ्चिद्विचारणा॥ २३ | मैं (ब्रह्मा), विष्णु, शंकर, सावित्री, लक्ष्मी एवं पार्वती—हम सभी उन्हींके अधीन हैं; इसमें कुछ भी संशय नहीं है॥ २३॥ |
| हरिरप्यवशः शेते यथान्यः प्राकृतो जनः।<br>ययाभिभूतः का वार्ता किलान्येषां महात्मनाम्॥ २४ | भगवान् विष्णु भी जिस शक्तिके वशीभूत होकर विवश हुए-से उसी प्रकार सो रहे हैं जिस प्रकार एक सामान्य प्राणी सोता है, तब अन्य महापुरुषोंके विषयमें क्या कहा जाय?॥ २४॥ |
| स्तौम्यद्य योगनिद्रां वै यया मुक्तो जनार्दनः।<br>घटयिष्यति युद्धे च वासुदेवः सनातनः॥ २५ | अतः अब मैं योगनिद्राका ही स्तवन करूँगा जिनकी कृपासे निद्रामुक्त होकर जनार्दन, सनातन भगवान् वासुदेव युद्धके लिये उद्योग करेंगे॥ २५॥ |
| इति कृत्वा मतिं ब्रह्मा पद्मनालस्थितस्तदा।<br>तुष्टाव योगनिद्रां तां विष्णोरङ्गेषु संस्थिताम्॥ २६ | तदनन्तर ऐसा निश्चयकर कमलनालपर विराजमान ब्रह्माजी भगवान् विष्णुके अंगोंमें व्याप्त उन योगनिद्राकी स्तुति करने लगे॥ २६॥ |
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माजी बोले— |
| देवि त्वमस्य जगतः किल कारणं हि<br>ज्ञातं मया सकलवेदवचोभिरम्ब।<br>यद्विष्णुरप्यखिललोकविवेककर्ता<br>निद्रावशं च गमितः पुरुषोत्तमोऽद्य॥ २७ | हे देवि! इस जगत्का कारण आप ही हैं; वेदवाक्योंसे मुझे ऐसा ज्ञात हुआ है। हे अम्ब! आपकी ही शक्तिसे सम्पूर्ण विश्वको ज्ञान देनेवाले पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु भी इस समय योगनिद्राके वशमें हो गये हैं॥ २७॥ |
| अ० ७ ] | प्रथम स्कन्ध | १०३ |
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| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
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| को वेद ते जननि मोहविलासलीलां<br>मूढोऽस्म्यहं हरिरयं विवशश्च शेते।<br>ईदृक्तया सकलभूतमनोनिवासे<br>विद्वत्तमो विबुधकोटिषु निर्गुणायाः ॥ २८ | हे माता! समग्र लोकको मोहित कर देनेवाली आपकी लीलाको कौन जान सकता है ? आपकी इस लीलासे मैं तो मूढ़ हो गया हूँ और ये विष्णु परवश होकर सो रहे हैं। हे समस्त प्राणियोंके मनमें निवास करनेवाली भगवति! करोड़ों देवताओंमें भी ऐसा कौन विज्ञ है, जो ऐसी आप निर्गुणाका रहस्य जान सके ? ॥ २८ ॥ |
| सांख्या वदन्ति पुरुषं प्रकृतिं च यां तां<br>चैतन्यभावरहितां जगतश्च कर्त्रीम्।<br>किं तादृशासि कथमत्र जगन्निवास-<br>श्चैतन्यताविरहितो विहितस्त्वयाद्य ॥ २९ | सांख्यशास्त्रके विद्वान् पुरुष और प्रकृतिसे जगत्की उत्पत्ति मानते हैं। इनमें वे अचेतन प्रकृतिको ही जगत्को उत्पन्न करनेवाली बताते हैं। तो फिर क्या आप वैसी ही अचेतन हैं ? किंतु यदि आप जड होतीं तो इन जगदाधार विष्णुको इस समय चेतनारहित कैसे कर देतीं ? ॥ २९ ॥ |
| नाट्यं तनोषि सगुणा विविधप्रकारं<br>नो वेत्ति कोऽपि तव कृत्यविधानयोगम्।<br>ध्यायन्ति यां मुनिगणा नियतं त्रिकालं<br>सन्ध्येति नाम परिकल्प्य गुणान् भवानि ॥ ३० | हे महामाये! आप सगुण रूप धारणकर नानाविध लीलाएँ करती रहती हैं, अतः आपके रहस्यमय कार्योंका सम्यक् ज्ञान करनेमें भला कौन समर्थ है ? हे भवानि! मुनिगण ‘सन्ध्या’ नामसे आपके गुणोंको परिकल्पित करके तीनों समय (प्रातः, मध्याह्न, सायं) निश्चितरूपसे आपका ही ध्यान करते हैं॥ ३०॥ |
| बुद्धिर्हि बोधकरणा जगतां सदा त्वं<br>श्रीश्चासि देवि सततं सुखदा सुराणाम्।<br>कीर्तिस्तथा मतिधृती किल कान्तिरेव<br>श्रद्धा रतिश्च सकलेषु जनेषु मातः ॥ ३१ | हे देवि! आप बुद्धिरूपा होकर समस्त लोकको ज्ञान देती हैं और लक्ष्मीरूपसे सदैव देवताओंको सुख प्रदान करती हैं। हे माता! सम्पूर्ण प्राणियोंमें कीर्ति, मति, धृति, कान्ति, श्रद्धा एवं रतिरूपमें आप ही विद्यमान हैं॥ ३१॥ |
| नातः परं किल वितर्कशतैः प्रमाणं<br>प्राप्तं मया यदिह दुःखगतिं गतेन।<br>त्वं चात्र सर्वजगतां जननीति सत्यं<br>निद्रालुतां वितरता हरिणात्र दृष्टम् ॥ ३२ | हे देवि! प्रगाढ निद्राके वशीभूत विष्णुको देखकर विषम दुःखकी स्थितिको प्राप्त हुए मुझको यह प्रमाण मिल गया कि आप ही निस्संदेह सम्पूर्ण जगत्की जननी हैं। इस विषयमें अब सैकड़ों तर्क-वितर्ककी कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ३२॥ |
| त्वं देवि वेदविदुषामपि दुर्विभाव्या<br>वेदोऽपि नूनमखिलार्थतया न वेद।<br>यस्मात्त्वदुद्भवमसौ श्रुतिराप्नुवाना<br>प्रत्यक्षमेव सकलं तव कार्यमेतत् ॥ ३३ | हे देवि! आप वेदशास्त्रोंके पारदर्शी विद्वानोंकी समझसे भी परे हैं और वेद भी आपको पूर्णरूपसे नहीं जानते; क्योंकि उन वेदोंकी उत्पत्तिका भी कारण आप ही हैं। आपका यह सम्पूर्ण रहस्यमय क्रिया-कलाप सबको प्रत्यक्ष दिखायी देता है॥ ३३॥ |
| कस्ते चरित्रमखिलं भुवि वेद धीमा-<br>न्नाहं हरिन च भवो न सुरास्तथान्ये।<br>ज्ञातुं क्षमाश्च मुनयो न ममात्मजाश्च<br>दुर्वाच्य एव महिमा तव सर्वलोके ॥ ३४ | इस संसारमें कौन ऐसा बुद्धिमान् प्राणी है, जो आपके सम्पूर्ण चरित्रको जाननेमें समर्थ है? स्वयं मैं (ब्रह्मा), विष्णु, शंकर, देवगण, अन्य मुनिवृन्द तथा मेरे तत्त्वज्ञ पुत्र-लोग भी उसे नहीं जान सके हैं। सम्पूर्ण लोकमें आपकी महिमाका वर्णन कोई नहीं कर सकता है ॥ ३४॥ |
| १०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| यज्ञेषु देवि यदि नाम न ते वदन्ति<br>स्वाहेति वेदविदुषो हवने कृतेऽपि।<br>न प्राप्नुवन्ति सततं मखभागधेयं<br>देवास्त्वमेव विबुधेष्वपि वृत्तिदासि॥ ३५ | हे देवि! यदि यज्ञोंमें वैदिक विद्वान् हवनकार्यके समय आपके 'स्वाहा' नामका उच्चारण न करें तो देवगण अपना यज्ञभाग नहीं प्राप्त कर सकते। अतएव आप ही देवताओंका भी भरण-पोषण करती हैं॥ ३५॥ |
| त्राता वयं भगवति प्रथमं त्वया वै<br>देवारिसम्भवभयादधुना तथैव।<br>भीतोऽस्मि देवि वरदे शरणं गतोऽस्मि<br>घोरं निरीक्ष्य मधुना सह कैटभं च॥ ३६ | हे भगवति! आपने पहले भी समय-समयपर दैत्योंद्वारा उत्पन्न किये गये भयोंसे हमारी रक्षा की है, उसी प्रकार इस समय भी हमारी रक्षा करें, मैं आपकी शरणमें हूँ। हे देवि! हे वरदे! मधुके साथ भयानक इस कैटभको देखकर मैं अत्यन्त भयाक्रान्त हूँ॥ ३६॥ |
| नो वेत्ति विष्णुरधुना मम दुःखमेत-<br>ज्ज्ञाने त्वयात्मविवशीकृतदेहयष्टिः।<br>मुञ्चादिदेवमथवा जहि दानवेन्द्रौ<br>यद्रोचते तव कुरुष्व महानुभावे॥ ३७ | आपकी योगमायाने भगवान् विष्णुके शरीरके सभी अवयवोंको अपने वशमें कर रखा है, अतः वे मेरी इस विषम विपत्तिको नहीं जान रहे हैं। हे महानुभावे! या तो इस समय आप आदिदेवको मुक्त कर दें अथवा इन दोनों महादैत्योंका वध कर दें; इनमेंसे आपको जो उचित जान पड़े, वह कीजिये॥ ३७॥ |
| जानन्ति ये न तव देवि परं प्रभावं<br>ध्यायन्ति ते हरिहरावपि मन्दचित्ताः।<br>ज्ञातं मयाद्य जननि प्रकटं प्रमाणं<br>यद्विष्णुरप्यतितरां विवशोऽथ शेते॥ ३८ | हे देवि! जो मन्दबुद्धि प्राणी आपकी विशिष्ट महिमाको नहीं जानते, वे ही विष्णु तथा शंकर आदिकी आराधना करते हैं। हे जननि! आज प्रत्यक्ष प्रमाणके रूपमें मैं आपकी महिमा देख रहा हूँ कि भगवान् विष्णु भी प्रगाढ़ निद्राके वशीभूत होकर सो रहे हैं॥ ३८॥ |
| सिन्धूद्भवापि न हरिं प्रतिबोधितुं वै<br>शक्ता पतिं तव वशानुगमद्य शक्त्या।<br>मन्ये त्वया भगवति प्रसभं रमापि<br>प्रस्वापिता न बुबुधे विवशीकृतेव॥ ३९ | आपकी शक्तिके वशमें पड़े अपने पति भगवान् विष्णुको इस समय सिन्धुसुता लक्ष्मी भी नहीं जगा सकतीं; क्योंकि हे भगवति! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आपने ही बलपूर्वक लक्ष्मीको भी शयन करनेके लिये विवश कर दिया है, जिससे वे भी नहीं जग रही हैं॥ ३९॥ |
| धन्यास्त एव भुवि भक्तिपरास्तवांघ्रौ<br>त्यक्त्वान्यदेवभजनं त्वयि लीनभावाः।<br>कुर्वन्ति देवि भजनं सकलं निकामं<br>ज्ञात्वा समस्तजननीं किल कामधेनुम्॥ ४० | हे देवि! इस संसारमें वे ही प्राणी धन्य हैं जो आपके चरणोंमें भक्तिभाव रखते हैं, अन्य देवताओंकी उपासना त्यागकर आपके ध्यानमें लीन रहते हैं और आपको ही सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करनेवाली कामधेनु तथा समस्त लोककी जननी मानकर आपका भजन करते हैं॥ ४०॥ |
| धीकान्तिकर्त्तिशुभवृत्तिगुणादयस्ते<br>विष्णोर्गुणास्तु परिहृत्य गताः क्व चाद्य।<br>बन्दीकृतो हरिरसौ ननु निद्रयात्र<br>शक्त्या तवैव भगवत्यतिमानवत्याः॥ ४१ | बुद्धि, कान्ति, यश, शुभ वृत्ति आदि गुण इस समय भगवान् विष्णुका परित्यागकर कहाँ चले गये? हे भगवति! अतिशय मानवाली आपकी ही शक्तिसे ये भगवान् विष्णु इस समय निद्राके वशवर्ती हो गये हैं॥ ४१॥ |
| अ० ७ ] | प्रथम स्कन्ध | १०५ |
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| त्वं शक्तिरेव जगतामखिलप्रभावा<br> त्वन्निर्मितं च सकलं खलु भावमात्रम्।<br>त्वं क्रीडसे निजविनिर्मितमोहजाले<br> नाट्ये यथा विहरते स्वकृते नटो वै॥ ४२ | अखिल प्रभाववाली आप ही जगत्की एकमात्र शक्ति हैं और आपके द्वारा रचा गया सब कुछ आपकी लीला ही है। जैसे कोई नट अपने ही द्वारा निर्मित नाट्यमें अभिनय करता है, उसी प्रकार आप भी अपने ही द्वारा निर्मित मोहजालमें नानाविध लीलाएँ करती रहती हैं॥ ४२॥ |
| विष्णुस्त्वया प्रकटितः प्रथमं युगादौ<br> दत्ता च शक्तिरमला खलु पालनाय।<br>त्रातं च सर्वमखिलं विवशीकृतोऽद्य<br> यद्रोचते तव तथाम्ब करोषि नूनम्॥ ४३ | युगके आरम्भमें आपने सर्वप्रथम विष्णुका सृजन किया, सबके पालनके लिये उन्हें निर्मल शक्ति प्रदान की और इस प्रकार समस्त जगत्की रक्षा की। उन्हीं भगवान् विष्णुको निद्राभिभूतकर आपने इस समय सुला दिया है। हे अम्ब! आपको जो उचित जान पड़ता है, आप निश्चितरूपसे वही किया करती हैं॥ ४३॥ |
| सृष्ट्वात्र मां भगवति प्रविनाशितुं चे-<br> न्नेच्छास्ति ते कुरु दयां परिहृत्य मौनम्।<br>कस्मादिमौ प्रकटितौ किल कालरूपौ<br> यद्वा भवानि हसितुं नु किमिच्छसे माम्॥ ४४ | हे भगवति! यदि आप मेरी सृष्टि करके मुझे नष्ट कर देनेकी इच्छा नहीं रखतीं तो अपना यह मौन त्यागकर मेरे ऊपर दया कीजिये। हे भवानि! आपने कालरूप इन दोनों दानवोंको किसलिये उत्पन्न किया है? कहीं आपने मेरे उपहासके लिये तो ऐसा नहीं किया है?॥ ४४॥ |
| ज्ञातं मया तव विचेष्टितमद्भुतं वै<br> कृत्वाखिलं जगदिदं रमसे स्वतन्त्रा।<br>लीनं करोषि सकलं किल मां तथैव<br> हन्तुं त्वमिच्छसि भवानि किमत्र चित्रम्॥ ४५ | हे भवानि! अब मुझे आपके अद्भुत चरित्रका ज्ञान हो गया। समस्त जगत्की रचना करके आप उसीमें स्वेच्छासे विहार करती हैं और पुनः उसे अपनेमें जैसे समाहित कर लेती हैं, उसी प्रकार मुझे नष्ट कर देना चाहती हैं तो इसमें कोई विचित्र बात नहीं है॥ ४५॥ |
| कामं कुरुष्व वधमद्य ममैव मात-<br> र्दुःखं न मे मरणजं जगदम्बिकेऽत्र।<br>कर्ता त्वयैव विहितः प्रथमं स चायं<br> दैत्याहतोऽथ मृत इत्ययशो गरिष्ठम्॥ ४६ | हे माता! यदि आप यही चाहती हैं तो मेरा वध कर दीजिये। हे जगदम्बे! मुझे मरणजनित दुःखकी लेशमात्र भी चिन्ता नहीं है। हाँ, आपको यह महान् कलंक अवश्य लगेगा कि आपने जिसे सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता बनाया, उसे दैत्यने मार डाला॥ ४६॥ |
| उत्तिष्ठ देवि कुरु रूपमिहाद्भुतं त्वं<br> मां वा त्विमौ जहि यथेच्छसि बाललीले।<br>नो चेत्प्रबोधय हरिं निहनेदिमौ य-<br> स्त्वत्साध्यमेतदखिलं किल कार्यजातम्॥ ४७ | हे देवि! अब आप उठिये और अपना अद्भुत रूप धारण कीजिये। हे बाललीलाकारिणि! आप अपने इच्छानुरूप चाहे मुझे मार दें अथवा इन दोनों दैत्योंको मार दें या तो भगवान् विष्णुको जगा दें, जिससे वे इन दोनोंका वध कर दें। यह सारा काम करनेमें आप ही समर्थ हैं॥ ४७॥ |
| १०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| सूत उवाच | |
|---|---|
| एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा।<br>निःसृत्य हरिदेहात्तु संस्थिता पार्श्वतस्तदा॥ ४८ | **सूतजी बोले—**ब्रह्माजीद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर विष्णुके शरीरसे निकलकर तामसीदेवी उनके समीप खड़ी हो गयीं॥ ४८॥ |
| त्यक्त्वाङ्गानि च सर्वाणि विष्णोरतुलतेजसः।<br>निर्गता योगनिद्रा सा नाशाय च तयोस्तदा॥ ४९ | तदनन्तर अतुलित तेजवाले विष्णुके समस्त अंगोंको छोड़कर योगनिद्रा उन दोनोंका संहार करनेके लिये बाहर निकल आयीं॥ ४९॥ |
| विस्पन्दितशरीरोऽसौ यदा जातो जनार्दनः।<br>धाता परमिकां प्राप्तो मुदं दृष्ट्वा हरिं ततः॥ ५० | [योगमायाके प्रभावसे मुक्त हुए] वे जनार्दन जब चेतनायुक्त शरीरवाले हुए तब उन विष्णुको देखकर ब्रह्माजीको परम प्रसन्नता हुई॥ ५०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे<br>विष्णुप्रबोधो नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
अथाष्टमोऽध्यायः
भगवान् विष्णु योगमायाके अधीन क्यों हो गये—ऋषियोंके इस प्रश्नके उत्तरमें सूतजीद्वारा उन्हें आद्याशक्ति भगवतीकी महिमा सुनाना
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| सन्देहोऽत्र महाभाग कथायां तु महाद्भुतः।<br>वेदशास्त्रपुराणैश्च निश्चितं तु सदा बुधैः॥ १<br>ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रयो देवाः सनातनाः।<br>नातः परतरं किञ्चिद् ब्रह्माण्डेऽस्मिन्महामते॥ २ | हे महाभाग! हमें इस कथानकमें महान् अद्भुत संशय है। हे महामते! वेदों, शास्त्रों, पुराणों तथा बुद्धिमान् लोगोंकी सदासे यह अवधारणा रही है कि ब्रह्मा, विष्णु तथा शम्भु—ये तीनों देवता सनातन हैं और इस ब्रह्माण्डमें इनसे बढ़कर अन्य कोई नहीं है॥ १-२॥ |
| ब्रह्मा सृजति लोकान्वै विष्णुः पात्यखिलं जगत्।<br>रुद्रः संहरते काले त्रय एतेऽत्र कारणम्॥ ३ | ब्रह्मा जगत्का सृजन करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शंकर प्रलयकालमें संहार करते हैं। ये तीनों ही इसमें कारण हैं॥ ३॥ |
| एका मूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>रजःसत्त्वतमोभिश्च संयुताः कार्यकारकाः॥ ४ | ब्रह्मा, विष्णु और महेश—ये तीनों देवता एक ही मूर्तिके तीन स्वरूप हैं। ये लोग क्रमशः रज, सत्त्व और तम-गुणोंसे युक्त होकर अपना-अपना कार्य करते हैं॥ ४॥ |
| तेषां मध्ये हरिः श्रेष्ठो माधवः पुरुषोत्तमः।<br>आदिदेवो जगन्नाथः समर्थः सर्वकर्मसु॥ ५<br>नान्यः कोऽपि समर्थोऽस्ति विष्णोरतुलतेजसः।<br>स कथं स्वापितः स्वामी विवशो योगमायया॥ ६ | उन तीनोंमें माधव, पुरुषोत्तम, आदिदेव जगन्नाथ श्रीहरि श्रेष्ठ हैं और वे सभी कार्य सम्पादित करनेमें समर्थ हैं। अनुपम तेजवाले विष्णुसे बढ़कर सर्वसमर्थ अन्य कोई भी नहीं है। उन जगत्पति विष्णुको योगमायाने विवश करके भला कैसे सुला दिया?॥ ५-६॥ |
| क्व गतं तस्य विज्ञानं जीवतश्चेष्टितं कुतः।<br>सन्देहोऽयं महाभाग कथयस्व यथाशुभम्॥ ७ | उस समय उन विष्णुकी चेतना कहाँ चली गयी और उनके जीवनकी चेष्टा कहाँ लुप्त हो गयी? हे महाभाग! यह महान् सन्देह उपस्थित है; आप इस विषयमें यथोचित बतानेकी कृपा करें॥ ७॥ |
| अ० ८ ] | प्रथम स्कन्ध | १०७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| का सा शक्तिः पुरा प्रोक्ता यया विष्णुर्जितः प्रभुः।<br>कुतो जाता कथं शक्ता का शक्तिर्वद सुव्रत॥ ८ | जिस शक्तिके विषयमें आप पहले बता चुके हैं कि उसने भगवान् विष्णुको भी पराभूत कर दिया था, वह कौन-सी शक्ति है? वह शक्ति कहाँसे उद्भूत हुई, शक्तिसम्पन्न कैसे हुई तथा उसका स्वरूप क्या है? हे सुव्रत! यह सब हमें स्पष्टरूपसे बतलाइये॥ ८॥ |
| यस्तु सर्वेश्वरो विष्णुर्वासुदेवो जगद्गुरुः।<br>परमात्मा परानन्दः सच्चिदानन्दविग्रहः॥ ९<br><br>सर्वकृत्सर्वभृत्स्रष्टा विरजः सर्वगः शुचिः।<br>स कथं निद्रया नीतः परतन्त्रः परात्परः॥ १० | जो विष्णु हैं वे तो सबके ईश्वर, वासुदेव, जगत्के गुरु, परमात्मा, परम आनन्दस्वरूप तथा सच्चिदानन्दकी साक्षात् मूर्ति हैं; सब कुछ करनेमें समर्थ, सबका पालन करनेवाले, सभी चराचरका सृजन करनेवाले, रजोगुणसे रहित, सर्वव्यापी और पवित्र हैं। वे परात्पर विष्णु निद्राकी परतन्त्रतामें कैसे आबद्ध हो गये?॥ ९-१०॥ |
| एतदाश्चर्यभूतो हि सन्देहो नः परन्तप।<br>छिन्धि ज्ञानासिना सूत व्यासशिष्य महामते॥ ११ | हे परन्तप! हमें इस प्रकारका आश्चर्यजनक सन्देह है। हे सूत! हे व्यासशिष्य! हे महामते! आप अपने ज्ञानरूपी खड्गसे हमारे इस सन्देहको नष्ट कर दीजिये॥ ११॥ |
| सूत उवाच<br>कः सन्देहं भिनत्त्येनं त्रैलोक्ये सचराचरे।<br>मुह्यन्ति मुनयः कामं ब्रह्मपुत्राः सनातनाः॥ १२<br><br>नारदः कपिलश्चैव प्रश्नेऽस्मिन्मुनिसत्तमाः।<br>किं ब्रवीमि महाभागा दुर्घटेऽस्मिन्विमर्शने॥ १३ | सूतजी बोले— हे मुनिजन! इस चराचर जगत्में कौन ऐसा है, जो इस शंकाका समाधान कर सके, जबकि ब्रह्माके पुत्र सनकादि मुनि तथा नारद, कपिल आदि भी इस विषयमें मोहित हो जाते हैं? हे मुनिश्रेष्ठ! हे महाभाग! तब इस जटिल समस्याके समाधानमें मैं क्या कहूँ?॥ १२-१३॥ |
| देवेषु विष्णुः कथितः सर्वगः सर्वपालकः।<br>यतो विराडिदं सर्वमुत्पन्नं सचराचरम्॥ १४ | देवताओंमें भगवान् विष्णु ही सर्वव्यापी एवं सभी भूतोंके रक्षक कहे गये हैं। उन्हींसे इस चराचर समस्त विराट् संसारकी सृष्टि हुई है॥ १४॥ |
| ते सर्वे समुपासन्ते नत्वा देवं परात्परम्।<br>नारायणं हृषीकेशं वासुदेवं जनार्दनम्॥ १५ | वे सभी देवता परात्पर परमात्माको नमस्कार करके नारायण, हृषीकेश, वासुदेव, जनार्दनरूपमें उनकी उपासना करते हैं॥ १५॥ |
| तथा केचिन्महादेवं शङ्करं शशिशेखरम्।<br>त्रिनेत्रं पञ्चवक्त्रं च शूलपाणिं वृषध्वजम्॥ १६ | कुछ लोग महादेव, शंकर, शशिशेखर, त्रिनेत्र, पंचवक्त्र, शूलपाणि और वृषभध्वजके रूपमें उन्हींकी उपासना करते हैं॥ १६॥ |
| तथा वेदेषु सर्वेषु गीतं नाम्ना त्रियम्बकम्।<br>कपर्द्दिनं पञ्चवक्त्रं गौरीदेहार्धधारिणम्॥ १७<br><br>कैलासवासनिरतं सर्वशक्तिसमन्वितम्।<br>भूतवृन्दयुतं देवं दक्षयज्ञविघातकम्॥ १८ | सभी वेदोंमें भी त्रियम्बक (त्र्यम्बक), कपर्दी, पंचवक्त्र, गौरीदेहार्धधारी, कैलासवासी, सर्वशक्ति-समन्वित, भूतगणोंसे सेवित एवं दक्षयज्ञविध्वंसक आदि नामोंसे उनका गुणगान किया गया है॥ १७-१८॥ |
| १०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| तथा सूर्य वेदविदः सायंप्रातर्दिने दिने।<br>मध्याह्ने तु महाभागाः स्तुवन्ति विविधैः स्तवैः॥ १९ | हे महाभागो! वैदिक विद्वान् लोग सूर्य आदि नामोंसे भी नित्य प्रातः, सायं तथा मध्याह्नकालमें सन्ध्या करते समय विविध प्रकारकी स्तुतियोंसे उन्हींकी प्रार्थना करते हैं॥ १९॥ |
| तथा वेदेषु सर्वेषु सूर्योपासनमुत्तमम्।<br>परमात्मेति विख्यातं नाम तस्य महात्मनः॥ २०<br><br>अग्निः सर्वत्र वेदेषु संस्तुतो वेदवित्तमैः।<br>इन्द्रश्चापि त्रिलोकेशो वरुणश्च तथापरः॥ २१ | सभी वेदोंमें सूर्योपासना श्रेष्ठ कही गयी है तथा उन महात्माका नाम 'परमात्मा' कहा गया है। वेदोंमें सर्वत्र वेदज्ञोंद्वारा अग्निदेवकी भी स्तुति की गयी है। वहाँ त्रिलोकेश इन्द्र, वरुण तथा अन्यान्य देवताओंकी भी स्तुति की गयी है॥ २०-२१॥ |
| यथा गङ्गा प्रवाहैश्च बहुभिः परिवर्तते।<br>तथैव सर्वदेवेषु विष्णुः प्रोक्तो महर्षिभिः॥ २२ | जिस प्रकार गंगा अनेक धाराओंमें विद्यमान रहकर प्रवाहित होती हैं, उसी प्रकार महर्षियोंद्वारा भगवान् विष्णु सभी देवताओंमें विद्यमान बताये गये हैं॥ २२॥ |
| त्रीण्येव हि प्रमाणानि पठितानि सुपण्डितैः।<br>प्रत्यक्षं चानुमानं च शाब्दं चैव तृतीयकम्॥ २३<br><br>चत्वार्येवेतरे प्राहुरुपमानयुतानि च।<br>अर्थापत्तियुतान्यन्ये पञ्च प्राहुर्महाधियः॥ २४ | मनीषी विद्वानोंने तीन प्रकारके मुख्य प्रमाण बताये हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान और तीसरा शब्दप्रमाण। अन्य (न्याय)-के पण्डित चार प्रमाण मानते हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान एवं शब्दप्रमाण। परंतु अन्य (मीमांसाके) विद्वान् लोग अर्थापत्तिको लेकर पाँच प्रमाण मानते हैं॥ २३-२४॥ |
| सप्त पौराणिकाश्चैव प्रवदन्ति मनीषिणः।<br>एतैः प्रमाणैर्दुर्ज्ञेयं यद् ब्रह्म परमं च तत्॥ २५ | पौराणिक विद्वान् सात प्रमाण बताते हैं—इन प्रमाणोंसे भी जो दुर्ज्ञेय है, वह है—परब्रह्म॥ २५॥ |
| वितर्कश्चात्र कर्तव्यो बुद्ध्या चैवागमेन च।<br>निश्चयात्मिकया युक्त्या विचार्य च पुनः पुनः॥ २६<br><br>प्रत्यक्षतस्तु विज्ञानं चिन्त्यं मतिमता सदा।<br>दृष्टान्तेनापि सततं शिष्टमार्गानुसारिणा॥ २७ | इसलिये इस विषयमें बुद्धि, शास्त्र एवं निश्चयात्मिका युक्तिसे बार-बार विचार करके अनुमान करना चाहिये। साथ ही सन्मार्गका अनुसरण करनेवाले दृष्टान्तद्वारा इस प्रत्यक्ष विज्ञानका चिन्तन बुद्धिमान् मनुष्यको सर्वदा करते रहना चाहिये॥ २६-२७॥ |
| विद्वांसोऽपि वदन्त्येवं पुराणैः परिगीयते।<br>द्रुहिणे सृष्टिशक्तिश्च हरौ पालनशक्तिता॥ २८<br><br>हरे संहारशक्तिश्च सूर्ये शक्तिः प्रकाशिका।<br>धराधारणशक्तिश्च शेषे कूर्मे तथैव च॥ २९ | प्रायः सभी पुराण तथा विद्वान् ऐसा कहते हैं कि ब्रह्मामें सृष्टि करनेकी शक्ति, विष्णुमें पालन करनेकी शक्ति, शिवमें संहार करनेकी शक्ति, सूर्यमें प्रकाश करनेकी शक्ति तथा शेष और कच्छपमें पृथ्वीको धारण करनेकी शक्ति स्वभावतः विद्यमान रहती है॥ २८-२९॥ |
| साद्या शक्तिः परिणता सर्वस्मिन्त्या प्रतिष्ठिता।<br>दाहशक्तिस्तथा वह्नौ समीरे प्रेरणात्मिका॥ ३० | इस प्रकार एकमात्र वे आद्याशक्ति ही स्वरूपभेदसे सभीमें व्याप्त रहती हैं। वे ही अग्निमें दाहकत्व शक्ति तथा वायुमें संचारशक्ति हैं॥ ३०॥ |
| शिवोऽपि शवतां याति कुण्डलिन्या विवर्जितः।<br>शक्तिहीनस्तु यः कश्चिदसमर्थः स्मृतो बुधैः॥ ३१ | कुण्डलिनी शक्तिके बिना शिव भी 'शव' बन जाते हैं। विद्वान् लोग शक्तिहीन जीवको निर्जीव एवं असमर्थ कहते हैं॥ ३१॥ |
| अ० ८ ] | प्रथम स्कन्ध | १०९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवं सर्वत्र भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं ब्रह्माण्डेऽस्मिन्महातपाः॥ ३२<br>शक्तिहीनं तु निन्द्यं स्याद्वस्तुमात्रं चराचरम्।<br>अशक्तः शत्रुविजये गमने भोजने तथा॥ ३३ | अतएव हे मुनिजनो! ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सभी पदार्थ इस संसारमें शक्तिके बिना सर्वथा हेय हैं; क्योंकि स्थावर-जंगम सभी जीवोंमें वह शक्ति ही काम करती है। यहाँतक कि शक्तिहीन पुरुष शत्रुपर विजयी होने, चलने-फिरने तथा भोजन करनेमें भी सर्वथा असमर्थ रहता है॥ ३२-३३॥ |
| एवं सर्वगता शक्तिः सा ब्रह्मेति विविच्यते।<br>सोपास्या विविधैः सम्यग्विचार्या सुधिया सदा॥ ३४ | वह सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली आदिशक्ति ही 'ब्रह्म' कहलाती है। बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि वह अनेक प्रकारके यत्नोंद्वारा सम्यक् रूपसे उसकी उपासना करे तथा उसका चिन्तन करे॥ ३४॥ |
| विष्णौ च सात्त्विकी शक्तिस्तया हीनोऽप्यकर्मकृत्।<br>द्रुहिणे राजसी शक्तिर्यया हीनो ह्यसृष्टिकृत्॥ ३५<br>शिवे च तामसी शक्तिस्तया संहारकारकः।<br>इत्यूह्यं मनसा सर्वं विचार्य च पुनः पुनः॥ ३६ | भगवान् विष्णुमें सात्त्विकी शक्ति रहती है, जिसके बिना वे अकर्मण्य हो जाते हैं। ब्रह्मामें राजसी शक्ति है, वे भी शक्तिहीन होकर सृष्टिकार्य नहीं कर सकते और शिवमें तामसी शक्ति रहती है, जिसके बलपर वे संहार-कृत्य सम्पादित करते हैं। इस विषयपर मनसे बार-बार विचार करके तर्क-वितर्क करते रहना चाहिये॥ ३५-३६॥ |
| शक्तिः करोति ब्रह्माण्डं सा वै पालयतेऽखिलम्।<br>इच्छया संहरत्येषा जगदेतच्चराचरम्॥ ३७ | शक्ति ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी रचना करती है, सबका पालन करती है और इच्छानुसार इस चराचर जगत्का संहार करती है॥ ३७॥ |
| न विष्णुर्न हरः शक्रो न ब्रह्मा न च पावकः।<br>न सूर्यो वरुणः शक्तः स्वे स्वे कार्ये कथञ्चन॥ ३८ | उसके बिना विष्णु, शिव, इन्द्र, ब्रह्मा, अग्नि, सूर्य और वरुण कोई भी अपने-अपने कार्यमें किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हो सकते॥ ३८॥ |
| तया युक्ता हि कुर्वन्ति स्वानि कार्याणि ते सुराः।<br>सैव कारणकार्येषु प्रत्यक्षेणावगम्यते॥ ३९ | वे देवगण शक्तियुक्त होनेपर ही अपने-अपने कार्योंको सम्पादित करते रहते हैं। प्रत्येक कार्य-कारणमें वही शक्ति प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है॥ ३९॥ |
| सगुणा निर्गुणा सा तु द्विधा प्रोक्ता मनीषिभिः।<br>सगुणा रागिभिः सेव्या निर्गुणा तु विरागिभिः॥ ४० | मनीषी पुरुषोंने शक्तिको सगुणा और निर्गुणा भेदसे दो प्रकारका बताया है। सगुणा शक्तिकी उपासना आसक्तजनों और निर्गुणा शक्तिकी उपासना अनासक्तजनोंको करनी चाहिये॥ ४०॥ |
| धर्मार्थकाममोक्षाणां स्वामिनी सा निराकुला।<br>ददाति वाञ्छितान्कामान्पूजिता विधिपूर्वकम्॥ ४१ | धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पदार्थोंकी स्वामिनी वे ही निर्विकार शक्ति हैं। विधिवत् पूजा करनेसे वे सब प्रकारके मनोरथ पूर्ण करती हैं॥ ४१॥ |
| न जानन्ति जना मूढास्तां सदा माययावृताः।<br>जानन्तोऽपि नराः केचिन्मोहयन्ति परानपि॥ ४२<br>पण्डिताः स्वोदरार्थं वै पाखण्डानि पृथक्पृथक्।<br>प्रवर्तयन्ति कलिना प्रेरिता मन्दचेतसः॥ ४३ | सदा मायासे घिरे हुए अज्ञानी लोग उस महाशक्तिको जान नहीं पाते। यहाँतक कि कुछ विद्वान् पुरुष उन्हें जानते हुए भी दूसरोंको भ्रममें डालते हैं। कुछ मन्दबुद्धि पण्डित अपने उदरकी पूर्तिके लिये कलिसे प्रेरित होकर अनेक प्रकारके पाखण्ड करते हैं॥ ४२-४३॥ |