भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 105
९६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ६

| महामायाचरित्रञ्च पवित्रं पापनाशनम्।<br><br>पठतां शृण्वतां चैव सर्वसम्पत्तिकारकम्॥ ११२ | महामाया भगवतीका चरित्र अति पावन है तथा पापोंका नाश कर देता है। इस चरित्रका पाठ तथा श्रवण करनेवाले प्राणियोंको सभी प्रकारकी सम्पदाएँ अनायास ही प्राप्त हो जाती हैं॥ ११२॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां प्रथमस्कन्धे हयग्रीवावतारकथनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥


अथ षष्ठोऽध्यायः

शेषशायी भगवान् विष्णुके कर्णमलसे मधु-कैटभकी उत्पत्ति तथा उन दोनोंका ब्रह्माजीसे युद्धके लिये तत्पर होना

ऋषय ऊचुः<br>सौम्य यच्च त्वया प्रोक्तं शौरेर्युद्धं महार्णवे।<br>मधुकैटभयोः सार्धं पञ्चवर्षसहस्रकम्॥ १**ऋषिगण बोले—**हे सौम्य! आपने मधु और कैटभके साथ भगवान् विष्णुद्वारा महासिन्धुमें पाँच हजार वर्षोंतक युद्ध किये जानेकी पहले चर्चा की थी॥ १॥
कस्मात्तौ दानवौ जातौ तस्मिन्नेकार्णवे जले।<br>महावीर्यौ दुराधर्षौ देवैरपि सुदुर्जयौ॥ २महावीर्यसम्पन्न, किसीसे भी पराभूत न होनेवाले तथा देवताओंसे भी अपराजेय वे दोनों दानव उस एकार्णवके जलमें किससे प्रादुर्भूत हुए?॥ २॥
कथं तावसुरौ जातौ कथं च हरिणा हतौ।<br>तदाचक्ष्व महाप्राज्ञ चरितं परमाद्भुतम्॥ ३वे असुर क्यों उत्पन्न हुए तथा भगवान्‌के द्वारा उनका वध क्यों किया गया? हे महामते! आप यह परम अद्भुत आख्यान हमको सुनाइये॥ ३॥
श्रोतुकामा वयं सर्वे त्वं वक्ता च बहुश्रुतः।<br>दैवाच्चात्रैव संजातः संयोगश्च तथावयोः॥ ४हमलोग यह कथा सुननेको इच्छुक हैं और आप अति प्रसिद्ध वक्ता हैं। हमारा और आपका यह सम्पर्क दैवयोगसे ही हुआ है॥ ४॥
मूर्खेण सह संयोगो विषादपि सुदुर्ज्जरः।<br>विज्ञेन सह संयोगः सुधारससमः स्मृतः॥ ५मूर्खके साथ स्थापित किया गया सम्पर्क विषसे भी अधिक अनिष्टकर होता है और इसके विपरीत विद्वानोंका सम्पर्क पीयूषरसके तुल्य माना गया है॥ ५॥
जीवन्ति पशवः सर्वे खादन्ति मेहयन्ति च।<br>जानन्ति विषयाकारं व्यवायसुखमद्भुतम्॥ ६<br><br>न तेषां सदसज्ज्ञानं विवेको न च मोक्षदः।<br>पशुभिस्ते समा ज्ञेया येषां न श्रवणादरः॥ ७पशु भी जीवनयापन करते हैं, वे भी आहार ग्रहण करते हैं, मल-मूत्रादिका विसर्जन करते हैं और विषयासक्त होकर इन्द्रियजन्य सुखकी अनुभूति करते हैं; किंतु उनमें अच्छे-बुरेका लेशमात्र भी ज्ञान नहीं होता तथा वे मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले विवेकसे भी रहित होते हैं। अतएव उत्तम बातोंको सुननेमें जो लोग श्रद्धा-भाव नहीं रखते, उन्हें पशु-तुल्य ही समझना चाहिये॥ ६-७॥