देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 106, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 106
अ० ६ ] प्रथम स्कन्ध ९७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मृगाद्याः पशवः केचिज्जानन्ति श्रावणं सुखम्।<br>अश्रोत्राः फणिनश्चैव मुमुहुर्नादपानतः॥ ८ | मृग आदि बहुत-से पशु श्रवण-सुखका अनुभव करते हैं और कानविहीन सर्प भी ध्वनि सुनकर मुग्ध हो जाते हैं॥ ८॥ |
| पञ्चानामिन्द्रियाणां वै शुभे श्रवणदर्शने।<br>श्रवणाद्वस्तुविज्ञानं दर्शनाच्चित्तरञ्जनम्॥ ९ | पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंमें श्रवणेन्द्रिय तथा दर्शनेन्द्रिय—दोनों ही शुभ होती हैं; क्योंकि सुननेसे वस्तुओंका ज्ञान प्राप्त होता है और देखनेसे मनोरंजन होता है॥ ९॥ |
| श्रवणं त्रिविधं प्रोक्तं सात्त्विकं राजसं तथा।<br>तामसं च महाभाग सुज्ञैरुक्तं निश्चयान्वितम्॥ १० | हे महाभाग! विद्वानोंने निर्धारित करके कहा है कि सात्त्विक, राजस तथा तामस भेदानुसार श्रवण तीन प्रकारका होता है॥ १०॥ |
| सात्त्विकं वेदशास्त्रादि साहित्यं चैव राजसम्।<br>तामसं युद्धवार्ता च परदोषप्रकाशनम्॥ ११ | वेद-शास्त्रादिका श्रवण सात्त्विक, साहित्यका श्रवण राजस तथा युद्धसम्बन्धी बातों एवं दूसरोंकी निन्दाका श्रवण तामस कहा गया है॥ ११॥ |
| सात्त्विकं त्रिविधं प्रोक्तं प्रज्ञावद्भिश्च पण्डितैः।<br>उत्तमं मध्यमं चैव तथैवाधममित्युत॥ १२ | प्रज्ञावान् पण्डितोंद्वारा सात्त्विक श्रवणके भी उत्तम, मध्यम तथा अधम—ये तीन प्रकार बताये गये हैं॥ १२॥ |
| उत्तमं मोक्षफलदं स्वर्गदं मध्यमं तथा।<br>अधमं भोगदं प्रोक्तं निर्णीय विदितं बुधैः॥ १३ | उत्तम श्रवण मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला, मध्यम श्रवण स्वर्ग देनेवाला तथा अधम श्रवण भोगोंकी उपलब्धि करानेवाला कहा गया है। विद्वानोंने अच्छी तरह सोच-समझकर ऐसा निर्धारण किया है॥ १३॥ |
| साहित्यं चैव त्रिविधं स्वीयायां चोत्तमं स्मृतम्।<br>मध्यमं वारयोषायां परोढायां तथाधमम्॥ १४ | साहित्य भी तीन प्रकारका होता है। जिस साहित्यमें स्वकीया नायिकाका वर्णन हो वह उत्तम, जिस साहित्यमें वेश्याओंका वर्णन हो वह मध्यम तथा जिस साहित्यमें परस्त्रीवर्णन हो, वह अधम साहित्य कहा गया है॥ १४॥ |
| तामसं त्रिविधं ज्ञेयं विद्वद्भिः शास्त्रदर्शिभिः।<br>आततायिनियुद्धं यत्तदुत्तममुदाहृतम्॥ १५<br><br>मध्यमं चापि विद्वेषात्पाण्डवानां तथारिभिः।<br>अधमं निर्निमित्तं तु विवादे कलहे तथा॥ १६ | शास्त्रोंके परम निष्णात विद्वानोंने तामस श्रवणके तीन भेद बतलाये हैं। किसी पापाचारीके संहारसे सम्बन्धित युद्धवर्णनका श्रवण उत्तम, कौरव-पाण्डवोंकी तरह द्वेषके कारण शत्रुतामें युद्धवर्णनका श्रवण मध्यम तथा अकारण विवाद एवं कलहसे हुए युद्धके वर्णनका श्रवण अधम कहा गया है॥ १५-१६॥ |
| तदत्र श्रवणं मुख्यं पुराणस्य महामते।<br>बुद्धिप्रवर्धनं पुण्यं ततः पापप्रणाशनम्॥ १७ | हे महामते! इनमें पुराणोंके श्रवणकी ही प्रधानता मानी गयी है; क्योंकि इनके श्रवणसे बुद्धिका विकास होता है, पुण्य प्राप्त होता है और समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं॥ १७॥ |
| तदाख्याहि महाबुद्धे कथां पौराणिकीं शुभाम्।<br>श्रुतां द्वैपायनात्पूर्वं सर्वार्थस्य प्रसाधिनीम्॥ १८ | अतएव हे महामते! पूर्वकालमें द्वैपायन महर्षि व्याससे सुनी हुई समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाली परम पवित्र पौराणिक कथा कहिये॥ १८॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—4 A