देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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९८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ६
| सूत उवाच<br>यूयं धन्या महाभागा धन्योऽहं पृथिवीतले।<br>येषां श्रवणबुद्धिश्च ममापि कथने किल॥ १९ | सूतजी बोले—हे महाभाग! इस पृथ्विलोकमें आप-लोग धन्य हैं और मैं भी धन्य हूँ; क्योंकि आपलोगोंमें कथा-श्रवणके प्रति और मुझमें कथा-वाचनके प्रति विवेक जाग्रत् हुआ है॥ १९॥ |
| पुरा चैकार्णवे जाते विलीने भुवनत्रये।<br>शेषपर्यङ्कसुप्ते च देवदेवे जनार्दने॥ २०<br><br>विष्णुकर्णमलोद्भूतौ दानवौ मधुकैटभौ।<br>महाबलौ च तौ दैत्यौ विवृद्धौ सागरे जले॥ २१ | पूर्वकालमें प्रलयावस्थामें जब तीनों लोक महाजलराशिमें विलीन हो गये और देवाधिदेव भगवान् विष्णु शेष-शय्यापर सो गये तब विष्णुके कानोंकी मैलसे मधु-कैटभ नामक दो दानव उत्पन्न हुए और वे महाबली दैत्य उस महासागरमें बढ़ने लगे॥ २०-२१॥ |
| क्रीडमानौ स्थितौ तत्र विचरन्तावितस्ततः।<br>तावेकदा महाकायौ क्रीडासक्तौ महार्णवे॥ २२<br><br>चिन्तामवापतुश्चित्ते भ्रातराविव संस्थितौ।<br>नाकारणं भवेत्कार्यं सर्वत्रैषा परम्परा॥ २३ | वे दोनों दैत्य क्रीडा करते हुए उसी सागरमें इधर-उधर भ्रमण करते रहे। एक बार क्रीडापरायण विशाल शरीरवाले उन दोनों भाइयोंने विचार किया कि बिना किसी कारणके कोई भी कार्य नहीं होता; यह एक सार्वत्रिक परम्परा है॥ २२-२३॥ |
| आधेयं तु विनाधारं न तिष्ठति कथञ्चन।<br>आधाराधेयभावस्तु भाति नो चित्तगोचरः॥ २४ | बिना किसी आधारके आधेयकी सत्ता कदापि सम्भव नहीं है; अतः आधार-आधेयका भाव हमारे मनमें बार-बार आता रहता है॥ २४॥ |
| क्व तिष्ठति जलं चेदं सुखरूपं सुविस्तरम्।<br>केन सृष्टं कथं जातं मग्नावावाञ्जले स्थितौ॥ २५ | अति विस्तारवाला तथा सुखद यह जल किस आधारपर स्थित है? किसने इसका सृजन किया? यह किस प्रकार उत्पन्न हुआ और इस जलमें निमग्न हमलोग कैसे स्थित हैं?॥ २५॥ |
| आवां वा कथमुत्पन्नौ केन वोत्पादितावुभौ।<br>पितरौ क्वेति विज्ञानं नास्ति कामं तथावयोः॥ २६ | हम दोनों कैसे पैदा हुए और किसने हम दोनोंको उत्पन्न किया? हमारे माता-पिता कौन हैं?—इस बातका भी कोई ज्ञान हम दोनोंको नहीं है॥ २६॥ |
| सूत उवाच<br>एवं कामयमानौ तौ जग्मतुर्न विनिश्चयम्।<br>उवाच कैटभस्तत्र मधुं पार्श्वे स्थितं जले॥ २७ | सूतजी बोले—इस प्रकार चिन्तन करते हुए वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँचे, तब कैटभने जलके भीतर अपने पास स्थित मधुसे कहा॥ २७॥ |
| कैटभ उवाच<br>मधो वामत्र सलिले स्थातुं शक्तिर्महाबला।<br>वर्तते भ्रातरचला कारणं सा हि मे मता॥ २८ | कैटभ बोला—हे भाई मधु! हम दोनोंके इस जलमें स्थित रहनेका कारण कोई अचल महाबली शक्ति है, ऐसा ही मैं मानता हूँ॥ २८॥ |
| तया ततमिदं तोयं तदाधारं च तिष्ठति।<br>सा एव परमा देवी कारणञ्च तथावयोः॥ २९ | उसीसे समुद्रका सम्पूर्ण जल व्याप्त है और उसी शक्तिके आधारपर यह जल टिका हुआ है तथा वे ही परात्परा देवी हम दोनोंकी भी स्थितिका कारण हैं॥ २९॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—4 B