देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० ६ ] प्रथम स्कन्ध ९९
| एवं विबुध्यमानौ तौ चिन्ताविष्टौ यदासुरौ।<br>तदाकाशे श्रुतं ताभ्यां वाग्बीजं सुमनोहरम्॥ ३० | इस प्रकार विविध चिन्तन करते हुए वे दोनों दानव जब सचेत हुए तब उन्हें आकाशमें अत्यन्त मनोहारी वाग्बीजस्वरूप (ऐं) वाणी सुनायी पड़ी॥ ३०॥ |
| गृहीतं च ततस्ताभ्यां तस्याभ्यासो दृढः कृतः।<br>तदा सौदामनी दृष्टा ताभ्यां खे चोत्थिता शुभा॥ ३१ | उसे सुनकर उन दोनोंने सम्यक् रूपसे हृदयंगम कर लिया और वे उसका दृढ़ अभ्यास करने लगे। तदनन्तर उन्हें आकाशमें कौंधती हुई सुन्दर विद्युत् दिखलायी पड़ी॥ ३१॥ |
| ताभ्यां विचारितं तत्र मन्त्रोऽयं नात्र संशयः।<br>तथा ध्यानमिदं दृष्टं गगने सगुणं किल॥ ३२ | तब उन्होंने सोचा कि निःसन्देह यह मन्त्र ही है और यह सगुण ध्यान ही आकाशमें प्रत्यक्ष दृष्टिगत हुआ है॥ ३२॥ |
| निराहारौ जितात्मानौ तन्मनस्कौ समाहितौ।<br>बभूवतुर्विचिन्त्यैवं जपध्यानपरायणौ॥ ३३ | तदनन्तर वे दोनों दैत्य आहारका परित्यागकर इन्द्रियोंको आत्मनियन्त्रित करके उसी विद्युज्ज्योतिमें मन केन्द्रित किये हुए समाधिस्थ भावसे जप-ध्यान करनेमें लीन हो गये॥ ३३॥ |
| एवं वर्षसहस्रं तु ताभ्यां तप्तं महत्त्पः।<br>प्रसन्ना परमा शक्तिर्जाता सा परमा तयोः॥ ३४ | इस प्रकार उन दोनोंने एक हजार वर्षोंतक कठोर तपस्या की, जिससे वे परात्परा शक्ति उन दोनोंपर अतिशय प्रसन्न हो गयीं॥ ३४॥ |
| खिन्नौ तौ दानवौ दृष्ट्वा तपसे कृतनिश्चयौ।<br>तयोरनुग्रहार्थाय वागुवाचाशरीरिणी॥ ३५ | घोर तपस्याके लिये अपने निश्चयपर दृढ़ रहनेवाले उन दोनों दानवोंको अत्यन्त परिश्रान्त देखकर उनपर कृपाके निमित्त यह आकाशवाणी हुई॥ ३५॥ |
| वरं वां वाञ्छितं दैत्यौ ब्रूतं परमसम्मतम्।<br>ददामि परितुष्टास्मि युवयोस्तपसा किल॥ ३६ | हे दैत्यो! तुम दोनोंकी कठोर तपश्चर्यासे मैं परम प्रसन्न हूँ। अतएव तुम दोनों अपना मनोवांछित वरदान माँगो; मैं अवश्य दूँगी॥ ३६॥ |
| सूत उवाच<br>इति श्रुत्वा तु तां वाणीं दानवावूचतुस्तदा।<br>स्वेच्छया मरणं देवि वरं नौ देहि सुव्रते॥ ३७ | **सूतजी बोले—**तदनन्तर उस आकाशवाणीको सुनकर उन दानवोंने कहा—हे देवि! हमारी मृत्यु हमारे इच्छानुसार हो; हे सुव्रते! हमें आप यही वरदान दीजिये॥ ३७॥ |
| वागुवाच<br>वाञ्छितं मरणं दैत्यौ भवेद्वां मत्प्रसादतः।<br>अजेयौ देवदैत्यैश्च भ्रातरौ नात्र संशयः॥ ३८ | **वाणीने कहा—**हे दैत्यो! मेरी कृपासे अब तुम दोनों अपनी इच्छासे ही मृत्युको प्राप्त होओगे। दानव और देवता कोई भी तुम दोनों भाइयोंको पराजित नहीं कर सकेंगे; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३८॥ |
| सूत उवाच<br>इति दत्तवरौ देव्या दानवौ मददर्पितौ।<br>चक्रतुः सागरे क्रीडां यादोगणसमन्वितौ॥ ३९ | **सूतजी बोले—**भगवतीसे ऐसा वरदान प्राप्तकर वे दोनों दैत्य मदोन्मत्त होकर उस महासागरमें जलचर जीवोंके साथ क्रीड़ातत्पर हो गये॥ ३९॥ |
| कालेन कियता विप्रा दानवाभ्यां यदृच्छया।<br>दृष्टः प्रजापतिर्ब्रह्मा पद्मासनगतः प्रभुः॥ ४० | हे विप्रो! कुछ समय व्यतीत होनेपर उन दानवोंने संयोगवश जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीको कमलके आसनपर बैठे हुए देखा॥ ४०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—4 C