देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| दृष्ट्वा तु मुदितावास्तां युद्धकामौ महाबलौ।<br>तमूचतुस्तदा तत्र युद्धं नौ देहि सुव्रत॥ ४१<br><br>नोचेत्पद्मं परित्यज्य यथेष्टं गच्छ माचिरम्।<br>यदि त्वं निर्बलश्चासि क्व योग्यं शुभमासनम्॥ ४२<br><br>वीरभोग्यमिदं स्थानं कातरोऽसि त्यजाशु वै।<br>तयोरिति वचः श्रुत्वा चिन्तामाप प्रजापतिः॥ ४३<br><br>दृष्ट्वा च बलिनौ वीरौ किं करोमीति तापसः।<br>चिन्ताविष्टस्तदा तस्थौ चिन्तयन्मनसा तदा॥ ४४ | उन्हें देखकर युद्धकी लालसासे वे दोनों महाबली दैत्य प्रसन्न हो उठे और ब्रह्माजीसे बोले—हे सुव्रत! आप हमलोगोंके साथ युद्ध कीजिये; अन्यथा यह पद्मासन छोड़कर आप अविलम्ब जहाँ जाना चाहें, वहाँ चले जाइये। यदि आप दुर्बल हैं तो इस शुभ आसनपर बैठनेका आपका अधिकार कहाँ! कोई वीर ही इस आसनका उपभोग कर सकता है। आप कायर हैं, अतः अतिशीघ्र इस आसनको छोड़ दीजिये। उन दोनों दैत्योंकी यह बात सुनकर प्रजापति ब्रह्मा चिन्तामें पड़ गये। तब उन दोनों बलशाली वीरोंको देखकर ब्रह्माजी चिन्ताकुल हो उठे और मन-ही-मन सोचने लगे कि मुझ-जैसा तपस्वी इनका क्या कर सकता है?॥ ४१—४४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे मधुकैटभयोर्युद्धोद्योगवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
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अथ सप्तमोऽध्यायः
ब्रह्माजीका भगवान् विष्णु तथा भगवती योगनिद्राकी स्तुति करना
| सूत उवाच<br>तौ वीक्ष्य बलिनौ ब्रह्मा तदोपायानचिन्तयत्।<br>सामदानभिदादींश्च युद्धान्तान्सर्वतन्त्रवित्॥ १ | सूतजी बोले—तदनन्तर उन दोनों वीरोंको देखकर सर्वशास्त्रवेत्ता ब्रह्माजी साम, दान, भेद आदि नीतियोंके माध्यमसे युद्धकी समाप्तिके उपायोंको सोचने लगे॥ १॥ |
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| न जानेऽहं बलं नूनमेतयोर्वा यथातथम्।<br>अज्ञाते तु बले कामं नैव युद्धं प्रशस्यते॥ २ | इनके वास्तविक बलका मुझे कोई ज्ञान नहीं है। नीतिके अनुसार जिसके बलकी जानकारी न हो, उसके साथ युद्ध करना कदापि उचित नहीं होता॥ २॥ |
| स्तुतिं करोमि चेदद्य दुष्टयोर्मदमत्तयोः।<br>प्रकाशितं भवेन्नूनं निर्बलत्वं मया स्वयम्॥ ३<br><br>वधिष्यति तदैकोऽपि निर्बलत्वे प्रकाशिते।<br>दानं नैवाद्य योग्यं वा भेदः कार्यो मया कथम्॥ ४<br><br>विष्णुं प्रबोधयाम्यद्य शेषे सुप्तं जनार्दनम्।<br>चतुर्भुजं महावीर्यं दुःखहा स भविष्यति॥ ५ | यदि मैं इस समय इन मदोन्मत्त दुष्ट दानवोंकी स्तुति करता हूँ तो इससे स्वयं मेरे द्वारा अपनी निर्बलता प्रकाशित होगी। निर्बलता प्रदर्शित करनेपर इनमेंसे कोई एक ही मेरा वध कर देगा। इनके साथ इस समय मैं न तो दाननीति और न तो भेदनीतिको ही उपयुक्त समझ रहा हूँ। अतः इस समय उचित यही है कि मैं शेषनागपर सोये हुए चतुर्भुज एवं पराक्रमी भगवान् विष्णुको जगाऊँ। वे मेरी विपत्ति अवश्य ही दूर करेंगे॥ ३—५॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा पद्मनालगतोऽब्जजः।<br>जगाम शरणं विष्णुं मनसा दुःखनाशकम्॥ ६ | मनमें ऐसा सोचकर कमलनालका आश्रय लेकर पद्मयोनि ब्रह्माजी मन-ही-मन दुःखनाशक विष्णुके शरणागत हो गये॥ ६॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—4 D