देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 110, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 110
अ० ७ ] प्रथम स्कन्ध १०१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तुष्टाव बोधनार्थं तं शुभैः सम्बोधनैर्हरिम्।<br>नारायणं जगन्नाथं निस्पन्दं योगनिद्रया॥ ७ | वे शुभ सम्बोधनोंके द्वारा योगनिद्राके कारण स्पन्दनरहित उन नारायण जगत्पति भगवान् विष्णुको जगानेके लिये उनकी स्तुति करने लगे॥ ७॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>दीननाथ हरे विष्णो वामनोत्तिष्ठ माधव।<br>भक्तार्तिहृद्धृषीकेश सर्वावास जगत्पते॥ ८<br><br>अन्तर्यामिन्नमेयात्मन्वासुदेव जगत्पते।<br>दुष्टारिनाशनैकाग्रचित्त चक्रगदाधर॥ ९<br><br>सर्वज्ञ सर्वलोकेश सर्वशक्तिसमन्वित।<br>उत्तिष्ठोत्तिष्ठ देवेश दुःखनाशन पाहि माम्॥ १० | ब्रह्माजी बोले— हे दीनानाथ! हे हरे! हे विष्णो! हे वामन! हे माधव! भक्तोंकी पीड़ा हरनेवाले हे हृषीकेश! हे सर्वव्यापिन्! हे जगत्पते! हे अनन्तस्वरूप! हे वासुदेव! हे अन्तर्यामिन्! हे जगत्के स्वामी! हे दुष्टों तथा शत्रुओंका संहार करनेमें एकाग्र चित्तवाले! हे चक्रधर! हे गदाधर! हे सर्वज्ञ! हे सर्वलोकेश! हे सर्वशक्तिसम्पन्न! हे देवेश! हे दुःखनाशन! अब आप उठिये, उठिये और मेरी रक्षा कीजिये॥ ८—१०॥ |
| विश्वम्भर विशालाक्ष पुण्यश्रवणकीर्तन।<br>जगद्योने निराकार सर्गस्थित्यन्तकारक॥ ११<br><br>इमौ दैत्यौ महाराज हन्तुकामौ मदोद्धतौ।<br>न जानास्यखिलाधार कथं मां सङ्कटे गतम्॥ १२ | हे विश्वम्भर! हे विशालाक्ष! हे पुण्यश्रवण-कीर्तन! हे जगत्स्रष्टा! हे निराकार! हे सृष्टि-पालन-संहारके कारक! हे महाराज! ये दोनों मदोन्मत्त दानव मेरा वध करना चाहते हैं। हे सर्वाधार! मैं इस समय संकटग्रस्त हूँ; क्या आप यह नहीं जानते?॥ ११-१२॥ |
| उपेक्षसेऽतिदुःखार्तं यदि मां शरणं गतम्।<br>पालकत्वं महाविष्णो निराधारं भवेत्ततः॥ १३ | हे महाविष्णो! मैं इस समय दुःखसे अत्यधिक पीड़ित हूँ और आपके शरणागत हूँ। ऐसी स्थितिमें यदि आप मेरी उपेक्षा करेंगे तो आपका जगत्पालनका नियम निरर्थक हो जायगा॥ १३॥ |
| एवं स्तुतोऽपि भगवान् न बुबोध यदा हरिः।<br>योगनिद्रासमाक्रान्तस्तदा ब्रह्मा ह्यचिन्तयत्॥ १४<br><br>नूनं शक्तिसमाक्रान्तो विष्णुर्निद्रावशं गतः।<br>जजागार न धर्मात्मा किं करोम्यद्य दुःखितः॥ १५<br><br>हन्तुकामावुभौ प्राप्तौ दानवौ मदगर्वितौ।<br>किं करोमि क्व गच्छामि नास्ति मे शरणं क्वचित्॥ १६ | इस प्रकार स्तुति करनेपर भी जब योगनिद्रामें लीन भगवान् विष्णु नहीं जगे, तब ब्रह्माजीने विचार किया कि भगवान् विष्णु अवश्य ही शक्तिके अधीन होकर योगनिद्राके वशमें हो गये हैं, जिससे ये धर्मात्मा नहीं जग रहे हैं। अब दुःखसे पीड़ित मैं इस समय क्या करूँ? अहंकारके मदमें चूर वे दोनों दानव मुझे मारनेके उद्देश्यसे यहाँ आ गये हैं। अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? अब तो मुझे शरण देनेवाला कोई भी नहीं है॥ १४—१६॥ |
| इति संचिन्त्य मनसा निश्चयं प्रतिपद्य च।<br>तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः॥ १७ | इस प्रकार मन-ही-मन सोचते हुए वे एक निष्कर्षपर पहुँचकर एकाग्रचित्त हो उन भगवती योगनिद्राकी स्तुति करने लगे॥ १७॥ |
| विचार्य मनसाप्येवं शक्तिर्मे रक्षणे क्षमा।<br>यया ह्यचेतनो विष्णुः कृतोऽस्ति स्पन्दवर्जितः॥ १८ | उन्होंने अपने मनमें यह दृढ़ विचार रख लिया कि वे ही महाशक्ति मेरी रक्षा करनेमें समर्थ हैं; जिन्होंने भगवान् विष्णुको भी चेतनाहीन तथा निःस्पन्द कर दिया है॥ १८॥ |