देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| १०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| व्यसुर्यथा न जानाति गुणाञ्छब्दादिकानिह।<br>तथा हरिर्न जानाति निद्रामीलितलोचनः॥ १९ | इस लोकमें जैसे मृत प्राणीको शब्द आदि गुणोंका आभास नहीं हो पाता, उसी प्रकार निद्राके कारण अपने नेत्र मूँदे हुए भगवान् विष्णु कुछ भी जान सकनेमें असमर्थ हैं॥ १९॥ |
| न जहाति यतो निद्रां बहुधा संस्तुतोऽप्यसौ।<br>मन्ये नास्य वशे निद्रा निद्रायं वशीकृतः॥ २० | मेरे द्वारा नानाविध स्तुति किये जानेपर भी भगवान् विष्णु निद्राका त्याग नहीं कर रहे हैं। अतएव मैं मानता हूँ कि निद्रा इनके अधीन नहीं है, अपितु निद्राके द्वारा ही ये वशीभूत कर लिये गये हैं॥ २०॥ |
| यो यस्य वशमापन्नः स तस्य किङ्करः किल।<br>तस्माच्च योगनिद्रेयं स्वामिनी मापतेर्हरेः॥ २१ | जो प्राणी जिस किसीके वशमें हो जाता है, वह निश्चय ही उसीका दास बन जाता है। अतः ये योगनिद्रा ही लक्ष्मीपति विष्णुकी स्वामिनी हो गयी हैं॥ २१॥ |
| सिन्धुजाया अपि वशे यया स्वामी वशीकृतः।<br>नूनं जगदिदं सर्वं भगवत्या वशीकृतम्॥ २२ | जिस शक्तिके द्वारा सिन्धुपुत्री लक्ष्मीके वशमें रहनेवाले भगवान् विष्णु भी वशीभूत कर लिये गये हैं, उन्हीं भगवतीने निश्चितरूपसे इस जगत्को अपने अधीन कर रखा है॥ २२॥ |
| अहं विष्णुस्तथा शम्भुः सावित्री च रमाप्युमा।<br>सर्वे वयं वशे यस्या नात्र किञ्चिद्विचारणा॥ २३ | मैं (ब्रह्मा), विष्णु, शंकर, सावित्री, लक्ष्मी एवं पार्वती—हम सभी उन्हींके अधीन हैं; इसमें कुछ भी संशय नहीं है॥ २३॥ |
| हरिरप्यवशः शेते यथान्यः प्राकृतो जनः।<br>ययाभिभूतः का वार्ता किलान्येषां महात्मनाम्॥ २४ | भगवान् विष्णु भी जिस शक्तिके वशीभूत होकर विवश हुए-से उसी प्रकार सो रहे हैं जिस प्रकार एक सामान्य प्राणी सोता है, तब अन्य महापुरुषोंके विषयमें क्या कहा जाय?॥ २४॥ |
| स्तौम्यद्य योगनिद्रां वै यया मुक्तो जनार्दनः।<br>घटयिष्यति युद्धे च वासुदेवः सनातनः॥ २५ | अतः अब मैं योगनिद्राका ही स्तवन करूँगा जिनकी कृपासे निद्रामुक्त होकर जनार्दन, सनातन भगवान् वासुदेव युद्धके लिये उद्योग करेंगे॥ २५॥ |
| इति कृत्वा मतिं ब्रह्मा पद्मनालस्थितस्तदा।<br>तुष्टाव योगनिद्रां तां विष्णोरङ्गेषु संस्थिताम्॥ २६ | तदनन्तर ऐसा निश्चयकर कमलनालपर विराजमान ब्रह्माजी भगवान् विष्णुके अंगोंमें व्याप्त उन योगनिद्राकी स्तुति करने लगे॥ २६॥ |
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माजी बोले— |
| देवि त्वमस्य जगतः किल कारणं हि<br>ज्ञातं मया सकलवेदवचोभिरम्ब।<br>यद्विष्णुरप्यखिललोकविवेककर्ता<br>निद्रावशं च गमितः पुरुषोत्तमोऽद्य॥ २७ | हे देवि! इस जगत्का कारण आप ही हैं; वेदवाक्योंसे मुझे ऐसा ज्ञात हुआ है। हे अम्ब! आपकी ही शक्तिसे सम्पूर्ण विश्वको ज्ञान देनेवाले पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु भी इस समय योगनिद्राके वशमें हो गये हैं॥ २७॥ |