देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 112, कुल 889 में से
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| अ० ७ ] | प्रथम स्कन्ध | १०३ |
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| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
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| को वेद ते जननि मोहविलासलीलां<br>मूढोऽस्म्यहं हरिरयं विवशश्च शेते।<br>ईदृक्तया सकलभूतमनोनिवासे<br>विद्वत्तमो विबुधकोटिषु निर्गुणायाः ॥ २८ | हे माता! समग्र लोकको मोहित कर देनेवाली आपकी लीलाको कौन जान सकता है ? आपकी इस लीलासे मैं तो मूढ़ हो गया हूँ और ये विष्णु परवश होकर सो रहे हैं। हे समस्त प्राणियोंके मनमें निवास करनेवाली भगवति! करोड़ों देवताओंमें भी ऐसा कौन विज्ञ है, जो ऐसी आप निर्गुणाका रहस्य जान सके ? ॥ २८ ॥ |
| सांख्या वदन्ति पुरुषं प्रकृतिं च यां तां<br>चैतन्यभावरहितां जगतश्च कर्त्रीम्।<br>किं तादृशासि कथमत्र जगन्निवास-<br>श्चैतन्यताविरहितो विहितस्त्वयाद्य ॥ २९ | सांख्यशास्त्रके विद्वान् पुरुष और प्रकृतिसे जगत्की उत्पत्ति मानते हैं। इनमें वे अचेतन प्रकृतिको ही जगत्को उत्पन्न करनेवाली बताते हैं। तो फिर क्या आप वैसी ही अचेतन हैं ? किंतु यदि आप जड होतीं तो इन जगदाधार विष्णुको इस समय चेतनारहित कैसे कर देतीं ? ॥ २९ ॥ |
| नाट्यं तनोषि सगुणा विविधप्रकारं<br>नो वेत्ति कोऽपि तव कृत्यविधानयोगम्।<br>ध्यायन्ति यां मुनिगणा नियतं त्रिकालं<br>सन्ध्येति नाम परिकल्प्य गुणान् भवानि ॥ ३० | हे महामाये! आप सगुण रूप धारणकर नानाविध लीलाएँ करती रहती हैं, अतः आपके रहस्यमय कार्योंका सम्यक् ज्ञान करनेमें भला कौन समर्थ है ? हे भवानि! मुनिगण ‘सन्ध्या’ नामसे आपके गुणोंको परिकल्पित करके तीनों समय (प्रातः, मध्याह्न, सायं) निश्चितरूपसे आपका ही ध्यान करते हैं॥ ३०॥ |
| बुद्धिर्हि बोधकरणा जगतां सदा त्वं<br>श्रीश्चासि देवि सततं सुखदा सुराणाम्।<br>कीर्तिस्तथा मतिधृती किल कान्तिरेव<br>श्रद्धा रतिश्च सकलेषु जनेषु मातः ॥ ३१ | हे देवि! आप बुद्धिरूपा होकर समस्त लोकको ज्ञान देती हैं और लक्ष्मीरूपसे सदैव देवताओंको सुख प्रदान करती हैं। हे माता! सम्पूर्ण प्राणियोंमें कीर्ति, मति, धृति, कान्ति, श्रद्धा एवं रतिरूपमें आप ही विद्यमान हैं॥ ३१॥ |
| नातः परं किल वितर्कशतैः प्रमाणं<br>प्राप्तं मया यदिह दुःखगतिं गतेन।<br>त्वं चात्र सर्वजगतां जननीति सत्यं<br>निद्रालुतां वितरता हरिणात्र दृष्टम् ॥ ३२ | हे देवि! प्रगाढ निद्राके वशीभूत विष्णुको देखकर विषम दुःखकी स्थितिको प्राप्त हुए मुझको यह प्रमाण मिल गया कि आप ही निस्संदेह सम्पूर्ण जगत्की जननी हैं। इस विषयमें अब सैकड़ों तर्क-वितर्ककी कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ३२॥ |
| त्वं देवि वेदविदुषामपि दुर्विभाव्या<br>वेदोऽपि नूनमखिलार्थतया न वेद।<br>यस्मात्त्वदुद्भवमसौ श्रुतिराप्नुवाना<br>प्रत्यक्षमेव सकलं तव कार्यमेतत् ॥ ३३ | हे देवि! आप वेदशास्त्रोंके पारदर्शी विद्वानोंकी समझसे भी परे हैं और वेद भी आपको पूर्णरूपसे नहीं जानते; क्योंकि उन वेदोंकी उत्पत्तिका भी कारण आप ही हैं। आपका यह सम्पूर्ण रहस्यमय क्रिया-कलाप सबको प्रत्यक्ष दिखायी देता है॥ ३३॥ |
| कस्ते चरित्रमखिलं भुवि वेद धीमा-<br>न्नाहं हरिन च भवो न सुरास्तथान्ये।<br>ज्ञातुं क्षमाश्च मुनयो न ममात्मजाश्च<br>दुर्वाच्य एव महिमा तव सर्वलोके ॥ ३४ | इस संसारमें कौन ऐसा बुद्धिमान् प्राणी है, जो आपके सम्पूर्ण चरित्रको जाननेमें समर्थ है? स्वयं मैं (ब्रह्मा), विष्णु, शंकर, देवगण, अन्य मुनिवृन्द तथा मेरे तत्त्वज्ञ पुत्र-लोग भी उसे नहीं जान सके हैं। सम्पूर्ण लोकमें आपकी महिमाका वर्णन कोई नहीं कर सकता है ॥ ३४॥ |