भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 113
१०४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ७
श्लोकअर्थ
यज्ञेषु देवि यदि नाम न ते वदन्ति<br>स्वाहेति वेदविदुषो हवने कृतेऽपि।<br>न प्राप्नुवन्ति सततं मखभागधेयं<br>देवास्त्वमेव विबुधेष्वपि वृत्तिदासि॥ ३५हे देवि! यदि यज्ञोंमें वैदिक विद्वान् हवनकार्यके समय आपके 'स्वाहा' नामका उच्चारण न करें तो देवगण अपना यज्ञभाग नहीं प्राप्त कर सकते। अतएव आप ही देवताओंका भी भरण-पोषण करती हैं॥ ३५॥
त्राता वयं भगवति प्रथमं त्वया वै<br>देवारिसम्भवभयादधुना तथैव।<br>भीतोऽस्मि देवि वरदे शरणं गतोऽस्मि<br>घोरं निरीक्ष्य मधुना सह कैटभं च॥ ३६हे भगवति! आपने पहले भी समय-समयपर दैत्योंद्वारा उत्पन्न किये गये भयोंसे हमारी रक्षा की है, उसी प्रकार इस समय भी हमारी रक्षा करें, मैं आपकी शरणमें हूँ। हे देवि! हे वरदे! मधुके साथ भयानक इस कैटभको देखकर मैं अत्यन्त भयाक्रान्त हूँ॥ ३६॥
नो वेत्ति विष्णुरधुना मम दुःखमेत-<br>ज्ज्ञाने त्वयात्मविवशीकृतदेहयष्टिः।<br>मुञ्चादिदेवमथवा जहि दानवेन्द्रौ<br>यद्रोचते तव कुरुष्व महानुभावे॥ ३७आपकी योगमायाने भगवान् विष्णुके शरीरके सभी अवयवोंको अपने वशमें कर रखा है, अतः वे मेरी इस विषम विपत्तिको नहीं जान रहे हैं। हे महानुभावे! या तो इस समय आप आदिदेवको मुक्त कर दें अथवा इन दोनों महादैत्योंका वध कर दें; इनमेंसे आपको जो उचित जान पड़े, वह कीजिये॥ ३७॥
जानन्ति ये न तव देवि परं प्रभावं<br>ध्यायन्ति ते हरिहरावपि मन्दचित्ताः।<br>ज्ञातं मयाद्य जननि प्रकटं प्रमाणं<br>यद्विष्णुरप्यतितरां विवशोऽथ शेते॥ ३८हे देवि! जो मन्दबुद्धि प्राणी आपकी विशिष्ट महिमाको नहीं जानते, वे ही विष्णु तथा शंकर आदिकी आराधना करते हैं। हे जननि! आज प्रत्यक्ष प्रमाणके रूपमें मैं आपकी महिमा देख रहा हूँ कि भगवान् विष्णु भी प्रगाढ़ निद्राके वशीभूत होकर सो रहे हैं॥ ३८॥
सिन्धूद्भवापि न हरिं प्रतिबोधितुं वै<br>शक्ता पतिं तव वशानुगमद्य शक्त्या।<br>मन्ये त्वया भगवति प्रसभं रमापि<br>प्रस्वापिता न बुबुधे विवशीकृतेव॥ ३९आपकी शक्तिके वशमें पड़े अपने पति भगवान् विष्णुको इस समय सिन्धुसुता लक्ष्मी भी नहीं जगा सकतीं; क्योंकि हे भगवति! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आपने ही बलपूर्वक लक्ष्मीको भी शयन करनेके लिये विवश कर दिया है, जिससे वे भी नहीं जग रही हैं॥ ३९॥
धन्यास्त एव भुवि भक्तिपरास्तवांघ्रौ<br>त्यक्त्वान्यदेवभजनं त्वयि लीनभावाः।<br>कुर्वन्ति देवि भजनं सकलं निकामं<br>ज्ञात्वा समस्तजननीं किल कामधेनुम्॥ ४०हे देवि! इस संसारमें वे ही प्राणी धन्य हैं जो आपके चरणोंमें भक्तिभाव रखते हैं, अन्य देवताओंकी उपासना त्यागकर आपके ध्यानमें लीन रहते हैं और आपको ही सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करनेवाली कामधेनु तथा समस्त लोककी जननी मानकर आपका भजन करते हैं॥ ४०॥
धीकान्तिकर्त्तिशुभवृत्तिगुणादयस्ते<br>विष्णोर्गुणास्तु परिहृत्य गताः क्व चाद्य।<br>बन्दीकृतो हरिरसौ ननु निद्रयात्र<br>शक्त्या तवैव भगवत्यतिमानवत्याः॥ ४१बुद्धि, कान्ति, यश, शुभ वृत्ति आदि गुण इस समय भगवान् विष्णुका परित्यागकर कहाँ चले गये? हे भगवति! अतिशय मानवाली आपकी ही शक्तिसे ये भगवान् विष्णु इस समय निद्राके वशवर्ती हो गये हैं॥ ४१॥