भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० ७ ]प्रथम स्कन्ध१०५
त्वं शक्तिरेव जगतामखिलप्रभावा<br>  त्वन्निर्मितं च सकलं खलु भावमात्रम्।<br>त्वं क्रीडसे निजविनिर्मितमोहजाले<br>  नाट्ये यथा विहरते स्वकृते नटो वै॥ ४२अखिल प्रभाववाली आप ही जगत्‌की एकमात्र शक्ति हैं और आपके द्वारा रचा गया सब कुछ आपकी लीला ही है। जैसे कोई नट अपने ही द्वारा निर्मित नाट्यमें अभिनय करता है, उसी प्रकार आप भी अपने ही द्वारा निर्मित मोहजालमें नानाविध लीलाएँ करती रहती हैं॥ ४२॥
विष्णुस्त्वया प्रकटितः प्रथमं युगादौ<br>  दत्ता च शक्तिरमला खलु पालनाय।<br>त्रातं च सर्वमखिलं विवशीकृतोऽद्य<br>  यद्रोचते तव तथाम्ब करोषि नूनम्॥ ४३युगके आरम्भमें आपने सर्वप्रथम विष्णुका सृजन किया, सबके पालनके लिये उन्हें निर्मल शक्ति प्रदान की और इस प्रकार समस्त जगत्‌की रक्षा की। उन्हीं भगवान् विष्णुको निद्राभिभूतकर आपने इस समय सुला दिया है। हे अम्ब! आपको जो उचित जान पड़ता है, आप निश्चितरूपसे वही किया करती हैं॥ ४३॥
सृष्ट्वात्र मां भगवति प्रविनाशितुं चे-<br>  न्नेच्छास्ति ते कुरु दयां परिहृत्य मौनम्।<br>कस्मादिमौ प्रकटितौ किल कालरूपौ<br>  यद्वा भवानि हसितुं नु किमिच्छसे माम्॥ ४४हे भगवति! यदि आप मेरी सृष्टि करके मुझे नष्ट कर देनेकी इच्छा नहीं रखतीं तो अपना यह मौन त्यागकर मेरे ऊपर दया कीजिये। हे भवानि! आपने कालरूप इन दोनों दानवोंको किसलिये उत्पन्न किया है? कहीं आपने मेरे उपहासके लिये तो ऐसा नहीं किया है?॥ ४४॥
ज्ञातं मया तव विचेष्टितमद्भुतं वै<br>  कृत्वाखिलं जगदिदं रमसे स्वतन्त्रा।<br>लीनं करोषि सकलं किल मां तथैव<br>  हन्तुं त्वमिच्छसि भवानि किमत्र चित्रम्॥ ४५हे भवानि! अब मुझे आपके अद्भुत चरित्रका ज्ञान हो गया। समस्त जगत्‌की रचना करके आप उसीमें स्वेच्छासे विहार करती हैं और पुनः उसे अपनेमें जैसे समाहित कर लेती हैं, उसी प्रकार मुझे नष्ट कर देना चाहती हैं तो इसमें कोई विचित्र बात नहीं है॥ ४५॥
कामं कुरुष्व वधमद्य ममैव मात-<br>  र्दुःखं न मे मरणजं जगदम्बिकेऽत्र।<br>कर्ता त्वयैव विहितः प्रथमं स चायं<br>  दैत्याहतोऽथ मृत इत्ययशो गरिष्ठम्॥ ४६हे माता! यदि आप यही चाहती हैं तो मेरा वध कर दीजिये। हे जगदम्बे! मुझे मरणजनित दुःखकी लेशमात्र भी चिन्ता नहीं है। हाँ, आपको यह महान् कलंक अवश्य लगेगा कि आपने जिसे सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता बनाया, उसे दैत्यने मार डाला॥ ४६॥
उत्तिष्ठ देवि कुरु रूपमिहाद्भुतं त्वं<br>  मां वा त्विमौ जहि यथेच्छसि बाललीले।<br>नो चेत्प्रबोधय हरिं निहनेदिमौ य-<br>  स्त्वत्साध्यमेतदखिलं किल कार्यजातम्॥ ४७हे देवि! अब आप उठिये और अपना अद्भुत रूप धारण कीजिये। हे बाललीलाकारिणि! आप अपने इच्छानुरूप चाहे मुझे मार दें अथवा इन दोनों दैत्योंको मार दें या तो भगवान् विष्णुको जगा दें, जिससे वे इन दोनोंका वध कर दें। यह सारा काम करनेमें आप ही समर्थ हैं॥ ४७॥