देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| १०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| सूत उवाच | |
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| एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा।<br>निःसृत्य हरिदेहात्तु संस्थिता पार्श्वतस्तदा॥ ४८ | **सूतजी बोले—**ब्रह्माजीद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर विष्णुके शरीरसे निकलकर तामसीदेवी उनके समीप खड़ी हो गयीं॥ ४८॥ |
| त्यक्त्वाङ्गानि च सर्वाणि विष्णोरतुलतेजसः।<br>निर्गता योगनिद्रा सा नाशाय च तयोस्तदा॥ ४९ | तदनन्तर अतुलित तेजवाले विष्णुके समस्त अंगोंको छोड़कर योगनिद्रा उन दोनोंका संहार करनेके लिये बाहर निकल आयीं॥ ४९॥ |
| विस्पन्दितशरीरोऽसौ यदा जातो जनार्दनः।<br>धाता परमिकां प्राप्तो मुदं दृष्ट्वा हरिं ततः॥ ५० | [योगमायाके प्रभावसे मुक्त हुए] वे जनार्दन जब चेतनायुक्त शरीरवाले हुए तब उन विष्णुको देखकर ब्रह्माजीको परम प्रसन्नता हुई॥ ५०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे<br>विष्णुप्रबोधो नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
अथाष्टमोऽध्यायः
भगवान् विष्णु योगमायाके अधीन क्यों हो गये—ऋषियोंके इस प्रश्नके उत्तरमें सूतजीद्वारा उन्हें आद्याशक्ति भगवतीकी महिमा सुनाना
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
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| सन्देहोऽत्र महाभाग कथायां तु महाद्भुतः।<br>वेदशास्त्रपुराणैश्च निश्चितं तु सदा बुधैः॥ १<br>ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च त्रयो देवाः सनातनाः।<br>नातः परतरं किञ्चिद् ब्रह्माण्डेऽस्मिन्महामते॥ २ | हे महाभाग! हमें इस कथानकमें महान् अद्भुत संशय है। हे महामते! वेदों, शास्त्रों, पुराणों तथा बुद्धिमान् लोगोंकी सदासे यह अवधारणा रही है कि ब्रह्मा, विष्णु तथा शम्भु—ये तीनों देवता सनातन हैं और इस ब्रह्माण्डमें इनसे बढ़कर अन्य कोई नहीं है॥ १-२॥ |
| ब्रह्मा सृजति लोकान्वै विष्णुः पात्यखिलं जगत्।<br>रुद्रः संहरते काले त्रय एतेऽत्र कारणम्॥ ३ | ब्रह्मा जगत्का सृजन करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शंकर प्रलयकालमें संहार करते हैं। ये तीनों ही इसमें कारण हैं॥ ३॥ |
| एका मूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>रजःसत्त्वतमोभिश्च संयुताः कार्यकारकाः॥ ४ | ब्रह्मा, विष्णु और महेश—ये तीनों देवता एक ही मूर्तिके तीन स्वरूप हैं। ये लोग क्रमशः रज, सत्त्व और तम-गुणोंसे युक्त होकर अपना-अपना कार्य करते हैं॥ ४॥ |
| तेषां मध्ये हरिः श्रेष्ठो माधवः पुरुषोत्तमः।<br>आदिदेवो जगन्नाथः समर्थः सर्वकर्मसु॥ ५<br>नान्यः कोऽपि समर्थोऽस्ति विष्णोरतुलतेजसः।<br>स कथं स्वापितः स्वामी विवशो योगमायया॥ ६ | उन तीनोंमें माधव, पुरुषोत्तम, आदिदेव जगन्नाथ श्रीहरि श्रेष्ठ हैं और वे सभी कार्य सम्पादित करनेमें समर्थ हैं। अनुपम तेजवाले विष्णुसे बढ़कर सर्वसमर्थ अन्य कोई भी नहीं है। उन जगत्पति विष्णुको योगमायाने विवश करके भला कैसे सुला दिया?॥ ५-६॥ |
| क्व गतं तस्य विज्ञानं जीवतश्चेष्टितं कुतः।<br>सन्देहोऽयं महाभाग कथयस्व यथाशुभम्॥ ७ | उस समय उन विष्णुकी चेतना कहाँ चली गयी और उनके जीवनकी चेष्टा कहाँ लुप्त हो गयी? हे महाभाग! यह महान् सन्देह उपस्थित है; आप इस विषयमें यथोचित बतानेकी कृपा करें॥ ७॥ |