देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० ८ ] | प्रथम स्कन्ध | १०७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| का सा शक्तिः पुरा प्रोक्ता यया विष्णुर्जितः प्रभुः।<br>कुतो जाता कथं शक्ता का शक्तिर्वद सुव्रत॥ ८ | जिस शक्तिके विषयमें आप पहले बता चुके हैं कि उसने भगवान् विष्णुको भी पराभूत कर दिया था, वह कौन-सी शक्ति है? वह शक्ति कहाँसे उद्भूत हुई, शक्तिसम्पन्न कैसे हुई तथा उसका स्वरूप क्या है? हे सुव्रत! यह सब हमें स्पष्टरूपसे बतलाइये॥ ८॥ |
| यस्तु सर्वेश्वरो विष्णुर्वासुदेवो जगद्गुरुः।<br>परमात्मा परानन्दः सच्चिदानन्दविग्रहः॥ ९<br><br>सर्वकृत्सर्वभृत्स्रष्टा विरजः सर्वगः शुचिः।<br>स कथं निद्रया नीतः परतन्त्रः परात्परः॥ १० | जो विष्णु हैं वे तो सबके ईश्वर, वासुदेव, जगत्के गुरु, परमात्मा, परम आनन्दस्वरूप तथा सच्चिदानन्दकी साक्षात् मूर्ति हैं; सब कुछ करनेमें समर्थ, सबका पालन करनेवाले, सभी चराचरका सृजन करनेवाले, रजोगुणसे रहित, सर्वव्यापी और पवित्र हैं। वे परात्पर विष्णु निद्राकी परतन्त्रतामें कैसे आबद्ध हो गये?॥ ९-१०॥ |
| एतदाश्चर्यभूतो हि सन्देहो नः परन्तप।<br>छिन्धि ज्ञानासिना सूत व्यासशिष्य महामते॥ ११ | हे परन्तप! हमें इस प्रकारका आश्चर्यजनक सन्देह है। हे सूत! हे व्यासशिष्य! हे महामते! आप अपने ज्ञानरूपी खड्गसे हमारे इस सन्देहको नष्ट कर दीजिये॥ ११॥ |
| सूत उवाच<br>कः सन्देहं भिनत्त्येनं त्रैलोक्ये सचराचरे।<br>मुह्यन्ति मुनयः कामं ब्रह्मपुत्राः सनातनाः॥ १२<br><br>नारदः कपिलश्चैव प्रश्नेऽस्मिन्मुनिसत्तमाः।<br>किं ब्रवीमि महाभागा दुर्घटेऽस्मिन्विमर्शने॥ १३ | सूतजी बोले— हे मुनिजन! इस चराचर जगत्में कौन ऐसा है, जो इस शंकाका समाधान कर सके, जबकि ब्रह्माके पुत्र सनकादि मुनि तथा नारद, कपिल आदि भी इस विषयमें मोहित हो जाते हैं? हे मुनिश्रेष्ठ! हे महाभाग! तब इस जटिल समस्याके समाधानमें मैं क्या कहूँ?॥ १२-१३॥ |
| देवेषु विष्णुः कथितः सर्वगः सर्वपालकः।<br>यतो विराडिदं सर्वमुत्पन्नं सचराचरम्॥ १४ | देवताओंमें भगवान् विष्णु ही सर्वव्यापी एवं सभी भूतोंके रक्षक कहे गये हैं। उन्हींसे इस चराचर समस्त विराट् संसारकी सृष्टि हुई है॥ १४॥ |
| ते सर्वे समुपासन्ते नत्वा देवं परात्परम्।<br>नारायणं हृषीकेशं वासुदेवं जनार्दनम्॥ १५ | वे सभी देवता परात्पर परमात्माको नमस्कार करके नारायण, हृषीकेश, वासुदेव, जनार्दनरूपमें उनकी उपासना करते हैं॥ १५॥ |
| तथा केचिन्महादेवं शङ्करं शशिशेखरम्।<br>त्रिनेत्रं पञ्चवक्त्रं च शूलपाणिं वृषध्वजम्॥ १६ | कुछ लोग महादेव, शंकर, शशिशेखर, त्रिनेत्र, पंचवक्त्र, शूलपाणि और वृषभध्वजके रूपमें उन्हींकी उपासना करते हैं॥ १६॥ |
| तथा वेदेषु सर्वेषु गीतं नाम्ना त्रियम्बकम्।<br>कपर्द्दिनं पञ्चवक्त्रं गौरीदेहार्धधारिणम्॥ १७<br><br>कैलासवासनिरतं सर्वशक्तिसमन्वितम्।<br>भूतवृन्दयुतं देवं दक्षयज्ञविघातकम्॥ १८ | सभी वेदोंमें भी त्रियम्बक (त्र्यम्बक), कपर्दी, पंचवक्त्र, गौरीदेहार्धधारी, कैलासवासी, सर्वशक्ति-समन्वित, भूतगणोंसे सेवित एवं दक्षयज्ञविध्वंसक आदि नामोंसे उनका गुणगान किया गया है॥ १७-१८॥ |