देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| १०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| तथा सूर्य वेदविदः सायंप्रातर्दिने दिने।<br>मध्याह्ने तु महाभागाः स्तुवन्ति विविधैः स्तवैः॥ १९ | हे महाभागो! वैदिक विद्वान् लोग सूर्य आदि नामोंसे भी नित्य प्रातः, सायं तथा मध्याह्नकालमें सन्ध्या करते समय विविध प्रकारकी स्तुतियोंसे उन्हींकी प्रार्थना करते हैं॥ १९॥ |
| तथा वेदेषु सर्वेषु सूर्योपासनमुत्तमम्।<br>परमात्मेति विख्यातं नाम तस्य महात्मनः॥ २०<br><br>अग्निः सर्वत्र वेदेषु संस्तुतो वेदवित्तमैः।<br>इन्द्रश्चापि त्रिलोकेशो वरुणश्च तथापरः॥ २१ | सभी वेदोंमें सूर्योपासना श्रेष्ठ कही गयी है तथा उन महात्माका नाम 'परमात्मा' कहा गया है। वेदोंमें सर्वत्र वेदज्ञोंद्वारा अग्निदेवकी भी स्तुति की गयी है। वहाँ त्रिलोकेश इन्द्र, वरुण तथा अन्यान्य देवताओंकी भी स्तुति की गयी है॥ २०-२१॥ |
| यथा गङ्गा प्रवाहैश्च बहुभिः परिवर्तते।<br>तथैव सर्वदेवेषु विष्णुः प्रोक्तो महर्षिभिः॥ २२ | जिस प्रकार गंगा अनेक धाराओंमें विद्यमान रहकर प्रवाहित होती हैं, उसी प्रकार महर्षियोंद्वारा भगवान् विष्णु सभी देवताओंमें विद्यमान बताये गये हैं॥ २२॥ |
| त्रीण्येव हि प्रमाणानि पठितानि सुपण्डितैः।<br>प्रत्यक्षं चानुमानं च शाब्दं चैव तृतीयकम्॥ २३<br><br>चत्वार्येवेतरे प्राहुरुपमानयुतानि च।<br>अर्थापत्तियुतान्यन्ये पञ्च प्राहुर्महाधियः॥ २४ | मनीषी विद्वानोंने तीन प्रकारके मुख्य प्रमाण बताये हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान और तीसरा शब्दप्रमाण। अन्य (न्याय)-के पण्डित चार प्रमाण मानते हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान एवं शब्दप्रमाण। परंतु अन्य (मीमांसाके) विद्वान् लोग अर्थापत्तिको लेकर पाँच प्रमाण मानते हैं॥ २३-२४॥ |
| सप्त पौराणिकाश्चैव प्रवदन्ति मनीषिणः।<br>एतैः प्रमाणैर्दुर्ज्ञेयं यद् ब्रह्म परमं च तत्॥ २५ | पौराणिक विद्वान् सात प्रमाण बताते हैं—इन प्रमाणोंसे भी जो दुर्ज्ञेय है, वह है—परब्रह्म॥ २५॥ |
| वितर्कश्चात्र कर्तव्यो बुद्ध्या चैवागमेन च।<br>निश्चयात्मिकया युक्त्या विचार्य च पुनः पुनः॥ २६<br><br>प्रत्यक्षतस्तु विज्ञानं चिन्त्यं मतिमता सदा।<br>दृष्टान्तेनापि सततं शिष्टमार्गानुसारिणा॥ २७ | इसलिये इस विषयमें बुद्धि, शास्त्र एवं निश्चयात्मिका युक्तिसे बार-बार विचार करके अनुमान करना चाहिये। साथ ही सन्मार्गका अनुसरण करनेवाले दृष्टान्तद्वारा इस प्रत्यक्ष विज्ञानका चिन्तन बुद्धिमान् मनुष्यको सर्वदा करते रहना चाहिये॥ २६-२७॥ |
| विद्वांसोऽपि वदन्त्येवं पुराणैः परिगीयते।<br>द्रुहिणे सृष्टिशक्तिश्च हरौ पालनशक्तिता॥ २८<br><br>हरे संहारशक्तिश्च सूर्ये शक्तिः प्रकाशिका।<br>धराधारणशक्तिश्च शेषे कूर्मे तथैव च॥ २९ | प्रायः सभी पुराण तथा विद्वान् ऐसा कहते हैं कि ब्रह्मामें सृष्टि करनेकी शक्ति, विष्णुमें पालन करनेकी शक्ति, शिवमें संहार करनेकी शक्ति, सूर्यमें प्रकाश करनेकी शक्ति तथा शेष और कच्छपमें पृथ्वीको धारण करनेकी शक्ति स्वभावतः विद्यमान रहती है॥ २८-२९॥ |
| साद्या शक्तिः परिणता सर्वस्मिन्त्या प्रतिष्ठिता।<br>दाहशक्तिस्तथा वह्नौ समीरे प्रेरणात्मिका॥ ३० | इस प्रकार एकमात्र वे आद्याशक्ति ही स्वरूपभेदसे सभीमें व्याप्त रहती हैं। वे ही अग्निमें दाहकत्व शक्ति तथा वायुमें संचारशक्ति हैं॥ ३०॥ |
| शिवोऽपि शवतां याति कुण्डलिन्या विवर्जितः।<br>शक्तिहीनस्तु यः कश्चिदसमर्थः स्मृतो बुधैः॥ ३१ | कुण्डलिनी शक्तिके बिना शिव भी 'शव' बन जाते हैं। विद्वान् लोग शक्तिहीन जीवको निर्जीव एवं असमर्थ कहते हैं॥ ३१॥ |