भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 889 में से

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पृष्ठ 118

| अ० ८ ] | प्रथम स्कन्ध | १०९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं सर्वत्र भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं ब्रह्माण्डेऽस्मिन्महातपाः॥ ३२<br>शक्तिहीनं तु निन्द्यं स्याद्वस्तुमात्रं चराचरम्।<br>अशक्तः शत्रुविजये गमने भोजने तथा॥ ३३अतएव हे मुनिजनो! ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सभी पदार्थ इस संसारमें शक्तिके बिना सर्वथा हेय हैं; क्योंकि स्थावर-जंगम सभी जीवोंमें वह शक्ति ही काम करती है। यहाँतक कि शक्तिहीन पुरुष शत्रुपर विजयी होने, चलने-फिरने तथा भोजन करनेमें भी सर्वथा असमर्थ रहता है॥ ३२-३३॥
एवं सर्वगता शक्तिः सा ब्रह्मेति विविच्यते।<br>सोपास्या विविधैः सम्यग्विचार्या सुधिया सदा॥ ३४वह सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली आदिशक्ति ही 'ब्रह्म' कहलाती है। बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि वह अनेक प्रकारके यत्नोंद्वारा सम्यक् रूपसे उसकी उपासना करे तथा उसका चिन्तन करे॥ ३४॥
विष्णौ च सात्त्विकी शक्तिस्तया हीनोऽप्यकर्मकृत्।<br>द्रुहिणे राजसी शक्तिर्यया हीनो ह्यसृष्टिकृत्॥ ३५<br>शिवे च तामसी शक्तिस्तया संहारकारकः।<br>इत्यूह्यं मनसा सर्वं विचार्य च पुनः पुनः॥ ३६भगवान् विष्णुमें सात्त्विकी शक्ति रहती है, जिसके बिना वे अकर्मण्य हो जाते हैं। ब्रह्मामें राजसी शक्ति है, वे भी शक्तिहीन होकर सृष्टिकार्य नहीं कर सकते और शिवमें तामसी शक्ति रहती है, जिसके बलपर वे संहार-कृत्य सम्पादित करते हैं। इस विषयपर मनसे बार-बार विचार करके तर्क-वितर्क करते रहना चाहिये॥ ३५-३६॥
शक्तिः करोति ब्रह्माण्डं सा वै पालयतेऽखिलम्।<br>इच्छया संहरत्येषा जगदेतच्चराचरम्॥ ३७शक्ति ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी रचना करती है, सबका पालन करती है और इच्छानुसार इस चराचर जगत्का संहार करती है॥ ३७॥
न विष्णुर्न हरः शक्रो न ब्रह्मा न च पावकः।<br>न सूर्यो वरुणः शक्तः स्वे स्वे कार्ये कथञ्चन॥ ३८उसके बिना विष्णु, शिव, इन्द्र, ब्रह्मा, अग्नि, सूर्य और वरुण कोई भी अपने-अपने कार्यमें किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हो सकते॥ ३८॥
तया युक्ता हि कुर्वन्ति स्वानि कार्याणि ते सुराः।<br>सैव कारणकार्येषु प्रत्यक्षेणावगम्यते॥ ३९वे देवगण शक्तियुक्त होनेपर ही अपने-अपने कार्योंको सम्पादित करते रहते हैं। प्रत्येक कार्य-कारणमें वही शक्ति प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है॥ ३९॥
सगुणा निर्गुणा सा तु द्विधा प्रोक्ता मनीषिभिः।<br>सगुणा रागिभिः सेव्या निर्गुणा तु विरागिभिः॥ ४०मनीषी पुरुषोंने शक्तिको सगुणा और निर्गुणा भेदसे दो प्रकारका बताया है। सगुणा शक्तिकी उपासना आसक्तजनों और निर्गुणा शक्तिकी उपासना अनासक्तजनोंको करनी चाहिये॥ ४०॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां स्वामिनी सा निराकुला।<br>ददाति वाञ्छितान्कामान्पूजिता विधिपूर्वकम्॥ ४१धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पदार्थोंकी स्वामिनी वे ही निर्विकार शक्ति हैं। विधिवत् पूजा करनेसे वे सब प्रकारके मनोरथ पूर्ण करती हैं॥ ४१॥
न जानन्ति जना मूढास्तां सदा माययावृताः।<br>जानन्तोऽपि नराः केचिन्मोहयन्ति परानपि॥ ४२<br>पण्डिताः स्वोदरार्थं वै पाखण्डानि पृथक्पृथक्।<br>प्रवर्तयन्ति कलिना प्रेरिता मन्दचेतसः॥ ४३सदा मायासे घिरे हुए अज्ञानी लोग उस महाशक्तिको जान नहीं पाते। यहाँतक कि कुछ विद्वान् पुरुष उन्हें जानते हुए भी दूसरोंको भ्रममें डालते हैं। कुछ मन्दबुद्धि पण्डित अपने उदरकी पूर्तिके लिये कलिसे प्रेरित होकर अनेक प्रकारके पाखण्ड करते हैं॥ ४२-४३॥