भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 119
११०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९
कलावस्मिन्महाभागा नानाभेदसमुत्थिताः।<br>नान्ये युगे तथा धर्मा वेदबाह्याः कथञ्चन॥ ४४हे महाभागो! इस कलिमें बहुत प्रकारके अवैदिक तथा भेदमूलक धर्म उत्पन्न होते हैं; दूसरे युगोंमें नहीं होते॥ ४४॥
विष्णुश्चरत्यसावुग्रं तपो वर्षाण्यनेकंशः।<br>ब्रह्मा हरस्त्रयो देवा ध्यायन्तः कमपि ध्रुवम्॥ ४५स्वयं भगवान् विष्णु भी अनेक वर्षोंतक कठोर तप करते हैं और ब्रह्मा तथा शिवजी भी ऐसा ही करते हैं। ये तीनों देवता निश्चित ही किसीका ध्यान करते हुए कठिन तपस्या करते रहते हैं॥ ४५॥
कामयानाः सदा कामं ते त्रयः सर्वदैव हि।<br>यजन्ति यज्ञान्विविधान्ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः॥ ४६इसी प्रकार अपनी इच्छाओंकी पूर्तिके लिये ब्रह्मा, विष्णु, महेश—ये तीनों ही देवता अनेक प्रकारके यज्ञ सदा करते हैं। वे उन पराशक्ति, ब्रह्म नामवाली परमात्मिका देवीको नित्य एवं सनातन मानकर सर्वदा मनसे उन्हींका ध्यान करते हैं॥ ४६-४७॥
ते वै शक्तिं परां देवीं ब्रह्माख्यां परमात्मिकाम्।<br>ध्यायन्ति मनसा नित्यं नित्यां मत्वा सनातनीम्॥ ४७
तस्माच्छक्तिः सदा सेव्या विद्वद्भिः कृतनिश्चयैः।<br>निश्चयः सर्वशास्त्राणां ज्ञातव्यो मुनिसत्तमाः॥ ४८हे मुनिश्रेष्ठ! सब शास्त्रोंका यही निश्चय जानना चाहिये कि दृढनिश्चयी विद्वानोंके द्वारा वे आदिशक्ति ही सदा सेवनीय हैं॥ ४८॥
कृष्णाच्छ्रुतं मया चैतत्तेन ज्ञातं तु नारदात्।<br>पितुः सकाशात्तेनापि ब्रह्मणा विष्णुवाक्यतः॥ ४९यह गुप्त रहस्य मैंने कृष्णद्वैपायनसे सुना है जिसे उन्होंने नारदजीसे, नारदजीने अपने पिता ब्रह्माजीसे और ब्रह्माजीने भी भगवान् विष्णुके मुखसे सुना था॥ ४९॥
न श्रोतव्यं न मन्तव्यमन्येषां वचनं बुधैः।<br>शक्तिरेव सदा सेव्या विद्वद्भिः कृतनिश्चयैः॥ ५०इसलिये विद्वान् पुरुषोंको चाहिये कि वे न तो किसी अन्यकी बात सुनें और न मानें तथा दृढप्रतिज्ञ होकर सर्वदा शक्तिकी ही उपासना करें॥ ५०॥
प्रत्यक्षमपि द्रष्टव्यमशक्तस्य विचेष्टितम्।<br>अतः सर्वेषु भूतेषु ज्ञातव्या शक्तिरेव हि॥ ५१शक्तिहीन असमर्थ पुरुषका व्यवहार तो प्रत्यक्ष ही देखा जाता है [कि वह कुछ कर नहीं पाता]। इसलिये सर्वव्यापिनी आदिशक्ति जगज्जननी भगवतीको ही जाननेका प्रयत्न करना चाहिये॥ ५१॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां प्रथमस्कन्धे
आराध्यनिर्णयवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥

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अथ नवमोऽध्यायः

भगवान् विष्णुका मधु-कैटभसे पाँच हजार वर्षोंतक युद्ध करना, विष्णुद्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीद्वारा मोहित मधु-कैटभका विष्णुद्वारा वध

सूत उवाच<br>यदा विनिर्गता निद्रा देहातस्य जगद्गुरोः।<br>नेत्रास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ॥ १सूतजी बोले—[हे मुनिजनो!] जब जगद्गुरु भगवान् विष्णुके शरीरसे निद्रादेवी निकलीं; उस समय उनके नेत्र, मुख, नासिका, भुजा, हृदय तथा वक्षःस्थलसे