भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 120
अ० ९ ]प्रथम स्कन्ध१११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
निःसृत्य गगने तस्थौ तामसी शक्तिरुत्तमा।<br>उदतिष्ठज्जगन्नाथो जृम्भमाणः पुनः पुनः॥ २निकलकर वे श्रेष्ठ तामसी शक्ति आकाशमें स्थित हो गयीं, तब भगवान् विष्णु भी बार-बार जम्हाई लेते हुए उठ खड़े हुए॥ १-२॥
तदापश्यत् स्थितं तत्र भयत्रस्तं प्रजापतिम्।<br>उवाच च महातेजा मेघगम्भीरया गिरा॥ ३तब वहाँ भगवान् विष्णुने भयसे काँपते हुए ब्रह्माको देखा और उन महातेजस्वी विष्णुने मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा॥ ३॥
विष्णुरुवाच<br>किमागतोऽसि भगवंस्तपस्त्यक्त्वात्र पद्मज।<br>कस्माच्चिन्तातुरोऽसि त्वं भयाकुलितमानसः॥ ४विष्णु बोले—हे कमलोद्भव ब्रह्माजी! आप तपस्या छोड़कर यहाँ कैसे आ गये हैं? आप इतने चिन्तित एवं भयभीत क्यों हो रहे हैं?॥ ४॥
ब्रह्मोवाच<br>त्वत्कर्णमलजौ देव दैत्यौ च मधुकैटभौ।<br>हन्तुं मां समुपायातौ घोररूपौ महाबलौ॥ ५<br><br>भयात्तयोः समायातस्त्वत्समीपं जगत्पते।<br>त्राहि मां वासुदेवाद्य भयत्रस्तं विचेतनम्॥ ६ब्रह्माजी बोले—हे देव! आपके कानोंके मैलसे दो महादानव पैदा हो गये हैं, जो महाभयंकर एवं महाबली हैं, जिनका नाम मधु और कैटभ है। उन्हीं दोनोंके भयसे मैं आपके पास आया हूँ। हे जगत्पते! हे वासुदेव! आप मुझ भयभीत तथा किंकर्तव्यविमूढ़की रक्षा कीजिये॥ ५-६॥
विष्णुरुवाच<br>तिष्ठाद्य निर्भयो जातस्तौ हनिष्याम्यहं किल।<br>युद्धायाजग्मतुर्मूढौ मत्समीपं गतायुषौ॥ ७विष्णु बोले—ब्रह्मन्! अब आप निर्भय हो जाइये। उनकी मृत्यु निकट है, इसीलिये वे यहाँ युद्ध करनेके लिये आयेंगे और मैं उन दोनों दैत्योंका वध करूँगा॥ ७॥
सूत उवाच<br>एवं वदति देवेशे दानवौ तौ महाबलौ।<br>विचिन्वानावजं चोभौ संप्राप्तौ मदगर्वितौ॥ ८<br><br>निराधारौ जले तत्र संस्थितौ विगतज्वरौ।<br>तावूचतुर्मदोन्मत्तौ ब्रह्माणं मुनिसत्तमाः॥ ९<br><br>पलायित्वा समायातः सन्निधावस्य किं ततः।<br>युद्धं कुरु हनिष्यावः पश्यतोऽस्यैव सन्निधौ॥ १०<br><br>पश्चादेनं हनिष्यावः सर्पभोगोपरिस्थितम्।<br>त्वमद्य कुरु संग्रामं दासोऽस्मीति च वा वद॥ ११सूतजी बोले—इस प्रकार भगवान् विष्णु ब्रह्मासे कह ही रहे थे कि वे दोनों मतवाले महाबली दैत्य ब्रह्माजीको ढूँढ़ते हुए वहाँ आ पहुँचे॥ ८॥<br><br>हे श्रेष्ठ मुनियो! वे दैत्य उस महासागरके जलमें बिना किसी अवलम्बके निश्चिन्त होकर खड़े थे। उन अहंकारी राक्षसोंने ब्रह्माजीसे कहा—'तुम भागकर इनके पास क्यों आये? अब तुम युद्ध करो। इनके देखते-देखते ही हमलोग तुम्हें मार डालेंगे'॥ ९-१०॥<br><br>तत्पश्चात् शेषशय्यापर सोनेवाले इस पुरुषको भी मार डालेंगे। इसलिये तुम हम दोनों भाइयोंसे या तो युद्ध करो अथवा यह कहो कि 'मैं तुम्हारा सेवक हूँ'॥ ११॥
सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णुस्तावुवाच जनार्दनः।<br>कुरुतं समरं कामं मया दानवपुङ्गवौ॥ १२<br><br>हरिष्यामि मदं चाहं युवयोर्मत्तयोः किल।<br>आगच्छतं महाभागौ श्रद्धा चेद्वां महाबलौ॥ १३सूतजी बोले—उन दैत्योंका वचन सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—अरे दानवेन्द्रो! तुम दोनों मेरे साथ यथेच्छ युद्ध करो। मैं तुम दोनों दैत्योंका घमण्ड चूर-चूर कर डालूँगा। हे महाभागो! तुम दोनोंकी लड़नेकी इच्छा है और अपनेको महायोद्धा समझ रहे हो तो आ जाओ॥ १२-१३॥