भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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११२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९

सूत उवाच
श्रुत्वा तद्वचनं चोभौ क्रोधव्याकुललोचनौ।<br>निराधारौ जलस्थौ च युद्धोद्युक्तौ बभूवतुः॥ १४सूतजी बोले— भगवान्का यह वचन सुनते ही उन दैत्योंके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और जलमें खड़े निराधार वे दोनों भयंकर दानव युद्ध करनेको तैयार हो गये॥ १४॥
मधुश्च कुपितस्तत्र हरिणा सह संयुगम्।<br>कर्तुं प्रचलितस्तूर्णं कैटभस्तु तथा स्थितः॥ १५इनमें मधुदैत्य कुपित होकर विष्णुसे युद्ध करनेके लिये शीघ्र ही चल पड़ा और कैटभ वहीं खड़ा रहा॥ १५॥
बाहुयुद्धं तयोरासीन्मल्लयोरिव मत्तयोः।<br>श्रान्ते मधौ कैटभस्तु संग्राममकरोत्तदा॥ १६दो मतवाले वीरोंके समान मधु और विष्णुमें बाहुयुद्ध होने लगा। जब मधु थक गया तब कैटभ उनसे लड़ने लगा॥ १६॥
पुनर्मधुः कैटभश्च युयुधाते पुनः पुनः।<br>बाहुयुद्धेन रागान्धौ विष्णुना प्रभविष्णुना॥ १७इस प्रकार क्रमशः कुपित एवं मदान्ध दोनों दैत्य परम प्रतापी भगवान् विष्णुके साथ बारी-बारीसे बाहुयुद्ध करते रहे॥ १७॥
प्रेक्षकस्तु तदा ब्रह्मा देवी चैवान्तरिक्षगा।<br>न मम्लतुस्तदा तौ तु विष्णुस्तु ग्लानिमाप्तवान्॥ १८उस समय वहाँ उस युद्धके द्रष्टा ब्रह्मा और आकाशमें स्थित आदिशक्ति देवी थीं। बहुत दिनोंतक युद्ध करते-करते भी वे दैत्य नहीं थके तब भगवान् विष्णुको ग्लानि होने लगी। इस प्रकार जब युद्ध करते हुए पाँच हजार वर्ष बीत गये तब भगवान् विष्णु उन दैत्योंकी मृत्युका उपाय सोचने लगे॥ १८-१९॥
पञ्चवर्षसहस्राणि यदा जातानि युद्ध्यता।<br>हरिणा चिन्तितं तत्र कारणं मरणे तयोः॥ १९
पञ्चवर्षसहस्राणि मया युद्धं कृतं किल।<br>न श्रान्तौ दानवौ घोरौ श्रान्तोऽहं चैतदद्भुतम्॥ २०उनके विचारमें आया कि मैंने पाँच हजार वर्षतक इनके साथ युद्ध किया, किंतु ये भयानक दानव थके नहीं और मैं थक गया; यह बड़े आश्चर्यकी बात है॥ २०॥
क्व गतं मे बलं शौर्यं कस्माच्चेमावनामयौ।<br>किमत्र कारणं चिन्त्यं विचार्य मनसा त्विह॥ २१मेरा वह पराक्रम और बल कहाँ चला गया? ये दोनों मुझसे लड़ते हुए भी स्वस्थ हैं। इसका कारण क्या है? अब मुझे अच्छी तरह विचार करना चाहिये॥ २१॥
इति चिन्तापरं दृष्ट्वा हरिं हर्षपरावुभौ।<br>ऊचतुस्तौ मदोन्मत्तौ मेघगम्भीरनिःस्वनौ॥ २२इस प्रकार चिन्तामें पड़े हुए विष्णुको देखकर ये दोनों मतवाले दैत्य अत्यन्त हर्षित हुए और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले—हे विष्णो! यदि तुझमें अब बल न हो अथवा युद्धसे थक गये हो तो सिरपर हाथ जोड़कर कह दो कि मैं तुम दोनोंका सेवक हूँ अथवा यदि सामर्थ्य हो तो हे महामते! आओ, हमारे साथ युद्ध करो। आज हमलोग तुम्हें मारकर इस चार मुखवाले पुरुष (ब्रह्मा)-को भी मार डालेंगे॥ २२—२४॥
तव नोचेद् बलं विष्णो यदि श्रान्तोऽसि युद्धतः।<br>ब्रूहि दासोऽस्मि वां नूनं कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्॥ २३
न चेद्युद्धं कुरुष्वाद्य समर्थोऽसि महामते।<br>हत्वा त्वां निहनिष्यावः पुरुषं च चतुर्मुखम्॥ २४
सूत उवाचसूतजी बोले—
श्रुत्वा तद्भाषितं विष्णुस्तयोस्तस्मिन्महोदधौ।<br>उवाच वचनं श्लक्ष्णं सामपूर्वं महामनाः॥ २५उस महासागरमें उपस्थित महामना विष्णुने उनके वचन सुनकर सामनीतिके अनुसार मधुर शब्दोंमें कहा— ॥ २५॥