देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
११२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९
| सूत उवाच | |
|---|---|
| श्रुत्वा तद्वचनं चोभौ क्रोधव्याकुललोचनौ।<br>निराधारौ जलस्थौ च युद्धोद्युक्तौ बभूवतुः॥ १४ | सूतजी बोले— भगवान्का यह वचन सुनते ही उन दैत्योंके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और जलमें खड़े निराधार वे दोनों भयंकर दानव युद्ध करनेको तैयार हो गये॥ १४॥ |
| मधुश्च कुपितस्तत्र हरिणा सह संयुगम्।<br>कर्तुं प्रचलितस्तूर्णं कैटभस्तु तथा स्थितः॥ १५ | इनमें मधुदैत्य कुपित होकर विष्णुसे युद्ध करनेके लिये शीघ्र ही चल पड़ा और कैटभ वहीं खड़ा रहा॥ १५॥ |
| बाहुयुद्धं तयोरासीन्मल्लयोरिव मत्तयोः।<br>श्रान्ते मधौ कैटभस्तु संग्राममकरोत्तदा॥ १६ | दो मतवाले वीरोंके समान मधु और विष्णुमें बाहुयुद्ध होने लगा। जब मधु थक गया तब कैटभ उनसे लड़ने लगा॥ १६॥ |
| पुनर्मधुः कैटभश्च युयुधाते पुनः पुनः।<br>बाहुयुद्धेन रागान्धौ विष्णुना प्रभविष्णुना॥ १७ | इस प्रकार क्रमशः कुपित एवं मदान्ध दोनों दैत्य परम प्रतापी भगवान् विष्णुके साथ बारी-बारीसे बाहुयुद्ध करते रहे॥ १७॥ |
| प्रेक्षकस्तु तदा ब्रह्मा देवी चैवान्तरिक्षगा।<br>न मम्लतुस्तदा तौ तु विष्णुस्तु ग्लानिमाप्तवान्॥ १८ | उस समय वहाँ उस युद्धके द्रष्टा ब्रह्मा और आकाशमें स्थित आदिशक्ति देवी थीं। बहुत दिनोंतक युद्ध करते-करते भी वे दैत्य नहीं थके तब भगवान् विष्णुको ग्लानि होने लगी। इस प्रकार जब युद्ध करते हुए पाँच हजार वर्ष बीत गये तब भगवान् विष्णु उन दैत्योंकी मृत्युका उपाय सोचने लगे॥ १८-१९॥ |
| पञ्चवर्षसहस्राणि यदा जातानि युद्ध्यता।<br>हरिणा चिन्तितं तत्र कारणं मरणे तयोः॥ १९ | |
| पञ्चवर्षसहस्राणि मया युद्धं कृतं किल।<br>न श्रान्तौ दानवौ घोरौ श्रान्तोऽहं चैतदद्भुतम्॥ २० | उनके विचारमें आया कि मैंने पाँच हजार वर्षतक इनके साथ युद्ध किया, किंतु ये भयानक दानव थके नहीं और मैं थक गया; यह बड़े आश्चर्यकी बात है॥ २०॥ |
| क्व गतं मे बलं शौर्यं कस्माच्चेमावनामयौ।<br>किमत्र कारणं चिन्त्यं विचार्य मनसा त्विह॥ २१ | मेरा वह पराक्रम और बल कहाँ चला गया? ये दोनों मुझसे लड़ते हुए भी स्वस्थ हैं। इसका कारण क्या है? अब मुझे अच्छी तरह विचार करना चाहिये॥ २१॥ |
| इति चिन्तापरं दृष्ट्वा हरिं हर्षपरावुभौ।<br>ऊचतुस्तौ मदोन्मत्तौ मेघगम्भीरनिःस्वनौ॥ २२ | इस प्रकार चिन्तामें पड़े हुए विष्णुको देखकर ये दोनों मतवाले दैत्य अत्यन्त हर्षित हुए और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले—हे विष्णो! यदि तुझमें अब बल न हो अथवा युद्धसे थक गये हो तो सिरपर हाथ जोड़कर कह दो कि मैं तुम दोनोंका सेवक हूँ अथवा यदि सामर्थ्य हो तो हे महामते! आओ, हमारे साथ युद्ध करो। आज हमलोग तुम्हें मारकर इस चार मुखवाले पुरुष (ब्रह्मा)-को भी मार डालेंगे॥ २२—२४॥ |
| तव नोचेद् बलं विष्णो यदि श्रान्तोऽसि युद्धतः।<br>ब्रूहि दासोऽस्मि वां नूनं कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्॥ २३ | |
| न चेद्युद्धं कुरुष्वाद्य समर्थोऽसि महामते।<br>हत्वा त्वां निहनिष्यावः पुरुषं च चतुर्मुखम्॥ २४ | |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| श्रुत्वा तद्भाषितं विष्णुस्तयोस्तस्मिन्महोदधौ।<br>उवाच वचनं श्लक्ष्णं सामपूर्वं महामनाः॥ २५ | उस महासागरमें उपस्थित महामना विष्णुने उनके वचन सुनकर सामनीतिके अनुसार मधुर शब्दोंमें कहा— ॥ २५॥ |
| अ० ९ ] | प्रथम स्कन्ध | ११३ | | :--- | :--- |
| हरिरुवाच | विष्णु बोले—यह सनातनधर्म है कि थके हुए, डरे हुए, शस्त्र त्यागे हुए, गिरे हुए एवं बालकपर वीर लोग प्रहार नहीं करते॥ २६॥ | | श्रान्ते भीते त्यक्तशस्त्रे पतिते बालके तथा।<br>प्रहरन्ति न वीरास्ते धर्म एष सनातनः॥ २६ | | | पञ्चवर्षसहस्त्राणि कृतं युद्धं मया त्विह।<br>एकोऽहं भ्रातरौ वां च बलिनौ सदृशौ तथा॥ २७ | मैंने तो यहाँ पाँच हजार वर्षोंतक युद्ध किया। मैं अकेला हूँ और तुम दोनों भाई समान बलवाले वीर हो और दोनों बीच-बीचमें बारी-बारीसे विश्राम भी करते रहे हो। अब मुझे भी थोड़ा विश्राम कर लेने दो। तत्पश्चात् मैं पुनः लडूँगा, इसमें सन्देह नहीं है॥ २७-२८॥ | | कृतं विश्रमणं मध्ये युवाभ्यां च पुनः पुनः।<br>तथा विश्रमणं कृत्वा युध्येऽहं नात्र संशयः॥ २८ | | | तिष्ठतं हि युवां तावद् बलवन्तौ मदोत्कटौ।<br>विश्रम्याहं करिष्यामि युद्धं वा न्यायमार्गतः॥ २९ | बली एवं मदोन्मत्त तुम दोनों भी कुछ विश्राम कर लो, तब मैं विश्राम करके न्यायधर्मानुसार युद्ध करूँगा॥ २९॥ | | सूत उवाच | सूतजी बोले—भगवान् विष्णुकी बात सुनकर दोनों दानव भी युद्ध करनेकी इच्छासे कुछ दूर जाकर विश्राम करने लगे। उन्हें बहुत दूर बैठे देखकर चतुर्भुज भगवान् विष्णु उनके मरनेका उपाय सोचने लगे॥ ३०-३१॥ | | इति श्रुत्वा वचस्तस्य विश्रब्धौ दानवोत्तमौ।<br>संस्थितौ दूरतस्तत्र संग्रामे कृतनिश्चयौ॥ ३० | | | अतिदूरे च तौ दृष्ट्वा वासुदेवश्चतुर्भुजः।<br>दध्यौ च मनसा तत्र कारणं मरणे तयोः॥ ३१ | | | चिन्तनाज्ज्ञानमुत्पन्नं देवीदत्तवरावुभौ।<br>कामं वाञ्छितमरणौ न मम्लतुरतस्त्विमौ॥ ३२ | ध्यानकी अवस्थामें होकर विचार करनेपर उन्हें ज्ञात हो गया कि इन दोनोंको देवीके द्वारा इच्छामृत्युका वरदान प्राप्त है, इसी कारण ये थकते नहीं॥ ३२॥ | | वृथा मया कृतं युद्धं श्रमोऽयं मे वृथा गतः।<br>करोमि च कथं युद्धमेवं ज्ञात्वा विनिश्चयम्॥ ३३ | वे सोचने लगे कि मैंने व्यर्थ ही युद्ध किया, मेरा सब परिश्रम व्यर्थ गया। इस (वरदानकी) बातको जानकर भी अब मैं कैसे युद्ध करूँ?॥ ३३॥ | | अकृते च तथा युद्धे कथमेतौ गमिष्यतः।<br>विनाशं दुःखदौ नित्यं दानवौ वरदर्पितौ॥ ३४ | यदि युद्ध न भी करूँ तो भी ये दैत्य यहाँसे हटेंगे कैसे? यदि इनका विनाश न होगा तो वरप्राप्त दोनों दुर्धर्ष दैत्य सबको दुःख देते रहेंगे॥ ३४॥ | | भगवत्या वरो दत्तस्तया सोऽपि च दुर्घटः।<br>मरणं चेच्छया कामं दुःखितोऽपि न वाञ्छति॥ ३५ | देवीने जो वरदान इन्हें दिया है, वह भी अत्यन्त कठिन है। अत्यन्त दुःखी, रोगी और दीन-हीन प्राणी भी स्वेच्छाया कभी नहीं मरना चाहता, तब भला वे दोनों मदोन्मत्त दैत्य क्यों मरना चाहेंगे?॥ ३५-३६॥ | | रोगग्रस्तोऽपि दीनोऽपि न मुमूर्षति कश्चन।<br>कथं चेमौ मदोन्मत्तौ मर्तुकामौ भविष्यतः॥ ३६ | | | नन्वद्य शरणं यामि विद्यां शक्तिं सुकामदाम्।<br>विना तया न सिध्यन्ति कामाः सम्यक्प्रसन्नया॥ ३७ | अतएव अब मैं सब चिन्ता छोड़कर उन आदिशक्ति भगवती विद्यादेवीकी शरणमें जाऊँ, जो सबकी मनोकामनाएँ सिद्ध करनेवाली हैं; क्योंकि बिना उनके प्रसन्न हुए कोई कामनाएँ पूर्ण नहीं होतीं॥ ३७॥ | | एवं सञ्चिन्त्यमानस्तु गगने संस्थितां शिवाम्।<br>अपश्यद्भगवाग्विष्णुर्योगनिद्रां मनोहराम्॥ ३८ | ऐसा मनमें विचार करते ही भगवान् विष्णुने आकाशमें स्थित परम सुन्दर स्वरूपवाली योगनिद्रा भगवती ‘शिवा’ को देखा। उन्हें देखते ही योगेश्वर |
| ११४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
|---|
| कृताञ्जलिरमेयात्मा तां च तुष्टाव योगवित्।<br>विनाशार्थं तयोस्तत्र वरदां भुवनेश्वरीम्॥ ३९ | अनन्त भगवान् विष्णु उन दोनों दैत्योंके विनाशके लिये हाथ जोड़कर वरप्रदायिनी भगवती ‘भुवनेश्वरी’ की स्तुति करने लगे॥ ३८-३९॥ |
| विष्णुरुवाच<br>नमो देवि महामाये सृष्टिसंहारकारिणि।<br>अनादिनिधने चण्डि भुक्तिमुक्तिप्रदे शिवे॥ ४० | विष्णु बोले—हे देवि! हे महामाये! हे सृष्टि-संहारकारिणि! हे आदि-अन्तरहित! हे चण्डि! हे भुक्तिमुक्ति-प्रदायिनी शिवे! आपको नमस्कार है॥ ४०॥ |
| न ते रूपं विजानामि सगुणं निर्गुणं तथा।<br>चरित्राणि कुतो देवि संख्यातीतानि यानि ते॥ ४१ | हे देवि! मैं आपके सगुण तथा निर्गुण रूपको नहीं जानता, फिर आपके जो असंख्य अद्भुत चरित्र हैं, उन्हें कैसे जान पाऊँगा? मैंने आपके अत्यन्त दुर्घट प्रभावको आज जाना है जबकि मैं आपके द्वारा प्रेरित योगनिद्रामें विलीन होकर अचेत हो गया था॥ ४१-४२॥ |
| अनुभूतो मया तेऽद्य प्रभावश्चातिदुर्घटना।<br>यदहं निद्रया लीनः सञ्जातोऽस्मि विचेतनः॥ ४२ | |
| ब्रह्मणा चातियत्नेन बोधितोऽपि पुनः पुनः।<br>न प्रबुद्धः सर्वथाहं सङ्कोचितषडिन्द्रियः॥ ४३ | ब्रह्माने मुझे बड़े यत्नसे बार-बार जगाया था, किंतु मैं अपनी छहों इन्द्रियोंके संकुचित होनेके कारण जाग न सका॥ ४३॥ |
| अचेतनत्वं सम्प्राप्तः प्रभावात्तव चाम्बिके।<br>त्वया मुक्तः प्रबुद्धोऽहं युद्धं च बहुधा कृतम्॥ ४४ | हे अम्बिके! उस समय मैं आपके प्रभावसे अचेत हो गया था। जब आपने अपना वह प्रभाव हटा लिया तब मैं जगा और मैंने उन दानवोंके साथ अनेक प्रकारसे युद्ध किया। उस युद्धमें मैं तो थक गया, किंतु वे नहीं थके; क्योंकि उन्हें आपका वरदान प्राप्त था। जब वे मदोन्मत्त दानव ब्रह्माजीको मारने दौड़े, तब मैंने भी पुनः द्वन्द्व युद्धके लिये उनका आह्वान किया। हे मानप्रदायिनि! उस समय मैंने उनके साथ महासागरमें घोर युद्ध किया॥ ४४-४६॥ |
| श्रान्तोऽहं न च तौ श्रान्तौ त्वया दत्तवरौ वरौ।<br>ब्रह्माणं हन्तुमायाताै दानवौ मदगर्वितौ॥ ४५ | |
| आहूतौ च मया कामं द्वन्द्वयुद्धाय मानदे।<br>कृतं युद्धं महाघोरं मया ताभ्यां महार्णवे॥ ४६ | |
| मरणे वरदानं ते ततो ज्ञातं महाद्भुतम्।<br>ज्ञात्वाहं शरणं प्राप्तस्त्वामद्य शरणप्रदाम्॥ ४७ | बादमें मुझे ज्ञात हुआ कि आपने उन्हें इच्छामरणका अद्भुत वरदान दिया है। यह जानकर आज मैं शरणदायिनी आपकी शरणमें आया हूँ॥ ४७॥ |
| साहाय्यं कुरु मे मातः खिन्नोऽहं युद्धकर्मणा।<br>दृप्तौ तौ वरदानेन तव देवार्तिनाशने॥ ४८ | अतएव हे माता! अब मेरी सहायता आप ही करें; क्योंकि मैं युद्ध करते-करते बहुत ही खिन्न हो गया हूँ। हे देवताओंकी पीड़ा हरनेवाली! आपके वरदानसे दोनों दानव मदोन्मत्त हो गये हैं॥ ४८॥ |
| हन्तुं मामुद्यतौ पापौ किं करोमि क्व यामि च।<br>इत्युक्ता सा तदा देवी स्मितपूर्वमुवाच ह॥ ४९ | वे दोनों पापी दैत्य मुझे मार डालना चाहते हैं। अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? प्रणाम करते हुए उन जगन्नाथ सनातन वासुदेव विष्णुके ऐसा कहनेपर मुसकराती हुई उन देवीने उनसे कहा— |
| प्रणमन्तं जगन्नाथं वासुदेवं सनातनम्।<br>देवदेव हरे विष्णो कुरु युद्धं पुनः स्वयम्॥ ५० | हे देवदेव! हे हरे! हे विष्णो! आप पुनः उनसे युद्ध कीजिये॥ ४९-५०॥ |
| अ० ९ ] | प्रथम स्कन्ध | ११५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वञ्चयित्वा त्विमौ शूरौ हन्तव्यौ च विमोहितौ।<br>मोहयिष्याम्यहं नूनं दानवौ वक्रया दृशा॥ ५१<br>जहि नारायणाशु त्वं मम मायाविमोहितौ। | इन दोनों वीरोंको छलपूर्वक मोहित करके ही मारा जा सकता है। मैं अपनी वक्रदृष्टिसे उन्हें मोहित कर दूँगी। हे नारायण! अपनी मायासे जब मैं इन्हें मोहित कर दूँगी तब आप शीघ्र ही इन दोनोंका वध कर डालियेगा॥ ५१ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णुस्तस्याः प्रीतिरसान्वितम्॥ ५२<br>संग्रामस्थलमासाद्य तस्थौ तत्र महार्णवे।<br>तदायातौ च तौ वीरौ युद्धकामौ महाबलौ॥ ५३ | सूतजी बोले— देवीके प्रीतिरससे पूर्ण वचनोंको सुनकर भगवान् विष्णु उस सागरमें युद्धस्थलमें आकर खड़े हो गये। तब विष्णुको आते देख वे दोनों युद्धके अभिलाषी महाबली दैत्य भी वहाँ आ डटे॥ ५२-५३॥ |
| वीक्ष्य विष्णुं स्थितं तत्र हर्षयुक्तौ बभूवतुः।<br>तिष्ठ तिष्ठ महाकाम कुरु युद्धं चतुर्भुज॥ ५४<br>दैवाधीनौ विदित्वाद्य नूनं जयपराजयौ।<br>सबलो जयमाप्नोति दैवाज्जयति दुर्बलः॥ ५५ | भगवान् विष्णुको अपने सामने देखकर वे बड़े प्रसन्न हुए और कहने लगे—हे महाकाम! हे चतुर्भुज! ठहरो-ठहरो; हार और जीतको प्रारब्धके अधीन समझकर अब तुम हमारे साथ युद्ध करो। बलवान् व्यक्ति विजय प्राप्त करता है, किंतु कभी-कभी भाग्यवश दुर्बल व्यक्ति भी जीत जाता है॥ ५४-५५॥ |
| सर्वथैव न कर्तव्यौ हर्षशोकौ महात्मना।<br>पुरा वै बहवो दैत्या जिता दानववैरिणा॥ ५६<br>अधुना चावयोः सार्धं युध्यमानः पराजितः। | आप जैसे महापुरुषको जय या पराजयमें हर्ष या शोक कभी नहीं करना चाहिये। आपने दानवशत्रु होकर पूर्वकालमें बहुत-से दैत्योंको अनेक बार हराया है, परंतु इस समय तो हम दोनोंके साथ लड़ते हुए आप पराजित हो गये हैं॥ ५६ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा तौ महाबाहू युद्धाय समुपस्थितौ॥ ५७<br>वीक्ष्य विष्णुर्जघानाशु मुष्टिनाद्भुतकर्मणा।<br>तावप्यतिबलोन्मत्तौ जघ्नतुर्मुष्टिना हरिम्॥ ५८ | सूतजी बोले— ऐसा कहकर वे दोनों महाबाहु दैत्य युद्ध करनेको तत्पर हो गये। तब वहाँ अवसर देखकर ज्यों ही विचित्रकर्मा विष्णुने उन दोनोंपर मुष्टिसे प्रहार किया, त्यों ही उन दोनों बलोन्मत्त दैत्योंने भी विष्णुपर मुष्टिप्रहार किया॥ ५७-५८॥ |
| एवं परस्परं जातं युद्धं परमदारुणम्।<br>युध्यमानौ महावीर्यौ दृष्ट्वा नारायणस्तदा॥ ५९<br>अपश्यत्सम्मुखं देव्याः कृत्वा दीनां दृशं हरिः। | इस प्रकार उनमें परस्पर महाभयंकर युद्ध होने लगा। उन दोनों महाबलशाली दानवोंको युद्धरत देखकर नारायण श्रीहरिने दीन दृष्टिसे भगवतीकी ओर देखा॥ ५९ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>तं वीक्ष्य तादृशं विष्णुं करुणारससंयुतम्॥ ६०<br>जहासातीव ताम्राक्षी वीक्षमाणा तदासुरौ।<br>तौ जघान कटाक्षैश्च कामबाणैरिवापरैः॥ ६१<br>मन्दस्मितयुतैः कामं प्रेमभावयुतैरनु।<br>दृष्ट्वा मुमुहतुः पापौ देव्या वक्रवलोकनम्॥ ६२ | सूतजी बोले— विष्णुकी ऐसी करुणाजनक दीन दशा देखकर अरुण नेत्रोंवाली भगवती उन दोनों दैत्योंकी ओर देखकर हँसने लगीं और उन्होंने दूसरे कामबाणोंके समान, मन्द मुसकानयुक्त तथा प्रेमभावसे भरे अपने कटाक्षोंसे उनपर प्रहार किया। इस प्रकार देवीके कटाक्षको देखकर वे पापी मधु-कैटभ अत्यन्त मोहित हो गये। वे कामान्ध दानव अपने ऊपर भगवतीकी विशेष अनुकम्पा जानकर |
| ११६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विशेषमिति मन्वानौ कामबाणातिपीडितौ।<br>वीक्षमाणौ स्थितौ तत्र तां देवीं विशदप्रभाम्॥ ६३ | कामबाणसे अत्यन्त पीड़ित होने लगे और अपूर्व शोभाशालिनी भगवतीको देखते हुए वे वहीं खड़े हो गये॥ ६०—६३॥ |
| हरिणापि च तद् दृष्टं देव्यास्तत्र चिकीर्षितम्।<br>मोहितौ तौ परिज्ञाय भगवान्कार्यवित्तमः॥ ६४<br><br>उवाच तौ हसन् श्लक्ष्णं मेघगम्भीरया गिरा।<br>वरं वरयतां वीरौ युवयोर्योऽभिवाञ्छितः॥ ६५ | भगवान् विष्णु भी देवीके उस प्रयत्नको समझ गये। दोनों कामी दानवोंको देवीकी मायासे विमोहित जानकर स्वकार्यसाधक भगवान् विष्णुने वहाँ मेघके समान गम्भीर एवं मधुर वचनोंके द्वारा उन दोनोंका उपहास करते हुए कहा—हे वीरो! तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँगो॥ ६४-६५॥ |
| ददामि परमप्रीतो युद्धेन युवयोः किल।<br>दानवा बहवो दृष्टा युध्यमाना मया पुरा॥ ६६<br><br>युवयोः सदृशः कोऽपि न दृष्टो न च वै श्रुतः।<br>तस्मात्तुष्टोऽस्मि कामं वै निस्तुलेन बलेन च॥ ६७<br><br>भ्रात्रोश्च वाञ्छितं कामं प्रयच्छामि महाबलौ। | तुम दोनोंके युद्धसे मैं अत्यन्त हर्षित हूँ, अतः मैं तुम्हें मनोभिलषित वर दूँगा। यद्यपि पूर्वकालमें भी मेरेद्वारा अनेक दानव युद्ध करते हुए देखे गये हैं, किंतु तुम दोनों भाइयोंके समान मैंने किसीको देखा-सुना नहीं। तुम दोनोंके अतुलनीय बलको देखकर मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। हे महाबली दानवो! मैं तुम दोनों भाइयोंकी वांछित कामनाएँ पूर्ण करूँगा॥ ६६-६७३/२॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णोः साभिमानौ स्मरातुरौ॥ ६८<br><br>वीक्षमाणौ महामायां जगदानन्दकारिणीम्।<br>तमूचतुश्च कामार्तौ विष्णुं कमललोचनौ॥ ६९ | **सूतजी बोले—**विष्णुका यह वचन सुनकर कमलके समान नेत्रवाले कामपीड़ित वे दोनों दैत्य जगदानन्ददायिनी भगवती महामायाको देखते हुए विष्णुसे अभिमानपूर्वक बोले॥ ६८-६९॥ |
| हरे न याचकावावां त्वं किं दातुमिहेच्छसि।<br>ददाव तुल्यं देवेश दातारौ नौ न याचकौ॥ ७०<br><br>प्रार्थय त्वं हृषीकेश मनोऽभिलषितं वरम्।<br>तुष्टौ स्वस्तव युद्धेन वासुदेवाद्भुतेन च॥ ७१ | हे विष्णो! हमलोग याचक नहीं हैं, अतः आप हमलोगोंको देना क्यों चाहते हैं? हे देवेश! यदि आप लेना चाहें तो आप जो माँगिये हम दे सकते हैं; क्योंकि हमलोग भिक्षुक नहीं हैं, दाता हैं। हे हृषीकेश! आप अपना मनोभिलषित वरदान माँगिये। हे वासुदेव! आपके अद्भुत युद्धसे हमलोग आपपर अत्यन्त प्रसन्न हैं॥ ७०-७१॥ |
| तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच जनार्दनः।<br>भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि॥ ७२ | उन दोनोंका वचन सुनकर भगवान् विष्णुने उत्तर दिया—'यदि तुम दोनों मेरे ऊपर प्रसन्न हो तो यही वरदान दो कि तुम दोनों भाई अब मेरे ही हाथों मारे जाओ'॥ ७२॥ |
| सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णोर्दानवौ चातिविस्मितौ।<br>वञ्चिताविति मन्वानौ तस्थतुः शोकसंयुतौ॥ ७३ | **सूतजी बोले—**विष्णुका वचन सुनकर दोनों भाई चकित हो गये और अपनेको उनके द्वारा ठगा हुआ समझकर शोकसे चिन्तित हो गये॥ ७३॥ |
| विचार्य मनसा तौ तु दानवौ विष्णुमूचतुः।<br>प्रेक्ष्य सर्वं जलमयं भूमिं स्थलविवर्जिताम्॥ ७४ | कुछ देरके बाद मनमें विचारकर सम्पूर्ण भूमिको स्थलरहित तथा वहाँ सर्वत्र जल-ही-जल देखकर उन्होंने विष्णुसे कहा—हे जनार्दन विष्णो! आपने |
| अ० ९ ] | प्रथम स्कन्ध | ११७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हरे योऽयं वरो दत्तस्त्वया पूर्वं जनार्दन।<br>सत्यवागसि देवेश देहि तं वाञ्छितं वरम्॥ ७५ | हम-लोगोंको पहले जो वरदान देनेको कहा था, यदि आप सत्यवादी हैं तो पहले उस वांछित वरको प्रदान कीजिये॥ ७४-७५॥ |
| निर्जले विपुले देशे हनस्व मधुसूदन।<br>वध्यावावां तु भवतः सत्यवाग्भव माधव॥ ७६ | हे मधुसूदन! आप हमें किसी निर्जल प्रदेशकी सुविस्तृत भूमिपर मारिये तभी हम आपसे मारे जा सकेंगे, अन्यथा नहीं। अतः हे माधव अब आप सत्यवादी बनिये॥ ७६॥ |
| स्मृत्वा चक्रं तदा विष्णुस्तावुवाच हसन्हरिः।<br>हन्म्यद्य वां महाभागौ निर्जले विपुले स्थले॥ ७७ | तब भगवान् विष्णुने अपने सुदर्शन चक्रका स्मरण करके उन दानवोंसे हँसते हुए कहा—'हे महाभागो! [तुम्हारे कथनानुसार] निर्जल तथा सुविस्तृत भूमिपर ही मैं आज तुम दोनोंको मारूँगा'॥ ७७॥ |
| इत्युक्त्वा देवदेवेश ऊरू कृत्वातिविस्तरौ।<br>दर्शयामास तौ तत्र निर्जलं च जलोपरि॥ ७८<br><br>नास्त्यत्र दानवौ वारि शिरसी मुञ्चतामिह।<br>सत्यवागहमद्यैव भविष्यामि च वां तथा॥ ७९ | ऐसा कहकर देवताओंके आराध्य भगवान् विष्णुने अपनी दोनों जाँघोंको सुविस्तृत करके जलके ऊपर ही स्थल दिखा दिया और उनसे कहा—'दैत्यो! [देखो,] यहाँ जल नहीं है, पृथ्वी है। अतः यहींपर तुम दोनों अपना सिर रखो। ऐसा करनेसे ही आज हम और तुम दोनों सत्यवादी सिद्ध होंगे'॥ ७८-७९॥ |
| तदाकर्ण्य वचस्तथ्यं विचिन्त्य मनसा च तौ।<br>वर्धयामासतुर्देहं योजनानां सहस्रकम्॥ ८० | उस समय विष्णुका तथ्यपूर्ण वचन सुनकर तथा अपने मनमें विचार करके उन दोनों दैत्योंने अपना शरीर बढ़ाकर हजारों योजन लम्बा-चौड़ा कर लिया॥ ८०॥ |
| भगवान्द्विगुणं चक्रे जघनं विस्मितौ तदा।<br>शीर्षे सन्दधतां तत्र जघने परमाद्भुते॥ ८१<br><br>रथांगेन तदा छिन्ने विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>जघनोपरि वेगेन प्रकृष्टे शिरसी तयोः॥ ८२ | तब भगवान् विष्णुने भी अपनी दोनों जाँघोंको बढ़ाकर उससे भी द्विगुणित कर दिया। यह देखकर वे दोनों दैत्य बड़े विस्मयमें पड़ गये, [परंतु अपनी बात सत्य प्रमाणित करनेके लिये] उन्होंने अपने-अपने मस्तक उस अत्यन्त अद्भुत जंघेपर रख दिये। उसी समय प्रतापी भगवान् विष्णुने अपने सुदर्शन चक्रसे जंघेपर स्थित उनके विशाल सिरोंको वेगपूर्वक धड़से अलग कर दिया॥ ८१-८२॥ |
| गतप्राणौ तदा जातौ दानवौ मधुकैटभौ।<br>सागरः सकलो व्याप्तस्तदा वै मेदसा तयोः॥ ८३<br><br>मेदिनीति ततो जातं नाम पृथ्व्याः समन्ततः।<br>अभक्ष्या मृत्तिका तेन कारणेन मुनीश्वराः॥ ८४ | जब दोनों दैत्य मधु और कैटभ मर गये, तब उन्हींकी मेद (चर्बी)-से सम्पूर्ण सागर पट गया। हे मुनीश्वरो! तभीसे पृथ्वीका नाम 'मेदिनी' पड़ गया और इसीलिये मृत्तिका भी अभक्ष्य मानी जाने लगी॥ ८३-८४॥ |
| इति वः कथितं सर्वं यत्पृष्टोऽस्मि सुनिश्चितम्।<br>महाविद्या महामाया सेवनीया सदा बुधैः॥ ८५ | आपलोगोंने जो प्रश्न किया था, उसका ठीक-ठीक उत्तर मैंने दे दिया। बुद्धिमान् मनुष्योंको चाहिये कि वे महामाया महाविद्याकी सर्वदा उपासना करते |
११८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०
११८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०
| आराध्या परमा शक्तिः सर्वैरपि सुरासुरैः।<br>नातः परतरं किञ्चिदधिकं भुवनत्रये॥ ८६ | रहें; क्योंकि वे पराशक्ति ही समस्त देव-दानवोंद्वारा आराध्य हैं। उनसे बढ़कर कोई दूसरा देवता तीनों लोकोंमें नहीं है॥ ८५-८६॥ |
|---|---|
| सत्यं सत्यं पुनः सत्यं वेदशास्त्रार्थनिर्णयः।<br>पूजनीया परा शक्तिर्निर्गुणा सगुणाथवा॥ ८७ | यह बात सर्वदा सत्य है एवं वेदों तथा शास्त्रोंका निष्कर्ष है कि सगुण अथवा निर्गुणरूपमें सर्वदा उस पराशक्तिका ही पूजन करते रहना चाहिये॥ ८७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे<br>हरिकृतमधुकैटभवधवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
अथ दशमोऽध्यायः
व्यासजीकी तपस्या और वर-प्राप्ति
| ऋषय ऊचुः | |
|---|---|
| सूत पूर्वं त्वया प्रोक्तं व्यासेनामिततेजसा।<br>कृत्वा पुराणमखिलं शुकायाध्यापितं शुभम्॥ १ | ऋषिगण बोले— हे सूतजी! आपने हमें पहले ही बतला दिया है कि असीम तेजवाले व्यासजीने कल्याणकारी समस्त पुराणोंकी रचना करके उन्हें शुकदेवजीको पढ़ाया॥ १॥ |
| व्यासेन तु तपस्तप्त्वा कथमुत्पादितः शुकः।<br>विस्तरं ब्रूहि सकलं यच्छ्रुतं कृष्णतस्त्वया॥ २ | व्यासजीने घोर तप करके शुकदेवजीको किस प्रकार पुत्ररूपमें प्राप्त किया? व्यासजीके मुखसे आपने जो कुछ सुना है, वह सब हमसे विस्तारपूर्वक कहिये॥ २॥ |
| सूत उवाच | |
| प्रवक्ष्यामि शुकोत्पत्तिं व्यासात्सत्यवतीसुतात्।<br>यथोत्पन्नः शुकः साक्षाद्योगिनां प्रवरो मुनिः॥ ३ | सूतजी बोले— सत्यवतीपुत्र व्यासजीसे जिस प्रकार योगिजनोंमें श्रेष्ठ साक्षात् मुनिस्वरूप शुकदेवजी उत्पन्न हुए, उत्पत्तिके उस इतिहासको मैं आपलोगोंको बता रहा हूँ॥ ३॥ |
| मेरुशृङ्गे महारम्ये व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>तपश्चचार सोऽत्युग्रं पुत्रार्थं कृतनिश्चयः॥ ४ | सत्यवतीके पुत्र महर्षि व्यास पुत्र-प्राप्तिके लिये दृढ़ संकल्पकर अत्यन्त मनोहर सुमेरुपर्वतके शिखरपर कठोर तपस्या करने लगे॥ ४॥ |
| जपन्नेकाक्षरं मन्त्रं वाग्बीजं नारदाच्छ्रुतम्।<br>ध्यायन्परां महामायां पुत्रकामस्तपोनिधिः॥ ५<br><br>अग्नेर्भूमेस्तथा वायोरन्तरिक्षस्य चाप्ययम्।<br>वीर्येण संमितः पुत्रो मम भूयादिति स्म ह॥ ६ | नारदजीसे सुने गये एकाक्षर वाग्बीज मन्त्रका जप करते हुए तपोनिधि व्यासजी पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे परात्परा महामायामें अपना ध्यान केन्द्रित किये हुए मन-ही-मन सोच रहे थे कि अग्नि, भूमि, वायु एवं आकाश—इनकी शक्तिसे सम्पन्न पुत्रकी मुझे प्राप्ति हो॥ ५-६॥ |
| अतिष्ठत्स गताहारः शतसंवत्सरं प्रभुः।<br>आराधयन्महादेवं तथैव च सदाशिवाम्॥ ७ | इस प्रकार प्रभुतासम्पन्न वे व्यासजी निराहार रहते हुए सौ वर्षोंतक शंकर एवं सदाशिवा भगवतीकी आराधनामें लीन रहे॥ ७॥ |
अ० १० ] प्रथम स्कन्ध ११ ९
| शक्तिः सर्वत्र पूज्येति विचार्य च पुनः पुनः।<br>अशक्तो निन्द्यते लोके शक्तस्तु परिपूज्यते॥ ८<br><br>यत्र पर्वतशृङ्गे वै कर्णिकारवनाद्भुते।<br>क्रीडन्ति देवताः सर्वे मुनयश्च तपोऽधिकाः॥ ९<br><br>आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विनौ तथा।<br>वसन्ति मुनयो यत्र ये चान्ये ब्रह्मवित्तमाः॥ १०<br><br>तत्र हेमगिरेः शृङ्गे संगीतध्वनिनादिते।<br>तपश्चचार धर्मात्मा व्यासः सत्यवतीसुतः॥ ११ | अनेकशः विचार करते हुए महर्षि व्यास इस निष्कर्षपर पहुँचे कि शक्ति ही सर्वत्र पूजनीया है। निर्बल प्राणी लोकमें निन्दाका पात्र होता है और शक्तिशालीकी पूजा की जाती है॥ ८॥<br><br>जहाँ पर्वत-शिखरपर कर्णिकार पुष्पके अद्भुत वनमें देवता एवं महातपस्वी मुनिवृन्द विहार करते हैं; जहाँ सूर्य, वसु, रुद्र, पवन, अश्विनीकुमारद्वय एवं ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ अन्य मुनिजन निवास करते हैं; मधुर संगीतकी ध्वनिसे मुखरित उसी सुमेरुपर्वतकी चोटीपर सत्यवतीनन्दन धर्मात्मा व्यासजीने तपस्या की॥ ९—११॥ | | ततोऽस्य तेजसा व्याप्तं विश्वं सर्वं चराचरम्।<br>अग्निवर्णा जटा जाता पाराशर्यस्य धीमतः॥ १२ | उनके इस तपश्चरणके प्रभावसे समग्र चराचर जगत् व्याप्त हो गया और महामेधासम्पन्न पराशरपुत्र व्यासजीकी जटा अग्निवर्ण हो गयी॥ १२॥ | | ततोऽस्य तेज आलक्ष्य भयमाप शचीपतिः।<br>तुरासाहं तदा दृष्ट्वा भयत्रस्तं श्रमातुरम्॥ १३<br><br>उवाच भगवान् रुद्रो मघवन्तं तथास्थितम्। | तदनन्तर व्यासजीका यह तेज देखकर इन्द्र भयभीत हो गये। तब इन्द्रको भयाक्रान्त तथा व्याकुल देखकर भगवान् शंकरजी उनसे कहने लगे—॥ १३ १/२॥ | | शङ्कर उवाच<br>कथमिन्द्राद्य भीतोऽसि किं दुःखं ते सुरेश्वर॥ १४<br><br>अमर्षो नैव कर्तव्यस्तापसेषु कदाचन।<br>तपश्चरन्ति मुनयो ज्ञात्वा मां शक्तिसंयुतम्॥ १५<br><br>न त्वेतेऽहितमिच्छन्ति तापसाः सर्वथैव हि।<br>इत्युक्तवचनः शक्रस्तमुवाच वृषध्वजम्॥ १६<br><br>कस्मात्तपस्यति व्यासः कोऽर्थस्तस्य मनोगतः। | शंकरजी बोले—हे सुरेश्वर! आपको क्या दुःख है? हे इन्द्र! आज आप इस तरह भयग्रस्त क्यों हैं? तपस्वियोंसे कभी भी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये; क्योंकि मुनिगण मुझे शक्तिसम्पन्न जानकर ही तपस्या करते हैं। ये तपस्वी मुनिलोग कभी भी किसीका अपकार नहीं चाहते हैं। शंकरजीके ऐसा कहनेपर इन्द्र उनसे बोले—व्यासजी ऐसा तप किसलिये कर रहे हैं, उनकी क्या मनोकामना है?॥ १४—१६ १/२॥ | | शिव उवाच<br>पाराशर्यस्तु पुत्रार्थी तपश्चरति दुश्चरम्॥ १७<br><br>पूर्णवर्षशतं जातं ददाम्यद्य सुतं शुभम्। | शिवजी बोले—व्यासजी पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे यह कठोर तप कर रहे हैं। इन्हें तपस्या करते हुए पूरे एक सौ वर्ष हो चुके हैं, अतः मैं इन्हें कल्याणकारी पुत्र प्रदान करूँगा॥ १७ १/२॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा वासवं रुद्रो दयया मुदिताननः॥ १८<br><br>गत्वा ऋषिसमीपं तु तमुवाच जगद्गुरुः।<br>उत्तिष्ठ वासवीपुत्र पुत्रस्ते भविता शुभः॥ १९<br><br>सर्वतेजोमयो ज्ञानी कीर्तिकर्ता तवानघ।<br>अखिलस्य जनस्यात्र वल्लभस्ते सुतः सदा॥ २०<br><br>भविष्यति गुणैः पूर्णः सात्त्विकैः सत्यविक्रमः। | सूतजी बोले—दयाभावसे युक्त प्रसन्न मुखवाले जगद्गुरु भगवान् शंकर इन्द्रसे ऐसा कहकर मुनि व्यासजीके पास जाकर बोले—हे वासवीपुत्र! उठो, तुम्हें कल्याणकारी पुत्र अवश्य प्राप्त होगा। हे निष्पाप! तुम्हारा वह पुत्र सभी प्रकारके तेजोंसे सम्पन्न, ज्ञानवान्, यशस्वी और सभी लोगोंका सदा अतिशय प्रिय, समस्त सात्त्विक गुणोंसे सम्पन्न तथा सत्यरूपी पराक्रमसे युक्त होगा॥ १८—२० १/२॥ |
| १२० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
|---|
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| तदाकर्ण्य वचः श्लक्ष्णं कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥ २१<br><br>शूलपाणिं नमस्कृत्य जगामाश्रममात्मनः ।<br>स गत्वाश्रममेवाशु बहुवर्षश्रमातुरः ॥ २२<br><br>अरणीसहितं गुह्यं मन्थाग्निं चिकीर्षया ।<br>मन्थनं कुर्वतस्तस्य चित्ते चिन्ताभरस्तदा ॥ २३ | तब शूलपाणि शंकरजीका मधुर वचन सुनकर उन्हें प्रणामकर द्वैपायन व्यासजीने अपने आश्रमके लिये प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर कई वर्षोंतक घोर तप करनेके कारण अतिशय श्रान्त महर्षि व्यास अरणीमें समाहित अग्निको प्रकट करनेकी कामनासे अरणि-मन्थन करने लगे। मन्थन कर रहे व्यासजीके मनमें उस समय महान् चिन्ता हो रही थी॥ २१—२३॥ |
| प्रादुर्बभूव सहसा सुतोत्पत्तौ महात्मनः ।<br>मन्थानारणि संयोगान्मन्थनाच्च समुद्भवः ॥ २४<br><br>पावकस्य यथा तद्वत्कथं मे स्यात्सुतोद्भवः ।<br>पुत्रारणिस्तु या ख्याता सा ममाद्य न विद्यते ॥ २५<br><br>तरुणी रूपसम्पन्ना कुलोत्पन्ना पतिव्रता ।<br>कथं करोमि कान्तां च पादयोः शृङ्खलासमाम् ॥ २६<br><br>पुत्रोत्पादनदक्षां च पातिव्रत्ये सदा स्थिताम् ।<br>पतिव्रतापि दक्षापि रूपवत्यपि कामिनी ॥ २७<br><br>सदा बन्धनरूपा च स्वेच्छासुखविधायिनी ।<br>शिवोऽपि वर्तते नित्यं कामिनीपाशसंयुतः ॥ २८ | मन्थन तथा अरणिके पारस्परिक संयोगसे प्रकटित अग्निको देखकर व्यासजीके मनमें अचानक पुत्रोत्पत्तिका विचार आया कि अरणि-मन्थनजनित अग्निकी भाँति मुझे पुत्र कैसे उत्पन्न हो? क्योंकि पुत्र प्रदान करनेवाली अरणी-रूपी वह रूपवती, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा पतिव्रता युवती स्त्री मेरे पास है नहीं, साथ ही पैरोंकी शृंखलाके समान स्त्रीको मैं कैसे अंगीकार करूँ? पुत्र उत्पन्न करनेमें कुशल और पातिव्रत्य धर्ममें सदा तत्पर रहनेवाली पत्नी मुझे कैसे मिले? पतिपरायणा, निपुण, रूपवती—कैसी भी स्त्री हो; वह सदा बन्धनकी कारण ही बनी रहती है। स्त्री सदा अपनी इच्छाके अनुसार सुख प्राप्त करना चाहती है। शंकरजी भी नित्य स्त्रीके मोहपाशमें फँसे हुए रहते हैं। अतः अब मैं अत्यन्त विषम गृहस्थाश्रम-धर्मको किस प्रकार अंगीकार करूँ?॥ २४—२८<sup>१</sup>॥ |
| कथं करोम्यहं चात्र दुर्घटं च गृहाश्रमम् ।<br>एवं चिन्तयतस्तस्य घृताची दिव्यरूपिणी ॥ २९<br><br>प्राप्ता दृष्टिपथं तत्र समीपे गगने स्थिता ।<br>तां दृष्ट्वा चञ्चलापाङ्गीं समीपस्थां वराप्सराम् ॥ ३०<br><br>पञ्चबाणपरीताङ्गस्तूर्णंमासीद् धृतव्रतः ।<br>चिन्तयामास च तदा किं करोम्यद्य संकटे ॥ ३१ | व्यासजी ऐसा विचार कर ही रहे थे कि आकाशमें समीपमें ही स्थित घृताची नामक अप्सरा उन्हें दृष्टि-गोचर हुई। चंचल कटाक्षोंवाली उस श्रेष्ठ अप्सराको पासमें ही स्थित देखकर कठोर नियम-संयम धारण करनेवाले व्यासजी शीघ्र ही कामबाणसे आहत अंगोंवाले हो गये और सोचने लगे कि अब इस विषम संकटके समय मैं क्या करूँ?॥ २९—३१॥ |
| धर्मस्य पुरतः प्राप्ते कामभावे दुरासदे ।<br>अङ्गीकरोमि यद्येनां वञ्चनार्थमिहागताम् ॥ ३२<br><br>हसिष्यन्ति महात्मानस्तापसा मां तु विह्वलम् ।<br>तपस्तप्त्वा महाघोरं पूर्णवर्षशतं त्विह ॥ ३३ | धर्मके समक्ष इस दुर्जय कामवासनाके वशीभूत होकर यदि मैं छलनेके लिये यहाँ उपस्थित हुई इस अप्सराको स्वीकार करता हूँ, तब ऐसी स्थितिमें महात्मा तथा तपस्वीगण मुझ कामासक्तिसे विह्वलका यह उपहास करेंगे कि सौ वर्षोंतक कठिन तपस्या करनेके पश्चात् भी एक अप्सराको देखकर महातपस्वी |
अ० ११ ] प्रथम स्कन्ध १२१
अ० ११ ] प्रथम स्कन्ध १२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दृष्ट्वाप्सरां च विवशः कथं जातो महातपाः।<br>कामं निन्दापि भवतु यदि स्यादतुलं सुखम्॥ ३४ | व्यास इतने विवश कैसे हो गये? और फिर यदि इसमें अतुलनीय सुख हो तो ऐसी निन्दा भी होती रहे। अर्थात् उसकी उपेक्षा भी की जा सकती है॥ ३२—३४॥ |
| गृहस्थाश्रमसम्भूतं सुखदं पुत्रकामदम्।<br>स्वर्गदं च तथा प्रोक्तं ज्ञानिनां मोक्षदं तथा॥ ३५<br><br>न भविष्यति तन्नूनमनया देवकन्यया।<br>नारदाच्च मया पूर्वं श्रुतमस्ति कथानकम्।<br>यथोर्वशीवशो राजा पराभूतः पुरूरवाः॥ ३६ | गृहस्थाश्रम पुत्र-प्राप्तिकी कामना पूर्ण करनेवाला, स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा ज्ञानियोंको मोक्ष देनेवाला कहा गया है। किंतु वैसा सुख इस देवकन्यासे नहीं प्राप्त होगा। पूर्वकालमें मैंने नारदजीसे एक कथा सुनी थी जिसमें राजा पुरूरवा उर्वशीके वशीभूत होकर अत्यन्त संकटमें पड़ गये थे॥ ३५–३६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शिववरदानवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
# अथैकादशोऽध्यायः
### बुधके जन्मकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
| :--- | :--- |
| **ऋषय ऊचुः**<br>कोऽसौ पुरूरवा राजा कोर्वशी देवकन्यका।<br>कथं कष्टं च सम्प्राप्तं तेन राज्ञा महात्मना॥ १ | **ऋषिगण बोले**—हे सूतजी! वे राजा पुरूरवा कौन थे तथा वह देवकन्या उर्वशी कौन थी? उस मनस्वी राजाने किस प्रकार संकट प्राप्त किया?॥ १॥ |
| सर्वं कथानकं ब्रूहि लोमहर्षणजाधुना।<br>श्रोतुकामा वयं सर्वे त्वन्मुखाब्जच्युतं रसम्॥ २ | हे लोमहर्षणतनय! आप इस समय पूरा कथानक विस्तारपूर्वक कहें। हम सभी लोग आपके मुखारविन्दसे निःसृत रसमयी वाणीको सुननेके इच्छुक हैं॥ २॥ |
| अमृतादपि मिष्टा ते वाणी सूत रसात्मिका।<br>न तृप्यामो वयं सर्वे सुधया च यथामराः॥ ३ | हे सूतजी! आपकी वाणी अमृतसे भी बढ़कर मधुर एवं रसमयी है। जिस प्रकार देवगण अमृत-पानसे कभी तृप्त नहीं होते, उसी प्रकार आपके कथा-श्रवणसे हम तृप्त नहीं होते॥ ३॥ |
| **सूत उवाच**<br>शृणुध्वं मुनयः सर्वे कथां दिव्यां मनोरमाम्।<br>वक्ष्याम्यहं यथाबुद्ध्या श्रुतां व्यासवरोत्तमात्॥ ४ | **सूतजी बोले**—हे मुनियो! अब आपलोग उस दिव्य तथा मनोहर कथाको सुनिये, जिसे मैंने परम श्रेष्ठ व्यासजीके मुखसे सुना है। मैं उसे अपनी बुद्धिके अनुसार वैसा ही कहूँगा॥ ४॥ |
| गुरोस्तु दयिता भार्या तारा नामेति विश्रुता।<br>रूपयौवनयुक्ता सा चार्वङ्गी मदविह्वला॥ ५ | सुरगुरु बृहस्पतिकी पत्नीका नाम 'तारा' था। वह रूप-यौवनसे सम्पन्न तथा सुन्दर अंगोंवाली थी॥ ५॥ |
| गतैकदा विधोर्धाम यजमानस्य भामिनी।<br>दृष्टा च शशिनात्यर्थं रूपयौवनशालिनी॥ ६<br><br>कामातुरस्तदा जातः शशी शशिमुखीं प्रति।<br>सापि वीक्ष्य विधुं कामं जाता मदनपीडिता॥ ७<br><br>तावन्योन्यं प्रेमयुक्तौ स्मरार्तौ च बभूवतुः।<br>तारा शशी मदोन्मत्तौ कामबाणप्रपीडितौ॥ ८ | एक बार वह सुन्दरी अपने यजमान चन्द्रमाके घर गयी। उस रूप तथा यौवनसे सम्पन्न चन्द्रमुखी कामिनीको देखते ही चन्द्रमा उसपर आसक्त हो गये। तारा भी चन्द्रमाको देखकर आसक्त हो गयी। इस प्रकार वे दोनों तारा तथा चन्द्रमा एक-दूसरेको देखकर प्रेमविभोर हो गये॥ ६—८॥ |
| १२२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रेमाते मदमत्तौ तौ परस्परस्पृहान्वितौ।<br>दिनानि कतिचित्तत्र जातानि रममाणयोः ॥ ९<br><br>बृहस्पतिस्तु दुःखार्तस्तारामानयितुं गृहम्।<br>प्रेषयामास शिष्यं तु नायाता सा वशीकृता॥ १० | वे दोनों प्रेमोन्मत्त एक-दूसरेको चाहनेकी इच्छासे युक्त हो विहार करने लगे। इस प्रकार उनके कुछ दिन व्यतीत हुए। तब बृहस्पतिने ताराको घर लानेके लिये अपना एक शिष्य भेजा; परंतु वह न आ सकी॥ ९-१०॥ |
| पुनः पुनर्यदा शिष्यं परावर्तत चन्द्रमाः।<br>बृहस्पतिस्तदा क्रुद्धो जगाम स्वयमेव हि॥ ११ | जब चन्द्रमाने बृहस्पतिके शिष्यको कई बार लौटाया, तो वे क्रोधित होकर चन्द्रमाके पास स्वयं गये॥ ११॥ |
| गत्वा सोमगृहं तत्र वाचस्पतिरुदारधीः।<br>उवाच शशिनं क्रुद्धः स्मयमानं मदान्वितम्॥ १२<br><br>किं कृतं किल शीतांशो कर्म धर्मविगर्हितम्।<br>रक्षिता मम भार्येयं सुन्दरी केन हेतुना॥ १३ | चन्द्रमाके घर जाकर उदारचित्त बृहस्पतिने अभिमानके साथ मुसकराते हुए उस चन्द्रमासे कहा—हे चन्द्रमा! तुमने यह धर्मविरुद्ध कार्य क्यों किया और मेरी इस परम सुन्दरी पत्नीको अपने घरमें क्यों रख लिया?॥ १२-१३॥ |
| तव देव गुरुश्चाहं यजमानोऽसि सर्वथा।<br>गुरुभार्यां कथं मूढ भुक्ता किं रक्षिताथवा॥ १४ | हे देव! मैं तुम्हारा गुरु हूँ और तुम मेरे यजमान हो। तब हे मूर्ख! तुमने गुरुपत्नीको अपने घरमें क्यों रख लिया?॥ १४॥ |
| ब्रह्महा हेमहारी च सुरापो गुरुतल्पगः।<br>महापातकिनो ह्येते तत्संसर्गी च पञ्चमः॥ १५<br><br>महापातकयुक्तस्त्वं दुराचारोऽतिगर्हितः।<br>न देवसदनार्होऽसि यदि भुक्तेयमङ्गना॥ १६ | ब्रह्महत्या करनेवाला, सुवर्ण चुरानेवाला, मदिरापान करनेवाला, गुरुपत्नीगामी तथा पाँचवाँ इन पापियोंके साथ संसर्ग रखनेवाला—ये ‘महापातकी’ हैं। तुम महापापी, दुराचारी एवं अत्यन्त निन्दनीय हो। यदि तुमने मेरी पत्नीके साथ अनाचार किया है तो तुम देवलोकमें रहनेयोग्य नहीं हो॥ १५-१६॥ |
| मुञ्चेमामसितापाङ्गीं नयामि सदनं मम।<br>नोचेद्धक्ष्यामि दुष्टात्मन् गुरुदारापहारिणम्॥ १७ | हे दुष्टात्मन्! असितापांगी मेरी इस पत्नीको छोड़ दो जिससे मैं इसे अपने घर ले जाऊँ, अन्यथा गुरुपत्नीका अपहरण करनेवाले तुझको मैं शाप दे दूँगा॥ १७॥ |
| इत्येवं भाषमाणं तमुवाच रोहिणीपतिः।<br>गुरुं क्रोधसमायुक्तं कान्ताविरहदुःखितम्॥ १८ | इस प्रकार बोलते हुए स्त्रीविरहसे कातर तथा क्रोधाकुल देवगुरु बृहस्पतिसे रोहिणीपति चन्द्रमाने कहा॥ १८॥ |
| इन्दुरुवाच<br>क्रोधान्ते तु दुराराध्या ब्राह्मणाः क्रोधवर्जिताः।<br>पूजार्हा धर्मशास्त्रज्ञा वर्जनीयास्ततोऽन्यथा॥ १९ | **चन्द्रमा बोले—**क्रोधके कारण ब्राह्मण अपूजनीय होते हैं। क्रोधरहित तथा धर्मशास्त्रज्ञ विप्र पूजाके योग्य हैं और इन गुणोंसे हीन ब्राह्मण त्याज्य होते हैं॥ १९॥ |
| आगमिष्यति सा कामं गृहं ते वरवर्णिनी।<br>अत्रैव संस्थिता बाला का ते हानिरिहानघ॥ २०<br><br>इच्छया संस्थिता चात्र सुखकामार्थिनी हि सा।<br>दिनानि कतिचित्स्थित्वा स्वेच्छया चागमिष्यति॥ २१ | हे अनघ! वह सुन्दर स्त्री अपनी इच्छासे आपके घर चली जायगी और यदि कुछ दिन यहाँ ठहर भी गयी तो इससे आपकी क्या हानि है? अपनी इच्छासे ही वह यहाँ रहती है। सुखकी इच्छा रखनेवाली वह कुछ दिन यहाँ रहकर अपनी इच्छासे चली जायगी॥ २०-२१॥ |
| अ० ११ ] | प्रथम स्कन्ध | १२३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| त्वयैवोदाहृतं पूर्वं धर्मशास्त्रमतं तथा।<br>न स्त्री दुष्यति चोरेण न विप्रो वेदकर्मणा॥ २२ | आपने ही तो पूर्वमें धर्मशास्त्रके इस मतका उल्लेख किया है कि संसर्गसे स्त्री और वेदकर्मसे ब्राह्मण कभी दूषित नहीं होते॥ २२॥ |
| इत्युक्तः शशिना तत्र गुरुरत्यन्तदुःखितः।<br>जगाम स्वगृहं तूर्णं चिन्ताविष्टः स्मरातुरः॥ २३ | चन्द्रमाके ऐसा कहनेपर बृहस्पति अत्यन्त दुखी हुए एवं चिन्तामग्न होकर शीघ्र ही अपने घर चले गये॥ २३॥ |
| दिनानि कतिचित्तत्र स्थित्वा चिन्तातुरो गुरुः।<br>ययावथ गृहं तस्य त्वरितश्चौषधीपतेः॥ २४<br>स्थितः क्षत्रा निषिद्धोऽसौ द्वारदेशे रुषान्वितः।<br>नाजगाम शशी तत्र चुकोपाति बृहस्पतिः॥ २५ | कुछ दिन अपने घर रहकर चिन्तासे व्याकुल गुरु बृहस्पति पुनः उन औषधिपति चन्द्रमाके यहाँ शीघ्र जा पहुँचे। वहाँ द्वारपालने उन्हें भीतर जानेसे रोका, तब वे क्रुद्ध होकर द्वारपर ही रुक गये। [कुछ देरतक प्रतीक्षा करनेपर] जब चन्द्रमा वहाँ नहीं आये, तब बृहस्पति अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे॥ २४-२५॥ |
| अयं मे शिष्यतां यातो गुरुपत्नीं तु मातरम्।<br>जग्राह बलतोऽधर्मी शिक्षणीयो मयाऽधुना॥ २६ | [वे विचार करने लगे] मेरा शिष्य होते हुए भी इसने माताके समान आदरणीया गुरुपत्नीको बलपूर्वक हर लिया है। इसलिये अब मुझे इस अधर्मीको दण्डित करना चाहिये॥ २६॥ |
| उवाच वाचं कोपात्तु द्वारदेशस्थितो बहिः।<br>किं शेषे भवने मन्द पापाचार सुराधम॥ २७<br>देहि मे कामिनीं शीघ्रं नोचेच्छापं ददाम्यहम्।<br>करोमि भस्मसान्नूनं न ददासि प्रियां मम॥ २८ | तब बाहर द्वारपर खड़े बृहस्पतिने क्रोधके साथ चन्द्रमासे कहा—अरे नीच! पापी! देवाधम! तुम अपने घरमें निश्चिन्त होकर क्यों पड़े हो? मेरी स्त्री शीघ्र मुझे लौटा दो, अन्यथा मैं तुम्हें शाप दे दूँगा। यदि तुम मेरी पत्नी नहीं दोगे तो मैं तुझे अभी अवश्य भस्म कर दूँगा॥ २७-२८॥ |
| सूत उवाच<br>क्रूराणि चैवमादीनि भाषणानि बृहस्पतेः।<br>श्रुत्वा द्विजपतिः शीघ्रं निर्गतः सदनाद् बहिः॥ २९<br>तमुवाच हसन्सोमः किमिदं बहु भाषसे।<br>न ते योग्यासितापाङ्गी सर्वलक्षणसंयुता॥ ३० | **सूतजी बोले—**बृहस्पतिके इस प्रकारके क्रोधभरे वचन सुनकर द्विजराज चन्द्रमा शीघ्र घरसे बाहर निकले और हँसते हुए उनसे बोले—आप इतना अधिक क्यों बोल रहे हैं? सर्वलक्षणसम्पन्न वह असितापांगी आपके योग्य नहीं है॥ २९-३०॥ |
| कुरूपां च स्वसदृशीं गृहाणान्यां स्त्रियं द्विज।<br>भिक्षुकस्य गृहे योग्या नेदृशी वरवर्णिनी॥ ३१<br>रतिः स्वसदृशे कान्ते नार्याः किल निगद्यते।<br>त्वं न जानासि मन्दात्मन् कामशास्त्रविनिर्णयम्॥ ३२<br>यथेष्टं गच्छ दुर्बुद्धे नाहं दास्यामि कामिनीम्।<br>यच्छक्यं कुरु तत्कामं न देया वरवर्णिनी॥ ३३<br>कामार्तस्य च ते शापो न मां बाधितुमर्हति।<br>नाहं ददे गुरो कान्तां यथेच्छसि तथा कुरु॥ ३४ | हे विप्र! आप अपने समान किसी अन्य स्त्रीको ग्रहण कर लीजिये; ऐसी सुन्दरी भिक्षुकके घरमें रहनेयोग्य नहीं है। यह प्रायः कहा जाता है कि अपने समान गुणसम्पन्न पतिपर ही पत्नीका प्रेम स्थिर रहता है। अपने इच्छानुसार अब आप चाहे जहाँ चले जायँ। मैं इसे नहीं दूँगा। आपका शाप मेरे ऊपर नहीं लग सकता। हे गुरो! मैं यह रमणी आपको नहीं दूँगा, अब आप जैसा चाहें वैसा करें॥ ३१-३४॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्तः शशिना चेज्यश्चिन्तामाप रुषान्वितः।<br>जगाम तरसा सद्य क्रोधयुक्तः शचीपतेः॥ ३५ | **सूतजी बोले—**चन्द्रमाके ऐसा कहनेपर देवगुरु बृहस्पति रुष्ट होकर चिन्तामें पड़ गये और वे कुपित हो शीघ्रतासे इन्द्रके भवन चले गये॥ ३५॥ |
| १२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दृष्ट्वा शतक्रतुस्तत्र गुरुं दुःखातुरं स्थितम्।<br>पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः पूजयित्वा सुसंस्थितः॥ ३६ | वहाँ स्थित देवगुरु बृहस्पतिवारको दुःखसे व्याकुल देखकर इन्द्रने पाद्य, अर्घ्य तथा आचमनीय आदिसे उनकी विधिवत् पूजा करके बैठाया॥ ३६॥ |
| पप्रच्छ परमोदारस्तं तथावस्थितं गुरुम्।<br>का चिन्ता ते महाभाग शोकार्तोऽसि महामुने॥ ३७ | जब बृहस्पति आसनपर बैठकर स्वस्थ हो गये, तब परम उदार इन्द्रने उनसे पूछा—'हे महाभाग! आपको कौन-सी चिन्ता है? हे मुनिवर! आप इतने शोकाकुल किसलिये हैं?॥ ३७॥ |
| केनापमानितोऽसि त्वं मम राज्ये गुरुश्च मे।<br>त्वदधीनमिदं सर्वं सैन्यं लोकाधिपैः सह॥ ३८<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा शम्भुर्यै चान्ये देवसत्तमाः।<br>करिष्यन्ति च साहाय्यं का चिन्ता वद साम्प्रतम्॥ ३९ | मेरे राज्यमें आपका अपमान किसने किया है? आप मेरे गुरु हैं, अतः हमारी सारी सेना एवं लोकपाल सभी आपके अधीन हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा अन्य देवता भी आपकी सहायता करेंगे। आपको कौन-सी चिन्ता है; इस समय उसे बताइये॥ ३८-३९॥ |
| गुरुरुवाच<br>शशिनापहृता भार्या तारा मम सुलोचना।<br>न ददाति स दुष्टात्मा प्रार्थितोऽपि पुनः पुनः॥ ४०<br>किं करोमि सुरेशान त्वमेव शरणं मम।<br>साहाय्यं कुरु देवेश दुःखितोऽस्मि शतक्रतो॥ ४१ | बृहस्पति बोले—चन्द्रमाने मेरी सुन्दर नेत्रोंवाली पत्नी ताराका हरण कर लिया और वह दुष्ट मेरे बार-बार प्रार्थना करनेपर भी उसे लौटाता नहीं है। हे देवराज! अब मैं क्या करूँ? अब तो केवल आप ही मेरी शरण हैं। हे शतक्रतो! मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। हे देवेश! आप मेरी सहायता कीजिये॥ ४०-४१॥ |
| इन्द्र उवाच<br>मा शोकं कुरु धर्मज्ञ दासोऽस्मि तव सुव्रत।<br>आनयिष्याम्यहं नूनं भार्या तव महामते॥ ४२<br>प्रेषिते चेन्मया दूते न दास्यति मदाकुलः।<br>ततो युद्धं करिष्यामि देवसैन्यैः समावृतः॥ ४३ | इन्द्र बोले—हे धर्मात्मन्! आप शोक न करें, हे सुव्रत! मैं आपका सेवक हूँ, मैं आपकी पत्नीको अवश्य लाऊँगा। हे महामते! यदि दूत भेजनेपर भी वह मदोन्मत्त चन्द्रमा आपकी स्त्रीको नहीं देगा तो देवसेनाओंसहित मैं स्वयं युद्ध करूँगा॥ ४२-४३॥ |
| इत्याश्वास्य गुरुं शक्रो दूतं वक्तृविचक्षणम्।<br>प्रेषयामास सोमाय वार्ताशंसिनमद्भुतम्॥ ४४ | इस प्रकार गुरु बृहस्पतिको आश्वासन देकर इन्द्रने अपनी बातको सही ढंगसे कहनेवाले, विलक्षण तथा वाक्पटु दूतको चन्द्रमाके पास भेजा॥ ४४॥ |
| स गत्वा शशिलोकं तु त्वरितः सुविचक्षणः।<br>उवाच वचनेनैव वचनं रोहिणीपतिम्॥ ४५<br>प्रेषितोऽहं महाभाग शक्रेण त्वां विवक्षया।<br>कथितं प्रभुणा यच्च तद् ब्रवीमि महामते॥ ४६ | शीघ्र ही वह चतुर दूत चन्द्रलोक गया और रोहिणीपति चन्द्रमासे यह सन्देश-वचन कहने लगा—हे महाभाग! हे महामते! इन्द्रने आपसे कुछ कहनेके लिये मुझे भेजा है। अतः उनके द्वारा जो कुछ कहा गया है, वही ज्यों-का-त्यों मैं आपसे कह रहा हूँ॥ ४५-४६॥ |
| धर्मज्ञोऽसि महाभाग नीतिं जानासि सुव्रत।<br>अत्रिः पिता ते धर्मात्मा न निन्द्यं कर्तुमर्हसि॥ ४७<br>भार्या रक्ष्या सर्वभूतैर्यथाशक्ति ह्यतन्द्रितैः।<br>तदर्थे कलहः कामं भविता नात्र संशयः॥ ४८ | हे महाभाग! हे सुव्रत! आप धर्मज्ञ हैं, नीति जानते हैं तथा धर्मात्मा अत्रिमुनि आपके पिता हैं, अतएव आपको कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये जिससे आप निन्दनीय हो जायें। आलस्यरहित होकर यथाशक्ति अपनी स्त्रीकी रक्षा सभी प्राणी करते हैं। अतः इस (तारा)-के लिये बड़ा कलह होगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४७-४८॥ |
| अ० ११ ] | प्रथम स्कन्ध | १२५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यथा तव तथा तस्य यत्नः स्याद्दाररक्षणे।<br>आत्मवत्सर्वभूतानि चिन्तय त्वं सुधानिधे॥ ४९ | हे सुधानिधे! जैसे आप अपनी भार्याकी रक्षा हेतु प्रयत्न करते हैं, वैसे वे गुरु बृहस्पति भी अपनी पत्नीकी रक्षाके लिये प्रयत्नशील हैं। आप अपने ही सदृश सभी प्राणियोंके विषयमें विचार कीजिये॥ ४९॥ |
| अष्टाविंशतिसंख्यास्ते कामिन्यो दक्षजाः शुभाः।<br>गुरुपत्नीं कथं भोक्तुं त्वमिच्छसि सुधानिधे॥ ५०<br><br>स्वर्गे सदा वसन्त्येता मेनकाद्या मनोरमाः।<br>भुंक्ष्व ताः स्वेच्छया कामं मुञ्च पत्नीं गुरोरपि॥ ५१ | हे सुधानिधे! आपको दक्षप्रजापतिकी सुलक्षणोंसे युक्त अट्ठाईस कन्याएँ पत्नीके रूपमें प्राप्त हैं। आप अपने गुरुकी पत्नीको पानेकी इच्छा क्यों रखते हैं? स्वर्गलोकमें मेनका आदि अनेक मनोरम अप्सराएँ सर्वदा सुलभ हैं, तब उनके साथ स्वेच्छापूर्वक विहार कीजिये और गुरुपत्नी ताराको शीघ्र ही लौटा दीजिये॥ ५०-५१॥ |
| ईश्वरा यदि कुर्वन्ति जुगुप्सितमहन्तया।<br>अज्ञास्तदनुवर्तन्ते तदा धर्मक्षयो भवेत्॥ ५२<br><br>तस्मान्मुञ्च महाभाग गुरोः पत्नीं मनोरमाम्।<br>कलहस्त्वन्निमित्तोऽद्य सुराणां न भवेद्यथा॥ ५३ | आप-जैसे महान् लोग यदि अहंकारवश ऐसा निन्दित कर्म करें तो अनभिज्ञ साधारणजन तो उनका अनुकरण करेंगे ही और तब धर्मका नाश हो जायगा। अतः हे महाभाग! गुरुकी इस मनोरमा पत्नीको शीघ्र लौटा दीजिये, जिससे आपके कारण इस समय देवताओंके बीच कलह न उत्पन्न हो॥ ५२-५३॥ |
| सूत उवाच<br>सोमः शक्रवचः श्रुत्वा किञ्चित्क्रोधसमाकुलः।<br>भङ्गया प्रतिवचः प्राह शक्रदूतं तदा शशी॥ ५४ | **सूतजी बोले—**दूतसे इन्द्रका सन्देश सुनकर चन्द्रमा कुछ क्रोधित हो गये और उन्होंने इन्द्रके दूतको इस प्रकार व्यंग्यपूर्वक उत्तर दिया॥ ५४॥ |
| इन्दुरुवाच<br>धर्मज्ञोऽसि महाबाहो देवानामधियः स्वयम्।<br>पुरोधापि च ते तादृग्युवयोः सदृशी मतिः॥ ५५ | **चन्द्रमा बोले—**हे महाबाहो! आप धर्मज्ञ हैं और स्वयं देवताओंके राजा हैं। आपके पुरोहित बृहस्पति भी ठीक आपकी तरह हैं और आप दोनोंकी बुद्धि भी एक समान है॥ ५५॥ |
| परोपदेशे कुशला भवन्ति बहवो जनाः।<br>दुर्लभस्तु स्वयं कर्ता प्राप्ते कर्मणि सर्वदा॥ ५६ | दूसरोंको उपदेश देनेमें अनेक लोग चतुर होते हैं, परंतु कार्य उपस्थित होनेपर [उपदेशानुसार] स्वयं आचरण करनेवाला दुर्लभ होता है॥ ५६॥ |
| बार्हस्पत्यप्रणीतं च शास्त्रं गृह्णन्ति मानवाः।<br>को विरोधोऽत्र देवेश कामयानां भजन्स्त्रियम्॥ ५७<br><br>स्वकीयं बलिनां सर्वं दुर्बलानां न किञ्चन।<br>स्वीया च परकीया च भ्रमोऽयं मन्दचेतसाम्॥ ५८<br><br>तारा मय्यनुरक्ता च यथा न तु तथा गुरौ।<br>अनुरक्ता कथं त्याज्या धर्मतो न्यायतस्तथा॥ ५९<br><br>गृहारम्भस्तु रक्तायां विरक्तायां कथं भवेत्।<br>विरक्तेयं यदा जाता चकमेऽनुजकामिनीम्॥ ६०<br><br>न दास्येऽहं वरारोहां गच्छ दूत वद स्वयम्।<br>ईश्वरोऽसि सहस्त्राक्ष यदिच्छसि कुरुष्व तत्॥ ६१ | हे देवेश! बृहस्पतिके बनाये शास्त्रको सभी मनुष्य स्वीकार करते हैं। शक्तिशाली लोगोंके लिये सब कुछ अपना होता है, परंतु दुर्बल लोगोंके लिये कुछ भी अपना नहीं होता। तारा जितना प्रेम मुझसे करती है, उतना बृहस्पतिसे नहीं। अतः अनुरक्त स्त्री धर्म अथवा न्यायसे त्याज्य कैसे हो सकती है? गार्हस्थ्य जीवनका वास्तविक सुख तो प्रेम रखनेवाली स्त्रीके साथ ही होता है, उदासीन स्त्रीके साथ नहीं; इसलिये हे दूत! तुम जाओ और इन्द्रसे कह दो कि मैं इसे नहीं दूँगा। हे सहस्राक्ष! आप स्वयं समर्थ हैं; आप जो चाहते हों, वह कीजिये॥ ५७–६१॥ |
| १२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ |
|---|
| सूत उवाच | |
|---|---|
| सूत उवाच<br>इत्युक्तः शशिना दूतः प्रययौ शक्रसन्निधिम्।<br>इन्द्रायाचष्ट तत्सर्वं यदुक्तं शीतरश्मिना ॥ ६२ | **सूतजी बोले—**चन्द्रमाके ऐसा कहनेपर दूत इन्द्रके पास लौट गया और चन्द्रमाने जो कहा था, वह सब उसने इन्द्रसे कह दिया ॥ ६२ ॥ |
| तुराषाडपि तच्छ्रुत्वा क्रोधयुक्तो बभूव ह।<br>सेनोद्योगं तथा चक्रे साहाय्यार्थं गुरोर्विभुः ॥ ६३ | इसे सुनकर प्रतापी इन्द्र भी अत्यन्त क्रोधित हुए और गुरु बृहस्पतिकी सहायताके लिये सेनाकी तैयारी करने लगे ॥ ६३ ॥ |
| शुक्रस्तु विग्रहं श्रुत्वा गुरुद्वेषात्ततो ययौ।<br>मा ददस्वेति तं वाक्यमुवाच शशिनं प्रति ॥ ६४ | दैत्यगुरु शुक्राचार्य चन्द्रमा तथा देवगुरुके विरोधकी बात सुनकर बृहस्पतिसे द्वेषके कारण चन्द्रमाके पास गये और उससे बोले कि आप ताराको वापस मत कीजिये ॥ ६४ ॥ |
| साहाय्यं ते करिष्यामि मन्त्रशक्त्या महामते।<br>भविता यदि संग्रामस्तव चेन्द्रेण मारिष ॥ ६५ | हे महामते! हे मान्य! यदि इन्द्रके साथ आपका युद्ध छिड़ जायगा तो मैं भी अपनी मन्त्रशक्तिसे आपकी सहायता करूँगा ॥ ६५ ॥ |
| शङ्करस्तु तदाकर्ण्य गुरुदाराभिमर्शनम्।<br>गुरुशत्रुं भृगुं मत्वा साहाय्यमकरोत्तदा ॥ ६६ | गुरुपत्नीसे अनाचारकी बात सुनकर और शुक्राचार्यको बृहस्पतिका शत्रु जानकर शिवजी भी बृहस्पतिकी सहायताके लिये तैयार हो गये ॥ ६६ ॥ |
| संग्रामस्तु तदा वृत्तो देवदानवयोरद्भुतम्।<br>बहूनि तत्र वर्षाणि तारकासुरवत्किल ॥ ६७ | तब तारकासुरके साथ हुए युद्धकी भाँति देव-दानवोंमें संग्राम छिड़ गया। यह युद्ध बहुत वर्षोंतक चलता रहा ॥ ६७ ॥ |
| देवासुरकृतं युद्धं दृष्ट्वा तत्र पितामहः।<br>हंसारूढो जगामाशु तं देशं क्लेशशान्तये ॥ ६८ | देव-दानवोंका यह संग्राम देखकर प्रजापति ब्रह्माजी हंसपर सवार होकर उस क्लेशकी शान्तिके लिये रणस्थलमें शीघ्र पहुँचे। तब ब्रह्माजीने चन्द्रमासे कहा कि तुम गुरु बृहस्पतिकी पत्नी लौटा दो, नहीं तो भगवान् विष्णुको बुलाकर मैं तुम्हें समूल नष्ट कर दूँगा। तत्पश्चात् लोकपितामह ब्रह्माजीने भृगुनन्दन शुक्रको भी युद्धसे रोका और उनसे कहा—हे महामते! दैत्योंके संगसे क्या आपकी भी बुद्धि अन्याययुक्त हो गयी है? ॥ ६८—७० ॥ |
| राकापतिं तदा प्राह मुञ्च भार्यां गुरोरिति।<br>नोचेद्विष्णुं समाहूय करिष्यामि तु संक्षयम् ॥ ६९ | |
| भृगुं निवारयामास ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>किमन्यायमतिर्जाता सङ्गदोषान्महामते ॥ ७० | |
| निषेधयामास ततो भृगुस्तं चौषधीपतिम्।<br>मुञ्च भार्यां गुरोरद्य पित्राहं प्रेषितस्तव ॥ ७१ | तत्पश्चात् [ब्रह्माजीकी बात सुनकर शुक्राचार्य चन्द्रमाके पास गये] उन्होंने चन्द्रमाको युद्धसे रोका और कहा कि तुम्हारे पिताने मुझे भेजा है, तुम अपने गुरुकी पत्नीको तत्काल छोड़ दो ॥ ७१ ॥ |
| सूत उवाच<br>द्विजराजस्तु तच्छ्रुत्वा भृगोर्वचनमद्भुतम्।<br>ददौ च तत्प्रियां भार्यां गुरोर्गर्भवतीं शुभाम् ॥ ७२ | **सूतजी बोले—**शुक्राचार्यकी वह अद्भुत वाणी सुनकर चन्द्रमाने बृहस्पतिकी गर्भवती सुन्दरी प्रिय भार्याको लौटा दिया ॥ ७२ ॥ |
| प्राप्य कान्तां गुरुर्हृष्टः स्वगृहं मुदितो ययौ।<br>ततो देवास्ततो दैत्या ययुः स्वान्स्वान्गृहान्प्रति ॥ ७३ | पत्नीको पाकर देवगुरु बड़े प्रसन्न हुए और आनन्दपूर्वक अपने घर चले गये। तत्पश्चात् सभी देवता और दैत्य भी अपने-अपने घर चले गये ॥ ७३ ॥ |
अ० ११ ] प्रथम स्कन्ध १२७
अ० ११ ] प्रथम स्कन्ध १२७
| ब्रह्मा स्वसदनं प्राप्तः कैलासं चापि शङ्करः।<br>बृहस्पतिस्तु सन्तुष्टः प्राप्य भार्यां मनोरमाम्॥ ७४ | पितामह ब्रह्मा अपने लोकको तथा शिवजी भी कैलासपर्वतपर चले गये। इस प्रकार अपनी सुन्दरी स्त्रीको पाकर बृहस्पति सन्तुष्ट हो गये॥ ७४॥ |
| ततः कालेन कियता तारासूत सुतं शुभम्।<br>सुदिने शुभनक्षत्रे तारापतिसमं गुणैः॥ ७५ | तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद ताराने शुभ दिन तथा शुभ नक्षत्रमें गुणोंमें चन्द्रमाके समान ही सुन्दर पुत्रको जन्म दिया। पुत्रको उत्पन्न देखकर देवगुरु बृहस्पतिने प्रसन्न मनसे उसके विधिवत् जातकर्म आदि सभी संस्कार किये॥ ७५-७६॥ |
| दृष्ट्वा पुत्रं गुरुर्जातं चकार विधिपूर्वकम्।<br>जातकर्मादिकं सर्वं प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥ ७६ | |
| श्रुतं चन्द्रमसा जन्म पुत्रस्य मुनिसत्तमाः।<br>दूतं च प्रेषयामास गुरुं प्रति महामतिः॥ ७७ | हे श्रेष्ठ मुनियो! चन्द्रमाने जब सुना कि पुत्र उत्पन्न हुआ है, तब बुद्धिमान् चन्द्रमाने बृहस्पतिके पास अपना दूत भेजा [और कहलाया—हे गुरो!] यह पुत्र आपका नहीं है; क्योंकि यह मेरे तेजसे उत्पन्न है। तब आपने अपनी इच्छासे बालकका जातकर्मादि संस्कार क्यों कर लिया?॥ ७७-७८॥ |
| न चायं तव पुत्रोऽस्ति मम वीर्यसमुद्भवः।<br>कथं त्वं कृतवान्कामं जातकर्मादिकं विधिम्॥ ७८ | |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य दूतस्य च बृहस्पतिः।<br>उवाच मम पुत्रो मे सदृशो नात्र संशयः॥ ७९ | उस दूतका वचन सुनकर बृहस्पतिने कहा कि यह मेरा पुत्र है; क्योंकि इसकी आकृति मेरे समान है, इसमें सन्देह नहीं॥ ७९॥ |
| पुनर्विवादः सञ्जातो मिलिता देवदानवाः।<br>युद्धार्थमागतास्तेषां समाजः समजायत॥ ८० | पुनः दोनोंमें विवाद खड़ा हो गया और देव-दानव मिलकर फिर युद्धके लिये आ गये और इस प्रकार उनका बहुत बड़ा समूह एकत्र हो गया॥ ८०॥ |
| तत्रागतः स्वयं ब्रह्मा शान्तिकामः प्रजापतिः।<br>निवारयामास मुखे संस्थितान्युद्धदुर्मदान्॥ ८१ | उस समय शान्तिके अभिलाषी स्वयं प्रजापति ब्रह्माजी पुनः वहाँ पहुँचे और रणभूमिमें डटे हुए युद्धोत्सुक देव-दानवोंको उन्होंने युद्धसे रोका॥ ८१॥ |
| तारां पप्रच्छ धर्मात्मा कस्यायं तनयः शुभे।<br>सत्यं वद वरारोहे यथा क्लेशः प्रशाम्यति॥ ८२ | धर्मात्मा ब्रह्माजीने तारासे पूछा—‘हे कल्याणि! यह पुत्र किसका है? हे सुन्दरि! तुम सही-सही बता दो, जिससे यह कलह शान्त हो जाय’॥ ८२॥ |
| तमुवाचासितापाङ्गी लज्जमानाप्यधोमुखी।<br>चन्द्रस्येति शनैरन्तर्जगाम वरवर्णिनी॥ ८३ | तब असितापांगी सुन्दरी ताराने लजाते हुए सिर नीचे करके मन्द स्वरमें कहा—‘यह पुत्र चन्द्रमाका है’ ऐसा कहकर वह घरके भीतर चली गयी॥ ८३॥ |
| जग्राह तं सुतं सोमः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।<br>नाम चक्रे बुध इति जगाम स्वगृहं पुनः॥ ८४ | तब प्रसन्नचित्त होकर चन्द्रमाने उस पुत्रको ले लिया। उन्होंने उसका नाम ‘बुध’ रखा। पुनः वे अपने घर चले गये॥ ८४॥ |
| ययौ ब्रह्मा स्वकं धाम सर्वे देवाः सवासवाः।<br>यथागतं गतं सर्वैः सर्वशः प्रेक्षकैर्जनैः॥ ८५ | तत्पश्चात् ब्रह्माजी अपने लोकको तथा इन्द्रसहित सभी देवता भी चले गये। इसी प्रकार प्रेक्षक भी जो जहाँसे आये थे, वे सभी अपने-अपने स्थानको चले गये॥ ८५॥ |
१२८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १२
| कथितेयं बुधोत्पत्तिर्गुरुक्षेत्रे च सोमतः।<br><br>यथा श्रुता मया पूर्वं व्यासात्सत्यवतीसुतात् ॥ ८६ | [हे मुनिजन!] इस प्रकार गुरुके क्षेत्रमें चन्द्रमासे बुधकी उत्पत्तिका यह वृत्तान्त जैसा मैंने पूर्वमें सत्यवती-पुत्र व्यासजीसे सुना था, वैसा आपलोगोंसे कह दिया है॥ ८६ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे बुधोत्पत्तिर्नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
राजा सुद्युम्नकी इला नामक स्त्रीके रूपमें परिणति, इलाका बुधसे विवाह और पुरूरवाकी उत्पत्ति, भगवतीकी स्तुति करनेसे इलारूपधारी राजा सुद्युम्नकी सायुज्यमुक्ति
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| ततः पुरूरवा जज्ञे इलायां कथयामि वः।<br>बुधपुत्रोऽतिधर्मात्मा यज्ञकृद्दानतत्परः॥ १ | तदनन्तर इलाके गर्भसे पुरूरवाने जन्म लिया, यह प्रसंग मैं आपलोगोंसे कहता हूँ। वे बुधपुत्र पुरूरवा बड़े धर्मात्मा, यज्ञ करनेवाले एवं दानशील थे॥ १॥ |
| सुद्युम्नो नाम भूपालः सत्यवादी जितेन्द्रियः।<br>सैन्धवं हयमारुह्य चचार मृगयां वने॥ २<br><br>युतः कतिपयामात्यैर्दर्शितश्चारुकुण्डलः।<br>धनुराजगवं बद्ध्वा बाणसङ्गं तथाद्भुतम्॥ ३<br><br>स भ्रमंस्तद्गनोद्देशे हन्यमानो रुरून्मृगान्।<br>शशांश्च सूकरांश्चैव खड्गांश्च गवयांस्तथा॥ ४<br><br>शरभान्महिषांश्चैव साम्भ्रान्वनकुक्कुटान्।<br>निघ्नन्मेध्यान् पशून् राजा कुमारवनमाविशत्॥ ५ | सुद्युम्न नामक एक राजा थे। वे बड़े ही सत्यवादी और जितेन्द्रिय थे। एक बार वे सैन्धव घोड़ेपर आरूढ़ होकर आखेटके लिये वनमें गये। उनके साथ कुछ मन्त्री भी थे। वे राजा कानोंमें कमनीय कुण्डल पहने थे। आजगव नामक धनुष तथा बाणोंसे भरा अद्भुत तरकस धारण करके उस वनमें भ्रमण करते हुए रुरुमृग, हिरण, खरगोश, सूअर, गैंडों, गवय, साँभर, भैंसों, वन-मुर्गोंको मारते हुए तथा यज्ञोपयोगी अनेक वनपशुओंका वध करते हुए राजा सुद्युम्न 'कुमार' नामक वनमें प्रविष्ट हुए॥ २-५॥ |
| मेरोरधस्तले दिव्यं मन्दारद्रुमराजितम्।<br>अशोककलिकाकीर्णं बकुलैरधिवासितम्॥ ६<br><br>सालैस्तालैस्तमालैश्च चम्पकैः पनसैस्तथा।<br>आम्रैर्नीपैर्र्मधूकैश्च माधवीमण्डपावृतम्॥ ७ | वह दिव्य वन सुमेरु पर्वतके निचले भागमें था, जो सुन्दर मन्दार-वृक्षोंसे सुशोभित था, वहाँ अशोक वृक्षकी लताएँ फैली हुई थीं तथा मौलसिरीकी सुगन्धि उसे सुरभित कर रही थी। वह वन साल, ताड़, तमाल, चम्पा, कटहल, आम, कदम्ब और महुएके पेड़ोंसे सुशोभित था तथा जहाँ-तहाँ माधवी लता मण्डपके समान छायी हुई थी॥ ६-७॥ |
| दाडिमैर्नारिकेलैश्च कदलीखण्डमण्डितम्।<br>यूथिकामालतकुन्दपुष्पवल्लीसमावृतम् ॥ ८ | उस वनमें दाडिम, नारियल तथा केलेके वृक्ष भी शोभित हो रहे थे और वह वन जूही, मालती तथा कुन्दकी पुष्पित लताओंसे चारों ओरसे घिरा हुआ था। वहाँ हंस और बतख विचरण कर रहे थे, बाँस [एक |
| अ० १२] | प्रथम स्कन्ध | १२९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हंसकारण्डवाकीर्णं कीचकध्वनिनादितम्।<br>भ्रमरालिरुतारामं वनं सर्वसुखावहम्॥ ९ | दूसरेसे रगड़ खानेके कारण हवामें मधुर] ध्वनि कर रहे थे तथा कहीं भ्रमरोंकी मधुर गुंजार वन-प्रान्तको गुंजित कर रही थी। इस प्रकार वह वन सब प्रकारसे सुखदायक था॥ ८-९॥ |
| दृष्ट्वा प्रमुदितो राजा सुद्युम्नः सेवकैर्वृतः।<br>वृक्षान्सुपुष्पितान्वीक्ष्य कोकिलारावमण्डितान्॥ १० | कोयलोंकी ध्वनिसे मण्डित तथा पुष्पोंसे युक्त वृक्षोंको देखकर अनुचरोंके साथ राजा सुद्युम्न अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ १०॥ |
| प्रविष्टस्तत्र राजर्षिः स्त्रीत्वमाप क्षणात्ततः।<br>अश्वोऽपि वडवा जातश्चिन्ताविष्टः स भूपतिः॥ ११<br><br>किमेतदिति चिन्तार्तश्चिन्त्यमानः पुनः पुनः।<br>दुःखं बहुतरं प्राप्तः सुद्युम्नो लज्जयान्वितः॥ १२<br><br>किं करोमि कथं यामि गृहं स्त्रीभावसंयुतः।<br>कथं राज्यं करिष्यामि केन वा वञ्चितो ह्यहम्॥ १३ | राजर्षि सुद्युम्नने वहाँ प्रवेश किया और उसी क्षण वे स्त्रीके रूपमें परिणत हो गये; उनका घोड़ा भी घोड़ीके रूपमें हो गया। इससे वे राजा चिन्तामें पड़ गये। [वे मनमें सोचने लगे] यह क्या हो गया? चिन्तासे व्याकुल वे राजा सुद्युम्न बार-बार सोचते हुए बहुत दुःखी तथा लज्जित हुए। [उन्होंने सोचा] अब मैं क्या करूँ और स्त्रीत्व भावसे युक्त मैं घर कैसे जाऊँ? मैं अब कैसे राज्य-संचालन करूँगा? मैं इस प्रकार किससे ठगा गया?॥ ११-१३॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>सूताश्चर्यमिदं प्रोक्तं त्वया यल्लोमहर्षण।<br>सुद्युम्नः स्त्रीत्वमापन्नो भूपतिर्देवसन्निभः॥ १४<br><br>किं तत्कारणमाचक्ष्व वने तत्र मनोहरे।<br>किं कृतं तेन राज्ञा च विस्तरं वद सुव्रत॥ १५ | ऋषिगण बोले— हे लोमहर्षण सूतजी! आपने यह बड़ी आश्चर्यजनक बात कही है। देवताके समान तेजस्वी राजा सुद्युम्न स्त्रीत्वको प्राप्त हो गये—इसका क्या कारण है? उसे बताइये। उस रमणीय वनमें राजाने कौन-सा कार्य किया था? हे सुव्रत! आप विस्तारपूर्वक हमें बताइये॥ १४-१५॥ |
| सूत उवाच<br>एकदा गिरिशं द्रष्टुमृषयः सनकादयः।<br>दिशो वितिमिराभासाः कुर्वन्तः समुपागमन्॥ १६ | सूतजी बोले— एक समयकी बात है—सनकादिक ऋषिगण अपने तेजसे दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए शंकरजीके दर्शनके लिये वहाँ गये थे॥ १६॥ |
| तस्मिंश्च समये तत्र शङ्करः प्रमदायुतः।<br>क्रीडासक्तो महादेवो विवस्त्रा कामिनी शिवा॥ १७<br><br>उत्सङ्गे संस्थिता भर्तू रममाणा मनोरमा।<br>तान्विलोक्यम्बिका देवी विवस्त्रा व्रीडिता भृशम्॥ १८<br><br>भर्तुरङ्गात्समुत्थाय वस्त्रमादाय पर्यधात्।<br>लज्जाविष्टा स्थिता तत्र वेपमानातिमानिनी॥ १९ | उस समय महादेव शिव पार्वतीके साथ विहार कर रहे थे, इसी बीच उन सनकादिक ऋषियोंको वहाँ देखकर पार्वती अत्यन्त लज्जित हो गयीं। वे अतिमानिनी पार्वती काँपती हुई लज्जित होकर अलग खड़ी हो गयीं॥ १७-१९॥ |
| ऋषयोऽपि तयोर्वीक्ष्य प्रसङ्गं रममाणयोः।<br>परिवृत्य ययुस्तूर्णं नरनारायणाश्रमम्॥ २० | सनकादिक मुनि भी शिव एवं पार्वतीको विहार करते देखकर वहाँसे तत्काल लौटकर नर-नारायणके आश्रममें चले गये॥ २०॥ |
| ह्रीयुतां कामिनीं वीक्ष्य प्रोवाच भगवान्हरः।<br>कथं लज्जातुरासि त्वं सुखं ते प्रकरोम्यहम्॥ २१<br><br>अद्यप्रभृति यो मोहात्पुमान्कोऽपि वरानने।<br>वनं च प्रविशेदतत्सं वै योषिद्भविष्यति॥ २२ | भगवान् शिव अपनी प्रिय पत्नीको लज्जित देखकर कहने लगे—तुम इस प्रकार लज्जित क्यों हो रही हो? तुम्हारे सुख का उपाय मैं अभी करता हूँ। हे वरानने! आजसे जो कोई भी पुरुष इस वनमें भूलसे भी आयेगा, वह स्त्री हो जायगा॥ २१-२२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—5 A
| १३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ | | :--- | :--- |
| इति शप्तं वनं तेन ये जानन्ति जनाः क्वचित्।<br>वर्जयन्तीह ते कामं वनं दोषसमृद्धिमत्॥ २३ | उन शिवजीने वनको ऐसा शाप दे दिया है—इसे जो लोग जानते हैं, वे उस दोषपूर्ण वनका पूर्णतः परित्याग कर देते हैं॥ २३॥ | | सुद्युम्नस्तु तदज्ञानात्प्रविष्टः सचिवैः सह।<br>तथैव स्त्रीत्वमापन्नस्तैः सहेति न संशयः॥ २४ | वे सुद्युम्न भी अज्ञानवश सचिवोंके साथ उस वनमें चले गये, जिससे वे अपने सचिव आदि सहित स्त्री हो गये; इसमें शंकाका कोई कारण नहीं है॥ २४॥ | | चिन्ताविष्टः स राजर्षिर्न जगाम गृहं हिया।<br>विचचार बहिस्तस्माद्देशादितस्ततः॥ २५ | चिन्ताकुल होनेके कारण राजा सुद्युम्न लज्जावश घर नहीं गये और उस वनप्रदेशसे बाहर इधर-उधर घूमने लगे॥ २५॥ | | इलेति नाम सम्प्राप्तं स्त्रीत्वे तेन महात्मना।<br>विचरंस्तत्र सम्प्राप्तो बुधः सोमसुतो युवा॥ २६ | स्त्रीत्व प्राप्त होनेपर उन महात्माका नाम इला पड़ गया। इस प्रकार स्त्रीरूपमें घूमते हुए एक दिन चन्द्रमाके युवा पुत्र बुधसे उनकी भेंट हो गयी॥ २६॥ | | स्त्रीभिः परिवृतां तां तु दृष्ट्वा कान्तां मनोरमाम्।<br>हावभावकलायुक्तां चकमे भगवान्बुधः॥ २७<br><br>सापि तं चकमे कान्तं बुधं सोमसुतं पतिम्।<br>संयोगस्तत्र सञ्जातस्तयोः प्रेम्णा परस्परम्॥ २८ | अनेक स्त्रियोंके साथ भ्रमण करती हुई उस हाव-भावमयी युवती रमणीको देखकर चन्द्रमाके पुत्र भगवान् बुध उसपर मोहित हो गये। वह रमणी भी उन चन्द्रपुत्र बुधको अपना पति बनानेके लिये आकुल हो उठी। इस प्रकार परस्पर अनुरागके कारण कुछ दिनोंमें उन दोनोंका संयोग हो गया॥ २७-२८॥ | | स तस्यां जनयामास पुरूरवसमात्मजम्।<br>इलायां सोमपुत्रस्तु चक्रवर्तिनमुत्तमम्॥ २९<br><br>सा प्रासूत सुतं बाला चिन्ताविष्टा वने स्थिता।<br>सस्मार स्वकुलाचार्यं वसिष्ठं मुनिसत्तमम्॥ ३० | उस चन्द्रमापुत्र बुधने इलाके गर्भसे पुरूरवा नामक श्रेष्ठ चक्रवर्ती पुत्रको उत्पन्न किया। पुत्रको जन्म देकर वह इला वनमें ही रहने लगी तथा चिन्तातुर हो उसने अपने कुलाचार्य मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीका स्मरण किया॥ २९-३०॥ | | स तदास्य दशां दृष्ट्वा सुद्युम्नस्य कृपान्वितः।<br>अतोषयन्महादेवं शङ्करं लोकशङ्करम्॥ ३१ | [इलाके स्मरण करते ही वसिष्ठजी वहाँ आये।] सुद्युम्नकी यह दशा देखकर उन्हें बड़ी दया आयी। तब उन्होंने समस्त लोकका कल्याण करनेवाले महादेव शिवको प्रसन्न किया॥ ३१॥ | | तस्मै स भगवांस्तुष्टः प्रददौ वाञ्छितं वरम्।<br>वसिष्ठः प्रार्थयामास पुंस्त्वं राज्ञः प्रियस्य च॥ ३२ | वसिष्ठजीपर प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने उन्हें मनोभिलषित वर प्रदान किया। वसिष्ठजीने प्रिय राजा सुद्युम्नके पुनः पुरुष होनेके लिये प्रार्थना की॥ ३२॥ | | शङ्करस्तु निजां वाचमृतां कुर्वन्नुवाच ह।<br>मासं पुमांस्तु भविता मासं स्त्री भूपतिः किल॥ ३३ | शिवजीने अपना वचन सत्य करते हुए कहा—'हे ऋषे! आजसे राजा सुद्युम्न एक मास पुरुष और एक मास स्त्री बने रहेंगे'॥ ३३॥ | | इत्थं प्राप्य वरं राजा जगाम स्वगृहं पुनः।<br>चक्रे राज्यं स धर्मात्मा वसिष्ठस्याप्यनुग्रहात्॥ ३४ | इस प्रकार वरदान पाकर राजा सुद्युम्न पुनः अपने घर आ गये और वे धर्मात्मा वहाँ वसिष्ठजीकी कृपासे राज्य करने लगे॥ ३४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—5 B
अ० १२ ] प्रथम स्कन्ध [ १३१
अ० १२ ] प्रथम स्कन्ध [ १३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्त्रीत्वे तिष्ठति हर्म्येषु पुंस्त्वे राज्यं प्रशास्ति च।<br>प्रजास्तस्मिन्समुद्विग्ना नाभ्यनन्दन्महीपतिम्॥ ३५ | वे जब स्त्रीके रूपमें रहते थे, तब अन्तःपुरमें रहते थे और जब पुरुषरूपमें रहते थे, तब राज्य करते थे। परंतु इस कारण उनकी प्रजा उनसे उद्विग्न होकर राजाके रूपमें उनका अभिनन्दन नहीं करती थी॥ ३५॥ |
| काले तु यौवनं प्राप्तः पुत्रः पुरूरवास्तदा।<br>प्रतिष्ठां नृपतिस्तस्मै दत्त्वा राज्यं वनं ययौ॥ ३६ | कुछ समयके बाद जब राजकुमार पुरूरवा युवक हो गया तब महाराज सुद्युम्न उसे प्रतिष्ठानपुरका राज्य सौंपकर वनमें चले गये॥ ३६॥ |
| गत्वा तस्मिन्वने रम्ये नानाद्रुमसमाकुले।<br>नारदान्मन्त्रमासाद्य नवाक्षरमनुत्तमम्॥ ३७<br><br>जजाप मन्त्रमत्यर्थं प्रेमपूरितमानसः।<br>परितुष्टा तदा देवी सगुणा तारिणी शिवा॥ ३८<br><br>सिंहारूढा स्थिता चाग्रे दिव्यररूपा मनोरमा।<br>वारुणीपानसम्मत्ता मदाघूर्णितलोचना॥ ३९ | अनेक प्रकारके वृक्षोंसे सुन्दर लगनेवाले उस वनमें रहते हुए राजा सुद्युम्ने देवर्षि नारदजीसे सर्वोत्तम नवाक्षर (नवार्ण) मन्त्रकी दीक्षा ली और अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिके साथ मन लगाकर वे उस मन्त्रका जप करने लगे। तदनन्तर भक्तोंका उद्धार करनेवाली जगज्जननी भगवती शिवाने सगुणरूप धारण करके उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उस समय मनोरम तथा दिव्य स्वरूपवाली भगवती सिंहपर सवार होकर उनके समक्ष खड़ी हो गयीं। उनके नेत्र मदसे परिपूर्ण थे॥ ३७–३९॥ |
| दृष्ट्वा तां दिव्यरूप्रां च प्रेमाकुलितलोचनः।<br>प्रणम्य शिरसा प्रीत्या तुष्टाव जगदम्बिकाम्॥ ४० | ऐसी दिव्य रूपधारिणी श्रीदुर्गादेवीको अपने सामने देखकर स्नेहभरे नेत्रोंवाले (इलारूपी) राजा सुद्युम्न प्रेमपूर्वक सिर नवाकर उनकी स्तुति करने लगे॥ ४०॥ |
| इलोवाच<br>दिव्यं च ते भगवति प्रथितं स्वरूपं<br>दृष्टं मया सकललोकहितानुरूपम्।<br>वन्दे त्वदंघ्रिकमलं सुरसङ्घसेव्यं<br>कामप्रदं जननि चापि विमुक्तिदं च॥ ४१ | **इलाने कहा—**हे भगवति! आपका जगत्-प्रसिद्ध वह दिव्य रूप, जो संसारके लिये कल्याणकारी है—मैंने देखा। हे जननि! सुरसमूहसे सेवित आपके भुक्ति-मुक्तिप्रदायक चरणकमलकी मैं वन्दना कर रही हूँ॥ ४१॥ |
| को वेत्ति तेऽम्ब भुवि मर्त्यतनुर्निकामं<br>मुह्यन्ति यत्र मुनयश्च सुराश्च सर्वे।<br>ऐश्वर्यमेतदखिलं कृपणे दयां च<br>दृष्ट्वैव देवि सकलं किल विस्मयो मे॥ ४२ | हे अम्ब! इस संसारमें कौन मनुष्य आपको सम्पूर्ण रूपसे जान सकता है? जबकि मुनि एवं देवगण भी उसे देखकर विमोहित रहते हैं। हे देवि! आपके सम्पूर्ण ऐश्वर्य तथा मुझ-जैसी अकिंचनपर दया—यह सब देखकर मुझे आश्चर्य हो रहा है॥ ४२॥ |
| शम्भुर्हरिः कमलजो मघवा रविश्च<br>वित्तेशवह्निवरुणाः पवनश्च सोमः।<br>जानन्ति नैव वसवोऽपि हि ते प्रभावं<br>बुध्येत्कथं तव गुणानगुणो मनुष्यः॥ ४३ | हे माता! जब शिव, विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य, कुबेर, अग्नि, वरुण, वायु, चन्द्रमा और अष्टवसु भी आपके प्रभावको नहीं जानते हैं, तब भला गुणरहित मनुष्य आपके गुणोंको कैसे जान सकता है?॥ ४३॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—5 C