देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 132, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 132
| अ० ११ ] | प्रथम स्कन्ध | १२३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
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| त्वयैवोदाहृतं पूर्वं धर्मशास्त्रमतं तथा।<br>न स्त्री दुष्यति चोरेण न विप्रो वेदकर्मणा॥ २२ | आपने ही तो पूर्वमें धर्मशास्त्रके इस मतका उल्लेख किया है कि संसर्गसे स्त्री और वेदकर्मसे ब्राह्मण कभी दूषित नहीं होते॥ २२॥ |
| इत्युक्तः शशिना तत्र गुरुरत्यन्तदुःखितः।<br>जगाम स्वगृहं तूर्णं चिन्ताविष्टः स्मरातुरः॥ २३ | चन्द्रमाके ऐसा कहनेपर बृहस्पति अत्यन्त दुखी हुए एवं चिन्तामग्न होकर शीघ्र ही अपने घर चले गये॥ २३॥ |
| दिनानि कतिचित्तत्र स्थित्वा चिन्तातुरो गुरुः।<br>ययावथ गृहं तस्य त्वरितश्चौषधीपतेः॥ २४<br>स्थितः क्षत्रा निषिद्धोऽसौ द्वारदेशे रुषान्वितः।<br>नाजगाम शशी तत्र चुकोपाति बृहस्पतिः॥ २५ | कुछ दिन अपने घर रहकर चिन्तासे व्याकुल गुरु बृहस्पति पुनः उन औषधिपति चन्द्रमाके यहाँ शीघ्र जा पहुँचे। वहाँ द्वारपालने उन्हें भीतर जानेसे रोका, तब वे क्रुद्ध होकर द्वारपर ही रुक गये। [कुछ देरतक प्रतीक्षा करनेपर] जब चन्द्रमा वहाँ नहीं आये, तब बृहस्पति अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे॥ २४-२५॥ |
| अयं मे शिष्यतां यातो गुरुपत्नीं तु मातरम्।<br>जग्राह बलतोऽधर्मी शिक्षणीयो मयाऽधुना॥ २६ | [वे विचार करने लगे] मेरा शिष्य होते हुए भी इसने माताके समान आदरणीया गुरुपत्नीको बलपूर्वक हर लिया है। इसलिये अब मुझे इस अधर्मीको दण्डित करना चाहिये॥ २६॥ |
| उवाच वाचं कोपात्तु द्वारदेशस्थितो बहिः।<br>किं शेषे भवने मन्द पापाचार सुराधम॥ २७<br>देहि मे कामिनीं शीघ्रं नोचेच्छापं ददाम्यहम्।<br>करोमि भस्मसान्नूनं न ददासि प्रियां मम॥ २८ | तब बाहर द्वारपर खड़े बृहस्पतिने क्रोधके साथ चन्द्रमासे कहा—अरे नीच! पापी! देवाधम! तुम अपने घरमें निश्चिन्त होकर क्यों पड़े हो? मेरी स्त्री शीघ्र मुझे लौटा दो, अन्यथा मैं तुम्हें शाप दे दूँगा। यदि तुम मेरी पत्नी नहीं दोगे तो मैं तुझे अभी अवश्य भस्म कर दूँगा॥ २७-२८॥ |
| सूत उवाच<br>क्रूराणि चैवमादीनि भाषणानि बृहस्पतेः।<br>श्रुत्वा द्विजपतिः शीघ्रं निर्गतः सदनाद् बहिः॥ २९<br>तमुवाच हसन्सोमः किमिदं बहु भाषसे।<br>न ते योग्यासितापाङ्गी सर्वलक्षणसंयुता॥ ३० | **सूतजी बोले—**बृहस्पतिके इस प्रकारके क्रोधभरे वचन सुनकर द्विजराज चन्द्रमा शीघ्र घरसे बाहर निकले और हँसते हुए उनसे बोले—आप इतना अधिक क्यों बोल रहे हैं? सर्वलक्षणसम्पन्न वह असितापांगी आपके योग्य नहीं है॥ २९-३०॥ |
| कुरूपां च स्वसदृशीं गृहाणान्यां स्त्रियं द्विज।<br>भिक्षुकस्य गृहे योग्या नेदृशी वरवर्णिनी॥ ३१<br>रतिः स्वसदृशे कान्ते नार्याः किल निगद्यते।<br>त्वं न जानासि मन्दात्मन् कामशास्त्रविनिर्णयम्॥ ३२<br>यथेष्टं गच्छ दुर्बुद्धे नाहं दास्यामि कामिनीम्।<br>यच्छक्यं कुरु तत्कामं न देया वरवर्णिनी॥ ३३<br>कामार्तस्य च ते शापो न मां बाधितुमर्हति।<br>नाहं ददे गुरो कान्तां यथेच्छसि तथा कुरु॥ ३४ | हे विप्र! आप अपने समान किसी अन्य स्त्रीको ग्रहण कर लीजिये; ऐसी सुन्दरी भिक्षुकके घरमें रहनेयोग्य नहीं है। यह प्रायः कहा जाता है कि अपने समान गुणसम्पन्न पतिपर ही पत्नीका प्रेम स्थिर रहता है। अपने इच्छानुसार अब आप चाहे जहाँ चले जायँ। मैं इसे नहीं दूँगा। आपका शाप मेरे ऊपर नहीं लग सकता। हे गुरो! मैं यह रमणी आपको नहीं दूँगा, अब आप जैसा चाहें वैसा करें॥ ३१-३४॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्तः शशिना चेज्यश्चिन्तामाप रुषान्वितः।<br>जगाम तरसा सद्य क्रोधयुक्तः शचीपतेः॥ ३५ | **सूतजी बोले—**चन्द्रमाके ऐसा कहनेपर देवगुरु बृहस्पति रुष्ट होकर चिन्तामें पड़ गये और वे कुपित हो शीघ्रतासे इन्द्रके भवन चले गये॥ ३५॥ |