भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 133
१२४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दृष्ट्वा शतक्रतुस्तत्र गुरुं दुःखातुरं स्थितम्।<br>पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः पूजयित्वा सुसंस्थितः॥ ३६वहाँ स्थित देवगुरु बृहस्पतिवारको दुःखसे व्याकुल देखकर इन्द्रने पाद्य, अर्घ्य तथा आचमनीय आदिसे उनकी विधिवत् पूजा करके बैठाया॥ ३६॥
पप्रच्छ परमोदारस्तं तथावस्थितं गुरुम्।<br>का चिन्ता ते महाभाग शोकार्तोऽसि महामुने॥ ३७जब बृहस्पति आसनपर बैठकर स्वस्थ हो गये, तब परम उदार इन्द्रने उनसे पूछा—'हे महाभाग! आपको कौन-सी चिन्ता है? हे मुनिवर! आप इतने शोकाकुल किसलिये हैं?॥ ३७॥
केनापमानितोऽसि त्वं मम राज्ये गुरुश्च मे।<br>त्वदधीनमिदं सर्वं सैन्यं लोकाधिपैः सह॥ ३८<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा शम्भुर्यै चान्ये देवसत्तमाः।<br>करिष्यन्ति च साहाय्यं का चिन्ता वद साम्प्रतम्॥ ३९मेरे राज्यमें आपका अपमान किसने किया है? आप मेरे गुरु हैं, अतः हमारी सारी सेना एवं लोकपाल सभी आपके अधीन हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा अन्य देवता भी आपकी सहायता करेंगे। आपको कौन-सी चिन्ता है; इस समय उसे बताइये॥ ३८-३९॥
गुरुरुवाच<br>शशिनापहृता भार्या तारा मम सुलोचना।<br>न ददाति स दुष्टात्मा प्रार्थितोऽपि पुनः पुनः॥ ४०<br>किं करोमि सुरेशान त्वमेव शरणं मम।<br>साहाय्यं कुरु देवेश दुःखितोऽस्मि शतक्रतो॥ ४१बृहस्पति बोले—चन्द्रमाने मेरी सुन्दर नेत्रोंवाली पत्नी ताराका हरण कर लिया और वह दुष्ट मेरे बार-बार प्रार्थना करनेपर भी उसे लौटाता नहीं है। हे देवराज! अब मैं क्या करूँ? अब तो केवल आप ही मेरी शरण हैं। हे शतक्रतो! मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। हे देवेश! आप मेरी सहायता कीजिये॥ ४०-४१॥
इन्द्र उवाच<br>मा शोकं कुरु धर्मज्ञ दासोऽस्मि तव सुव्रत।<br>आनयिष्याम्यहं नूनं भार्या तव महामते॥ ४२<br>प्रेषिते चेन्मया दूते न दास्यति मदाकुलः।<br>ततो युद्धं करिष्यामि देवसैन्यैः समावृतः॥ ४३इन्द्र बोले—हे धर्मात्मन्! आप शोक न करें, हे सुव्रत! मैं आपका सेवक हूँ, मैं आपकी पत्नीको अवश्य लाऊँगा। हे महामते! यदि दूत भेजनेपर भी वह मदोन्मत्त चन्द्रमा आपकी स्त्रीको नहीं देगा तो देवसेनाओंसहित मैं स्वयं युद्ध करूँगा॥ ४२-४३॥
इत्याश्वास्य गुरुं शक्रो दूतं वक्तृविचक्षणम्।<br>प्रेषयामास सोमाय वार्ताशंसिनमद्भुतम्॥ ४४इस प्रकार गुरु बृहस्पतिको आश्वासन देकर इन्द्रने अपनी बातको सही ढंगसे कहनेवाले, विलक्षण तथा वाक्पटु दूतको चन्द्रमाके पास भेजा॥ ४४॥
स गत्वा शशिलोकं तु त्वरितः सुविचक्षणः।<br>उवाच वचनेनैव वचनं रोहिणीपतिम्॥ ४५<br>प्रेषितोऽहं महाभाग शक्रेण त्वां विवक्षया।<br>कथितं प्रभुणा यच्च तद् ब्रवीमि महामते॥ ४६शीघ्र ही वह चतुर दूत चन्द्रलोक गया और रोहिणीपति चन्द्रमासे यह सन्देश-वचन कहने लगा—हे महाभाग! हे महामते! इन्द्रने आपसे कुछ कहनेके लिये मुझे भेजा है। अतः उनके द्वारा जो कुछ कहा गया है, वही ज्यों-का-त्यों मैं आपसे कह रहा हूँ॥ ४५-४६॥
धर्मज्ञोऽसि महाभाग नीतिं जानासि सुव्रत।<br>अत्रिः पिता ते धर्मात्मा न निन्द्यं कर्तुमर्हसि॥ ४७<br>भार्या रक्ष्या सर्वभूतैर्यथाशक्ति ह्यतन्द्रितैः।<br>तदर्थे कलहः कामं भविता नात्र संशयः॥ ४८हे महाभाग! हे सुव्रत! आप धर्मज्ञ हैं, नीति जानते हैं तथा धर्मात्मा अत्रिमुनि आपके पिता हैं, अतएव आपको कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये जिससे आप निन्दनीय हो जायें। आलस्यरहित होकर यथाशक्ति अपनी स्त्रीकी रक्षा सभी प्राणी करते हैं। अतः इस (तारा)-के लिये बड़ा कलह होगा; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४७-४८॥