भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

| अ० ११ ] | प्रथम स्कन्ध | १२५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यथा तव तथा तस्य यत्नः स्याद्दाररक्षणे।<br>आत्मवत्सर्वभूतानि चिन्तय त्वं सुधानिधे॥ ४९हे सुधानिधे! जैसे आप अपनी भार्याकी रक्षा हेतु प्रयत्न करते हैं, वैसे वे गुरु बृहस्पति भी अपनी पत्नीकी रक्षाके लिये प्रयत्नशील हैं। आप अपने ही सदृश सभी प्राणियोंके विषयमें विचार कीजिये॥ ४९॥
अष्टाविंशतिसंख्यास्ते कामिन्यो दक्षजाः शुभाः।<br>गुरुपत्नीं कथं भोक्तुं त्वमिच्छसि सुधानिधे॥ ५०<br><br>स्वर्गे सदा वसन्त्येता मेनकाद्या मनोरमाः।<br>भुंक्ष्व ताः स्वेच्छया कामं मुञ्च पत्नीं गुरोरपि॥ ५१हे सुधानिधे! आपको दक्षप्रजापतिकी सुलक्षणोंसे युक्त अट्ठाईस कन्याएँ पत्नीके रूपमें प्राप्त हैं। आप अपने गुरुकी पत्नीको पानेकी इच्छा क्यों रखते हैं? स्वर्गलोकमें मेनका आदि अनेक मनोरम अप्सराएँ सर्वदा सुलभ हैं, तब उनके साथ स्वेच्छापूर्वक विहार कीजिये और गुरुपत्नी ताराको शीघ्र ही लौटा दीजिये॥ ५०-५१॥
ईश्वरा यदि कुर्वन्ति जुगुप्सितमहन्तया।<br>अज्ञास्तदनुवर्तन्ते तदा धर्मक्षयो भवेत्॥ ५२<br><br>तस्मान्मुञ्च महाभाग गुरोः पत्नीं मनोरमाम्।<br>कलहस्त्वन्निमित्तोऽद्य सुराणां न भवेद्यथा॥ ५३आप-जैसे महान् लोग यदि अहंकारवश ऐसा निन्दित कर्म करें तो अनभिज्ञ साधारणजन तो उनका अनुकरण करेंगे ही और तब धर्मका नाश हो जायगा। अतः हे महाभाग! गुरुकी इस मनोरमा पत्नीको शीघ्र लौटा दीजिये, जिससे आपके कारण इस समय देवताओंके बीच कलह न उत्पन्न हो॥ ५२-५३॥
सूत उवाच<br>सोमः शक्रवचः श्रुत्वा किञ्चित्क्रोधसमाकुलः।<br>भङ्गया प्रतिवचः प्राह शक्रदूतं तदा शशी॥ ५४**सूतजी बोले—**दूतसे इन्द्रका सन्देश सुनकर चन्द्रमा कुछ क्रोधित हो गये और उन्होंने इन्द्रके दूतको इस प्रकार व्यंग्यपूर्वक उत्तर दिया॥ ५४॥
इन्दुरुवाच<br>धर्मज्ञोऽसि महाबाहो देवानामधियः स्वयम्।<br>पुरोधापि च ते तादृग्युवयोः सदृशी मतिः॥ ५५**चन्द्रमा बोले—**हे महाबाहो! आप धर्मज्ञ हैं और स्वयं देवताओंके राजा हैं। आपके पुरोहित बृहस्पति भी ठीक आपकी तरह हैं और आप दोनोंकी बुद्धि भी एक समान है॥ ५५॥
परोपदेशे कुशला भवन्ति बहवो जनाः।<br>दुर्लभस्तु स्वयं कर्ता प्राप्ते कर्मणि सर्वदा॥ ५६दूसरोंको उपदेश देनेमें अनेक लोग चतुर होते हैं, परंतु कार्य उपस्थित होनेपर [उपदेशानुसार] स्वयं आचरण करनेवाला दुर्लभ होता है॥ ५६॥
बार्हस्पत्यप्रणीतं च शास्त्रं गृह्णन्ति मानवाः।<br>को विरोधोऽत्र देवेश कामयानां भजन्स्त्रियम्॥ ५७<br><br>स्वकीयं बलिनां सर्वं दुर्बलानां न किञ्चन।<br>स्वीया च परकीया च भ्रमोऽयं मन्दचेतसाम्॥ ५८<br><br>तारा मय्यनुरक्ता च यथा न तु तथा गुरौ।<br>अनुरक्ता कथं त्याज्या धर्मतो न्यायतस्तथा॥ ५९<br><br>गृहारम्भस्तु रक्तायां विरक्तायां कथं भवेत्।<br>विरक्तेयं यदा जाता चकमेऽनुजकामिनीम्॥ ६०<br><br>न दास्येऽहं वरारोहां गच्छ दूत वद स्वयम्।<br>ईश्वरोऽसि सहस्त्राक्ष यदिच्छसि कुरुष्व तत्॥ ६१हे देवेश! बृहस्पतिके बनाये शास्त्रको सभी मनुष्य स्वीकार करते हैं। शक्तिशाली लोगोंके लिये सब कुछ अपना होता है, परंतु दुर्बल लोगोंके लिये कुछ भी अपना नहीं होता। तारा जितना प्रेम मुझसे करती है, उतना बृहस्पतिसे नहीं। अतः अनुरक्त स्त्री धर्म अथवा न्यायसे त्याज्य कैसे हो सकती है? गार्हस्थ्य जीवनका वास्तविक सुख तो प्रेम रखनेवाली स्त्रीके साथ ही होता है, उदासीन स्त्रीके साथ नहीं; इसलिये हे दूत! तुम जाओ और इन्द्रसे कह दो कि मैं इसे नहीं दूँगा। हे सहस्राक्ष! आप स्वयं समर्थ हैं; आप जो चाहते हों, वह कीजिये॥ ५७–६१॥