भारतकोश
संग्रह पर लौटें

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

| अ० ११ ] | प्रथम स्कन्ध | १२५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यथा तव तथा तस्य यत्नः स्याद्दाररक्षणे।<br>आत्मवत्सर्वभूतानि चिन्तय त्वं सुधानिधे॥ ४९हे सुधानिधे! जैसे आप अपनी भार्याकी रक्षा हेतु प्रयत्न करते हैं, वैसे वे गुरु बृहस्पति भी अपनी पत्नीकी रक्षाके लिये प्रयत्नशील हैं। आप अपने ही सदृश सभी प्राणियोंके विषयमें विचार कीजिये॥ ४९॥
अष्टाविंशतिसंख्यास्ते कामिन्यो दक्षजाः शुभाः।<br>गुरुपत्नीं कथं भोक्तुं त्वमिच्छसि सुधानिधे॥ ५०<br><br>स्वर्गे सदा वसन्त्येता मेनकाद्या मनोरमाः।<br>भुंक्ष्व ताः स्वेच्छया कामं मुञ्च पत्नीं गुरोरपि॥ ५१हे सुधानिधे! आपको दक्षप्रजापतिकी सुलक्षणोंसे युक्त अट्ठाईस कन्याएँ पत्नीके रूपमें प्राप्त हैं। आप अपने गुरुकी पत्नीको पानेकी इच्छा क्यों रखते हैं? स्वर्गलोकमें मेनका आदि अनेक मनोरम अप्सराएँ सर्वदा सुलभ हैं, तब उनके साथ स्वेच्छापूर्वक विहार कीजिये और गुरुपत्नी ताराको शीघ्र ही लौटा दीजिये॥ ५०-५१॥
ईश्वरा यदि कुर्वन्ति जुगुप्सितमहन्तया।<br>अज्ञास्तदनुवर्तन्ते तदा धर्मक्षयो भवेत्॥ ५२<br><br>तस्मान्मुञ्च महाभाग गुरोः पत्नीं मनोरमाम्।<br>कलहस्त्वन्निमित्तोऽद्य सुराणां न भवेद्यथा॥ ५३आप-जैसे महान् लोग यदि अहंकारवश ऐसा निन्दित कर्म करें तो अनभिज्ञ साधारणजन तो उनका अनुकरण करेंगे ही और तब धर्मका नाश हो जायगा। अतः हे महाभाग! गुरुकी इस मनोरमा पत्नीको शीघ्र लौटा दीजिये, जिससे आपके कारण इस समय देवताओंके बीच कलह न उत्पन्न हो॥ ५२-५३॥
सूत उवाच<br>सोमः शक्रवचः श्रुत्वा किञ्चित्क्रोधसमाकुलः।<br>भङ्गया प्रतिवचः प्राह शक्रदूतं तदा शशी॥ ५४**सूतजी बोले—**दूतसे इन्द्रका सन्देश सुनकर चन्द्रमा कुछ क्रोधित हो गये और उन्होंने इन्द्रके दूतको इस प्रकार व्यंग्यपूर्वक उत्तर दिया॥ ५४॥
इन्दुरुवाच<br>धर्मज्ञोऽसि महाबाहो देवानामधियः स्वयम्।<br>पुरोधापि च ते तादृग्युवयोः सदृशी मतिः॥ ५५**चन्द्रमा बोले—**हे महाबाहो! आप धर्मज्ञ हैं और स्वयं देवताओंके राजा हैं। आपके पुरोहित बृहस्पति भी ठीक आपकी तरह हैं और आप दोनोंकी बुद्धि भी एक समान है॥ ५५॥
परोपदेशे कुशला भवन्ति बहवो जनाः।<br>दुर्लभस्तु स्वयं कर्ता प्राप्ते कर्मणि सर्वदा॥ ५६दूसरोंको उपदेश देनेमें अनेक लोग चतुर होते हैं, परंतु कार्य उपस्थित होनेपर [उपदेशानुसार] स्वयं आचरण करनेवाला दुर्लभ होता है॥ ५६॥
बार्हस्पत्यप्रणीतं च शास्त्रं गृह्णन्ति मानवाः।<br>को विरोधोऽत्र देवेश कामयानां भजन्स्त्रियम्॥ ५७<br><br>स्वकीयं बलिनां सर्वं दुर्बलानां न किञ्चन।<br>स्वीया च परकीया च भ्रमोऽयं मन्दचेतसाम्॥ ५८<br><br>तारा मय्यनुरक्ता च यथा न तु तथा गुरौ।<br>अनुरक्ता कथं त्याज्या धर्मतो न्यायतस्तथा॥ ५९<br><br>गृहारम्भस्तु रक्तायां विरक्तायां कथं भवेत्।<br>विरक्तेयं यदा जाता चकमेऽनुजकामिनीम्॥ ६०<br><br>न दास्येऽहं वरारोहां गच्छ दूत वद स्वयम्।<br>ईश्वरोऽसि सहस्त्राक्ष यदिच्छसि कुरुष्व तत्॥ ६१हे देवेश! बृहस्पतिके बनाये शास्त्रको सभी मनुष्य स्वीकार करते हैं। शक्तिशाली लोगोंके लिये सब कुछ अपना होता है, परंतु दुर्बल लोगोंके लिये कुछ भी अपना नहीं होता। तारा जितना प्रेम मुझसे करती है, उतना बृहस्पतिसे नहीं। अतः अनुरक्त स्त्री धर्म अथवा न्यायसे त्याज्य कैसे हो सकती है? गार्हस्थ्य जीवनका वास्तविक सुख तो प्रेम रखनेवाली स्त्रीके साथ ही होता है, उदासीन स्त्रीके साथ नहीं; इसलिये हे दूत! तुम जाओ और इन्द्रसे कह दो कि मैं इसे नहीं दूँगा। हे सहस्राक्ष! आप स्वयं समर्थ हैं; आप जो चाहते हों, वह कीजिये॥ ५७–६१॥
१२६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ११
सूत उवाच
सूत उवाच<br>इत्युक्तः शशिना दूतः प्रययौ शक्रसन्निधिम्।<br>इन्द्रायाचष्ट तत्सर्वं यदुक्तं शीतरश्मिना ॥ ६२**सूतजी बोले—**चन्द्रमाके ऐसा कहनेपर दूत इन्द्रके पास लौट गया और चन्द्रमाने जो कहा था, वह सब उसने इन्द्रसे कह दिया ॥ ६२ ॥
तुराषाडपि तच्छ्रुत्वा क्रोधयुक्तो बभूव ह।<br>सेनोद्योगं तथा चक्रे साहाय्यार्थं गुरोर्विभुः ॥ ६३इसे सुनकर प्रतापी इन्द्र भी अत्यन्त क्रोधित हुए और गुरु बृहस्पतिकी सहायताके लिये सेनाकी तैयारी करने लगे ॥ ६३ ॥
शुक्रस्तु विग्रहं श्रुत्वा गुरुद्वेषात्ततो ययौ।<br>मा ददस्वेति तं वाक्यमुवाच शशिनं प्रति ॥ ६४दैत्यगुरु शुक्राचार्य चन्द्रमा तथा देवगुरुके विरोधकी बात सुनकर बृहस्पतिसे द्वेषके कारण चन्द्रमाके पास गये और उससे बोले कि आप ताराको वापस मत कीजिये ॥ ६४ ॥
साहाय्यं ते करिष्यामि मन्त्रशक्त्या महामते।<br>भविता यदि संग्रामस्तव चेन्द्रेण मारिष ॥ ६५हे महामते! हे मान्य! यदि इन्द्रके साथ आपका युद्ध छिड़ जायगा तो मैं भी अपनी मन्त्रशक्तिसे आपकी सहायता करूँगा ॥ ६५ ॥
शङ्करस्तु तदाकर्ण्य गुरुदाराभिमर्शनम्।<br>गुरुशत्रुं भृगुं मत्वा साहाय्यमकरोत्तदा ॥ ६६गुरुपत्नीसे अनाचारकी बात सुनकर और शुक्राचार्यको बृहस्पतिका शत्रु जानकर शिवजी भी बृहस्पतिकी सहायताके लिये तैयार हो गये ॥ ६६ ॥
संग्रामस्तु तदा वृत्तो देवदानवयोरद्भुतम्।<br>बहूनि तत्र वर्षाणि तारकासुरवत्किल ॥ ६७तब तारकासुरके साथ हुए युद्धकी भाँति देव-दानवोंमें संग्राम छिड़ गया। यह युद्ध बहुत वर्षोंतक चलता रहा ॥ ६७ ॥
देवासुरकृतं युद्धं दृष्ट्वा तत्र पितामहः।<br>हंसारूढो जगामाशु तं देशं क्लेशशान्तये ॥ ६८देव-दानवोंका यह संग्राम देखकर प्रजापति ब्रह्माजी हंसपर सवार होकर उस क्लेशकी शान्तिके लिये रणस्थलमें शीघ्र पहुँचे। तब ब्रह्माजीने चन्द्रमासे कहा कि तुम गुरु बृहस्पतिकी पत्नी लौटा दो, नहीं तो भगवान् विष्णुको बुलाकर मैं तुम्हें समूल नष्ट कर दूँगा। तत्पश्चात् लोकपितामह ब्रह्माजीने भृगुनन्दन शुक्रको भी युद्धसे रोका और उनसे कहा—हे महामते! दैत्योंके संगसे क्या आपकी भी बुद्धि अन्याययुक्त हो गयी है? ॥ ६८—७० ॥
राकापतिं तदा प्राह मुञ्च भार्यां गुरोरिति।<br>नोचेद्विष्णुं समाहूय करिष्यामि तु संक्षयम् ॥ ६९
भृगुं निवारयामास ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>किमन्यायमतिर्जाता सङ्गदोषान्महामते ॥ ७०
निषेधयामास ततो भृगुस्तं चौषधीपतिम्।<br>मुञ्च भार्यां गुरोरद्य पित्राहं प्रेषितस्तव ॥ ७१तत्पश्चात् [ब्रह्माजीकी बात सुनकर शुक्राचार्य चन्द्रमाके पास गये] उन्होंने चन्द्रमाको युद्धसे रोका और कहा कि तुम्हारे पिताने मुझे भेजा है, तुम अपने गुरुकी पत्नीको तत्काल छोड़ दो ॥ ७१ ॥
सूत उवाच<br>द्विजराजस्तु तच्छ्रुत्वा भृगोर्वचनमद्भुतम्।<br>ददौ च तत्प्रियां भार्यां गुरोर्गर्भवतीं शुभाम् ॥ ७२**सूतजी बोले—**शुक्राचार्यकी वह अद्भुत वाणी सुनकर चन्द्रमाने बृहस्पतिकी गर्भवती सुन्दरी प्रिय भार्याको लौटा दिया ॥ ७२ ॥
प्राप्य कान्तां गुरुर्हृष्टः स्वगृहं मुदितो ययौ।<br>ततो देवास्ततो दैत्या ययुः स्वान्स्वान्गृहान्प्रति ॥ ७३पत्नीको पाकर देवगुरु बड़े प्रसन्न हुए और आनन्दपूर्वक अपने घर चले गये। तत्पश्चात् सभी देवता और दैत्य भी अपने-अपने घर चले गये ॥ ७३ ॥

अ० ११ ] प्रथम स्कन्ध १२७

अ० ११ ] प्रथम स्कन्ध १२७

ब्रह्मा स्वसदनं प्राप्तः कैलासं चापि शङ्करः।<br>बृहस्पतिस्तु सन्तुष्टः प्राप्य भार्यां मनोरमाम्॥ ७४पितामह ब्रह्मा अपने लोकको तथा शिवजी भी कैलासपर्वतपर चले गये। इस प्रकार अपनी सुन्दरी स्त्रीको पाकर बृहस्पति सन्तुष्ट हो गये॥ ७४॥
ततः कालेन कियता तारासूत सुतं शुभम्।<br>सुदिने शुभनक्षत्रे तारापतिसमं गुणैः॥ ७५तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद ताराने शुभ दिन तथा शुभ नक्षत्रमें गुणोंमें चन्द्रमाके समान ही सुन्दर पुत्रको जन्म दिया। पुत्रको उत्पन्न देखकर देवगुरु बृहस्पतिने प्रसन्न मनसे उसके विधिवत् जातकर्म आदि सभी संस्कार किये॥ ७५-७६॥
दृष्ट्वा पुत्रं गुरुर्जातं चकार विधिपूर्वकम्।<br>जातकर्मादिकं सर्वं प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥ ७६
श्रुतं चन्द्रमसा जन्म पुत्रस्य मुनिसत्तमाः।<br>दूतं च प्रेषयामास गुरुं प्रति महामतिः॥ ७७हे श्रेष्ठ मुनियो! चन्द्रमाने जब सुना कि पुत्र उत्पन्न हुआ है, तब बुद्धिमान् चन्द्रमाने बृहस्पतिके पास अपना दूत भेजा [और कहलाया—हे गुरो!] यह पुत्र आपका नहीं है; क्योंकि यह मेरे तेजसे उत्पन्न है। तब आपने अपनी इच्छासे बालकका जातकर्मादि संस्कार क्यों कर लिया?॥ ७७-७८॥
न चायं तव पुत्रोऽस्ति मम वीर्यसमुद्भवः।<br>कथं त्वं कृतवान्कामं जातकर्मादिकं विधिम्॥ ७८
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य दूतस्य च बृहस्पतिः।<br>उवाच मम पुत्रो मे सदृशो नात्र संशयः॥ ७९उस दूतका वचन सुनकर बृहस्पतिने कहा कि यह मेरा पुत्र है; क्योंकि इसकी आकृति मेरे समान है, इसमें सन्देह नहीं॥ ७९॥
पुनर्विवादः सञ्जातो मिलिता देवदानवाः।<br>युद्धार्थमागतास्तेषां समाजः समजायत॥ ८०पुनः दोनोंमें विवाद खड़ा हो गया और देव-दानव मिलकर फिर युद्धके लिये आ गये और इस प्रकार उनका बहुत बड़ा समूह एकत्र हो गया॥ ८०॥
तत्रागतः स्वयं ब्रह्मा शान्तिकामः प्रजापतिः।<br>निवारयामास मुखे संस्थितान्युद्धदुर्मदान्॥ ८१उस समय शान्तिके अभिलाषी स्वयं प्रजापति ब्रह्माजी पुनः वहाँ पहुँचे और रणभूमिमें डटे हुए युद्धोत्सुक देव-दानवोंको उन्होंने युद्धसे रोका॥ ८१॥
तारां पप्रच्छ धर्मात्मा कस्यायं तनयः शुभे।<br>सत्यं वद वरारोहे यथा क्लेशः प्रशाम्यति॥ ८२धर्मात्मा ब्रह्माजीने तारासे पूछा—‘हे कल्याणि! यह पुत्र किसका है? हे सुन्दरि! तुम सही-सही बता दो, जिससे यह कलह शान्त हो जाय’॥ ८२॥
तमुवाचासितापाङ्गी लज्जमानाप्यधोमुखी।<br>चन्द्रस्येति शनैरन्तर्जगाम वरवर्णिनी॥ ८३तब असितापांगी सुन्दरी ताराने लजाते हुए सिर नीचे करके मन्द स्वरमें कहा—‘यह पुत्र चन्द्रमाका है’ ऐसा कहकर वह घरके भीतर चली गयी॥ ८३॥
जग्राह तं सुतं सोमः प्रहृष्टेनान्तरात्मना।<br>नाम चक्रे बुध इति जगाम स्वगृहं पुनः॥ ८४तब प्रसन्नचित्त होकर चन्द्रमाने उस पुत्रको ले लिया। उन्होंने उसका नाम ‘बुध’ रखा। पुनः वे अपने घर चले गये॥ ८४॥
ययौ ब्रह्मा स्वकं धाम सर्वे देवाः सवासवाः।<br>यथागतं गतं सर्वैः सर्वशः प्रेक्षकैर्जनैः॥ ८५तत्पश्चात् ब्रह्माजी अपने लोकको तथा इन्द्रसहित सभी देवता भी चले गये। इसी प्रकार प्रेक्षक भी जो जहाँसे आये थे, वे सभी अपने-अपने स्थानको चले गये॥ ८५॥

१२८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १२

कथितेयं बुधोत्पत्तिर्गुरुक्षेत्रे च सोमतः।<br><br>यथा श्रुता मया पूर्वं व्यासात्सत्यवतीसुतात् ॥ ८६[हे मुनिजन!] इस प्रकार गुरुके क्षेत्रमें चन्द्रमासे बुधकी उत्पत्तिका यह वृत्तान्त जैसा मैंने पूर्वमें सत्यवती-पुत्र व्यासजीसे सुना था, वैसा आपलोगोंसे कह दिया है॥ ८६ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे बुधोत्पत्तिर्नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥


अथ द्वादशोऽध्यायः

राजा सुद्युम्नकी इला नामक स्त्रीके रूपमें परिणति, इलाका बुधसे विवाह और पुरूरवाकी उत्पत्ति, भगवतीकी स्तुति करनेसे इलारूपधारी राजा सुद्युम्नकी सायुज्यमुक्ति

सूत उवाचसूतजी बोले—
ततः पुरूरवा जज्ञे इलायां कथयामि वः।<br>बुधपुत्रोऽतिधर्मात्मा यज्ञकृद्दानतत्परः॥ १तदनन्तर इलाके गर्भसे पुरूरवाने जन्म लिया, यह प्रसंग मैं आपलोगोंसे कहता हूँ। वे बुधपुत्र पुरूरवा बड़े धर्मात्मा, यज्ञ करनेवाले एवं दानशील थे॥ १॥
सुद्युम्नो नाम भूपालः सत्यवादी जितेन्द्रियः।<br>सैन्धवं हयमारुह्य चचार मृगयां वने॥ २<br><br>युतः कतिपयामात्यैर्दर्शितश्चारुकुण्डलः।<br>धनुराजगवं बद्ध्वा बाणसङ्गं तथाद्भुतम्॥ ३<br><br>स भ्रमंस्तद्गनोद्देशे हन्यमानो रुरून्मृगान्।<br>शशांश्च सूकरांश्चैव खड्गांश्च गवयांस्तथा॥ ४<br><br>शरभान्महिषांश्चैव साम्भ्रान्वनकुक्कुटान्।<br>निघ्नन्मेध्यान् पशून् राजा कुमारवनमाविशत्॥ ५सुद्युम्न नामक एक राजा थे। वे बड़े ही सत्यवादी और जितेन्द्रिय थे। एक बार वे सैन्धव घोड़ेपर आरूढ़ होकर आखेटके लिये वनमें गये। उनके साथ कुछ मन्त्री भी थे। वे राजा कानोंमें कमनीय कुण्डल पहने थे। आजगव नामक धनुष तथा बाणोंसे भरा अद्भुत तरकस धारण करके उस वनमें भ्रमण करते हुए रुरुमृग, हिरण, खरगोश, सूअर, गैंडों, गवय, साँभर, भैंसों, वन-मुर्गोंको मारते हुए तथा यज्ञोपयोगी अनेक वनपशुओंका वध करते हुए राजा सुद्युम्न 'कुमार' नामक वनमें प्रविष्ट हुए॥ २-५॥
मेरोरधस्तले दिव्यं मन्दारद्रुमराजितम्।<br>अशोककलिकाकीर्णं बकुलैरधिवासितम्॥ ६<br><br>सालैस्तालैस्तमालैश्च चम्पकैः पनसैस्तथा।<br>आम्रैर्नीपैर्र्मधूकैश्च माधवीमण्डपावृतम्॥ ७वह दिव्य वन सुमेरु पर्वतके निचले भागमें था, जो सुन्दर मन्दार-वृक्षोंसे सुशोभित था, वहाँ अशोक वृक्षकी लताएँ फैली हुई थीं तथा मौलसिरीकी सुगन्धि उसे सुरभित कर रही थी। वह वन साल, ताड़, तमाल, चम्पा, कटहल, आम, कदम्ब और महुएके पेड़ोंसे सुशोभित था तथा जहाँ-तहाँ माधवी लता मण्डपके समान छायी हुई थी॥ ६-७॥
दाडिमैर्नारिकेलैश्च कदलीखण्डमण्डितम्।<br>यूथिकामालतकुन्दपुष्पवल्लीसमावृतम् ॥ ८उस वनमें दाडिम, नारियल तथा केलेके वृक्ष भी शोभित हो रहे थे और वह वन जूही, मालती तथा कुन्दकी पुष्पित लताओंसे चारों ओरसे घिरा हुआ था। वहाँ हंस और बतख विचरण कर रहे थे, बाँस [एक
अ० १२]प्रथम स्कन्ध१२९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हंसकारण्डवाकीर्णं कीचकध्वनिनादितम्।<br>भ्रमरालिरुतारामं वनं सर्वसुखावहम्॥ ९दूसरेसे रगड़ खानेके कारण हवामें मधुर] ध्वनि कर रहे थे तथा कहीं भ्रमरोंकी मधुर गुंजार वन-प्रान्तको गुंजित कर रही थी। इस प्रकार वह वन सब प्रकारसे सुखदायक था॥ ८-९॥
दृष्ट्वा प्रमुदितो राजा सुद्युम्नः सेवकैर्वृतः।<br>वृक्षान्सुपुष्पितान्वीक्ष्य कोकिलारावमण्डितान्॥ १०कोयलोंकी ध्वनिसे मण्डित तथा पुष्पोंसे युक्त वृक्षोंको देखकर अनुचरोंके साथ राजा सुद्युम्न अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ १०॥
प्रविष्टस्तत्र राजर्षिः स्त्रीत्वमाप क्षणात्ततः।<br>अश्वोऽपि वडवा जातश्चिन्ताविष्टः स भूपतिः॥ ११<br><br>किमेतदिति चिन्तार्तश्चिन्त्यमानः पुनः पुनः।<br>दुःखं बहुतरं प्राप्तः सुद्युम्नो लज्जयान्वितः॥ १२<br><br>किं करोमि कथं यामि गृहं स्त्रीभावसंयुतः।<br>कथं राज्यं करिष्यामि केन वा वञ्चितो ह्यहम्॥ १३राजर्षि सुद्युम्नने वहाँ प्रवेश किया और उसी क्षण वे स्त्रीके रूपमें परिणत हो गये; उनका घोड़ा भी घोड़ीके रूपमें हो गया। इससे वे राजा चिन्तामें पड़ गये। [वे मनमें सोचने लगे] यह क्या हो गया? चिन्तासे व्याकुल वे राजा सुद्युम्न बार-बार सोचते हुए बहुत दुःखी तथा लज्जित हुए। [उन्होंने सोचा] अब मैं क्या करूँ और स्त्रीत्व भावसे युक्त मैं घर कैसे जाऊँ? मैं अब कैसे राज्य-संचालन करूँगा? मैं इस प्रकार किससे ठगा गया?॥ ११-१३॥
ऋषय ऊचुः<br>सूताश्चर्यमिदं प्रोक्तं त्वया यल्लोमहर्षण।<br>सुद्युम्नः स्त्रीत्वमापन्नो भूपतिर्देवसन्निभः॥ १४<br><br>किं तत्कारणमाचक्ष्व वने तत्र मनोहरे।<br>किं कृतं तेन राज्ञा च विस्तरं वद सुव्रत॥ १५ऋषिगण बोले— हे लोमहर्षण सूतजी! आपने यह बड़ी आश्चर्यजनक बात कही है। देवताके समान तेजस्वी राजा सुद्युम्न स्त्रीत्वको प्राप्त हो गये—इसका क्या कारण है? उसे बताइये। उस रमणीय वनमें राजाने कौन-सा कार्य किया था? हे सुव्रत! आप विस्तारपूर्वक हमें बताइये॥ १४-१५॥
सूत उवाच<br>एकदा गिरिशं द्रष्टुमृषयः सनकादयः।<br>दिशो वितिमिराभासाः कुर्वन्तः समुपागमन्॥ १६सूतजी बोले— एक समयकी बात है—सनकादिक ऋषिगण अपने तेजसे दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए शंकरजीके दर्शनके लिये वहाँ गये थे॥ १६॥
तस्मिंश्च समये तत्र शङ्करः प्रमदायुतः।<br>क्रीडासक्तो महादेवो विवस्त्रा कामिनी शिवा॥ १७<br><br>उत्सङ्गे संस्थिता भर्तू रममाणा मनोरमा।<br>तान्विलोक्यम्बिका देवी विवस्त्रा व्रीडिता भृशम्॥ १८<br><br>भर्तुरङ्गात्समुत्थाय वस्त्रमादाय पर्यधात्।<br>लज्जाविष्टा स्थिता तत्र वेपमानातिमानिनी॥ १९उस समय महादेव शिव पार्वतीके साथ विहार कर रहे थे, इसी बीच उन सनकादिक ऋषियोंको वहाँ देखकर पार्वती अत्यन्त लज्जित हो गयीं। वे अतिमानिनी पार्वती काँपती हुई लज्जित होकर अलग खड़ी हो गयीं॥ १७-१९॥
ऋषयोऽपि तयोर्वीक्ष्य प्रसङ्गं रममाणयोः।<br>परिवृत्य ययुस्तूर्णं नरनारायणाश्रमम्॥ २०सनकादिक मुनि भी शिव एवं पार्वतीको विहार करते देखकर वहाँसे तत्काल लौटकर नर-नारायणके आश्रममें चले गये॥ २०॥
ह्रीयुतां कामिनीं वीक्ष्य प्रोवाच भगवान्हरः।<br>कथं लज्जातुरासि त्वं सुखं ते प्रकरोम्यहम्॥ २१<br><br>अद्यप्रभृति यो मोहात्पुमान्कोऽपि वरानने।<br>वनं च प्रविशेदतत्सं वै योषिद्भविष्यति॥ २२भगवान् शिव अपनी प्रिय पत्नीको लज्जित देखकर कहने लगे—तुम इस प्रकार लज्जित क्यों हो रही हो? तुम्हारे सुख का उपाय मैं अभी करता हूँ। हे वरानने! आजसे जो कोई भी पुरुष इस वनमें भूलसे भी आयेगा, वह स्त्री हो जायगा॥ २१-२२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—5 A

| १३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ | | :--- | :--- |

| इति शप्तं वनं तेन ये जानन्ति जनाः क्वचित्।<br>वर्जयन्तीह ते कामं वनं दोषसमृद्धिमत्॥ २३ | उन शिवजीने वनको ऐसा शाप दे दिया है—इसे जो लोग जानते हैं, वे उस दोषपूर्ण वनका पूर्णतः परित्याग कर देते हैं॥ २३॥ | | सुद्युम्नस्तु तदज्ञानात्प्रविष्टः सचिवैः सह।<br>तथैव स्त्रीत्वमापन्नस्तैः सहेति न संशयः॥ २४ | वे सुद्युम्न भी अज्ञानवश सचिवोंके साथ उस वनमें चले गये, जिससे वे अपने सचिव आदि सहित स्त्री हो गये; इसमें शंकाका कोई कारण नहीं है॥ २४॥ | | चिन्ताविष्टः स राजर्षिर्न जगाम गृहं हिया।<br>विचचार बहिस्तस्माद्देशादितस्ततः॥ २५ | चिन्ताकुल होनेके कारण राजा सुद्युम्न लज्जावश घर नहीं गये और उस वनप्रदेशसे बाहर इधर-उधर घूमने लगे॥ २५॥ | | इलेति नाम सम्प्राप्तं स्त्रीत्वे तेन महात्मना।<br>विचरंस्तत्र सम्प्राप्तो बुधः सोमसुतो युवा॥ २६ | स्त्रीत्व प्राप्त होनेपर उन महात्माका नाम इला पड़ गया। इस प्रकार स्त्रीरूपमें घूमते हुए एक दिन चन्द्रमाके युवा पुत्र बुधसे उनकी भेंट हो गयी॥ २६॥ | | स्त्रीभिः परिवृतां तां तु दृष्ट्वा कान्तां मनोरमाम्।<br>हावभावकलायुक्तां चकमे भगवान्बुधः॥ २७<br><br>सापि तं चकमे कान्तं बुधं सोमसुतं पतिम्।<br>संयोगस्तत्र सञ्जातस्तयोः प्रेम्णा परस्परम्॥ २८ | अनेक स्त्रियोंके साथ भ्रमण करती हुई उस हाव-भावमयी युवती रमणीको देखकर चन्द्रमाके पुत्र भगवान् बुध उसपर मोहित हो गये। वह रमणी भी उन चन्द्रपुत्र बुधको अपना पति बनानेके लिये आकुल हो उठी। इस प्रकार परस्पर अनुरागके कारण कुछ दिनोंमें उन दोनोंका संयोग हो गया॥ २७-२८॥ | | स तस्यां जनयामास पुरूरवसमात्मजम्।<br>इलायां सोमपुत्रस्तु चक्रवर्तिनमुत्तमम्॥ २९<br><br>सा प्रासूत सुतं बाला चिन्ताविष्टा वने स्थिता।<br>सस्मार स्वकुलाचार्यं वसिष्ठं मुनिसत्तमम्॥ ३० | उस चन्द्रमापुत्र बुधने इलाके गर्भसे पुरूरवा नामक श्रेष्ठ चक्रवर्ती पुत्रको उत्पन्न किया। पुत्रको जन्म देकर वह इला वनमें ही रहने लगी तथा चिन्तातुर हो उसने अपने कुलाचार्य मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीका स्मरण किया॥ २९-३०॥ | | स तदास्य दशां दृष्ट्वा सुद्युम्नस्य कृपान्वितः।<br>अतोषयन्महादेवं शङ्करं लोकशङ्करम्॥ ३१ | [इलाके स्मरण करते ही वसिष्ठजी वहाँ आये।] सुद्युम्नकी यह दशा देखकर उन्हें बड़ी दया आयी। तब उन्होंने समस्त लोकका कल्याण करनेवाले महादेव शिवको प्रसन्न किया॥ ३१॥ | | तस्मै स भगवांस्तुष्टः प्रददौ वाञ्छितं वरम्।<br>वसिष्ठः प्रार्थयामास पुंस्त्वं राज्ञः प्रियस्य च॥ ३२ | वसिष्ठजीपर प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने उन्हें मनोभिलषित वर प्रदान किया। वसिष्ठजीने प्रिय राजा सुद्युम्नके पुनः पुरुष होनेके लिये प्रार्थना की॥ ३२॥ | | शङ्करस्तु निजां वाचमृतां कुर्वन्नुवाच ह।<br>मासं पुमांस्तु भविता मासं स्त्री भूपतिः किल॥ ३३ | शिवजीने अपना वचन सत्य करते हुए कहा—'हे ऋषे! आजसे राजा सुद्युम्न एक मास पुरुष और एक मास स्त्री बने रहेंगे'॥ ३३॥ | | इत्थं प्राप्य वरं राजा जगाम स्वगृहं पुनः।<br>चक्रे राज्यं स धर्मात्मा वसिष्ठस्याप्यनुग्रहात्॥ ३४ | इस प्रकार वरदान पाकर राजा सुद्युम्न पुनः अपने घर आ गये और वे धर्मात्मा वहाँ वसिष्ठजीकी कृपासे राज्य करने लगे॥ ३४॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—5 B

अ० १२ ] प्रथम स्कन्ध [ १३१

अ० १२ ] प्रथम स्कन्ध [ १३१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्त्रीत्वे तिष्ठति हर्म्येषु पुंस्त्वे राज्यं प्रशास्ति च।<br>प्रजास्तस्मिन्समुद्विग्ना नाभ्यनन्दन्महीपतिम्॥ ३५वे जब स्त्रीके रूपमें रहते थे, तब अन्तःपुरमें रहते थे और जब पुरुषरूपमें रहते थे, तब राज्य करते थे। परंतु इस कारण उनकी प्रजा उनसे उद्विग्न होकर राजाके रूपमें उनका अभिनन्दन नहीं करती थी॥ ३५॥
काले तु यौवनं प्राप्तः पुत्रः पुरूरवास्तदा।<br>प्रतिष्ठां नृपतिस्तस्मै दत्त्वा राज्यं वनं ययौ॥ ३६कुछ समयके बाद जब राजकुमार पुरूरवा युवक हो गया तब महाराज सुद्युम्न उसे प्रतिष्ठानपुरका राज्य सौंपकर वनमें चले गये॥ ३६॥
गत्वा तस्मिन्वने रम्ये नानाद्रुमसमाकुले।<br>नारदान्मन्त्रमासाद्य नवाक्षरमनुत्तमम्॥ ३७<br><br>जजाप मन्त्रमत्यर्थं प्रेमपूरितमानसः।<br>परितुष्टा तदा देवी सगुणा तारिणी शिवा॥ ३८<br><br>सिंहारूढा स्थिता चाग्रे दिव्यररूपा मनोरमा।<br>वारुणीपानसम्मत्ता मदाघूर्णितलोचना॥ ३९अनेक प्रकारके वृक्षोंसे सुन्दर लगनेवाले उस वनमें रहते हुए राजा सुद्युम्ने देवर्षि नारदजीसे सर्वोत्तम नवाक्षर (नवार्ण) मन्त्रकी दीक्षा ली और अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिके साथ मन लगाकर वे उस मन्त्रका जप करने लगे। तदनन्तर भक्तोंका उद्धार करनेवाली जगज्जननी भगवती शिवाने सगुणरूप धारण करके उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उस समय मनोरम तथा दिव्य स्वरूपवाली भगवती सिंहपर सवार होकर उनके समक्ष खड़ी हो गयीं। उनके नेत्र मदसे परिपूर्ण थे॥ ३७–३९॥
दृष्ट्वा तां दिव्यरूप्रां च प्रेमाकुलितलोचनः।<br>प्रणम्य शिरसा प्रीत्या तुष्टाव जगदम्बिकाम्॥ ४०ऐसी दिव्य रूपधारिणी श्रीदुर्गादेवीको अपने सामने देखकर स्नेहभरे नेत्रोंवाले (इलारूपी) राजा सुद्युम्न प्रेमपूर्वक सिर नवाकर उनकी स्तुति करने लगे॥ ४०॥
इलोवाच<br>दिव्यं च ते भगवति प्रथितं स्वरूपं<br>दृष्टं मया सकललोकहितानुरूपम्।<br>वन्दे त्वदंघ्रिकमलं सुरसङ्घसेव्यं<br>कामप्रदं जननि चापि विमुक्तिदं च॥ ४१**इलाने कहा—**हे भगवति! आपका जगत्-प्रसिद्ध वह दिव्य रूप, जो संसारके लिये कल्याणकारी है—मैंने देखा। हे जननि! सुरसमूहसे सेवित आपके भुक्ति-मुक्तिप्रदायक चरणकमलकी मैं वन्दना कर रही हूँ॥ ४१॥
को वेत्ति तेऽम्ब भुवि मर्त्यतनुर्निकामं<br>मुह्यन्ति यत्र मुनयश्च सुराश्च सर्वे।<br>ऐश्वर्यमेतदखिलं कृपणे दयां च<br>दृष्ट्वैव देवि सकलं किल विस्मयो मे॥ ४२हे अम्ब! इस संसारमें कौन मनुष्य आपको सम्पूर्ण रूपसे जान सकता है? जबकि मुनि एवं देवगण भी उसे देखकर विमोहित रहते हैं। हे देवि! आपके सम्पूर्ण ऐश्वर्य तथा मुझ-जैसी अकिंचनपर दया—यह सब देखकर मुझे आश्चर्य हो रहा है॥ ४२॥
शम्भुर्हरिः कमलजो मघवा रविश्च<br>वित्तेशवह्निवरुणाः पवनश्च सोमः।<br>जानन्ति नैव वसवोऽपि हि ते प्रभावं<br>बुध्येत्कथं तव गुणानगुणो मनुष्यः॥ ४३हे माता! जब शिव, विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य, कुबेर, अग्नि, वरुण, वायु, चन्द्रमा और अष्टवसु भी आपके प्रभावको नहीं जानते हैं, तब भला गुणरहित मनुष्य आपके गुणोंको कैसे जान सकता है?॥ ४३॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—5 C

| १३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ | | :--- | :--- |

| जानाति विष्णुरमितद्युतिरम्ब साक्षा-<br>त्त्वां सात्त्विकीमुदधिजां सकलार्थदां च।<br>को राजसीं हर उमां किल तामसीं त्वां<br>वेदाम्बिके न तु पुनः खलु निर्गुणां त्वाम्॥ ४४ | हे अम्ब ! यद्यपि परम तेजस्वी भगवान् विष्णु आपको समुद्रसे उत्पन्न, सब प्रकारके मनोरथोंको सिद्ध करनेवाली साक्षात् सात्त्विकी शक्तिस्वरूपा लक्ष्मीके रूपमें समझते हैं, ब्रह्मा भी आपको राजसी शक्तिस्वरूपा सरस्वती तथा शिवजी आपको तामसी शक्तिस्वरूपा महाकालीके रूपमें जानते हैं, तथापि हे अम्बिके! वे भी आपकी निर्गुणात्मिका दिव्य शक्तिको भलीभाँति नहीं जानते॥ ४४॥ | | क्वाहं सुमन्दमतिरप्रतिमप्रभावः<br>क्वायं तवातिनिपुणो मयि सुप्रसादः।<br>जाने भवानि चरितं करुणासमेतं<br>यत्सेवकांश्च दयसे त्वयि भावयुक्तान्॥ ४५ | हे भवानि! कहाँ तो अत्यन्त मन्दबुद्धि मैं और कहाँ मुझपर अमित महिमाशाली तथा अमोघ प्रभाववाला आपका अनुग्रह! मैं आपके कारुणिक चरित्रको जानती हूँ जो कि आप भक्तिभावयुक्त सेवकोंपर सर्वदा दया करती हैं॥ ४५॥ | | वृत्तस्त्वया हरिरसौ वनजेशयापि<br>नैवाचरत्यपि मुदं मधुसूदनश्च।<br>पादौ तवादिपुरुषः किल पावकेन<br>कृत्वा करोति च करेण शुभौ पवित्रौ॥ ४६ | यद्यपि कमलवनमें वास करनेवाली कमला होकर आपने भगवान् विष्णुको पतिके रूपमें वरण किया है, तथापि वे मधुसूदन आनन्ददायक व्यवहार नहीं करते। वे आदिपुरुष विष्णु आदिशक्तिस्वरूपा आपके पवित्र हाथोंसे अपना पादसंवाहन कराकर अपने चरणोंको शुभ तथा पवित्र करते हैं॥ ४६॥ | | वाञ्छत्यहो हरिरशोक इवातिकामं<br>पादाहतिं प्रमुदितः पुरुषः पुराणः।<br>तां त्वं करोषि रुषिता प्रणतं च पादे<br>दृष्ट्वा पतिं सकलदेवनुतं स्मरार्तम्॥ ४७ | वे पुराणपुरुष भगवान् विष्णु भी प्रसन्न होकर आपके चरणोंका आघात वैसे ही चाहते हैं, जैसे अशोकवृक्ष अपनी वृद्धिके लिये चाहता है॥ ४७॥ | | वक्षःस्थले वससि देवि सदैव तस्य<br>पर्यङ्कवत्सुचरिते विपुलेऽतिशान्ते।<br>सौदामिनीव सुघने सुविभूषिते च<br>किं ते न वाहनमसौ जगदीश्वरोऽपि॥ ४८ | हे सुन्दर चरित्रवाली देवि! आप विष्णुके विशाल, शान्त एवं भूषणोंसे विभूषित वक्षःस्थलरूपी शय्यापर सर्वदा निवास करती हैं। उस समय ऐसा जान पड़ता है, मानो सुन्दर श्याम मेघमें बिजली चमक रही हो, तब वे जगदीश्वर होते हुए भी क्या आपके वाहन नहीं बन जाते?॥ ४८॥ | | त्वं चेज्जहासि मधुसूदनमम्ब कोपा-<br>न्नैवार्चितोऽपि स भवेत्किल शक्तिहीनः।<br>प्रत्यक्षमेव पुरुषं स्वजनास्त्यजन्ति<br>शान्तं श्रियोज्झितमतीव गुणैर्वियुक्तम्॥ ४९ | हे अम्ब! यदि क्रोधित होकर आप उनको त्याग दें तो वे भगवान् विष्णु अपूजित और शक्तिहीन होकर कुछ नहीं कर पायेंगे; क्योंकि लोकमें भी देखा जाता है कि श्रीहीन, गुणरहित एवं उदासीन पुरुषको उनके कुटुम्बीजन भी त्याग देते हैं॥ ४९॥ | | ब्रह्मादयः सुरगणा न तु किं युवतयो<br>ये त्वत्पदाम्बुजमहर्निशमाश्रयन्ति।<br>मन्ये त्वयैव विहिताः खलु ते पुमांसः<br>किं वर्णयामि तव शक्तिमनन्तवीर्ये॥ ५० | क्या ब्रह्मादि देवगण भी किसी समय युवतीरूपमें नहीं थे, जो दिन-रात आपके चरणकमलोंका ही आश्रय रखते हैं। मैं तो मानती हूँ कि आपने ही उन्हें पुंस्त्व प्रदान किया था। अतः हे अनन्त पराक्रमशालिनि! मैं आपकी शक्तिका क्या वर्णन कर सकती हूँ?॥ ५०॥ |


1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—5 D

अ० १३ ] प्रथम स्कन्ध १३३

अ० १३ ] प्रथम स्कन्ध १३३


त्वं नापुमान्न च पुमानिति मे विकल्पो<br>या कासि देवि सगुणा ननु निर्गुणा वा।<br>तां त्वां नमामि सततं किल भावयुक्तो<br>वाञ्छामि भक्तिमचलां त्वयि मातरं तु॥ ५१‘आप न तो स्त्री हैं, न पुरुष; न निर्गुण हैं न सगुण’—ऐसी मेरी धारणा है। अतः आप जैसी भी हों—उन आपको मैं भक्तिपूर्वक बार-बार प्रणाम करती हूँ। आप मातासे मैं यही प्रार्थना करती हूँ कि आपमें मेरी अचल भक्ति बनी रहे॥ ५१॥
सूत उवाच<br>इति स्तुत्वा महीपालो जगाम शरणं तदा।<br>परितुष्टा ददौ देवी तत्र सायुज्यमात्मनि॥ ५२<br>सुद्युम्नस्तु ततः प्राप पदं परमकं स्थिरम्।<br>तस्या देव्याः प्रसादेन मुनीनामपि दुर्लभम्॥ ५३सूतजी बोले— इस प्रकार स्तुति करके राजा सुद्युम्न उनके शरणागत हुए और भगवतीने भी अत्यन्त सन्तुष्ट होकर उन्हें अपनी सायुज्य मुक्ति प्रदान की। तब उन देवीकी कृपासे सुद्युम्नने मुनियोंके लिये भी अति दुर्लभ शाश्वत परमपद प्राप्त किया॥ ५२-५३॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
सुद्युम्नस्तुतिर्नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
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अथ त्रयोदशोऽध्यायः

राजा पुरूरवा और उर्वशीकी कथा

सूत उवाच<br>सुद्युम्ने तु दिवं याते राज्यं चक्रे पुरूरवाः।<br>सगुणश्च सुरूपश्च प्रजारञ्जनतत्परः॥ १<br>प्रतिष्ठाने पुरे रम्ये राज्यं सर्वनमस्कृतम्।<br>चकार सर्वधर्मज्ञः प्रजारक्षणतत्परः॥ २सूतजी बोले— सुद्युम्नके दिवंगत हो जानेपर प्रजारंजनमें तत्पर, गुणी एवं सुन्दर महाराज पुरूरवा राज्य करने लगे। उस रमणीय प्रतिष्ठानपुरमें सर्वधर्मज्ञ तथा प्रजाकी रक्षामें तत्पर राजा पुरूरवाने सभीके द्वारा आदरणीय राज्य किया॥ १-२॥
मन्त्रः सुगुप्तस्तस्यासीत्परत्राभिज्ञता तथा।<br>सदैवोत्साहशक्तिश्च प्रभुशक्तिस्तथोत्तमा॥ ३<br>सामदानादयः सर्वे वशगास्तस्य भूपतेः।<br>वर्णाश्रमान्स्वधर्मस्थान्कुर्वन् राज्यं शशास ह॥ ४<br>यज्ञांश्च विविधांश्चक्रे स राजा बहुदक्षिणान्।<br>दानानि च पवित्राणि ददावथ नराधिपः॥ ५उनकी राज्य-मन्त्रणा अच्छी तरहसे गुप्त रहती थी और उन्हें दूसरे राज्योंकी मन्त्रणाओंका भलीभाँति ज्ञान रहता था। उनमें सर्वदा उत्साहशक्ति एवं उत्तम प्रभुशक्ति विद्यमान थी। साम, दान, दण्ड और भेद—ये चारों नीतियाँ उन राजाके वशीभूत थीं। वे चारों वर्णों तथा आश्रमोंके लोगोंसे अपने-अपने धर्मोंका आचरण कराते हुए राज्यका शासन-कार्य करते थे। वे राजा पुरूरवा विपुल दक्षिणावाले विविध यज्ञ करते थे और पवित्र दान किया करते थे॥ ३-५॥
तस्य रूपगुणौदार्यशीलद्रविणविक्रमान्।<br>श्रुत्वोर्वशी वशीभूता चकमे तं नराधिपम्॥ ६<br>ब्रह्मशापाभितप्ता सा मानुषं लोकमास्थिता।<br>गुणिनं तं नृपं मत्वा वरयामास मानिनी॥ ७राजा पुरूरवाके रूप, गुण, उदारता, शील, ऐश्वर्य एवं वीरताकी प्रशंसा सुनकर उर्वशी उनके वशीभूत हो गयी; उन दिनों वह भी ब्रह्माके शापसे पृथ्वीपर मनुष्य-योनिमें आयी थी। अतः उस मानिनीने उन राजाको गुणी जानकर उन्हें पतिके रूपमें स्वीकार कर लिया॥ ६-७॥
१३४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३
संस्कृतहिन्दी टीका
समयं चेदृशं कृत्वा स्थिता तत्र वराङ्गना ।<br>एतावुरणकौ राजन्न्यस्तौ रक्षस्व मानद ॥ ८<br><br>घृतं मे भक्षणं नित्यं नान्यत्किञ्चिन्नृपाशनम् ।<br>नेक्षे त्वां च महाराज नग्नमन्यत्र मैथुनात् ॥ ९<br><br>भाषाबन्धस्त्वयं राजन् यदि भग्नो भविष्यति ।<br>तदा त्यक्त्वा गमिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ १०वह वरांगना इस प्रकारकी शर्त रखकर वहीं रहने लगी। [उसने कहा]—हे राजन्! ये दोनों भेड़के बच्चे मैं आपके पास धरोहरके रूपमें रखती हूँ। हे मानद! आप इनकी रक्षा करें। हे नृप! [दूसरी शर्त है कि] मैं केवल घी ही खाऊँगी और कुछ नहीं और हे महाराज! [तीसरी शर्त है कि] सहवासके अतिरिक्त किसी दूसरे समयमें मैं आपको कभी वस्त्रविहीन अवस्थामें न देखूँ। हे राजन्! यदि आप इन कही गयी शर्तोंको भंग करेंगे तो मैं उसी समय आपको छोड़कर चली जाऊँगी, यह मैं सत्य कह रही हूँ ॥ ८–१० ॥
अङ्गीकृतं च तद्राज्ञा कामिन्या भाषितं तु यत् ।<br>स्थिता भाषणबन्धेन शापानुग्रहकाम्यया ॥ ११इस प्रकार उस कामिनी उर्वशीने जो कहा था, उसे राजाने स्वीकार कर लिया और उर्वशी शापसे उद्धार पानेकी इच्छासे राजा पुरूरवाको प्रतिज्ञाबद्ध करके वहीं रहने लगी ॥ ११ ॥
रेमे तदा स भूपालो लीनो वर्षगणान्बहून् ।<br>धर्मकर्मादिकं त्यक्त्वा चोर्वश्या मदमोहितः ॥ १२<br><br>एकचित्तस्तु सञ्जातस्तन्मनस्को महीपतिः ।<br>न शशाक तया हीनः क्षणमप्यतिमोहितः ॥ १३उर्वशीके द्वारा मुग्ध किये गये राजा सब धर्म-कर्म त्यागकर अनेक वर्षोंतक भोग-विलासमें पड़े रहे। उसपर आसक्त मनवाले वे सदा उसीका चिन्तन करते रहते थे और उसपर अत्यधिक मोहित होनेके कारण एक क्षण भी उस उर्वशीके बिना नहीं रह सकते थे ॥ १२–१३ ॥
एवं वर्षगणान्ते तु स्वर्गस्थः पाकशासनः ।<br>उर्वशीं नागतां दृष्ट्वा गन्धर्वानाह देवराट् ॥ १४<br><br>उर्वशीमानयध्वं भो गन्धर्वाः सर्व एव हि ।<br>हृत्वोरणौ गृहात्तस्य भूपतेः समये किल ॥ १५<br><br>उर्वशीरहितं स्थानं मदीयं नातिशोभते ।<br>येन केनाप्युपायेन तामानयत कामिनीम् ॥ १६इस प्रकार जब बहुत वर्ष बीत गये, तब देवलोकमें इन्द्रने अपनी सभामें उर्वशीको अनुपस्थित देखकर गन्धर्वोंसे पूछकर कहा—हे गन्धर्वगण! तुम सब लोग वहाँ जाओ और प्रतिज्ञाबद्ध राजाके घरसे भेड़ोंको चुराकर उर्वशीको ले आओ; क्योंकि उर्वशीके बिना मुझे यह स्थान अच्छा नहीं लगता। अतः जिस किसी भी उपायसे उस कामिनीको तुमलोग लाओ ॥ १४–१६ ॥
इत्युक्तास्तेऽथ गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः ।<br>ततो गत्वा महागाढे तमसि प्रत्युपस्थिते ॥ १७<br><br>जहुस्तावुरणौ देवा रममाणं विलोक्य तम् ।<br>चक्रन्दतुस्तदा तौ तु ह्रियमाणौ विहायसा ॥ १८तब इन्द्रके ऐसा कहनेपर विश्वावसु आदि प्रधान गन्धर्वोंने वहाँसे जाकर रात्रिके घोर अन्धकारमें राजा पुरूरवाको विहार करते देख उन दोनों भेड़ोंको चुरा लिया। तब आकाशमार्गमें जाते हुए चुराये गये वे दोनों भेड़ जोरसे चिल्लाने लगे ॥ १७–१८ ॥
उर्वशी तदुपाकर्ण्य क्रन्दितं सुतयोरिव ।<br>कुपितोवाच राजानं समयोऽयं कृतो मया ॥ १९अपने पुत्रके समान पाले हुए भेड़ोंका क्रन्दन सुनते ही उर्वशीने क्रोधित होकर राजा पुरूरवासे कहा—हे राजन्! मैंने आपके सम्मुख जो पहली शर्त

| अ० १३ ] | प्रथम स्कन्ध | १३५ | | :--- | :--- | | नष्टाहं तव विश्वासाद्धतौ चोरैर्ममोरणौ।<br>राजन्यपुत्रसमावेतौ त्वं किं शेषे स्त्रिया समः॥ २० | रखी थी, वह टूट गयी। आपके विश्वासपर मैं धोखेमें पड़ी; क्योंकि पुत्रके समान मेरे प्रिय भेड़ोंको चोरोंने चुरा लिया फिर भी आप घरमें स्त्रीकी तरह शयन कर रहे हैं॥ १९-२०॥ | | हतास्म्यहं कुनाथेन नपुंसा वीरमानिना।<br>उरणौ मे गतौ चाद्य सदा प्राणप्रियौ मम॥ २१ | अपनेको वीर समझनेवाले नपुंसक इस अधम स्वामीके द्वारा मैं नष्ट कर दी गयी। सर्वदा प्राणोंके समान मेरे दोनों भेड़ अब चले गये। उर्वशीको इस प्रकार विलाप करती देख प्रेममें आसक्त राजा पुरूरवा चोरोंके पीछे नग्नावस्थामें ही तुरंत दौड़ पड़े॥ २१-२२॥ | | एवं विलप्यमानां तां दृष्ट्वा राजा विमोहितः।<br>नग्न एव ययौ तूर्णं पृष्ठतः पृथिवीपतिः॥ २२ | | | विद्युत्प्रकाशिता तत्र गन्धर्वैर्नृपवेश्मनि।<br>नग्नभूतस्तया दृष्टो भूपतिर्गन्तुकामया॥ २३ | उसी समय गन्धर्वोंद्वारा वहाँ राजाके भवनमें बिजली चमका दी गयी, जिसके कारण वहाँसे जानेकी इच्छावाली उर्वशीने राजाको नग्न देख लिया॥ २३॥ | | त्यक्त्वोरणौ गताः सर्वे गन्धर्वाः पथि पार्थिवः।<br>नग्नो जग्राह तौ श्रान्तो जगाम स्वगृहं प्रति॥ २४ | गन्धर्व उन दोनों भेड़ोंको वहीं मार्गमें छोड़कर भाग गये। थके एवं नग्न राजा भेड़ोंको लेकर अपने घर चले आये। तब वे उर्वशीको वहाँसे गयी हुई देखकर अत्यन्त दुःखित होकर विलाप करने लगे एवं लज्जित हुए। पतिको नग्न देखकर वह सुन्दरी उर्वशी चली गयी थी॥ २४-२५॥ | | तदोर्वशीं गतां दृष्ट्वा विललापातिदुःखितः।<br>नग्नं वीक्ष्य पतिं नारी गता सा वरवर्णिनी॥ २५ | | | क्रन्दन्स देशदेशेषु बभ्राम नृपतिः स्वयम्।<br>तच्चित्तो विह्वलः शोचन्विवशः काममोहितः॥ २६ | व्याकुल, लाचार, कामसे मोहित तथा एकमात्र उर्वशीमें आसक्त चित्तवाले राजा शोक तथा क्रन्दन करते हुए देश-देशमें भ्रमण करने लगे॥ २६॥ | | भ्रमन्वै सकलां पृथ्वीं कुरुक्षेत्रे ददर्श ताम्।<br>दृष्ट्वा संहृष्टवदनः प्राह सूक्तं नृपोत्तमः॥ २७ | इस प्रकार समस्त भूमण्डलपर भ्रमण करते हुए उन्होंने उर्वशीको कुरुक्षेत्रमें देखा। उसे देखते ही प्रसन्न मुखवाले नृपश्रेष्ठ राजा पुरूरवाने मधुर वाणीमें कहा— हे प्रिये! ठहरो-ठहरो। हे कठोरहृदये! मैं अब भी तुमपर आसक्त हूँ, मैं तुम्हारे वशमें हूँ; अतः मुझ निरपराधी पतिको तुम मत छोड़ो॥ २७-२८॥ | | अये जाये तिष्ठ तिष्ठ घोरे न त्यक्तुमर्हसि।<br>मां त्वं तन्मनसं कान्तं वशगं चाप्यनागसम्॥ २८ | | | स देहोऽयं पतत्यत्र देवि दूरं हृतस्त्वया।<br>खादन्त्येनं वृकाः काकास्त्वया त्यक्तं वरोरु यत्॥ २९ | हे देवि! जिस शरीरसे तुमने इतना प्रेम किया था, जिसे तुमने यहाँतक खींच लिया, वह शरीर आज यहीं गिर जायगा। हे सुन्दरि! तुम्हारे द्वारा त्यक्त इस देहको भेड़िये और कौए खा जायेंगे॥ २९॥ | | एवं विलपमानं तं राजानं प्राह चोर्वशी।<br>दुःखितं कृपणं श्रान्तं कामार्तं विवशं भृशम्॥ ३० | इस प्रकार विलाप करते हुए दुःखित, दीन, थके, कामातुर और अत्यन्त लाचार राजा पुरूरवासे उर्वशी कहने लगी॥ ३०॥ |

१३६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १४

| उर्वश्युवाच | उर्वशी बोली—हे राजेन्द्र! आप मूर्ख हैं। आपका ज्ञान कहाँ चला गया? हे पृथ्विपते! भेड़ियोंके समान स्त्रियोंकी किसीसे मित्रता नहीं होती। अतः राजाओंको चाहिये कि वे स्त्रियों और चोरोंपर कभी भी विश्वास न करें। अब आप अपने घर जाइये, सुख भोगिये और मनमें किसी प्रकारकी चिन्ता मत कीजिये॥ ३१-३२॥ | | मूर्खोऽसि नृपशार्दूल ज्ञानं कुत्र गतं तव।<br>क्वापि सख्यं न च स्त्रीणां वृकाणामिव पार्थिव॥ ३१<br><br>न विश्वासो हि कर्तव्यः स्त्रीषु चौरेषु पार्थिवैः।<br>गृहं गच्छ सुखं भुंक्ष्व मा विषादे मनः कृथाः॥ ३२ | | | इत्येवं बोधितो राजा न विवेदातिमोहितः।<br>दुःखं च परमं प्राप्तः स्वैरिणीस्नेहयन्त्रितः॥ ३३ | इस प्रकार अत्यन्त विषयासक्त होनेके कारण उर्वशीके समझानेपर भी राजाको ज्ञान नहीं हुआ। उस स्वेच्छाचारिणी अप्सराके स्नेहमें जकड़े रहनेके कारण उन्हें अपार दुःख प्राप्त हुआ॥ ३३॥ | | सूत उवाच<br>इति सर्वं समाख्यातमूर्वशीचरितं महत्।<br>वेदे विस्तरितं चैतत्संक्षेपात्कथितं मया॥ ३४ | सूतजी बोले—[हे मुनिजन!] इस प्रकार मैंने उर्वशीके महान् चरित्रका वर्णन आपलोगोंसे संक्षेपमें कर दिया, जो वेदमें विस्तारपूर्वक वर्णित है॥ ३४॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे पुरूरवस उर्वश्याश्च चरित्रवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥


अथ चतुर्दशोऽध्यायः

व्यासपुत्र शुकदेवके अरणिसे उत्पन्न होनेकी कथा तथा व्यासजीद्वारा उनसे गृहस्थधर्मका वर्णन

| सूत उवाच | सूतजी बोले—उस सुन्दरी असितापांगी घृताचीको देखकर व्यासजी बड़े असमंजसमें पड़े और सोचने लगे कि यह देवकन्या अप्सरा मेरे योग्य नहीं है, अतः अब मैं क्या करूँ? वह अप्सरा भी व्यासजीको चिन्तित होता देखकर भयभीत हो गयी कि कहीं ये मुझे शाप न दे दें॥ १-२॥ | | दृष्ट्वा तामसितापाङ्गीं व्यासश्चिन्तापरोऽभवत्।<br>किं करोमि न मे योग्या देवकन्येयमप्सराः॥ १<br><br>एवं चिन्तयमानं तु दृष्ट्वा व्यासं तदाप्सराः।<br>भयभीता हि सञ्जाता शापं मा विसृजेदयम्॥ २ | | | सा कृत्वाथ शुकीरूपं निर्गता भयविह्वला।<br>कृष्णस्तु विस्मयं प्राप्तो विहङ्गीं तां विलोकयन्॥ ३ | तत्पश्चात् भयसे व्याकुल वह अप्सरा एक शुकीका रूप धारण करके उड़ गयी। व्यासजी उसे पक्षीके रूपमें देखकर आश्चर्यमें पड़ गये॥ ३॥ | | कामस्तु देहे व्यासस्य दर्शनादेव सङ्गतः।<br>मनोऽतिविस्मितं जातं सर्वगात्रेषु विस्मितः॥ ४ | उसे देखनेमात्रसे व्यासजीके शरीरमें कामका संचार हो आया और प्रत्यंगमें कामका प्रवेश हो जानेके कारण उनका मन अत्यन्त विस्मयमें पड़ गया॥ ४॥ | | स तु धैर्येण महता निगृह्णन्मानसं मुनिः।<br>न शशाक नियन्तुं च स व्यासः प्रसृतं मनः॥ ५ | बड़ी धीरताके साथ मनको रोकनेकी चेष्टा करते हुए भी उस चंचल मनको वे व्यासमुनि वशमें करनेमें समर्थ नहीं हुए॥ ५॥ |

अ० १४ ]प्रथम स्कन्ध१३७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
बहुशो गृह्यमाणं च घृताच्या मोहितं मनः।<br>भावित्वान्नैव विधृतं व्यासस्यामिततेजसः॥ ६इस प्रकार घृताचीद्वारा मोहित तेजस्वी व्यासजीका मन अनेक यत्न करनेपर भी भावी संयोगके कारण उनके वशमें न हो सका॥ ६॥
मन्थनं कुर्वतस्तस्य मुनेरग्निचिकीर्षया।<br>अरण्यामेव सहसा तस्य शुक्रमथापतत्॥ ७<br><br>सोऽविचिन्त्य तथा पातं ममन्थारणिमेव च।<br>तस्माच्छुकः समुद्भूतो व्यासाकृतिमनोहरः॥ ८इसी बीच अग्नि निकालनेके लिये मन्थन करते समय एकाएक उनका तेज उस अरणीपर गिर गया, किंतु उसके गिरनेपर ध्यान न देकर वे अरणिमन्थन करते रहे। उस अरणीसे उन्हींके सदृश मनोहर स्वरूपवाले 'शुक' उत्पन्न हो गये॥ ७-८॥
विस्मयं जनयन्बालः सञ्जातस्तदरण्यजः।<br>यथाध्वरे समिद्धोऽग्निर्भाति हव्येन दीप्तिमान्॥ ९अरणीसे उत्पन्न वह बालक विस्मय पैदा करते हुए उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था, जिस प्रकार हवन करते समय घृताहुति पड़नेसे प्रकट अग्नि दीप्तिमान् हो उठती है॥ ९॥
व्यासस्तु सुतमालोक्य विस्मयं परमं गतः।<br>किमेतदिति सञ्चिन्त्य वरदानाच्छिवस्य वै॥ १०उस पुत्रको देखकर 'यह क्या !'—ऐसा सोचकर व्यासजी अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये [और विचार करने लगे कि यह] शिवके वरदानसे ही तो उत्पन्न नहीं हुआ है!॥ १०॥
तेजोरूपी शुको जातोऽप्यरणीगर्भसम्भवः।<br>द्वितीयोऽग्निरिवात्यर्थं दीप्यमानः स्वतेजसा॥ ११इस प्रकार अरणीगर्भसे उत्पन्न वह तेजस्वी पुत्र शुक अपने तेजसे दूसरे अग्निके तुल्य देदीप्यमान प्रतीत हो रहा था॥ ११॥
विलोकयामास तदा व्यासस्तु मुदितं सुतम्।<br>दिव्येन तेजसा युक्तं गार्हपत्यमिवापरम्॥ १२<br><br>गङ्गान्तः स्नापयामास समागत्य गिरेस्तदा।<br>पुष्पवृष्टिश्च खाज्जाता शिशोरुपरि तापसाः॥ १३व्यासजीने दिव्य देहधारी द्वितीय गार्हपत्य अग्निके समान तेजस्वी पुत्रको बड़ी प्रसन्नतासे देखा और पर्वतसे नीचे उतरकर गंगाजलसे उसको नहलाया। हे तपस्वियो ! उस समय आकाशसे उस शिशुके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा होने लगी॥ १२-१३॥
जातकर्मादिकं चक्रे व्यासस्तस्य महात्मनः।<br>देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ १४व्यासजीने उस महात्मा शिशुका जातकर्म आदि संस्कार किया। उस समय देवताओंने दुंदुभियाँ बजायीं तथा अप्सराओंने नृत्य किया॥ १४॥
जगुर्गन्धर्वपतयो मुदितास्ते दिदृक्षवः।<br>विश्वावसुर्नारदश्च तुम्बुरुः शुकसम्भवे॥ १५<br><br>तुष्टुवुर्मुदिताः सर्वे देवा विद्याधरास्तथा।<br>दृष्ट्वा व्याससुतं दिव्यमरणीगर्भसम्भवम्॥ १६उस बालकके दर्शनकी लालसावाले विश्वावसु, नारद, तुम्बुरु आदि सभी गन्धर्वराज प्रसन्न होकर शुकके जन्मपर गान करने लगे। सभी देवता तथा विद्याधर भी अरणीके गर्भसे उत्पन्न उस दिव्य व्यासपुत्रको देखकर प्रसन्नतापूर्वक स्तुति करने लगे॥ १५-१६॥
अन्तरिक्षात्पपातोर्व्यां दण्डः कृष्णाजिनं शुभम्।<br>कमण्डलुस्तथा दिव्यः शुकस्यार्थे द्विजोत्तमाः॥ १७हे द्विजोत्तम! उसी समय शुकदेवजीके लिये आकाशसे दिव्य दण्ड, कमण्डलु और शुभ कृष्ण मृगचर्म पृथ्वीपर आ गिरे॥ १७॥
१३८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १४

| सद्यः स ववृधे बालो जातमात्रोऽतिदीप्तिमान्।<br>तस्योपनयनं चक्रे व्यासो विद्याविधानवित्॥ १८ | उत्पन्न होते ही वह अति तेजस्वी शिशु शीघ्रतापूर्वक बड़ा हो गया, तब वैदिक विधानके मर्मज्ञ व्यासजीने उसका उपनयनसंस्कार भी कर दिया॥ १८॥ | | उत्पन्नमात्रं तं वेदाः सरहस्याः ससंग्रहाः।<br>उपतस्थुर्महात्मानं यथास्य पितरं तथा॥ १९ | उत्पन्न होते ही रहस्यों तथा संग्रहोंसहित सभी वेद उन महात्माके समक्ष वैसे ही उपस्थित हो गये, जैसे उसके पिता व्यासजीमें वे विद्यमान थे॥ १९॥ | | यतो दृष्टं शुकीरूपं घृताच्याः सम्भवे तदा।<br>शुकेति नाम पुत्रस्य चकार मुनिसत्तमः॥ २० | अरणि-मन्थनके समय मुनिश्रेष्ठ व्यासजीने घृताची अप्सराको शुकीके रूपमें देखा था, इसलिये उन्होंने इस बालकका नाम शुक रख दिया॥ २०॥ | | बृहस्पतिमुपाध्यायं कृत्वा व्याससुतस्तदा।<br>व्रतानि ब्रह्मचर्यस्य चकार विधिपूर्वकम्॥ २१<br><br>सोऽधीत्य निखिलान्वेदान् सरहस्यान्ससंग्रहान्।<br>धर्मशास्त्राणि सर्वाणि कृत्वा गुरुकुले शुकः॥ २२<br><br>गुरवे दक्षिणां दत्त्वा समावृत्तो मुनिस्तदा।<br>आजगाम पितुः पार्श्वं कृष्णद्वैपायनस्य च॥ २३ | व्याससुत शुकदेवने बृहस्पतिको अपना आचार्य मानकर विधिवत् ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया। गुरुकुलमें निवासकर रहस्यों तथा संग्रहोंसहित सभी वेदों तथा धर्मशास्त्रोंका अध्ययन करके, तदनन्तर गुरुको दक्षिणा देकर वे शुकदेवमुनि अपने पिता व्यासजीके पास आ गये॥ २१–२३॥ | | दृष्ट्वा व्यासः शुकं प्राप्तं प्रेम्णोत्थाय ससम्भ्रमः।<br>आलिङ्गि मुहुर्घ्राणं मूर्ध्नि तस्य चकार ह॥ २४<br><br>पप्रच्छ कुशलं व्यासस्तथा चाध्ययनं शुचिः।<br>आश्वास्य स्थापयामास शुकं तत्राश्रमे शुभे॥ २५ | शुकदेवको आया देखकर व्यासजीने शीघ्रताके साथ प्रसन्नतापूर्वक उठकर बारंबार उनका आलिंगन किया और उनका सिर सूँघा। परम पवित्र व्यासजीने शुकदेवजीके कुशलक्षेम तथा अध्ययनके विषयमें पूछा तथा उन्हें आश्वस्त करके अपने पावन आश्रममें रख लिया॥ २४–२५॥ | | दारकर्म ततो व्यासः शुकस्य पर्यचिन्तयत्।<br>कन्यां मुनिसुतां कान्तामपृच्छदतिवेगवान्॥ २६ | तत्पश्चात् व्यासजी शुकदेवजीके विवाहके विषयमें सोचने लगे। एक दिन परम तेजस्वी व्यासजीने शुकदेवजीसे किसी सुन्दर मुनिकन्याकी चर्चा की॥ २६॥ | | शुकं प्राह सुतं व्यासो वेदोऽधीतस्त्वयानघ।<br>धर्मशास्त्राणि सर्वाणि कुरु भार्यां महामते॥ २७<br><br>गार्हस्थ्यं च समासाद्य यज देवान्पितॄनथ।<br>ऋणान्मोचय मां पुत्र प्राप्य दारान्मनोरमान्॥ २८ | उन्होंने अपने पुत्र शुकदेवसे कहा—हे पवित्रात्मन्! तुमने वेद तथा सभी धर्मशास्त्रोंका अध्ययन कर लिया है। अतः हे महामते! अब तुम विवाह कर लो और गृहस्थ-आश्रममें रहकर देवताओं और पितरोंका यजन करो और हे पुत्र! तुम सुन्दर स्त्रीको स्वीकारकर मुझे भी ऋणसे मुक्त कर दो॥ २७–२८॥ | | अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च।<br>तस्मात्पुत्र महाभाग कुरुष्वाद्य गृहाश्रमम्॥ २९<br><br>कृत्वा गृहाश्रमं पुत्र सुखिनं कुरु मां शुक।<br>आशा मे महती पुत्र पूरयस्व महामते॥ ३० | अपुत्रकी गति नहीं होती और उसे स्वर्ग कदापि नहीं मिलता। इसलिये हे महाभाग पुत्र! अब तुम गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश करो और हे शुक! हे पुत्र! गृहस्थी बसाकर मुझे भी आनन्दित करो। ऐसा करके हे महामते! हे पुत्र! तुम मेरी महान् आशा परिपूर्ण करो॥ २९–३०॥ |

अ० १४ ]प्रथम स्कन्ध१३९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तपस्तप्त्वा महाघोरं प्राप्तोऽसि त्वमयोनिजः।<br>देवरूपी महाप्राज्ञ पाहि मां पितरं शुक॥ ३१हे शुक! कठिन तपस्या करके मैंने तुम्हारे-जैसा अयोनिज पुत्र पाया है। हे महाप्राज्ञ! तुम देवतारूप हो, अतः मुझ पिताकी रक्षा करो॥ ३१॥
सूत उवाच<br>इति वादिनमभ्याशे प्राप्तः प्राह शुकस्तदा।<br>विरक्तः सोऽतिसक्तं तं साक्षात्पितरमात्मनः॥ ३२सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] ऐसा कहनेवाले व्यासजीके पास उपस्थित विरक्त शुकदेवजीने गृहस्थ-आश्रममें अनुरक्त अपने पितासे कहा॥ ३२॥
शुक उवाच<br>किं त्वं वदसि धर्मज्ञ वेदव्यास महामते।<br>तत्त्वेन शाधि शिष्यं मां त्वदाज्ञां करवाण्यलम्॥ ३३**शुकदेवजी बोले—**हे महामते! हे धर्मज्ञ! हे वेदव्यास! आप क्या कह रहे हैं, मुझ शिष्यको आप तत्त्वज्ञानका उपदेश दें; मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा॥ ३३॥
व्यास उवाच<br>त्वदर्थे यत्तपस्तप्तं मया पुत्र शतं समाः।<br>प्राप्तस्त्वं चातिदुःखेन शिवस्याराधनेन च॥ ३४<br><br>ददामि तव वित्तं तु प्रार्थयित्वाथ भूपतिम्।<br>सुखं भुंक्ष्व महाप्राज्ञ प्राप्य यौवनमुत्तमम्॥ ३५**व्यासजी बोले—**हे पुत्र! तुम्हारे लिये मैंने सैकड़ों वर्ष कष्ट सहकर जो तपस्या की और शिवजीकी आराधना की, उसके फलस्वरूप मैंने तुम्हें पाया है। किसी राजासे माँगकर मैं तुम्हें प्रचुर धन दूँगा, हे महाप्राज्ञ! तुम श्रेष्ठ यौवन प्राप्त करके सुखका उपभोग करो॥ ३४-३५॥
शुक उवाच<br>किं सुखं मानुषे लोके ब्रूहि तात निरामयम्।<br>दुःखविद्धं सुखं प्राज्ञा न वदन्ति सुखं किल॥ ३६**शुकदेवजी बोले—**हे तात! आप बतायें कि इस मनुष्यलोकमें भला विपत्तिरहित कौन-सा सुख है? बुद्धिमान् लोग दुःखसे युक्त सुखको सुख नहीं कहते हैं॥ ३६॥
स्त्रियं कृत्वा महाभाग भवामि तद्वशानुगः।<br>सुखं किं परतन्त्रस्य स्त्रीजितस्य विशेषतः॥ ३७हे महाभाग! स्त्री पाकर मैं उसीके वशमें हो जाऊँगा। तब भला आप ही बताइये, परतन्त्र होकर और विशेषतः स्त्रीके वशमें रहकर मैं कौन-सा सुख पा सकूँगा?॥ ३७॥
कदाचिदपि मुच्येत लोहकाष्ठादियन्त्रितः।<br>पुत्रदारैर्निबद्धस्तु न विमुच्येत कर्हिचित्॥ ३८लौह या काष्ठके फन्देमें जकड़ा हुआ पुरुष कदाचित् छूट भी सकता है, किंतु पुत्र-कलत्रके बन्धनमें फँसा हुआ प्राणी कभी भी बन्धनमुक्त नहीं हो पाता॥ ३८॥
विण्मूत्रसम्भवो देहो नारीणां तन्मयस्तथा।<br>कः प्रीतिं तत्र विप्रेन्द्र विबुधः कर्तुमिच्छति॥ ३९यह शरीर विष्ठा एवं मूत्रसे परिपूर्ण रहता है; वैसे ही स्त्रियोंका शरीर भी होता है। हे विप्रेन्द्र! तब कौन बुद्धिमान् पुरुष उससे प्रीति करना चाहेगा!॥ ३९॥
अयोनिजोऽहं विप्रर्षे योनौ मे कीदृशी मतिः।<br>न वाञ्छाम्यहमग्रेऽपि योनावेव समुद्भवम्॥ ४०हे विप्रशिरोमणे! मैं अयोनिज हूँ, तब योनिजन्य सुखमें मेरी बुद्धि कैसे होगी? मैं भविष्यमें भी अपनी उत्पत्ति किसी योनिमें नहीं चाहता॥ ४०॥
विट्सुखं किमु वाञ्छामि त्यक्त्वात्मसुखमद्भुतम्।<br>आत्मारामश्च भूयोऽपि न भवत्यतिलोलुपः॥ ४१अतः अद्भुत अध्यात्म सुखको छोड़कर मैं विट्-मूत्रजन्य सुखको क्यों चाहूँ? अपने-आपमें रमण करनेवाला कभी विषय-सुखका लोभी नहीं होता॥ ४१॥

| १४० | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० १४ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रथमं पठिता वेदा मया विस्तारिताश्च ते।<br>हिंसामयास्ते पठिताः कर्ममार्गप्रवर्तकाः॥ ४२<br><br>बृहस्पतिर्गुरुः प्राप्तः सोऽपि मग्नो गृहार्णवे।<br>अविद्याग्रस्तहृदयः कथं तारयितुं क्षमः॥ ४३मैंने सांगोपांग वेदोंका अध्ययन किया और जाना कि वे हिंसामय हैं तथा कर्ममार्गके प्रवर्तक हैं। मुझे गुरुरूपमें बृहस्पति प्राप्त हुए, वे भी गृहस्थीके सागरमें डूबे हुए हैं। अविद्याग्रस्त हृदयवाले वे मेरा उद्धार कैसे कर सकते हैं?॥ ४२-४३॥
रोगग्रस्तो यथा वैद्यः पररोगचिकित्सकः।<br>तथा गुरुर्मुमुक्षोर्मे गृहस्थोऽयं विडम्बना॥ ४४<br><br>कृत्वा प्रणामं गुरवे त्वत्समीपमुपागतः।<br>त्राहि मां तत्त्वबोधेन भीतं संसारसर्पतः॥ ४५जैसे कोई रोगग्रस्त वैद्य दूसरेके रोगकी चिकित्सा करता हो, उसी प्रकार मुझ मोक्षार्थीके गुरु गृहस्थ हैं, यह विडम्बना ही है। इसलिये ऐसे गुरुको नमस्कार करके मैं आपके पास आया हूँ। अब आप तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर मेरी रक्षा करें; क्योंकि मैं इस संसाररूपी सर्पसे अत्यन्त भयभीत हूँ॥ ४४-४५॥
संसारेऽस्मिन्महाघोरे भ्रमणं नभचक्रवत्।<br>न च विश्रमणं क्वापि सूर्यस्येव दिवानिशि॥ ४६इस महाभयंकर संसार-चक्रमें प्राणीमात्रको सर्वदा नक्षत्रोंकी भाँति चक्कर काटना पड़ता है और सूर्यकी भाँति दिन-रात उन्हें भी कभी विश्राम करनेका अवसर नहीं मिलता॥ ४६॥
किं सुखं तात संसारे निजतत्त्वविचारणात्।<br>मूढानां सुखबुद्धिस्तु विट्सु कीटसुखं यथा॥ ४७हे तात! इस संसारमें आत्मज्ञानको छोड़कर कौन-सा सुख है? मूढ़ जनोंको सुखकी वैसी ही प्रतीति होती है, जैसी विष्ठाके कीड़ोंको विष्ठामें होती है॥ ४७॥
अधीत्य वेदशास्त्राणि संसारे रागिणश्च ये।<br>तेभ्यः परो न मूर्खोऽस्ति सधर्माः श्वाश्वसूकरैः॥ ४८वेदशास्त्रोंको पढ़कर भी जो सांसारिक सुखमें फँसे रहते हैं, भला उनसे बढ़कर मूर्ख और कौन होगा? उन्हें तो कुत्ते, घोड़े एवं सूअर आदि पशुओंके समान धर्मवाला समझना चाहिये॥ ४८॥
मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य वेदशास्त्राण्यधीत्य च।<br>बध्यते यदि संसारे को विमुच्येत मानवः॥ ४९<br><br>नातः परतरं लोके क्वचिदाश्चर्यमद्भुतम्।<br>पुत्रदारगृहासक्तः पण्डितः परिगीयते॥ ५०दुर्लभ मानवतनको पाकर तथा वेदशास्त्रोंका अध्ययन करके भी यदि मनुष्य इस संसारमें बँधता है, तो दूसरा भला कौन बन्धनमुक्त हो सकता है? इससे बढ़कर संसारमें कोई दूसरी अद्भुत बात नहीं है कि पुत्र-कलत्र और घरके बन्धनमें पड़ा हुआ भी पण्डित कहलाता है!॥ ४९-५०॥
न बाध्यते यः संसारे नरो मायागुणैस्त्रिभिः।<br>स विद्वान्स च मेधावी शास्त्रपारं गतो हि सः॥ ५१जो मनुष्य इस संसारमें मायाके सत्त्व, रज, तम-रूपी तीनों गुणोंसे बाँधा नहीं जाता है; वही विद्वान्, बुद्धिमान् एवं शास्त्रमें पारंगत है॥ ५१॥
किं वृथाध्ययनेनात्र दृढबन्धकरेण च।<br>पठितव्यं तदेवाशु मोचयेद्भवबन्धनात्॥ ५२दृढ़ बन्धनमें डालनेवाले व्यर्थ विद्याध्ययनसे क्या लाभ? उसीका अध्ययन करना चाहिये, जो शीघ्र ही भवबन्धनसे मुक्त कर दे॥ ५२॥
गृह्णाति पुरुषं यस्माद् गृहं तेन प्रकीर्तितम्।<br>क्व सुखं बन्धनागारे तेन भीतोऽस्म्यहं पितः॥ ५३पुरुषको बन्धनमें जकड़ लेनेके कारण ही उसे गृह कहा गया है। अतः ऐसे बन्धनरूप घरमें सुख कहाँ? हे पिताजी! इसीलिये मैं भयभीत हूँ॥ ५३॥

| अ० १४ ] | प्रथम स्कन्ध | १४१ | | :--- | :--- |

| येऽबुधा मन्दमतयो विधिना मुषिताश्च ये।<br>ते प्राप्य मानुषं जन्म पुनर्बन्धं विशन्त्युत॥ ५४ | जो अज्ञानी, मन्दबुद्धि तथा अभागे मनुष्य हैं; वे इस मानव-जन्मको पाकर भी पुनः बन्धनमें पड़ जाते हैं॥ ५४॥ | | व्यास उवाच<br>न गृहं बन्धनागारं बन्धने न च कारणम्।<br>मनसा यो विनिर्मुक्तो गृहस्थोऽपि विमुच्यते॥ ५५ | **व्यासजी बोले—**गृह बन्धनागार नहीं है और न बन्धनका कारण ही है। जो मनसे बन्धनमुक्त है, वह गृहस्थ-आश्रममें रहते हुए भी मुक्त हो जाता है॥ ५५॥ | | न्यायागतधनः कुर्वन्वेदोक्तं विधिवत्क्रमात्।<br>गृहस्थोऽपि विमुच्येत श्राद्धकृत्सत्यवाक् शुचिः॥ ५६ | जो न्यायमार्गसे धनोपार्जन करता है, शास्त्रोक्त कर्मोंका विधिवत् सम्पादन करता है, पितृश्राद्ध आदि यज्ञ करता है, सर्वदा सत्य बोलता है तथा पवित्र रहता है, वह गृहमें रहते हुए भी मुक्त हो जाता है॥ ५६॥ | | ब्रह्मचारी यतिश्चैव वानप्रस्थो व्रतस्थितः।<br>गृहस्थं समुपासन्ते मध्याह्नातिक्रमे सदा॥ ५७<br><br>श्रद्धया चान्नदानेन वाचा सूनृतया तथा।<br>उपकुर्वन्ति धर्मस्था गृहाश्रमनिवासिनः॥ ५८ | ब्रह्मचारी, संन्यासी, वानप्रस्थी तथा व्रतोपवास करनेवाला—ये सब मनुष्य मध्याह्नोत्तरकालमें गृहस्थके पास ही जाते हैं। वे धार्मिक गृहस्थ श्रद्धाके साथ मधुर वचनोंद्वारा सबका सत्कार करते एवं अन्नदानसे उन्हें उपकृत करते हैं॥ ५७-५८॥ | | गृहाश्रमात्परो धर्मो न दृष्टो न च वै श्रुतः।<br>वसिष्ठादिभिराचार्यैर्ज्ञानिभिः समुपाश्रितः॥ ५९ | गृहस्थ-आश्रमसे बढ़कर कोई दूसरा आश्रम देखा या सुना नहीं गया। वसिष्ठ आदि आचार्यों और तत्त्वज्ञानियोंने इसका आश्रय ग्रहण किया है॥ ५९॥ | | किमसाध्यं महाभाग वेदोक्तानि च कुर्वतः।<br>स्वर्गं मोक्षं च सज्जन्म यद्यद्वाञ्छति तद्भवेत्॥ ६०<br><br>आश्रमादाश्रमं गच्छेदिति धर्मविदो विदुः।<br>तस्मादग्निं समाधाय कुरु कर्माण्यतन्द्रितः॥ ६१ | हे महाभाग! वेदोक्त कर्म करनेवाले गृहस्थके लिये क्या असाध्य रह जाता है? वह स्वर्ग, मोक्ष अथवा उत्तम कुलमें जन्म—जो कुछ भी चाहता है, वह हो जाता है। 'एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें जाना चाहिये'—ऐसा धर्मज्ञोंने बताया है। अतः आलस्यरहित होकर गृहस्थसम्बन्धी कर्मोंको सम्पादित करो॥ ६०-६१॥ | | देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च सन्तर्प्य विधिवत्सुत।<br>पुत्रमुत्पाद्य धर्मज्ञ संयोज्य च गृहाश्रमे॥ ६२<br><br>त्यक्त्वा गृहं वनं गत्वा कर्तासि व्रतमुत्तमम्।<br>वानप्रस्थाश्रमं कृत्वा संन्यासं च ततः परम्॥ ६३ | हे धर्मज्ञ पुत्र! देवताओं, पितरों एवं आश्रित-जनोंको विधिवत् सन्तुष्ट करके, पुत्र उत्पन्न करके और उसे भी गृहस्थ-आश्रममें लगाकर पुनः गृह त्यागकर वनमें जाकर श्रेष्ठ व्रतका आश्रय ग्रहण करो। वहाँ वानप्रस्थ-आश्रम पूर्ण करके उसके बाद संन्यास धारण करो॥ ६२-६३॥ | | इन्द्रियाणि महाभाग मादकानि सुनिश्चितम्।<br>अदारस्य दुरन्तानि पञ्चैव मनसा सह॥ ६४ | हे महाभाग! इन्द्रियाँ मनुष्यको निश्चितरूपसे प्रमत्त बना देती हैं। जो मनुष्य स्त्रीरहित होता है, उसे मन पाँचों इन्द्रियोंसहित विकल कर देता है॥ ६४॥ |

१४२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १५
तस्माद्दारान्कुर्वीत तज्जयाय महामते।<br>वार्धके तप आतिष्ठेदिति शास्त्रोदितं वचः॥ ६५हे महामते! इसलिये उन बलवान् इन्द्रियोंपर विजय पानेके लिये स्त्रीपरिणय करके गृहस्थ बनना चाहिये, तत्पश्चात् वृद्धावस्थामें तप करना चाहिये—यह शास्त्रवचन है॥ ६५॥
विश्वामित्रो महाभाग तपः कृत्वातिदुश्चरम्।<br>त्रीणि वर्षसहस्राणि निराहारो जितेन्द्रियः॥ ६६<br><br>मोहितश्च महातेजा वने मेनकया स्थितः।<br>शकुन्तला समुत्पन्ना पुत्री तद्वीर्यजा शुभा॥ ६७हे महाभाग! वनमें स्थित महातेजस्वी महर्षि विश्वामित्र किसी समय तीन सहस्र वर्षोंतक निराहार और जितेन्द्रिय रहकर अत्यन्त कठोर तप करके भी मेनकाको देखकर मोहित हो गये और उन्हींके तेजसे पुत्रीरूपमें सुन्दर शकुन्तला पैदा हुई॥ ६६-६७॥
दृष्ट्वा दाशसुतां कालीं पिता मम पराशरः।<br>कामबाणार्दितः कन्यां तां जग्राहोडुपे स्थितः॥ ६८मेरे पिता पराशरजी भी धीवरकी कृष्णवर्णा कन्याको देखकर काम-बाणसे आहत हो गये और उन्होंने नावपर ही उसे स्वीकार कर लिया था॥ ६८॥
ब्रह्मापि स्वसुतां दृष्ट्वा पञ्चबाणप्रपीडितः।<br>धावमानश्च रुद्रेण मूर्च्छितश्च निवारितः॥ ६९ब्रह्माजी भी अपनी कन्या को देखकर कामसे पीड़ित हो गये और बेसुध होकर उसके पीछे दौड़ते रहे; तब शिवजीने उन्हें रोका॥ ६९॥
तस्मात्त्वमपि कल्याण कुरु मे वचनं हितम्।<br>कुलजां कन्यकां वृत्वा वेदमार्गं समाश्रय॥ ७०अतः हे कल्याणकारी पुत्र! तुम मेरा हितकर वचन मान लो और किसी कुलीन कन्यासे विवाह करके सनातन वेदमार्गका पालन करो॥ ७०॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे व्यासेन गृहस्थधर्मवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥


अथ पञ्चदशोऽध्यायः

शुकदेवजीका विवाहके लिये अस्वीकार करना तथा व्यासजीका उनसे श्रीमद्देवीभागवत पढ़नेके लिये कहना

श्रीशुक उवाच<br>नाहं गृहं करिष्यामि दुःखदं सर्वदा पितः।<br>वागुरासदृशं नित्यं बन्धनं सर्वदेहिनाम्॥ १**श्रीशुकदेवजी बोले—**हे पिताजी! सर्वदा दुःख देनेवाले गृहस्थाश्रमको मैं कभी स्वीकार नहीं करूँगा; क्योंकि [पशु-पक्षियोंको फँसानेवाले] जालके समान यह आश्रम सभी मानवोंके लिये सदा बन्धनस्वरूप है॥ १॥
धनचिन्तातूराणां हि क्व सुखं तात दृश्यते।<br>स्वजनैः खलु पीड्यन्ते निर्धना लोलुपा जनाः॥ २हे तात! धन-धान्यकी चिन्तामें व्याकुल लोगोंके लिये सुख कहाँ दिखायी पड़ता है? निर्धन और लोभके वशीभूत मनुष्य अपने ही परिवारजनोंद्वारा सर्वदा कष्ट पाते रहते हैं॥ २॥
इन्द्रोऽपि न सुखी तादृग्यादृशो भिक्षुनिःस्पृहः।<br>कोऽन्यः स्यादिह संसारे त्रिलोकीविभवे सति॥ ३इन्द्र भी वैसे सुखी नहीं रहते, जैसा एक सुखी निःस्पृह भिक्षुक रहता है। तब भला इस संसारमें तीनों लोकोंका वैभव पाकर भी दूसरा कौन सुखी रह सकता है?॥ ३॥
अ० १५ ]प्रथम स्कन्ध१४३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तपन्तं तापसं दृष्ट्वा मघवा दुःखितोऽभवत्।<br>विघ्नान्बहुविधानस्य करोति च दिवस्पतिः॥ ४किसी तपस्वीको तप करते हुए देखकर स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र भी चिन्तित हो उठते हैं और उसके तपमें अनेक प्रकारके विघ्न करने लगते हैं॥ ४॥
ब्रह्मापि न सुखी विष्णुर्लक्ष्मीं प्राप्य मनोरमाम्।<br>खेदं प्राप्नोति सततं संग्रामैरसुरैः सह॥ ५<br><br>करोति विपुलान्यत्नांस्तपश्चरति दुश्चरम्।<br>रमापतिरपि श्रीमान्कस्यास्ति विपुलं सुखम्॥ ६ब्रह्मा भी सुखी नहीं हैं और मनोरम लक्ष्मीको पाकर विष्णु भी सुखी नहीं हैं; उन्हें भी दैत्योंके साथ युद्धके द्वारा निरन्तर कष्ट सहन करने पड़ते हैं। उन ऐश्वर्यशाली रमापति विष्णुको भी [सुखप्राप्तिके लिये] अनेक प्रयत्न करने पड़ते हैं और कठोर तपस्या करनी पड़ती है। [इस संसारमें] किसको बहुत सुख है?॥ ५-६॥
शङ्करोऽपि सदा दुःखी भवत्येव च वेद्म्यहम्।<br>तपश्चर्यां प्रकुर्वाणो दैत्ययुद्धकरः सदा॥ ७भगवान् शंकर भी सदैव दुःखी रहते हैं—ऐसा मैं जानता हूँ; क्योंकि वे सदैव तपस्या करते हुए भी दैत्योंसे युद्ध करते रहते हैं॥ ७॥
कदाचिन्न सुखी शेते धनवानपि लोलुपः।<br>निर्धनस्तु कथं तात सुखं प्राप्नोति मानवः॥ ८<br><br>जानन्नपि महाभाग पुत्रं वा वीर्यसम्भवम्।<br>नियोक्ष्यसि महाघोरे संसारे दुःखदे सदा॥ ९हे तात! जब धनवान् होते हुए भी लोभी मनुष्य कभी भी सुखपूर्वक सो नहीं पाता, तब भला निर्धन मनुष्य कैसे सुख पा सकता है? इसलिये हे महाभाग! यह जानते हुए भी आप अपने तेजसे उत्पन्न पुत्रको दुःखदायक तथा महाभयानक संसारमें क्यों लगा रहे हैं?॥ ८-९॥
जन्मदुःखं जरादुःखं दुःखं च मरणे तथा।<br>गर्भवासे पुनर्दुःखं विष्ठामूत्रमये पितः॥ १०<br><br>तस्मादतिशयं दुःखं तृष्णालोभसमुद्भवम्।<br>याच्ञायां परमं दुःखं मरणादपि मानद॥ ११हे पिताजी! जहाँ जन्ममें दुःख, बुढ़ापेमें दुःख, मरणमें दुःख तथा पुनः विष्ठा और मूत्रसे भरे हुए गर्भमें दुःख सहन करना पड़ता है; उससे भी अधिक दुःख तृष्णा और लोभसे उत्पन्न होता है। हे मानद! मरनेसे भी अधिक दुःख माँगनेमें होता है॥ १०-११॥
प्रतिग्रहधना विप्रा न बुद्धिबलजीवनाः।<br>पराशा परमं दुःखं मरणं च दिने दिने॥ १२ब्राह्मण प्रतिग्रहद्वारा धन प्राप्त करते हैं और वे बुद्धि-बलका उपयोग नहीं करते। दूसरेके भरोसेपर रहना परम दुःखकर है तथा वह अहर्निश मृत्युके समान होता है॥ १२॥
पठित्वा सकलान् वेदाञ्छास्त्राणि च समन्ततः।<br>गत्वा च धनिनां कार्या स्तुतिः सर्वात्मना बुधैः॥ १३<br><br>एकोदरस्य का चिन्ता पत्रमूलफलादिभिः।<br>येनकेनाप्युपायेन सन्तुष्ट्या च प्रपूर्यते॥ १४सभी वेद-शास्त्रोंका भलीभाँति अध्ययन करके भी विद्वानोंको धनिकोंके पास जाकर सब प्रकारसे उनकी प्रशंसा करनी पड़ती है। केवल पेटके लिये कोई चिन्ताकी बात नहीं; उसे तो केवल पत्र, फल एवं कन्द-मूल आदिसे किसी भी प्रकार सन्तुष्टिपूर्वक भरा जा सकता है॥ १३-१४॥
भार्या पुत्रास्तथा पौत्राः कुटुम्बे विपुले सति।<br>पूरणार्थं महद्दुःखं क्व सुखं पितरद्भुतम्॥ १५हे पिताजी! भार्या, पुत्र, पौत्र आदि बड़े कुटुम्बके पालनमें तो अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। ऐसी दशामें गृहस्थको सुख कहाँ है?॥ १५॥

| १४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
योगशास्त्रं वद मम ज्ञानशास्त्रं सुखाकरम्।<br>कर्मकाण्डेऽखिले तात न रमेऽहं कदाचन॥ १६इसलिये हे तात! मुझे सुखदायी ज्ञानशास्त्र और योगशास्त्रका उपदेश कीजिये। सम्पूर्ण कर्मकाण्डमें मेरा मन कभी नहीं लगता॥ १६॥
वद कर्मक्षयोपायं प्रारब्धं सञ्चितं तथा।<br>वर्तमानं यथा नश्येत् त्रिविधं कर्ममूलजम्॥ १७अतः कर्मक्षयका कोई उपाय बताइये; जिससे संचित, प्रारब्ध एवं क्रियमाण—तीनों प्रकारके कर्मफल नष्ट हो जायँ॥ १७॥
जलूकेव सदा नारी रुधिरं पिबतीति वै।<br>मूर्खस्तु न विजानाति मोहितो भावचेष्टितैः॥ १८स्त्री जोंकके समान सदा [पुरुषका] रक्त चूसती रहती है, जिसे बुद्धिहीन मनुष्य उसकी भावपूर्ण चेष्टाओंसे मोहित होनेके कारण नहीं जान पाता॥ १८॥
भोगैर्वीर्यं धनं पूर्णं मनः कुटिलभाषणैः।<br>कान्ता हरति सर्वस्वं कः स्तेनस्तादृशोऽपरः॥ १९स्त्री अपने संसर्गसे उसके तेजका तथा अपनी वचनचातुरीद्वारा उसके सम्पूर्ण धन और मनका—इस प्रकार सर्वस्वका हरण कर लेती है। उससे बढ़कर दूसरा चोर कौन है?॥ १९॥
निद्रासुखविनाशार्थं मूर्खस्तु दारसंग्रहम्।<br>करोति वञ्चितो धात्रा दुःखाय न सुखाय च॥ २०इसलिये मेरे विचारमें तो मूर्ख मनुष्य ही केवल निद्रासुखका नाश करनेके लिये स्त्रीपरिणय करता है। विधाताद्वारा वह दुःखके लिये ही ठगा जाता है, सुखके लिये नहीं॥ २०॥
सूत उवाच<br>एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वा व्यासः शुकस्य च।<br>सम्प्राप महतीं चिन्तां किं करोमीत्यसंशयम्॥ २१**सूतजी बोले—**इस प्रकार शुकदेवकी युक्तियुक्त ये बातें सुनकर व्यासजी बड़ी चिन्तामें पड़ गये। वे मन-ही-मन सोचने लगे—‘अब मैं क्या करूँ?’
तस्य सुस्रुवुरश्रूणि लोचनाद्दुःखजानि च।<br>वेपथुश्च शरीरेऽभूद् ग्लानिं प्राप मनस्तथा॥ २२तत्पश्चात् उनकी आँखोंसे दुःखके आँसू बहने लगे, शरीर काँपने लगा और मनमें ग्लानि होने लगी॥ २१-२२॥
शोचन्तं पितरं दृष्ट्वा दीनं शोकपरिप्लुतम्।<br>उवाच पितरं व्यासं विस्मयोत्फुल्ललोचनः॥ २३इस प्रकार शोक करते हुए अपने दीन तथा शोकाकुल पिताको देखकर आश्चर्यसे विस्मित नेत्रवाले शुकदेवजीने अपने पिता व्यासजीसे कहा—
अहो मायाबलं चोग्रं यन्मोहयति पण्डितम्।<br>वेदान्तस्य च कर्तारं सर्वज्ञं वेदसम्मितम्॥ २४अहो! माया कितनी प्रबल है, जो कि यह वेदान्तदर्शनके प्रणेता तथा वेदका सांगोपांग ज्ञान रखनेवाले सर्वज्ञ पण्डित मेरे पिताजीको भी मोहित कर रही है!॥ २३-२४॥
न जाने का च सा माया किंस्वित्सातीव दुष्करा।<br>या मोहयति विद्वांसं व्यासं सत्यवतीसुतम्॥ २५न जाने वह कौन-सी तथा कैसी अति दुष्कर माया है, जो सत्यवतीसुत विद्वान् व्यासजीको भी मोहित कर रही है!॥ २५॥
पुराणानां च वक्ता च निर्माता भारतस्य च।<br>विभागकर्ता वेदानां सोऽपि मोहमुपागतः॥ २६जो पुराणोंके वक्ता, महाभारतके रचयिता, वेदोंके विभागकर्ता हैं, वे भी [मायाजनित] मोहको प्राप्त हो गये हैं॥ २६॥