भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 145
१३६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १४

| उर्वश्युवाच | उर्वशी बोली—हे राजेन्द्र! आप मूर्ख हैं। आपका ज्ञान कहाँ चला गया? हे पृथ्विपते! भेड़ियोंके समान स्त्रियोंकी किसीसे मित्रता नहीं होती। अतः राजाओंको चाहिये कि वे स्त्रियों और चोरोंपर कभी भी विश्वास न करें। अब आप अपने घर जाइये, सुख भोगिये और मनमें किसी प्रकारकी चिन्ता मत कीजिये॥ ३१-३२॥ | | मूर्खोऽसि नृपशार्दूल ज्ञानं कुत्र गतं तव।<br>क्वापि सख्यं न च स्त्रीणां वृकाणामिव पार्थिव॥ ३१<br><br>न विश्वासो हि कर्तव्यः स्त्रीषु चौरेषु पार्थिवैः।<br>गृहं गच्छ सुखं भुंक्ष्व मा विषादे मनः कृथाः॥ ३२ | | | इत्येवं बोधितो राजा न विवेदातिमोहितः।<br>दुःखं च परमं प्राप्तः स्वैरिणीस्नेहयन्त्रितः॥ ३३ | इस प्रकार अत्यन्त विषयासक्त होनेके कारण उर्वशीके समझानेपर भी राजाको ज्ञान नहीं हुआ। उस स्वेच्छाचारिणी अप्सराके स्नेहमें जकड़े रहनेके कारण उन्हें अपार दुःख प्राप्त हुआ॥ ३३॥ | | सूत उवाच<br>इति सर्वं समाख्यातमूर्वशीचरितं महत्।<br>वेदे विस्तरितं चैतत्संक्षेपात्कथितं मया॥ ३४ | सूतजी बोले—[हे मुनिजन!] इस प्रकार मैंने उर्वशीके महान् चरित्रका वर्णन आपलोगोंसे संक्षेपमें कर दिया, जो वेदमें विस्तारपूर्वक वर्णित है॥ ३४॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे पुरूरवस उर्वश्याश्च चरित्रवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥


अथ चतुर्दशोऽध्यायः

व्यासपुत्र शुकदेवके अरणिसे उत्पन्न होनेकी कथा तथा व्यासजीद्वारा उनसे गृहस्थधर्मका वर्णन

| सूत उवाच | सूतजी बोले—उस सुन्दरी असितापांगी घृताचीको देखकर व्यासजी बड़े असमंजसमें पड़े और सोचने लगे कि यह देवकन्या अप्सरा मेरे योग्य नहीं है, अतः अब मैं क्या करूँ? वह अप्सरा भी व्यासजीको चिन्तित होता देखकर भयभीत हो गयी कि कहीं ये मुझे शाप न दे दें॥ १-२॥ | | दृष्ट्वा तामसितापाङ्गीं व्यासश्चिन्तापरोऽभवत्।<br>किं करोमि न मे योग्या देवकन्येयमप्सराः॥ १<br><br>एवं चिन्तयमानं तु दृष्ट्वा व्यासं तदाप्सराः।<br>भयभीता हि सञ्जाता शापं मा विसृजेदयम्॥ २ | | | सा कृत्वाथ शुकीरूपं निर्गता भयविह्वला।<br>कृष्णस्तु विस्मयं प्राप्तो विहङ्गीं तां विलोकयन्॥ ३ | तत्पश्चात् भयसे व्याकुल वह अप्सरा एक शुकीका रूप धारण करके उड़ गयी। व्यासजी उसे पक्षीके रूपमें देखकर आश्चर्यमें पड़ गये॥ ३॥ | | कामस्तु देहे व्यासस्य दर्शनादेव सङ्गतः।<br>मनोऽतिविस्मितं जातं सर्वगात्रेषु विस्मितः॥ ४ | उसे देखनेमात्रसे व्यासजीके शरीरमें कामका संचार हो आया और प्रत्यंगमें कामका प्रवेश हो जानेके कारण उनका मन अत्यन्त विस्मयमें पड़ गया॥ ४॥ | | स तु धैर्येण महता निगृह्णन्मानसं मुनिः।<br>न शशाक नियन्तुं च स व्यासः प्रसृतं मनः॥ ५ | बड़ी धीरताके साथ मनको रोकनेकी चेष्टा करते हुए भी उस चंचल मनको वे व्यासमुनि वशमें करनेमें समर्थ नहीं हुए॥ ५॥ |