भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 146
अ० १४ ]प्रथम स्कन्ध१३७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
बहुशो गृह्यमाणं च घृताच्या मोहितं मनः।<br>भावित्वान्नैव विधृतं व्यासस्यामिततेजसः॥ ६इस प्रकार घृताचीद्वारा मोहित तेजस्वी व्यासजीका मन अनेक यत्न करनेपर भी भावी संयोगके कारण उनके वशमें न हो सका॥ ६॥
मन्थनं कुर्वतस्तस्य मुनेरग्निचिकीर्षया।<br>अरण्यामेव सहसा तस्य शुक्रमथापतत्॥ ७<br><br>सोऽविचिन्त्य तथा पातं ममन्थारणिमेव च।<br>तस्माच्छुकः समुद्भूतो व्यासाकृतिमनोहरः॥ ८इसी बीच अग्नि निकालनेके लिये मन्थन करते समय एकाएक उनका तेज उस अरणीपर गिर गया, किंतु उसके गिरनेपर ध्यान न देकर वे अरणिमन्थन करते रहे। उस अरणीसे उन्हींके सदृश मनोहर स्वरूपवाले 'शुक' उत्पन्न हो गये॥ ७-८॥
विस्मयं जनयन्बालः सञ्जातस्तदरण्यजः।<br>यथाध्वरे समिद्धोऽग्निर्भाति हव्येन दीप्तिमान्॥ ९अरणीसे उत्पन्न वह बालक विस्मय पैदा करते हुए उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था, जिस प्रकार हवन करते समय घृताहुति पड़नेसे प्रकट अग्नि दीप्तिमान् हो उठती है॥ ९॥
व्यासस्तु सुतमालोक्य विस्मयं परमं गतः।<br>किमेतदिति सञ्चिन्त्य वरदानाच्छिवस्य वै॥ १०उस पुत्रको देखकर 'यह क्या !'—ऐसा सोचकर व्यासजी अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये [और विचार करने लगे कि यह] शिवके वरदानसे ही तो उत्पन्न नहीं हुआ है!॥ १०॥
तेजोरूपी शुको जातोऽप्यरणीगर्भसम्भवः।<br>द्वितीयोऽग्निरिवात्यर्थं दीप्यमानः स्वतेजसा॥ ११इस प्रकार अरणीगर्भसे उत्पन्न वह तेजस्वी पुत्र शुक अपने तेजसे दूसरे अग्निके तुल्य देदीप्यमान प्रतीत हो रहा था॥ ११॥
विलोकयामास तदा व्यासस्तु मुदितं सुतम्।<br>दिव्येन तेजसा युक्तं गार्हपत्यमिवापरम्॥ १२<br><br>गङ्गान्तः स्नापयामास समागत्य गिरेस्तदा।<br>पुष्पवृष्टिश्च खाज्जाता शिशोरुपरि तापसाः॥ १३व्यासजीने दिव्य देहधारी द्वितीय गार्हपत्य अग्निके समान तेजस्वी पुत्रको बड़ी प्रसन्नतासे देखा और पर्वतसे नीचे उतरकर गंगाजलसे उसको नहलाया। हे तपस्वियो ! उस समय आकाशसे उस शिशुके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा होने लगी॥ १२-१३॥
जातकर्मादिकं चक्रे व्यासस्तस्य महात्मनः।<br>देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ १४व्यासजीने उस महात्मा शिशुका जातकर्म आदि संस्कार किया। उस समय देवताओंने दुंदुभियाँ बजायीं तथा अप्सराओंने नृत्य किया॥ १४॥
जगुर्गन्धर्वपतयो मुदितास्ते दिदृक्षवः।<br>विश्वावसुर्नारदश्च तुम्बुरुः शुकसम्भवे॥ १५<br><br>तुष्टुवुर्मुदिताः सर्वे देवा विद्याधरास्तथा।<br>दृष्ट्वा व्याससुतं दिव्यमरणीगर्भसम्भवम्॥ १६उस बालकके दर्शनकी लालसावाले विश्वावसु, नारद, तुम्बुरु आदि सभी गन्धर्वराज प्रसन्न होकर शुकके जन्मपर गान करने लगे। सभी देवता तथा विद्याधर भी अरणीके गर्भसे उत्पन्न उस दिव्य व्यासपुत्रको देखकर प्रसन्नतापूर्वक स्तुति करने लगे॥ १५-१६॥
अन्तरिक्षात्पपातोर्व्यां दण्डः कृष्णाजिनं शुभम्।<br>कमण्डलुस्तथा दिव्यः शुकस्यार्थे द्विजोत्तमाः॥ १७हे द्विजोत्तम! उसी समय शुकदेवजीके लिये आकाशसे दिव्य दण्ड, कमण्डलु और शुभ कृष्ण मृगचर्म पृथ्वीपर आ गिरे॥ १७॥