देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 140, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 140
अ० १२ ] प्रथम स्कन्ध [ १३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स्त्रीत्वे तिष्ठति हर्म्येषु पुंस्त्वे राज्यं प्रशास्ति च।<br>प्रजास्तस्मिन्समुद्विग्ना नाभ्यनन्दन्महीपतिम्॥ ३५ | वे जब स्त्रीके रूपमें रहते थे, तब अन्तःपुरमें रहते थे और जब पुरुषरूपमें रहते थे, तब राज्य करते थे। परंतु इस कारण उनकी प्रजा उनसे उद्विग्न होकर राजाके रूपमें उनका अभिनन्दन नहीं करती थी॥ ३५॥ |
| काले तु यौवनं प्राप्तः पुत्रः पुरूरवास्तदा।<br>प्रतिष्ठां नृपतिस्तस्मै दत्त्वा राज्यं वनं ययौ॥ ३६ | कुछ समयके बाद जब राजकुमार पुरूरवा युवक हो गया तब महाराज सुद्युम्न उसे प्रतिष्ठानपुरका राज्य सौंपकर वनमें चले गये॥ ३६॥ |
| गत्वा तस्मिन्वने रम्ये नानाद्रुमसमाकुले।<br>नारदान्मन्त्रमासाद्य नवाक्षरमनुत्तमम्॥ ३७<br><br>जजाप मन्त्रमत्यर्थं प्रेमपूरितमानसः।<br>परितुष्टा तदा देवी सगुणा तारिणी शिवा॥ ३८<br><br>सिंहारूढा स्थिता चाग्रे दिव्यररूपा मनोरमा।<br>वारुणीपानसम्मत्ता मदाघूर्णितलोचना॥ ३९ | अनेक प्रकारके वृक्षोंसे सुन्दर लगनेवाले उस वनमें रहते हुए राजा सुद्युम्ने देवर्षि नारदजीसे सर्वोत्तम नवाक्षर (नवार्ण) मन्त्रकी दीक्षा ली और अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिके साथ मन लगाकर वे उस मन्त्रका जप करने लगे। तदनन्तर भक्तोंका उद्धार करनेवाली जगज्जननी भगवती शिवाने सगुणरूप धारण करके उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उस समय मनोरम तथा दिव्य स्वरूपवाली भगवती सिंहपर सवार होकर उनके समक्ष खड़ी हो गयीं। उनके नेत्र मदसे परिपूर्ण थे॥ ३७–३९॥ |
| दृष्ट्वा तां दिव्यरूप्रां च प्रेमाकुलितलोचनः।<br>प्रणम्य शिरसा प्रीत्या तुष्टाव जगदम्बिकाम्॥ ४० | ऐसी दिव्य रूपधारिणी श्रीदुर्गादेवीको अपने सामने देखकर स्नेहभरे नेत्रोंवाले (इलारूपी) राजा सुद्युम्न प्रेमपूर्वक सिर नवाकर उनकी स्तुति करने लगे॥ ४०॥ |
| इलोवाच<br>दिव्यं च ते भगवति प्रथितं स्वरूपं<br>दृष्टं मया सकललोकहितानुरूपम्।<br>वन्दे त्वदंघ्रिकमलं सुरसङ्घसेव्यं<br>कामप्रदं जननि चापि विमुक्तिदं च॥ ४१ | **इलाने कहा—**हे भगवति! आपका जगत्-प्रसिद्ध वह दिव्य रूप, जो संसारके लिये कल्याणकारी है—मैंने देखा। हे जननि! सुरसमूहसे सेवित आपके भुक्ति-मुक्तिप्रदायक चरणकमलकी मैं वन्दना कर रही हूँ॥ ४१॥ |
| को वेत्ति तेऽम्ब भुवि मर्त्यतनुर्निकामं<br>मुह्यन्ति यत्र मुनयश्च सुराश्च सर्वे।<br>ऐश्वर्यमेतदखिलं कृपणे दयां च<br>दृष्ट्वैव देवि सकलं किल विस्मयो मे॥ ४२ | हे अम्ब! इस संसारमें कौन मनुष्य आपको सम्पूर्ण रूपसे जान सकता है? जबकि मुनि एवं देवगण भी उसे देखकर विमोहित रहते हैं। हे देवि! आपके सम्पूर्ण ऐश्वर्य तथा मुझ-जैसी अकिंचनपर दया—यह सब देखकर मुझे आश्चर्य हो रहा है॥ ४२॥ |
| शम्भुर्हरिः कमलजो मघवा रविश्च<br>वित्तेशवह्निवरुणाः पवनश्च सोमः।<br>जानन्ति नैव वसवोऽपि हि ते प्रभावं<br>बुध्येत्कथं तव गुणानगुणो मनुष्यः॥ ४३ | हे माता! जब शिव, विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य, कुबेर, अग्नि, वरुण, वायु, चन्द्रमा और अष्टवसु भी आपके प्रभावको नहीं जानते हैं, तब भला गुणरहित मनुष्य आपके गुणोंको कैसे जान सकता है?॥ ४३॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—5 C