देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ | | :--- | :--- |
| जानाति विष्णुरमितद्युतिरम्ब साक्षा-<br>त्त्वां सात्त्विकीमुदधिजां सकलार्थदां च।<br>को राजसीं हर उमां किल तामसीं त्वां<br>वेदाम्बिके न तु पुनः खलु निर्गुणां त्वाम्॥ ४४ | हे अम्ब ! यद्यपि परम तेजस्वी भगवान् विष्णु आपको समुद्रसे उत्पन्न, सब प्रकारके मनोरथोंको सिद्ध करनेवाली साक्षात् सात्त्विकी शक्तिस्वरूपा लक्ष्मीके रूपमें समझते हैं, ब्रह्मा भी आपको राजसी शक्तिस्वरूपा सरस्वती तथा शिवजी आपको तामसी शक्तिस्वरूपा महाकालीके रूपमें जानते हैं, तथापि हे अम्बिके! वे भी आपकी निर्गुणात्मिका दिव्य शक्तिको भलीभाँति नहीं जानते॥ ४४॥ | | क्वाहं सुमन्दमतिरप्रतिमप्रभावः<br>क्वायं तवातिनिपुणो मयि सुप्रसादः।<br>जाने भवानि चरितं करुणासमेतं<br>यत्सेवकांश्च दयसे त्वयि भावयुक्तान्॥ ४५ | हे भवानि! कहाँ तो अत्यन्त मन्दबुद्धि मैं और कहाँ मुझपर अमित महिमाशाली तथा अमोघ प्रभाववाला आपका अनुग्रह! मैं आपके कारुणिक चरित्रको जानती हूँ जो कि आप भक्तिभावयुक्त सेवकोंपर सर्वदा दया करती हैं॥ ४५॥ | | वृत्तस्त्वया हरिरसौ वनजेशयापि<br>नैवाचरत्यपि मुदं मधुसूदनश्च।<br>पादौ तवादिपुरुषः किल पावकेन<br>कृत्वा करोति च करेण शुभौ पवित्रौ॥ ४६ | यद्यपि कमलवनमें वास करनेवाली कमला होकर आपने भगवान् विष्णुको पतिके रूपमें वरण किया है, तथापि वे मधुसूदन आनन्ददायक व्यवहार नहीं करते। वे आदिपुरुष विष्णु आदिशक्तिस्वरूपा आपके पवित्र हाथोंसे अपना पादसंवाहन कराकर अपने चरणोंको शुभ तथा पवित्र करते हैं॥ ४६॥ | | वाञ्छत्यहो हरिरशोक इवातिकामं<br>पादाहतिं प्रमुदितः पुरुषः पुराणः।<br>तां त्वं करोषि रुषिता प्रणतं च पादे<br>दृष्ट्वा पतिं सकलदेवनुतं स्मरार्तम्॥ ४७ | वे पुराणपुरुष भगवान् विष्णु भी प्रसन्न होकर आपके चरणोंका आघात वैसे ही चाहते हैं, जैसे अशोकवृक्ष अपनी वृद्धिके लिये चाहता है॥ ४७॥ | | वक्षःस्थले वससि देवि सदैव तस्य<br>पर्यङ्कवत्सुचरिते विपुलेऽतिशान्ते।<br>सौदामिनीव सुघने सुविभूषिते च<br>किं ते न वाहनमसौ जगदीश्वरोऽपि॥ ४८ | हे सुन्दर चरित्रवाली देवि! आप विष्णुके विशाल, शान्त एवं भूषणोंसे विभूषित वक्षःस्थलरूपी शय्यापर सर्वदा निवास करती हैं। उस समय ऐसा जान पड़ता है, मानो सुन्दर श्याम मेघमें बिजली चमक रही हो, तब वे जगदीश्वर होते हुए भी क्या आपके वाहन नहीं बन जाते?॥ ४८॥ | | त्वं चेज्जहासि मधुसूदनमम्ब कोपा-<br>न्नैवार्चितोऽपि स भवेत्किल शक्तिहीनः।<br>प्रत्यक्षमेव पुरुषं स्वजनास्त्यजन्ति<br>शान्तं श्रियोज्झितमतीव गुणैर्वियुक्तम्॥ ४९ | हे अम्ब! यदि क्रोधित होकर आप उनको त्याग दें तो वे भगवान् विष्णु अपूजित और शक्तिहीन होकर कुछ नहीं कर पायेंगे; क्योंकि लोकमें भी देखा जाता है कि श्रीहीन, गुणरहित एवं उदासीन पुरुषको उनके कुटुम्बीजन भी त्याग देते हैं॥ ४९॥ | | ब्रह्मादयः सुरगणा न तु किं युवतयो<br>ये त्वत्पदाम्बुजमहर्निशमाश्रयन्ति।<br>मन्ये त्वयैव विहिताः खलु ते पुमांसः<br>किं वर्णयामि तव शक्तिमनन्तवीर्ये॥ ५० | क्या ब्रह्मादि देवगण भी किसी समय युवतीरूपमें नहीं थे, जो दिन-रात आपके चरणकमलोंका ही आश्रय रखते हैं। मैं तो मानती हूँ कि आपने ही उन्हें पुंस्त्व प्रदान किया था। अतः हे अनन्त पराक्रमशालिनि! मैं आपकी शक्तिका क्या वर्णन कर सकती हूँ?॥ ५०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—5 D