देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० १३ ] प्रथम स्कन्ध १३३
| त्वं नापुमान्न च पुमानिति मे विकल्पो<br>या कासि देवि सगुणा ननु निर्गुणा वा।<br>तां त्वां नमामि सततं किल भावयुक्तो<br>वाञ्छामि भक्तिमचलां त्वयि मातरं तु॥ ५१ | ‘आप न तो स्त्री हैं, न पुरुष; न निर्गुण हैं न सगुण’—ऐसी मेरी धारणा है। अतः आप जैसी भी हों—उन आपको मैं भक्तिपूर्वक बार-बार प्रणाम करती हूँ। आप मातासे मैं यही प्रार्थना करती हूँ कि आपमें मेरी अचल भक्ति बनी रहे॥ ५१॥ |
| सूत उवाच<br>इति स्तुत्वा महीपालो जगाम शरणं तदा।<br>परितुष्टा ददौ देवी तत्र सायुज्यमात्मनि॥ ५२<br>सुद्युम्नस्तु ततः प्राप पदं परमकं स्थिरम्।<br>तस्या देव्याः प्रसादेन मुनीनामपि दुर्लभम्॥ ५३ | सूतजी बोले— इस प्रकार स्तुति करके राजा सुद्युम्न उनके शरणागत हुए और भगवतीने भी अत्यन्त सन्तुष्ट होकर उन्हें अपनी सायुज्य मुक्ति प्रदान की। तब उन देवीकी कृपासे सुद्युम्नने मुनियोंके लिये भी अति दुर्लभ शाश्वत परमपद प्राप्त किया॥ ५२-५३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
सुद्युम्नस्तुतिर्नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
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अथ त्रयोदशोऽध्यायः
राजा पुरूरवा और उर्वशीकी कथा
| सूत उवाच<br>सुद्युम्ने तु दिवं याते राज्यं चक्रे पुरूरवाः।<br>सगुणश्च सुरूपश्च प्रजारञ्जनतत्परः॥ १<br>प्रतिष्ठाने पुरे रम्ये राज्यं सर्वनमस्कृतम्।<br>चकार सर्वधर्मज्ञः प्रजारक्षणतत्परः॥ २ | सूतजी बोले— सुद्युम्नके दिवंगत हो जानेपर प्रजारंजनमें तत्पर, गुणी एवं सुन्दर महाराज पुरूरवा राज्य करने लगे। उस रमणीय प्रतिष्ठानपुरमें सर्वधर्मज्ञ तथा प्रजाकी रक्षामें तत्पर राजा पुरूरवाने सभीके द्वारा आदरणीय राज्य किया॥ १-२॥ |
| मन्त्रः सुगुप्तस्तस्यासीत्परत्राभिज्ञता तथा।<br>सदैवोत्साहशक्तिश्च प्रभुशक्तिस्तथोत्तमा॥ ३<br>सामदानादयः सर्वे वशगास्तस्य भूपतेः।<br>वर्णाश्रमान्स्वधर्मस्थान्कुर्वन् राज्यं शशास ह॥ ४<br>यज्ञांश्च विविधांश्चक्रे स राजा बहुदक्षिणान्।<br>दानानि च पवित्राणि ददावथ नराधिपः॥ ५ | उनकी राज्य-मन्त्रणा अच्छी तरहसे गुप्त रहती थी और उन्हें दूसरे राज्योंकी मन्त्रणाओंका भलीभाँति ज्ञान रहता था। उनमें सर्वदा उत्साहशक्ति एवं उत्तम प्रभुशक्ति विद्यमान थी। साम, दान, दण्ड और भेद—ये चारों नीतियाँ उन राजाके वशीभूत थीं। वे चारों वर्णों तथा आश्रमोंके लोगोंसे अपने-अपने धर्मोंका आचरण कराते हुए राज्यका शासन-कार्य करते थे। वे राजा पुरूरवा विपुल दक्षिणावाले विविध यज्ञ करते थे और पवित्र दान किया करते थे॥ ३-५॥ |
| तस्य रूपगुणौदार्यशीलद्रविणविक्रमान्।<br>श्रुत्वोर्वशी वशीभूता चकमे तं नराधिपम्॥ ६<br>ब्रह्मशापाभितप्ता सा मानुषं लोकमास्थिता।<br>गुणिनं तं नृपं मत्वा वरयामास मानिनी॥ ७ | राजा पुरूरवाके रूप, गुण, उदारता, शील, ऐश्वर्य एवं वीरताकी प्रशंसा सुनकर उर्वशी उनके वशीभूत हो गयी; उन दिनों वह भी ब्रह्माके शापसे पृथ्वीपर मनुष्य-योनिमें आयी थी। अतः उस मानिनीने उन राजाको गुणी जानकर उन्हें पतिके रूपमें स्वीकार कर लिया॥ ६-७॥ |