देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| १३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ |
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| संस्कृत | हिन्दी टीका |
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| समयं चेदृशं कृत्वा स्थिता तत्र वराङ्गना ।<br>एतावुरणकौ राजन्न्यस्तौ रक्षस्व मानद ॥ ८<br><br>घृतं मे भक्षणं नित्यं नान्यत्किञ्चिन्नृपाशनम् ।<br>नेक्षे त्वां च महाराज नग्नमन्यत्र मैथुनात् ॥ ९<br><br>भाषाबन्धस्त्वयं राजन् यदि भग्नो भविष्यति ।<br>तदा त्यक्त्वा गमिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ १० | वह वरांगना इस प्रकारकी शर्त रखकर वहीं रहने लगी। [उसने कहा]—हे राजन्! ये दोनों भेड़के बच्चे मैं आपके पास धरोहरके रूपमें रखती हूँ। हे मानद! आप इनकी रक्षा करें। हे नृप! [दूसरी शर्त है कि] मैं केवल घी ही खाऊँगी और कुछ नहीं और हे महाराज! [तीसरी शर्त है कि] सहवासके अतिरिक्त किसी दूसरे समयमें मैं आपको कभी वस्त्रविहीन अवस्थामें न देखूँ। हे राजन्! यदि आप इन कही गयी शर्तोंको भंग करेंगे तो मैं उसी समय आपको छोड़कर चली जाऊँगी, यह मैं सत्य कह रही हूँ ॥ ८–१० ॥ |
| अङ्गीकृतं च तद्राज्ञा कामिन्या भाषितं तु यत् ।<br>स्थिता भाषणबन्धेन शापानुग्रहकाम्यया ॥ ११ | इस प्रकार उस कामिनी उर्वशीने जो कहा था, उसे राजाने स्वीकार कर लिया और उर्वशी शापसे उद्धार पानेकी इच्छासे राजा पुरूरवाको प्रतिज्ञाबद्ध करके वहीं रहने लगी ॥ ११ ॥ |
| रेमे तदा स भूपालो लीनो वर्षगणान्बहून् ।<br>धर्मकर्मादिकं त्यक्त्वा चोर्वश्या मदमोहितः ॥ १२<br><br>एकचित्तस्तु सञ्जातस्तन्मनस्को महीपतिः ।<br>न शशाक तया हीनः क्षणमप्यतिमोहितः ॥ १३ | उर्वशीके द्वारा मुग्ध किये गये राजा सब धर्म-कर्म त्यागकर अनेक वर्षोंतक भोग-विलासमें पड़े रहे। उसपर आसक्त मनवाले वे सदा उसीका चिन्तन करते रहते थे और उसपर अत्यधिक मोहित होनेके कारण एक क्षण भी उस उर्वशीके बिना नहीं रह सकते थे ॥ १२–१३ ॥ |
| एवं वर्षगणान्ते तु स्वर्गस्थः पाकशासनः ।<br>उर्वशीं नागतां दृष्ट्वा गन्धर्वानाह देवराट् ॥ १४<br><br>उर्वशीमानयध्वं भो गन्धर्वाः सर्व एव हि ।<br>हृत्वोरणौ गृहात्तस्य भूपतेः समये किल ॥ १५<br><br>उर्वशीरहितं स्थानं मदीयं नातिशोभते ।<br>येन केनाप्युपायेन तामानयत कामिनीम् ॥ १६ | इस प्रकार जब बहुत वर्ष बीत गये, तब देवलोकमें इन्द्रने अपनी सभामें उर्वशीको अनुपस्थित देखकर गन्धर्वोंसे पूछकर कहा—हे गन्धर्वगण! तुम सब लोग वहाँ जाओ और प्रतिज्ञाबद्ध राजाके घरसे भेड़ोंको चुराकर उर्वशीको ले आओ; क्योंकि उर्वशीके बिना मुझे यह स्थान अच्छा नहीं लगता। अतः जिस किसी भी उपायसे उस कामिनीको तुमलोग लाओ ॥ १४–१६ ॥ |
| इत्युक्तास्तेऽथ गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः ।<br>ततो गत्वा महागाढे तमसि प्रत्युपस्थिते ॥ १७<br><br>जहुस्तावुरणौ देवा रममाणं विलोक्य तम् ।<br>चक्रन्दतुस्तदा तौ तु ह्रियमाणौ विहायसा ॥ १८ | तब इन्द्रके ऐसा कहनेपर विश्वावसु आदि प्रधान गन्धर्वोंने वहाँसे जाकर रात्रिके घोर अन्धकारमें राजा पुरूरवाको विहार करते देख उन दोनों भेड़ोंको चुरा लिया। तब आकाशमार्गमें जाते हुए चुराये गये वे दोनों भेड़ जोरसे चिल्लाने लगे ॥ १७–१८ ॥ |
| उर्वशी तदुपाकर्ण्य क्रन्दितं सुतयोरिव ।<br>कुपितोवाच राजानं समयोऽयं कृतो मया ॥ १९ | अपने पुत्रके समान पाले हुए भेड़ोंका क्रन्दन सुनते ही उर्वशीने क्रोधित होकर राजा पुरूरवासे कहा—हे राजन्! मैंने आपके सम्मुख जो पहली शर्त |