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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
१३४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १३
संस्कृतहिन्दी टीका
समयं चेदृशं कृत्वा स्थिता तत्र वराङ्गना ।<br>एतावुरणकौ राजन्न्यस्तौ रक्षस्व मानद ॥ ८<br><br>घृतं मे भक्षणं नित्यं नान्यत्किञ्चिन्नृपाशनम् ।<br>नेक्षे त्वां च महाराज नग्नमन्यत्र मैथुनात् ॥ ९<br><br>भाषाबन्धस्त्वयं राजन् यदि भग्नो भविष्यति ।<br>तदा त्यक्त्वा गमिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥ १०वह वरांगना इस प्रकारकी शर्त रखकर वहीं रहने लगी। [उसने कहा]—हे राजन्! ये दोनों भेड़के बच्चे मैं आपके पास धरोहरके रूपमें रखती हूँ। हे मानद! आप इनकी रक्षा करें। हे नृप! [दूसरी शर्त है कि] मैं केवल घी ही खाऊँगी और कुछ नहीं और हे महाराज! [तीसरी शर्त है कि] सहवासके अतिरिक्त किसी दूसरे समयमें मैं आपको कभी वस्त्रविहीन अवस्थामें न देखूँ। हे राजन्! यदि आप इन कही गयी शर्तोंको भंग करेंगे तो मैं उसी समय आपको छोड़कर चली जाऊँगी, यह मैं सत्य कह रही हूँ ॥ ८–१० ॥
अङ्गीकृतं च तद्राज्ञा कामिन्या भाषितं तु यत् ।<br>स्थिता भाषणबन्धेन शापानुग्रहकाम्यया ॥ ११इस प्रकार उस कामिनी उर्वशीने जो कहा था, उसे राजाने स्वीकार कर लिया और उर्वशी शापसे उद्धार पानेकी इच्छासे राजा पुरूरवाको प्रतिज्ञाबद्ध करके वहीं रहने लगी ॥ ११ ॥
रेमे तदा स भूपालो लीनो वर्षगणान्बहून् ।<br>धर्मकर्मादिकं त्यक्त्वा चोर्वश्या मदमोहितः ॥ १२<br><br>एकचित्तस्तु सञ्जातस्तन्मनस्को महीपतिः ।<br>न शशाक तया हीनः क्षणमप्यतिमोहितः ॥ १३उर्वशीके द्वारा मुग्ध किये गये राजा सब धर्म-कर्म त्यागकर अनेक वर्षोंतक भोग-विलासमें पड़े रहे। उसपर आसक्त मनवाले वे सदा उसीका चिन्तन करते रहते थे और उसपर अत्यधिक मोहित होनेके कारण एक क्षण भी उस उर्वशीके बिना नहीं रह सकते थे ॥ १२–१३ ॥
एवं वर्षगणान्ते तु स्वर्गस्थः पाकशासनः ।<br>उर्वशीं नागतां दृष्ट्वा गन्धर्वानाह देवराट् ॥ १४<br><br>उर्वशीमानयध्वं भो गन्धर्वाः सर्व एव हि ।<br>हृत्वोरणौ गृहात्तस्य भूपतेः समये किल ॥ १५<br><br>उर्वशीरहितं स्थानं मदीयं नातिशोभते ।<br>येन केनाप्युपायेन तामानयत कामिनीम् ॥ १६इस प्रकार जब बहुत वर्ष बीत गये, तब देवलोकमें इन्द्रने अपनी सभामें उर्वशीको अनुपस्थित देखकर गन्धर्वोंसे पूछकर कहा—हे गन्धर्वगण! तुम सब लोग वहाँ जाओ और प्रतिज्ञाबद्ध राजाके घरसे भेड़ोंको चुराकर उर्वशीको ले आओ; क्योंकि उर्वशीके बिना मुझे यह स्थान अच्छा नहीं लगता। अतः जिस किसी भी उपायसे उस कामिनीको तुमलोग लाओ ॥ १४–१६ ॥
इत्युक्तास्तेऽथ गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः ।<br>ततो गत्वा महागाढे तमसि प्रत्युपस्थिते ॥ १७<br><br>जहुस्तावुरणौ देवा रममाणं विलोक्य तम् ।<br>चक्रन्दतुस्तदा तौ तु ह्रियमाणौ विहायसा ॥ १८तब इन्द्रके ऐसा कहनेपर विश्वावसु आदि प्रधान गन्धर्वोंने वहाँसे जाकर रात्रिके घोर अन्धकारमें राजा पुरूरवाको विहार करते देख उन दोनों भेड़ोंको चुरा लिया। तब आकाशमार्गमें जाते हुए चुराये गये वे दोनों भेड़ जोरसे चिल्लाने लगे ॥ १७–१८ ॥
उर्वशी तदुपाकर्ण्य क्रन्दितं सुतयोरिव ।<br>कुपितोवाच राजानं समयोऽयं कृतो मया ॥ १९अपने पुत्रके समान पाले हुए भेड़ोंका क्रन्दन सुनते ही उर्वशीने क्रोधित होकर राजा पुरूरवासे कहा—हे राजन्! मैंने आपके सम्मुख जो पहली शर्त

| अ० १३ ] | प्रथम स्कन्ध | १३५ | | :--- | :--- | | नष्टाहं तव विश्वासाद्धतौ चोरैर्ममोरणौ।<br>राजन्यपुत्रसमावेतौ त्वं किं शेषे स्त्रिया समः॥ २० | रखी थी, वह टूट गयी। आपके विश्वासपर मैं धोखेमें पड़ी; क्योंकि पुत्रके समान मेरे प्रिय भेड़ोंको चोरोंने चुरा लिया फिर भी आप घरमें स्त्रीकी तरह शयन कर रहे हैं॥ १९-२०॥ | | हतास्म्यहं कुनाथेन नपुंसा वीरमानिना।<br>उरणौ मे गतौ चाद्य सदा प्राणप्रियौ मम॥ २१ | अपनेको वीर समझनेवाले नपुंसक इस अधम स्वामीके द्वारा मैं नष्ट कर दी गयी। सर्वदा प्राणोंके समान मेरे दोनों भेड़ अब चले गये। उर्वशीको इस प्रकार विलाप करती देख प्रेममें आसक्त राजा पुरूरवा चोरोंके पीछे नग्नावस्थामें ही तुरंत दौड़ पड़े॥ २१-२२॥ | | एवं विलप्यमानां तां दृष्ट्वा राजा विमोहितः।<br>नग्न एव ययौ तूर्णं पृष्ठतः पृथिवीपतिः॥ २२ | | | विद्युत्प्रकाशिता तत्र गन्धर्वैर्नृपवेश्मनि।<br>नग्नभूतस्तया दृष्टो भूपतिर्गन्तुकामया॥ २३ | उसी समय गन्धर्वोंद्वारा वहाँ राजाके भवनमें बिजली चमका दी गयी, जिसके कारण वहाँसे जानेकी इच्छावाली उर्वशीने राजाको नग्न देख लिया॥ २३॥ | | त्यक्त्वोरणौ गताः सर्वे गन्धर्वाः पथि पार्थिवः।<br>नग्नो जग्राह तौ श्रान्तो जगाम स्वगृहं प्रति॥ २४ | गन्धर्व उन दोनों भेड़ोंको वहीं मार्गमें छोड़कर भाग गये। थके एवं नग्न राजा भेड़ोंको लेकर अपने घर चले आये। तब वे उर्वशीको वहाँसे गयी हुई देखकर अत्यन्त दुःखित होकर विलाप करने लगे एवं लज्जित हुए। पतिको नग्न देखकर वह सुन्दरी उर्वशी चली गयी थी॥ २४-२५॥ | | तदोर्वशीं गतां दृष्ट्वा विललापातिदुःखितः।<br>नग्नं वीक्ष्य पतिं नारी गता सा वरवर्णिनी॥ २५ | | | क्रन्दन्स देशदेशेषु बभ्राम नृपतिः स्वयम्।<br>तच्चित्तो विह्वलः शोचन्विवशः काममोहितः॥ २६ | व्याकुल, लाचार, कामसे मोहित तथा एकमात्र उर्वशीमें आसक्त चित्तवाले राजा शोक तथा क्रन्दन करते हुए देश-देशमें भ्रमण करने लगे॥ २६॥ | | भ्रमन्वै सकलां पृथ्वीं कुरुक्षेत्रे ददर्श ताम्।<br>दृष्ट्वा संहृष्टवदनः प्राह सूक्तं नृपोत्तमः॥ २७ | इस प्रकार समस्त भूमण्डलपर भ्रमण करते हुए उन्होंने उर्वशीको कुरुक्षेत्रमें देखा। उसे देखते ही प्रसन्न मुखवाले नृपश्रेष्ठ राजा पुरूरवाने मधुर वाणीमें कहा— हे प्रिये! ठहरो-ठहरो। हे कठोरहृदये! मैं अब भी तुमपर आसक्त हूँ, मैं तुम्हारे वशमें हूँ; अतः मुझ निरपराधी पतिको तुम मत छोड़ो॥ २७-२८॥ | | अये जाये तिष्ठ तिष्ठ घोरे न त्यक्तुमर्हसि।<br>मां त्वं तन्मनसं कान्तं वशगं चाप्यनागसम्॥ २८ | | | स देहोऽयं पतत्यत्र देवि दूरं हृतस्त्वया।<br>खादन्त्येनं वृकाः काकास्त्वया त्यक्तं वरोरु यत्॥ २९ | हे देवि! जिस शरीरसे तुमने इतना प्रेम किया था, जिसे तुमने यहाँतक खींच लिया, वह शरीर आज यहीं गिर जायगा। हे सुन्दरि! तुम्हारे द्वारा त्यक्त इस देहको भेड़िये और कौए खा जायेंगे॥ २९॥ | | एवं विलपमानं तं राजानं प्राह चोर्वशी।<br>दुःखितं कृपणं श्रान्तं कामार्तं विवशं भृशम्॥ ३० | इस प्रकार विलाप करते हुए दुःखित, दीन, थके, कामातुर और अत्यन्त लाचार राजा पुरूरवासे उर्वशी कहने लगी॥ ३०॥ |

१३६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १४

| उर्वश्युवाच | उर्वशी बोली—हे राजेन्द्र! आप मूर्ख हैं। आपका ज्ञान कहाँ चला गया? हे पृथ्विपते! भेड़ियोंके समान स्त्रियोंकी किसीसे मित्रता नहीं होती। अतः राजाओंको चाहिये कि वे स्त्रियों और चोरोंपर कभी भी विश्वास न करें। अब आप अपने घर जाइये, सुख भोगिये और मनमें किसी प्रकारकी चिन्ता मत कीजिये॥ ३१-३२॥ | | मूर्खोऽसि नृपशार्दूल ज्ञानं कुत्र गतं तव।<br>क्वापि सख्यं न च स्त्रीणां वृकाणामिव पार्थिव॥ ३१<br><br>न विश्वासो हि कर्तव्यः स्त्रीषु चौरेषु पार्थिवैः।<br>गृहं गच्छ सुखं भुंक्ष्व मा विषादे मनः कृथाः॥ ३२ | | | इत्येवं बोधितो राजा न विवेदातिमोहितः।<br>दुःखं च परमं प्राप्तः स्वैरिणीस्नेहयन्त्रितः॥ ३३ | इस प्रकार अत्यन्त विषयासक्त होनेके कारण उर्वशीके समझानेपर भी राजाको ज्ञान नहीं हुआ। उस स्वेच्छाचारिणी अप्सराके स्नेहमें जकड़े रहनेके कारण उन्हें अपार दुःख प्राप्त हुआ॥ ३३॥ | | सूत उवाच<br>इति सर्वं समाख्यातमूर्वशीचरितं महत्।<br>वेदे विस्तरितं चैतत्संक्षेपात्कथितं मया॥ ३४ | सूतजी बोले—[हे मुनिजन!] इस प्रकार मैंने उर्वशीके महान् चरित्रका वर्णन आपलोगोंसे संक्षेपमें कर दिया, जो वेदमें विस्तारपूर्वक वर्णित है॥ ३४॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे पुरूरवस उर्वश्याश्च चरित्रवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥


अथ चतुर्दशोऽध्यायः

व्यासपुत्र शुकदेवके अरणिसे उत्पन्न होनेकी कथा तथा व्यासजीद्वारा उनसे गृहस्थधर्मका वर्णन

| सूत उवाच | सूतजी बोले—उस सुन्दरी असितापांगी घृताचीको देखकर व्यासजी बड़े असमंजसमें पड़े और सोचने लगे कि यह देवकन्या अप्सरा मेरे योग्य नहीं है, अतः अब मैं क्या करूँ? वह अप्सरा भी व्यासजीको चिन्तित होता देखकर भयभीत हो गयी कि कहीं ये मुझे शाप न दे दें॥ १-२॥ | | दृष्ट्वा तामसितापाङ्गीं व्यासश्चिन्तापरोऽभवत्।<br>किं करोमि न मे योग्या देवकन्येयमप्सराः॥ १<br><br>एवं चिन्तयमानं तु दृष्ट्वा व्यासं तदाप्सराः।<br>भयभीता हि सञ्जाता शापं मा विसृजेदयम्॥ २ | | | सा कृत्वाथ शुकीरूपं निर्गता भयविह्वला।<br>कृष्णस्तु विस्मयं प्राप्तो विहङ्गीं तां विलोकयन्॥ ३ | तत्पश्चात् भयसे व्याकुल वह अप्सरा एक शुकीका रूप धारण करके उड़ गयी। व्यासजी उसे पक्षीके रूपमें देखकर आश्चर्यमें पड़ गये॥ ३॥ | | कामस्तु देहे व्यासस्य दर्शनादेव सङ्गतः।<br>मनोऽतिविस्मितं जातं सर्वगात्रेषु विस्मितः॥ ४ | उसे देखनेमात्रसे व्यासजीके शरीरमें कामका संचार हो आया और प्रत्यंगमें कामका प्रवेश हो जानेके कारण उनका मन अत्यन्त विस्मयमें पड़ गया॥ ४॥ | | स तु धैर्येण महता निगृह्णन्मानसं मुनिः।<br>न शशाक नियन्तुं च स व्यासः प्रसृतं मनः॥ ५ | बड़ी धीरताके साथ मनको रोकनेकी चेष्टा करते हुए भी उस चंचल मनको वे व्यासमुनि वशमें करनेमें समर्थ नहीं हुए॥ ५॥ |

अ० १४ ]प्रथम स्कन्ध१३७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
बहुशो गृह्यमाणं च घृताच्या मोहितं मनः।<br>भावित्वान्नैव विधृतं व्यासस्यामिततेजसः॥ ६इस प्रकार घृताचीद्वारा मोहित तेजस्वी व्यासजीका मन अनेक यत्न करनेपर भी भावी संयोगके कारण उनके वशमें न हो सका॥ ६॥
मन्थनं कुर्वतस्तस्य मुनेरग्निचिकीर्षया।<br>अरण्यामेव सहसा तस्य शुक्रमथापतत्॥ ७<br><br>सोऽविचिन्त्य तथा पातं ममन्थारणिमेव च।<br>तस्माच्छुकः समुद्भूतो व्यासाकृतिमनोहरः॥ ८इसी बीच अग्नि निकालनेके लिये मन्थन करते समय एकाएक उनका तेज उस अरणीपर गिर गया, किंतु उसके गिरनेपर ध्यान न देकर वे अरणिमन्थन करते रहे। उस अरणीसे उन्हींके सदृश मनोहर स्वरूपवाले 'शुक' उत्पन्न हो गये॥ ७-८॥
विस्मयं जनयन्बालः सञ्जातस्तदरण्यजः।<br>यथाध्वरे समिद्धोऽग्निर्भाति हव्येन दीप्तिमान्॥ ९अरणीसे उत्पन्न वह बालक विस्मय पैदा करते हुए उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था, जिस प्रकार हवन करते समय घृताहुति पड़नेसे प्रकट अग्नि दीप्तिमान् हो उठती है॥ ९॥
व्यासस्तु सुतमालोक्य विस्मयं परमं गतः।<br>किमेतदिति सञ्चिन्त्य वरदानाच्छिवस्य वै॥ १०उस पुत्रको देखकर 'यह क्या !'—ऐसा सोचकर व्यासजी अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये [और विचार करने लगे कि यह] शिवके वरदानसे ही तो उत्पन्न नहीं हुआ है!॥ १०॥
तेजोरूपी शुको जातोऽप्यरणीगर्भसम्भवः।<br>द्वितीयोऽग्निरिवात्यर्थं दीप्यमानः स्वतेजसा॥ ११इस प्रकार अरणीगर्भसे उत्पन्न वह तेजस्वी पुत्र शुक अपने तेजसे दूसरे अग्निके तुल्य देदीप्यमान प्रतीत हो रहा था॥ ११॥
विलोकयामास तदा व्यासस्तु मुदितं सुतम्।<br>दिव्येन तेजसा युक्तं गार्हपत्यमिवापरम्॥ १२<br><br>गङ्गान्तः स्नापयामास समागत्य गिरेस्तदा।<br>पुष्पवृष्टिश्च खाज्जाता शिशोरुपरि तापसाः॥ १३व्यासजीने दिव्य देहधारी द्वितीय गार्हपत्य अग्निके समान तेजस्वी पुत्रको बड़ी प्रसन्नतासे देखा और पर्वतसे नीचे उतरकर गंगाजलसे उसको नहलाया। हे तपस्वियो ! उस समय आकाशसे उस शिशुके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा होने लगी॥ १२-१३॥
जातकर्मादिकं चक्रे व्यासस्तस्य महात्मनः।<br>देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ १४व्यासजीने उस महात्मा शिशुका जातकर्म आदि संस्कार किया। उस समय देवताओंने दुंदुभियाँ बजायीं तथा अप्सराओंने नृत्य किया॥ १४॥
जगुर्गन्धर्वपतयो मुदितास्ते दिदृक्षवः।<br>विश्वावसुर्नारदश्च तुम्बुरुः शुकसम्भवे॥ १५<br><br>तुष्टुवुर्मुदिताः सर्वे देवा विद्याधरास्तथा।<br>दृष्ट्वा व्याससुतं दिव्यमरणीगर्भसम्भवम्॥ १६उस बालकके दर्शनकी लालसावाले विश्वावसु, नारद, तुम्बुरु आदि सभी गन्धर्वराज प्रसन्न होकर शुकके जन्मपर गान करने लगे। सभी देवता तथा विद्याधर भी अरणीके गर्भसे उत्पन्न उस दिव्य व्यासपुत्रको देखकर प्रसन्नतापूर्वक स्तुति करने लगे॥ १५-१६॥
अन्तरिक्षात्पपातोर्व्यां दण्डः कृष्णाजिनं शुभम्।<br>कमण्डलुस्तथा दिव्यः शुकस्यार्थे द्विजोत्तमाः॥ १७हे द्विजोत्तम! उसी समय शुकदेवजीके लिये आकाशसे दिव्य दण्ड, कमण्डलु और शुभ कृष्ण मृगचर्म पृथ्वीपर आ गिरे॥ १७॥
१३८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १४

| सद्यः स ववृधे बालो जातमात्रोऽतिदीप्तिमान्।<br>तस्योपनयनं चक्रे व्यासो विद्याविधानवित्॥ १८ | उत्पन्न होते ही वह अति तेजस्वी शिशु शीघ्रतापूर्वक बड़ा हो गया, तब वैदिक विधानके मर्मज्ञ व्यासजीने उसका उपनयनसंस्कार भी कर दिया॥ १८॥ | | उत्पन्नमात्रं तं वेदाः सरहस्याः ससंग्रहाः।<br>उपतस्थुर्महात्मानं यथास्य पितरं तथा॥ १९ | उत्पन्न होते ही रहस्यों तथा संग्रहोंसहित सभी वेद उन महात्माके समक्ष वैसे ही उपस्थित हो गये, जैसे उसके पिता व्यासजीमें वे विद्यमान थे॥ १९॥ | | यतो दृष्टं शुकीरूपं घृताच्याः सम्भवे तदा।<br>शुकेति नाम पुत्रस्य चकार मुनिसत्तमः॥ २० | अरणि-मन्थनके समय मुनिश्रेष्ठ व्यासजीने घृताची अप्सराको शुकीके रूपमें देखा था, इसलिये उन्होंने इस बालकका नाम शुक रख दिया॥ २०॥ | | बृहस्पतिमुपाध्यायं कृत्वा व्याससुतस्तदा।<br>व्रतानि ब्रह्मचर्यस्य चकार विधिपूर्वकम्॥ २१<br><br>सोऽधीत्य निखिलान्वेदान् सरहस्यान्ससंग्रहान्।<br>धर्मशास्त्राणि सर्वाणि कृत्वा गुरुकुले शुकः॥ २२<br><br>गुरवे दक्षिणां दत्त्वा समावृत्तो मुनिस्तदा।<br>आजगाम पितुः पार्श्वं कृष्णद्वैपायनस्य च॥ २३ | व्याससुत शुकदेवने बृहस्पतिको अपना आचार्य मानकर विधिवत् ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया। गुरुकुलमें निवासकर रहस्यों तथा संग्रहोंसहित सभी वेदों तथा धर्मशास्त्रोंका अध्ययन करके, तदनन्तर गुरुको दक्षिणा देकर वे शुकदेवमुनि अपने पिता व्यासजीके पास आ गये॥ २१–२३॥ | | दृष्ट्वा व्यासः शुकं प्राप्तं प्रेम्णोत्थाय ससम्भ्रमः।<br>आलिङ्गि मुहुर्घ्राणं मूर्ध्नि तस्य चकार ह॥ २४<br><br>पप्रच्छ कुशलं व्यासस्तथा चाध्ययनं शुचिः।<br>आश्वास्य स्थापयामास शुकं तत्राश्रमे शुभे॥ २५ | शुकदेवको आया देखकर व्यासजीने शीघ्रताके साथ प्रसन्नतापूर्वक उठकर बारंबार उनका आलिंगन किया और उनका सिर सूँघा। परम पवित्र व्यासजीने शुकदेवजीके कुशलक्षेम तथा अध्ययनके विषयमें पूछा तथा उन्हें आश्वस्त करके अपने पावन आश्रममें रख लिया॥ २४–२५॥ | | दारकर्म ततो व्यासः शुकस्य पर्यचिन्तयत्।<br>कन्यां मुनिसुतां कान्तामपृच्छदतिवेगवान्॥ २६ | तत्पश्चात् व्यासजी शुकदेवजीके विवाहके विषयमें सोचने लगे। एक दिन परम तेजस्वी व्यासजीने शुकदेवजीसे किसी सुन्दर मुनिकन्याकी चर्चा की॥ २६॥ | | शुकं प्राह सुतं व्यासो वेदोऽधीतस्त्वयानघ।<br>धर्मशास्त्राणि सर्वाणि कुरु भार्यां महामते॥ २७<br><br>गार्हस्थ्यं च समासाद्य यज देवान्पितॄनथ।<br>ऋणान्मोचय मां पुत्र प्राप्य दारान्मनोरमान्॥ २८ | उन्होंने अपने पुत्र शुकदेवसे कहा—हे पवित्रात्मन्! तुमने वेद तथा सभी धर्मशास्त्रोंका अध्ययन कर लिया है। अतः हे महामते! अब तुम विवाह कर लो और गृहस्थ-आश्रममें रहकर देवताओं और पितरोंका यजन करो और हे पुत्र! तुम सुन्दर स्त्रीको स्वीकारकर मुझे भी ऋणसे मुक्त कर दो॥ २७–२८॥ | | अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च।<br>तस्मात्पुत्र महाभाग कुरुष्वाद्य गृहाश्रमम्॥ २९<br><br>कृत्वा गृहाश्रमं पुत्र सुखिनं कुरु मां शुक।<br>आशा मे महती पुत्र पूरयस्व महामते॥ ३० | अपुत्रकी गति नहीं होती और उसे स्वर्ग कदापि नहीं मिलता। इसलिये हे महाभाग पुत्र! अब तुम गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश करो और हे शुक! हे पुत्र! गृहस्थी बसाकर मुझे भी आनन्दित करो। ऐसा करके हे महामते! हे पुत्र! तुम मेरी महान् आशा परिपूर्ण करो॥ २९–३०॥ |

अ० १४ ]प्रथम स्कन्ध१३९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तपस्तप्त्वा महाघोरं प्राप्तोऽसि त्वमयोनिजः।<br>देवरूपी महाप्राज्ञ पाहि मां पितरं शुक॥ ३१हे शुक! कठिन तपस्या करके मैंने तुम्हारे-जैसा अयोनिज पुत्र पाया है। हे महाप्राज्ञ! तुम देवतारूप हो, अतः मुझ पिताकी रक्षा करो॥ ३१॥
सूत उवाच<br>इति वादिनमभ्याशे प्राप्तः प्राह शुकस्तदा।<br>विरक्तः सोऽतिसक्तं तं साक्षात्पितरमात्मनः॥ ३२सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] ऐसा कहनेवाले व्यासजीके पास उपस्थित विरक्त शुकदेवजीने गृहस्थ-आश्रममें अनुरक्त अपने पितासे कहा॥ ३२॥
शुक उवाच<br>किं त्वं वदसि धर्मज्ञ वेदव्यास महामते।<br>तत्त्वेन शाधि शिष्यं मां त्वदाज्ञां करवाण्यलम्॥ ३३**शुकदेवजी बोले—**हे महामते! हे धर्मज्ञ! हे वेदव्यास! आप क्या कह रहे हैं, मुझ शिष्यको आप तत्त्वज्ञानका उपदेश दें; मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा॥ ३३॥
व्यास उवाच<br>त्वदर्थे यत्तपस्तप्तं मया पुत्र शतं समाः।<br>प्राप्तस्त्वं चातिदुःखेन शिवस्याराधनेन च॥ ३४<br><br>ददामि तव वित्तं तु प्रार्थयित्वाथ भूपतिम्।<br>सुखं भुंक्ष्व महाप्राज्ञ प्राप्य यौवनमुत्तमम्॥ ३५**व्यासजी बोले—**हे पुत्र! तुम्हारे लिये मैंने सैकड़ों वर्ष कष्ट सहकर जो तपस्या की और शिवजीकी आराधना की, उसके फलस्वरूप मैंने तुम्हें पाया है। किसी राजासे माँगकर मैं तुम्हें प्रचुर धन दूँगा, हे महाप्राज्ञ! तुम श्रेष्ठ यौवन प्राप्त करके सुखका उपभोग करो॥ ३४-३५॥
शुक उवाच<br>किं सुखं मानुषे लोके ब्रूहि तात निरामयम्।<br>दुःखविद्धं सुखं प्राज्ञा न वदन्ति सुखं किल॥ ३६**शुकदेवजी बोले—**हे तात! आप बतायें कि इस मनुष्यलोकमें भला विपत्तिरहित कौन-सा सुख है? बुद्धिमान् लोग दुःखसे युक्त सुखको सुख नहीं कहते हैं॥ ३६॥
स्त्रियं कृत्वा महाभाग भवामि तद्वशानुगः।<br>सुखं किं परतन्त्रस्य स्त्रीजितस्य विशेषतः॥ ३७हे महाभाग! स्त्री पाकर मैं उसीके वशमें हो जाऊँगा। तब भला आप ही बताइये, परतन्त्र होकर और विशेषतः स्त्रीके वशमें रहकर मैं कौन-सा सुख पा सकूँगा?॥ ३७॥
कदाचिदपि मुच्येत लोहकाष्ठादियन्त्रितः।<br>पुत्रदारैर्निबद्धस्तु न विमुच्येत कर्हिचित्॥ ३८लौह या काष्ठके फन्देमें जकड़ा हुआ पुरुष कदाचित् छूट भी सकता है, किंतु पुत्र-कलत्रके बन्धनमें फँसा हुआ प्राणी कभी भी बन्धनमुक्त नहीं हो पाता॥ ३८॥
विण्मूत्रसम्भवो देहो नारीणां तन्मयस्तथा।<br>कः प्रीतिं तत्र विप्रेन्द्र विबुधः कर्तुमिच्छति॥ ३९यह शरीर विष्ठा एवं मूत्रसे परिपूर्ण रहता है; वैसे ही स्त्रियोंका शरीर भी होता है। हे विप्रेन्द्र! तब कौन बुद्धिमान् पुरुष उससे प्रीति करना चाहेगा!॥ ३९॥
अयोनिजोऽहं विप्रर्षे योनौ मे कीदृशी मतिः।<br>न वाञ्छाम्यहमग्रेऽपि योनावेव समुद्भवम्॥ ४०हे विप्रशिरोमणे! मैं अयोनिज हूँ, तब योनिजन्य सुखमें मेरी बुद्धि कैसे होगी? मैं भविष्यमें भी अपनी उत्पत्ति किसी योनिमें नहीं चाहता॥ ४०॥
विट्सुखं किमु वाञ्छामि त्यक्त्वात्मसुखमद्भुतम्।<br>आत्मारामश्च भूयोऽपि न भवत्यतिलोलुपः॥ ४१अतः अद्भुत अध्यात्म सुखको छोड़कर मैं विट्-मूत्रजन्य सुखको क्यों चाहूँ? अपने-आपमें रमण करनेवाला कभी विषय-सुखका लोभी नहीं होता॥ ४१॥

| १४० | श्रीमद्देवीभागवत | [अ० १४ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रथमं पठिता वेदा मया विस्तारिताश्च ते।<br>हिंसामयास्ते पठिताः कर्ममार्गप्रवर्तकाः॥ ४२<br><br>बृहस्पतिर्गुरुः प्राप्तः सोऽपि मग्नो गृहार्णवे।<br>अविद्याग्रस्तहृदयः कथं तारयितुं क्षमः॥ ४३मैंने सांगोपांग वेदोंका अध्ययन किया और जाना कि वे हिंसामय हैं तथा कर्ममार्गके प्रवर्तक हैं। मुझे गुरुरूपमें बृहस्पति प्राप्त हुए, वे भी गृहस्थीके सागरमें डूबे हुए हैं। अविद्याग्रस्त हृदयवाले वे मेरा उद्धार कैसे कर सकते हैं?॥ ४२-४३॥
रोगग्रस्तो यथा वैद्यः पररोगचिकित्सकः।<br>तथा गुरुर्मुमुक्षोर्मे गृहस्थोऽयं विडम्बना॥ ४४<br><br>कृत्वा प्रणामं गुरवे त्वत्समीपमुपागतः।<br>त्राहि मां तत्त्वबोधेन भीतं संसारसर्पतः॥ ४५जैसे कोई रोगग्रस्त वैद्य दूसरेके रोगकी चिकित्सा करता हो, उसी प्रकार मुझ मोक्षार्थीके गुरु गृहस्थ हैं, यह विडम्बना ही है। इसलिये ऐसे गुरुको नमस्कार करके मैं आपके पास आया हूँ। अब आप तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर मेरी रक्षा करें; क्योंकि मैं इस संसाररूपी सर्पसे अत्यन्त भयभीत हूँ॥ ४४-४५॥
संसारेऽस्मिन्महाघोरे भ्रमणं नभचक्रवत्।<br>न च विश्रमणं क्वापि सूर्यस्येव दिवानिशि॥ ४६इस महाभयंकर संसार-चक्रमें प्राणीमात्रको सर्वदा नक्षत्रोंकी भाँति चक्कर काटना पड़ता है और सूर्यकी भाँति दिन-रात उन्हें भी कभी विश्राम करनेका अवसर नहीं मिलता॥ ४६॥
किं सुखं तात संसारे निजतत्त्वविचारणात्।<br>मूढानां सुखबुद्धिस्तु विट्सु कीटसुखं यथा॥ ४७हे तात! इस संसारमें आत्मज्ञानको छोड़कर कौन-सा सुख है? मूढ़ जनोंको सुखकी वैसी ही प्रतीति होती है, जैसी विष्ठाके कीड़ोंको विष्ठामें होती है॥ ४७॥
अधीत्य वेदशास्त्राणि संसारे रागिणश्च ये।<br>तेभ्यः परो न मूर्खोऽस्ति सधर्माः श्वाश्वसूकरैः॥ ४८वेदशास्त्रोंको पढ़कर भी जो सांसारिक सुखमें फँसे रहते हैं, भला उनसे बढ़कर मूर्ख और कौन होगा? उन्हें तो कुत्ते, घोड़े एवं सूअर आदि पशुओंके समान धर्मवाला समझना चाहिये॥ ४८॥
मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य वेदशास्त्राण्यधीत्य च।<br>बध्यते यदि संसारे को विमुच्येत मानवः॥ ४९<br><br>नातः परतरं लोके क्वचिदाश्चर्यमद्भुतम्।<br>पुत्रदारगृहासक्तः पण्डितः परिगीयते॥ ५०दुर्लभ मानवतनको पाकर तथा वेदशास्त्रोंका अध्ययन करके भी यदि मनुष्य इस संसारमें बँधता है, तो दूसरा भला कौन बन्धनमुक्त हो सकता है? इससे बढ़कर संसारमें कोई दूसरी अद्भुत बात नहीं है कि पुत्र-कलत्र और घरके बन्धनमें पड़ा हुआ भी पण्डित कहलाता है!॥ ४९-५०॥
न बाध्यते यः संसारे नरो मायागुणैस्त्रिभिः।<br>स विद्वान्स च मेधावी शास्त्रपारं गतो हि सः॥ ५१जो मनुष्य इस संसारमें मायाके सत्त्व, रज, तम-रूपी तीनों गुणोंसे बाँधा नहीं जाता है; वही विद्वान्, बुद्धिमान् एवं शास्त्रमें पारंगत है॥ ५१॥
किं वृथाध्ययनेनात्र दृढबन्धकरेण च।<br>पठितव्यं तदेवाशु मोचयेद्भवबन्धनात्॥ ५२दृढ़ बन्धनमें डालनेवाले व्यर्थ विद्याध्ययनसे क्या लाभ? उसीका अध्ययन करना चाहिये, जो शीघ्र ही भवबन्धनसे मुक्त कर दे॥ ५२॥
गृह्णाति पुरुषं यस्माद् गृहं तेन प्रकीर्तितम्।<br>क्व सुखं बन्धनागारे तेन भीतोऽस्म्यहं पितः॥ ५३पुरुषको बन्धनमें जकड़ लेनेके कारण ही उसे गृह कहा गया है। अतः ऐसे बन्धनरूप घरमें सुख कहाँ? हे पिताजी! इसीलिये मैं भयभीत हूँ॥ ५३॥

| अ० १४ ] | प्रथम स्कन्ध | १४१ | | :--- | :--- |

| येऽबुधा मन्दमतयो विधिना मुषिताश्च ये।<br>ते प्राप्य मानुषं जन्म पुनर्बन्धं विशन्त्युत॥ ५४ | जो अज्ञानी, मन्दबुद्धि तथा अभागे मनुष्य हैं; वे इस मानव-जन्मको पाकर भी पुनः बन्धनमें पड़ जाते हैं॥ ५४॥ | | व्यास उवाच<br>न गृहं बन्धनागारं बन्धने न च कारणम्।<br>मनसा यो विनिर्मुक्तो गृहस्थोऽपि विमुच्यते॥ ५५ | **व्यासजी बोले—**गृह बन्धनागार नहीं है और न बन्धनका कारण ही है। जो मनसे बन्धनमुक्त है, वह गृहस्थ-आश्रममें रहते हुए भी मुक्त हो जाता है॥ ५५॥ | | न्यायागतधनः कुर्वन्वेदोक्तं विधिवत्क्रमात्।<br>गृहस्थोऽपि विमुच्येत श्राद्धकृत्सत्यवाक् शुचिः॥ ५६ | जो न्यायमार्गसे धनोपार्जन करता है, शास्त्रोक्त कर्मोंका विधिवत् सम्पादन करता है, पितृश्राद्ध आदि यज्ञ करता है, सर्वदा सत्य बोलता है तथा पवित्र रहता है, वह गृहमें रहते हुए भी मुक्त हो जाता है॥ ५६॥ | | ब्रह्मचारी यतिश्चैव वानप्रस्थो व्रतस्थितः।<br>गृहस्थं समुपासन्ते मध्याह्नातिक्रमे सदा॥ ५७<br><br>श्रद्धया चान्नदानेन वाचा सूनृतया तथा।<br>उपकुर्वन्ति धर्मस्था गृहाश्रमनिवासिनः॥ ५८ | ब्रह्मचारी, संन्यासी, वानप्रस्थी तथा व्रतोपवास करनेवाला—ये सब मनुष्य मध्याह्नोत्तरकालमें गृहस्थके पास ही जाते हैं। वे धार्मिक गृहस्थ श्रद्धाके साथ मधुर वचनोंद्वारा सबका सत्कार करते एवं अन्नदानसे उन्हें उपकृत करते हैं॥ ५७-५८॥ | | गृहाश्रमात्परो धर्मो न दृष्टो न च वै श्रुतः।<br>वसिष्ठादिभिराचार्यैर्ज्ञानिभिः समुपाश्रितः॥ ५९ | गृहस्थ-आश्रमसे बढ़कर कोई दूसरा आश्रम देखा या सुना नहीं गया। वसिष्ठ आदि आचार्यों और तत्त्वज्ञानियोंने इसका आश्रय ग्रहण किया है॥ ५९॥ | | किमसाध्यं महाभाग वेदोक्तानि च कुर्वतः।<br>स्वर्गं मोक्षं च सज्जन्म यद्यद्वाञ्छति तद्भवेत्॥ ६०<br><br>आश्रमादाश्रमं गच्छेदिति धर्मविदो विदुः।<br>तस्मादग्निं समाधाय कुरु कर्माण्यतन्द्रितः॥ ६१ | हे महाभाग! वेदोक्त कर्म करनेवाले गृहस्थके लिये क्या असाध्य रह जाता है? वह स्वर्ग, मोक्ष अथवा उत्तम कुलमें जन्म—जो कुछ भी चाहता है, वह हो जाता है। 'एक आश्रमसे दूसरे आश्रममें जाना चाहिये'—ऐसा धर्मज्ञोंने बताया है। अतः आलस्यरहित होकर गृहस्थसम्बन्धी कर्मोंको सम्पादित करो॥ ६०-६१॥ | | देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च सन्तर्प्य विधिवत्सुत।<br>पुत्रमुत्पाद्य धर्मज्ञ संयोज्य च गृहाश्रमे॥ ६२<br><br>त्यक्त्वा गृहं वनं गत्वा कर्तासि व्रतमुत्तमम्।<br>वानप्रस्थाश्रमं कृत्वा संन्यासं च ततः परम्॥ ६३ | हे धर्मज्ञ पुत्र! देवताओं, पितरों एवं आश्रित-जनोंको विधिवत् सन्तुष्ट करके, पुत्र उत्पन्न करके और उसे भी गृहस्थ-आश्रममें लगाकर पुनः गृह त्यागकर वनमें जाकर श्रेष्ठ व्रतका आश्रय ग्रहण करो। वहाँ वानप्रस्थ-आश्रम पूर्ण करके उसके बाद संन्यास धारण करो॥ ६२-६३॥ | | इन्द्रियाणि महाभाग मादकानि सुनिश्चितम्।<br>अदारस्य दुरन्तानि पञ्चैव मनसा सह॥ ६४ | हे महाभाग! इन्द्रियाँ मनुष्यको निश्चितरूपसे प्रमत्त बना देती हैं। जो मनुष्य स्त्रीरहित होता है, उसे मन पाँचों इन्द्रियोंसहित विकल कर देता है॥ ६४॥ |

१४२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १५
तस्माद्दारान्कुर्वीत तज्जयाय महामते।<br>वार्धके तप आतिष्ठेदिति शास्त्रोदितं वचः॥ ६५हे महामते! इसलिये उन बलवान् इन्द्रियोंपर विजय पानेके लिये स्त्रीपरिणय करके गृहस्थ बनना चाहिये, तत्पश्चात् वृद्धावस्थामें तप करना चाहिये—यह शास्त्रवचन है॥ ६५॥
विश्वामित्रो महाभाग तपः कृत्वातिदुश्चरम्।<br>त्रीणि वर्षसहस्राणि निराहारो जितेन्द्रियः॥ ६६<br><br>मोहितश्च महातेजा वने मेनकया स्थितः।<br>शकुन्तला समुत्पन्ना पुत्री तद्वीर्यजा शुभा॥ ६७हे महाभाग! वनमें स्थित महातेजस्वी महर्षि विश्वामित्र किसी समय तीन सहस्र वर्षोंतक निराहार और जितेन्द्रिय रहकर अत्यन्त कठोर तप करके भी मेनकाको देखकर मोहित हो गये और उन्हींके तेजसे पुत्रीरूपमें सुन्दर शकुन्तला पैदा हुई॥ ६६-६७॥
दृष्ट्वा दाशसुतां कालीं पिता मम पराशरः।<br>कामबाणार्दितः कन्यां तां जग्राहोडुपे स्थितः॥ ६८मेरे पिता पराशरजी भी धीवरकी कृष्णवर्णा कन्याको देखकर काम-बाणसे आहत हो गये और उन्होंने नावपर ही उसे स्वीकार कर लिया था॥ ६८॥
ब्रह्मापि स्वसुतां दृष्ट्वा पञ्चबाणप्रपीडितः।<br>धावमानश्च रुद्रेण मूर्च्छितश्च निवारितः॥ ६९ब्रह्माजी भी अपनी कन्या को देखकर कामसे पीड़ित हो गये और बेसुध होकर उसके पीछे दौड़ते रहे; तब शिवजीने उन्हें रोका॥ ६९॥
तस्मात्त्वमपि कल्याण कुरु मे वचनं हितम्।<br>कुलजां कन्यकां वृत्वा वेदमार्गं समाश्रय॥ ७०अतः हे कल्याणकारी पुत्र! तुम मेरा हितकर वचन मान लो और किसी कुलीन कन्यासे विवाह करके सनातन वेदमार्गका पालन करो॥ ७०॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे व्यासेन गृहस्थधर्मवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥


अथ पञ्चदशोऽध्यायः

शुकदेवजीका विवाहके लिये अस्वीकार करना तथा व्यासजीका उनसे श्रीमद्देवीभागवत पढ़नेके लिये कहना

श्रीशुक उवाच<br>नाहं गृहं करिष्यामि दुःखदं सर्वदा पितः।<br>वागुरासदृशं नित्यं बन्धनं सर्वदेहिनाम्॥ १**श्रीशुकदेवजी बोले—**हे पिताजी! सर्वदा दुःख देनेवाले गृहस्थाश्रमको मैं कभी स्वीकार नहीं करूँगा; क्योंकि [पशु-पक्षियोंको फँसानेवाले] जालके समान यह आश्रम सभी मानवोंके लिये सदा बन्धनस्वरूप है॥ १॥
धनचिन्तातूराणां हि क्व सुखं तात दृश्यते।<br>स्वजनैः खलु पीड्यन्ते निर्धना लोलुपा जनाः॥ २हे तात! धन-धान्यकी चिन्तामें व्याकुल लोगोंके लिये सुख कहाँ दिखायी पड़ता है? निर्धन और लोभके वशीभूत मनुष्य अपने ही परिवारजनोंद्वारा सर्वदा कष्ट पाते रहते हैं॥ २॥
इन्द्रोऽपि न सुखी तादृग्यादृशो भिक्षुनिःस्पृहः।<br>कोऽन्यः स्यादिह संसारे त्रिलोकीविभवे सति॥ ३इन्द्र भी वैसे सुखी नहीं रहते, जैसा एक सुखी निःस्पृह भिक्षुक रहता है। तब भला इस संसारमें तीनों लोकोंका वैभव पाकर भी दूसरा कौन सुखी रह सकता है?॥ ३॥
अ० १५ ]प्रथम स्कन्ध१४३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तपन्तं तापसं दृष्ट्वा मघवा दुःखितोऽभवत्।<br>विघ्नान्बहुविधानस्य करोति च दिवस्पतिः॥ ४किसी तपस्वीको तप करते हुए देखकर स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र भी चिन्तित हो उठते हैं और उसके तपमें अनेक प्रकारके विघ्न करने लगते हैं॥ ४॥
ब्रह्मापि न सुखी विष्णुर्लक्ष्मीं प्राप्य मनोरमाम्।<br>खेदं प्राप्नोति सततं संग्रामैरसुरैः सह॥ ५<br><br>करोति विपुलान्यत्नांस्तपश्चरति दुश्चरम्।<br>रमापतिरपि श्रीमान्कस्यास्ति विपुलं सुखम्॥ ६ब्रह्मा भी सुखी नहीं हैं और मनोरम लक्ष्मीको पाकर विष्णु भी सुखी नहीं हैं; उन्हें भी दैत्योंके साथ युद्धके द्वारा निरन्तर कष्ट सहन करने पड़ते हैं। उन ऐश्वर्यशाली रमापति विष्णुको भी [सुखप्राप्तिके लिये] अनेक प्रयत्न करने पड़ते हैं और कठोर तपस्या करनी पड़ती है। [इस संसारमें] किसको बहुत सुख है?॥ ५-६॥
शङ्करोऽपि सदा दुःखी भवत्येव च वेद्म्यहम्।<br>तपश्चर्यां प्रकुर्वाणो दैत्ययुद्धकरः सदा॥ ७भगवान् शंकर भी सदैव दुःखी रहते हैं—ऐसा मैं जानता हूँ; क्योंकि वे सदैव तपस्या करते हुए भी दैत्योंसे युद्ध करते रहते हैं॥ ७॥
कदाचिन्न सुखी शेते धनवानपि लोलुपः।<br>निर्धनस्तु कथं तात सुखं प्राप्नोति मानवः॥ ८<br><br>जानन्नपि महाभाग पुत्रं वा वीर्यसम्भवम्।<br>नियोक्ष्यसि महाघोरे संसारे दुःखदे सदा॥ ९हे तात! जब धनवान् होते हुए भी लोभी मनुष्य कभी भी सुखपूर्वक सो नहीं पाता, तब भला निर्धन मनुष्य कैसे सुख पा सकता है? इसलिये हे महाभाग! यह जानते हुए भी आप अपने तेजसे उत्पन्न पुत्रको दुःखदायक तथा महाभयानक संसारमें क्यों लगा रहे हैं?॥ ८-९॥
जन्मदुःखं जरादुःखं दुःखं च मरणे तथा।<br>गर्भवासे पुनर्दुःखं विष्ठामूत्रमये पितः॥ १०<br><br>तस्मादतिशयं दुःखं तृष्णालोभसमुद्भवम्।<br>याच्ञायां परमं दुःखं मरणादपि मानद॥ ११हे पिताजी! जहाँ जन्ममें दुःख, बुढ़ापेमें दुःख, मरणमें दुःख तथा पुनः विष्ठा और मूत्रसे भरे हुए गर्भमें दुःख सहन करना पड़ता है; उससे भी अधिक दुःख तृष्णा और लोभसे उत्पन्न होता है। हे मानद! मरनेसे भी अधिक दुःख माँगनेमें होता है॥ १०-११॥
प्रतिग्रहधना विप्रा न बुद्धिबलजीवनाः।<br>पराशा परमं दुःखं मरणं च दिने दिने॥ १२ब्राह्मण प्रतिग्रहद्वारा धन प्राप्त करते हैं और वे बुद्धि-बलका उपयोग नहीं करते। दूसरेके भरोसेपर रहना परम दुःखकर है तथा वह अहर्निश मृत्युके समान होता है॥ १२॥
पठित्वा सकलान् वेदाञ्छास्त्राणि च समन्ततः।<br>गत्वा च धनिनां कार्या स्तुतिः सर्वात्मना बुधैः॥ १३<br><br>एकोदरस्य का चिन्ता पत्रमूलफलादिभिः।<br>येनकेनाप्युपायेन सन्तुष्ट्या च प्रपूर्यते॥ १४सभी वेद-शास्त्रोंका भलीभाँति अध्ययन करके भी विद्वानोंको धनिकोंके पास जाकर सब प्रकारसे उनकी प्रशंसा करनी पड़ती है। केवल पेटके लिये कोई चिन्ताकी बात नहीं; उसे तो केवल पत्र, फल एवं कन्द-मूल आदिसे किसी भी प्रकार सन्तुष्टिपूर्वक भरा जा सकता है॥ १३-१४॥
भार्या पुत्रास्तथा पौत्राः कुटुम्बे विपुले सति।<br>पूरणार्थं महद्दुःखं क्व सुखं पितरद्भुतम्॥ १५हे पिताजी! भार्या, पुत्र, पौत्र आदि बड़े कुटुम्बके पालनमें तो अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। ऐसी दशामें गृहस्थको सुख कहाँ है?॥ १५॥

| १४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
योगशास्त्रं वद मम ज्ञानशास्त्रं सुखाकरम्।<br>कर्मकाण्डेऽखिले तात न रमेऽहं कदाचन॥ १६इसलिये हे तात! मुझे सुखदायी ज्ञानशास्त्र और योगशास्त्रका उपदेश कीजिये। सम्पूर्ण कर्मकाण्डमें मेरा मन कभी नहीं लगता॥ १६॥
वद कर्मक्षयोपायं प्रारब्धं सञ्चितं तथा।<br>वर्तमानं यथा नश्येत् त्रिविधं कर्ममूलजम्॥ १७अतः कर्मक्षयका कोई उपाय बताइये; जिससे संचित, प्रारब्ध एवं क्रियमाण—तीनों प्रकारके कर्मफल नष्ट हो जायँ॥ १७॥
जलूकेव सदा नारी रुधिरं पिबतीति वै।<br>मूर्खस्तु न विजानाति मोहितो भावचेष्टितैः॥ १८स्त्री जोंकके समान सदा [पुरुषका] रक्त चूसती रहती है, जिसे बुद्धिहीन मनुष्य उसकी भावपूर्ण चेष्टाओंसे मोहित होनेके कारण नहीं जान पाता॥ १८॥
भोगैर्वीर्यं धनं पूर्णं मनः कुटिलभाषणैः।<br>कान्ता हरति सर्वस्वं कः स्तेनस्तादृशोऽपरः॥ १९स्त्री अपने संसर्गसे उसके तेजका तथा अपनी वचनचातुरीद्वारा उसके सम्पूर्ण धन और मनका—इस प्रकार सर्वस्वका हरण कर लेती है। उससे बढ़कर दूसरा चोर कौन है?॥ १९॥
निद्रासुखविनाशार्थं मूर्खस्तु दारसंग्रहम्।<br>करोति वञ्चितो धात्रा दुःखाय न सुखाय च॥ २०इसलिये मेरे विचारमें तो मूर्ख मनुष्य ही केवल निद्रासुखका नाश करनेके लिये स्त्रीपरिणय करता है। विधाताद्वारा वह दुःखके लिये ही ठगा जाता है, सुखके लिये नहीं॥ २०॥
सूत उवाच<br>एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वा व्यासः शुकस्य च।<br>सम्प्राप महतीं चिन्तां किं करोमीत्यसंशयम्॥ २१**सूतजी बोले—**इस प्रकार शुकदेवकी युक्तियुक्त ये बातें सुनकर व्यासजी बड़ी चिन्तामें पड़ गये। वे मन-ही-मन सोचने लगे—‘अब मैं क्या करूँ?’
तस्य सुस्रुवुरश्रूणि लोचनाद्दुःखजानि च।<br>वेपथुश्च शरीरेऽभूद् ग्लानिं प्राप मनस्तथा॥ २२तत्पश्चात् उनकी आँखोंसे दुःखके आँसू बहने लगे, शरीर काँपने लगा और मनमें ग्लानि होने लगी॥ २१-२२॥
शोचन्तं पितरं दृष्ट्वा दीनं शोकपरिप्लुतम्।<br>उवाच पितरं व्यासं विस्मयोत्फुल्ललोचनः॥ २३इस प्रकार शोक करते हुए अपने दीन तथा शोकाकुल पिताको देखकर आश्चर्यसे विस्मित नेत्रवाले शुकदेवजीने अपने पिता व्यासजीसे कहा—
अहो मायाबलं चोग्रं यन्मोहयति पण्डितम्।<br>वेदान्तस्य च कर्तारं सर्वज्ञं वेदसम्मितम्॥ २४अहो! माया कितनी प्रबल है, जो कि यह वेदान्तदर्शनके प्रणेता तथा वेदका सांगोपांग ज्ञान रखनेवाले सर्वज्ञ पण्डित मेरे पिताजीको भी मोहित कर रही है!॥ २३-२४॥
न जाने का च सा माया किंस्वित्सातीव दुष्करा।<br>या मोहयति विद्वांसं व्यासं सत्यवतीसुतम्॥ २५न जाने वह कौन-सी तथा कैसी अति दुष्कर माया है, जो सत्यवतीसुत विद्वान् व्यासजीको भी मोहित कर रही है!॥ २५॥
पुराणानां च वक्ता च निर्माता भारतस्य च।<br>विभागकर्ता वेदानां सोऽपि मोहमुपागतः॥ २६जो पुराणोंके वक्ता, महाभारतके रचयिता, वेदोंके विभागकर्ता हैं, वे भी [मायाजनित] मोहको प्राप्त हो गये हैं॥ २६॥
अ० १५ ]प्रथम स्कन्ध१४५
तां यामि शरणं देवीं या मोहयति वै जगत्।<br>ब्रह्मविष्णुहरादींश्च कथान्येषां च कीदृशी ॥ २७इसलिये मैं उन्हीं देवी महामायाकी शरणमें जाऊँ, जो समस्त जगत् तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदिको भी मोहित कर देती हैं, तब दूसरोंकी बात ही क्या है ? ॥ २७ ॥
कोऽप्यस्ति त्रिषु लोकेषु यो न मुह्यति मायया।<br>यन्मोहं गमिताः पूर्वे ब्रह्मविष्णुहरादयः ॥ २८इन तीनों लोकोंमें कौन ऐसा है जो मायासे मोहित न होता हो ? उस मायाने तो ब्रह्मा आदि देवताओंको भी पूर्वकालमें मोहित कर दिया था ॥ २८ ॥
अहो बलमहो वीर्यं देव्या खलु विनिर्मितम्।<br>माययैव वशं नीतः सर्वज्ञ ईश्वरः प्रभुः ॥ २९अहो! उन भगवती जगदम्बाके द्वारा रचित मायाका बल तथा पराक्रम महान् आश्चर्यजनक है; उन्होंने अपनी मायाके प्रभावसे ही सर्वज्ञ और सर्वान्तर्यामी ईश्वरको भी अपने वशमें कर रखा है ॥ २९ ॥
विष्ण्वंशसम्भवो व्यास इति पौराणिका जगुः।<br>सोऽपि मोहार्णवे मग्नो भग्नपोतो वणिग्यथा ॥ ३०पौराणिकोंद्वारा कहा गया है कि व्यासजी भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए हैं; तथापि वे आज शोक-सागरमें इस प्रकार डूब रहे हैं जैसे समुद्रमें भग्न जलयानवाला वणिक् ॥ ३० ॥
अश्रुपातं करोत्यद्य विवशः प्राकृतो यथा।<br>अहो मायाबलं चैतद्दुस्त्यजं पण्डितैरपि ॥ ३१आज वे भी मायाके वशीभूत होकर एक साधारण व्यक्तिके समान आँसू बहा रहे हैं। अहो! माया बड़ी प्रबल है, जिसे बड़े-बड़े विद्वान् भी नहीं त्याग पाते ॥ ३१ ॥
कोऽयं कोऽहं कथं चेह कीदृशोऽयं भ्रमः किल।<br>पञ्चभूतात्मके देहे पितापुत्रेति वासना ॥ ३२<br><br>बलिष्ठा खलु मायेयं मायिनामपि मोहिनी।<br>ययाभिभूतः कृष्णोऽपि करोति रोदनं द्विजः ॥ ३३व्यास कौन हैं? मैं कौन हूँ? यह संसार क्या वस्तु है ? और यह कैसा भ्रम है ? इस पांचभौतिक शरीरमें पिता-पुत्रकी भावना कहाँसे आयी ? यह माया अतीव प्रबल है, जो मायावियोंको भी मोहित कर देती है, जिसके वशीभूत होकर यहाँ द्विज कृष्णद्वैपायन भी रुदन कर रहे हैं॥ ३२-३३ ॥
<center>सूूत उवाच</center>तां नत्वा मनसा देवीं सर्वकारणकारणम्।<br>जननीं सर्वदेवानां ब्रह्मादीनां तथेश्वरीम् ॥ ३४<br><br>पितरं प्राह दीनं तं शोकार्णवपरिप्लुतम्।<br>अरणीसम्भवो व्यासं हेतुमद्वचनं शुभम् ॥ ३५**सूतजी बोले—**सब कारणोंकी एकमात्र कारण, सब देवताओंकी जननी तथा ब्रह्मा आदि देवताओंकी भी स्वामिनी आदिशक्ति भगवतीको मनसे स्मरण करके शोकसागरमें डूबे हुए अपने दुःखी पिता श्रीव्यासजीसे अरणीपुत्र शुकदेवजीने इस प्रकार नीतियुक्त वचन कहा— ॥ ३४-३५ ॥
पाराशर्य महाभाग सर्वेषां बोधदः स्वयम्।<br>किं शोकं कुरुषे स्वामिन्व्यथाज्ञः प्राकृतो नरः ॥ ३६हे पराशरनन्दन! हे महाभाग! आप तो स्वयं सब लोगोंको ज्ञान देनेवाले हैं तब हे स्वामिन्! आप ऐसा शोक क्यों करते हैं, जैसा कोई अज्ञ साधारण व्यक्ति करता है ? ॥ ३६ ॥

| १४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ | | :--- | :--- |

| अद्याहं तव पुत्रोऽस्मि न जाने पूर्वजन्मनि।<br>कोऽहं कस्त्वं महाभाग विभ्रमोऽयं महात्मनि॥ ३७ | हे महाभाग! इस समय मैं आपका पुत्र हूँ, परंतु यह कौन जानता है कि पूर्वजन्ममें मैं कौन था और आप कौन थे ? यह संसार तो महात्माओंके लिये एक भ्रममात्र है ॥ ३७ ॥ | | कुरु धैर्यं प्रबुध्यस्व मा विषादे मनः कृथाः।<br>मोहजालमिमं मत्वा मुञ्च शोकं महामते॥ ३८ | अतएव आप धैर्य रखें, विवेक धारण करें तथा मनमें खेद न करें। हे महामते! इसे मोहजाल समझकर आप शोकका परित्याग करें ॥ ३८ ॥ | | क्षुधानिवृत्तिर्भक्ष्येण न पुत्रदर्शनेन च।<br>पिपासा जलपानेन याति नैवात्मजेक्षणात्॥ ३९<br><br>घ्राणं सुखं सुगन्धेन कर्णजं श्रवणेन च।<br>स्त्रीसुखं तु स्त्रिया नूनं पुत्रोऽहं किं करोमि ते॥ ४० | भूख भोजनसे मिटती है, पुत्रके देखनेसे नहीं। प्यास भी जल पीनेसे मिटती है, केवल पुत्र-दर्शनसे नहीं। इसी प्रकार सुगन्धित पदार्थसे नाकको तथा अच्छी बातोंसे कानोंको एवं स्त्रीसे विषय-सुखका आनन्द मिलता है। मैं आपका पुत्र हूँ, बताइये मैं आपके लिये क्या करूँ ? ॥ ३९-४० ॥ | | अजीगर्तेन पुत्रोऽपि हरिश्चन्द्राय भूभुजे।<br>पशुकामाय यज्ञार्थे दत्तो मूल्येन सर्वथा॥ ४१<br><br>सुखानां साधनं द्रव्यं धनात्सुखसमुच्चयः।<br>धनमर्जय लोभश्चेत्पुत्रोऽहं किं करोम्यहम्॥ ४२ | किसी समय अजीगर्त नामक ब्राह्मणने धन लेकर अपने पुत्र शुनःशेपको यज्ञपशुके रूपमें राजा हरिश्चन्द्रके हाथ बेच दिया था। सुखका साधन केवल धन ही है, धन ही सुखकी राशि है। अतः यदि आपको लोभ हो, तो धनका संचय कीजिये। मैं आपका पुत्र हूँ, अतः [आपके सुखके लिये] मैं क्या करूँ ? ॥ ४१-४२ ॥ | | मां प्रबोधय बुद्ध्या त्वं दैवज्ञोऽसि महामते।<br>यथा मुच्येयमत्यन्तं गर्भवासभयान्मुने॥ ४३ | हे महामते! आप दैवज्ञ हैं। अतः हे मुने! आप मुझे अपनी बुद्धिसे ऐसा ज्ञान दीजिये, जिससे मैं गर्भवासजनित महान् भयसे मुक्त हो जाऊँ॥ ४३॥ | | दुर्लभं मानुषं जन्म कर्मभूमाविहानघ।<br>तत्रापि ब्राह्मणत्वं वै दुर्लभं चोत्तमे कुले॥ ४४ | हे पवित्रात्मन्! इस कर्मभूमिमें मनुष्य-जन्म अति दुर्लभ है, उसमें भी उत्तम कुलमें ब्राह्मणका जन्म और भी दुर्लभ है ॥ ४४ ॥ | | बद्धोऽहमिति मे बुद्धिर्नापसर्पति चित्ततः।<br>संसारवासनाजाले निविष्टा वृद्धिगामिनी॥ ४५ | ‘मैं आबद्ध हूँ’—यह बुद्धि मेरे चित्तसे नहीं हटती। संसारके वासनाजालमें यह उत्तरोत्तर बढ़ती हुई फँसती ही जाती है ॥ ४५ ॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्तस्तु तदा व्यासः पुत्रेणामितबुद्धिना।<br>प्रत्युवाच शुकं शान्तं चतुर्थाश्रममानसम्॥ ४६ | **सूतजी बोले—**असीम बुद्धिवाले अपने पुत्र शुकदेवके ऐसा कहनेपर व्यासजीने शान्त एवं संन्यास-आश्रमके लिये उत्सुक मनवाले शुकदेवजीसे कहा— ॥ ४६ ॥ | | व्यास उवाच<br>पठ पुत्र महाभाग मया भागवतं कृतम्।<br>शुभं न चातिविस्तीर्णं पुराणं ब्रह्मसम्मितम्॥ ४७ | **व्यासजी बोले—**हे महाभाग पुत्र! मेरेद्वारा रचित श्रीमद्देवीभागवतपुराणको तुम पढ़ो; वेदतुल्य यह पवित्र पुराण अधिक विस्तृत भी नहीं है ॥ ४७ ॥ |

अ० १५ ]प्रथम स्कन्ध१४७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्कन्धा द्वादश तत्रैव पञ्चलक्षणसंयुतम्।<br>सर्वेषां च पुराणानां भूषणं मम सम्मतम्॥ ४८इसमें बारह स्कन्ध हैं, यह पुराणोंके पाँचों लक्षणोंसे युक्त है। मेरे विचारमें यह पुराण सभी पुराणोंका आभूषण है॥ ४८॥
सदसज्ज्ञानविज्ञानं श्रुतमात्रेण जायते।<br>येन भागवतेनेह तत्पठ त्वं महामते॥ ४९हे महामते! जिस भागवतके सुननेमात्रसे सत् और असत् वस्तुओंका यथार्थ ज्ञान हो जाता है, उसे तुम पढ़ो॥ ४९॥
वटपत्रशयानाय विष्णवे बालरूपिणे।<br>केनास्मि बालभावेन निर्मितोऽहं चिदात्मना॥ ५०<br><br>किमर्थं केन द्रव्येण कथं जानामि चाखिलम्।<br>इत्येवं चिन्त्यमानाय मुकुन्दाय महात्मने॥ ५१<br><br>श्लोकार्धेन तया प्रोक्तं भगवत्याखिलार्थदम्।<br>सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्॥ ५२[एक बार महाप्रलयकालमें] वटपत्रपर शयन करते हुए बालरूपधारी भगवान् विष्णु वहाँ सोच रहे थे कि किस चिदात्माने, किस प्रयोजनसे तथा किस द्रव्यसे मुझे बालरूपमें उत्पन्न किया है? इन सब विषयोंका ज्ञान मुझे कैसे हो? इस प्रकार चिन्तन कर रहे महात्मा बालमुकुन्दसे उन आदिशक्ति भगवतीने सम्पूर्ण अर्थको प्रदान करनेवाले ज्ञानको आधे श्लोकमें ही इस प्रकार कहा—‘सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्’ अर्थात् यह सब कुछ मैं ही हूँ और दूसरा कोई भी सनातन नहीं है॥ ५०—५२॥
तद्वचो विष्णुना पूर्वं संविज्ञातं मनस्यपि।<br>केनोक्ता वागियं सत्या चिन्तयामास चेतसा॥ ५३<br><br>कथं वेद्मि प्रवक्तां स्त्रीपुंसौ वा नपुंसकम्।<br>इति चिन्ताप्रपन्नेन धृतं भागवतं हृदि॥ ५४<br><br>पुनः पुनः कृतोच्चारस्तस्मिन्नेवास्तचेतसा।<br>वटपत्रे शयानः सन्नभूच्चिन्तासमन्वितः॥ ५५यह बात पहले भी भगवान् विष्णुके हृदयमें उत्पन्न हुई थी। इसलिये अब वे सोचने लगे कि इस सत्य वचनका उच्चारण किसने किया? इस कहनेवालेको मैं कैसे जानूँ? वह स्त्री है या पुरुष अथवा नपुंसक है? ऐसी चिन्तावाले भगवान् विष्णुने भागवतको हृदयमें धारण किया और उसी श्लोकार्धमें मन लगाये हुए वे बार-बार उसका उच्चारण करने लगे। इस प्रकार वटपत्रपर सोये हुए वे भगवान् विष्णु चिन्तातुर हो गये॥ ५३—५५॥
तदा शान्ता भगवती प्रादुरास चतुर्भुजा।<br>शङ्खचक्रगदापद्मवरायुधधरा शिवा॥ ५६<br><br>दिव्याम्बरधरा देवी दिव्यभूषणभूषिता।<br>संयुता सदृशीभिश्च सखीभिः स्वविभूतिभिः॥ ५७<br><br>प्रादुर्बभूव तस्याग्रे विष्णोरमिततेजसः।<br>मन्दहास्यं प्रयुञ्जाना महालक्ष्मीः शुभानना॥ ५८उसी समय शंख, चक्र, गदा, पद्म—इन श्रेष्ठ आयुधोंको धारण किये हुए, चतुर्भुजा, शान्तिस्वरूपा, शान्ता शिवा दिव्य वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित होकर अपने ही समान विभूतियोंवाली सखियोंसहित प्रादुर्भूत हुईं। वे सुन्दर मुखवाली भगवती महालक्ष्मी परम तेजस्वी भगवान् विष्णुके समक्ष मन्द-मन्द मुसकराती हुई प्रकट हुईं॥ ५६—५८॥
सूत उवाच<br>तां तथा संस्थितां दृष्ट्वा हृदये कमलेक्षणः।<br>विस्मितः सलिले तस्मिन्निराधारां मनोरमाम्॥ ५९सूतजी बोले— उस अपार प्रलय-सागरमें बिना अवलम्बके स्थित मनोरम रूपवाली उन दिव्य देवीको देखकर कमलनयन भगवान् विष्णु बड़े ही विस्मयमें पड़े॥ ५९॥
१४८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६
रतिर्भूतिस्तथा बुद्धिर्मतिः कीर्तिः स्मृतिर्धृतिः।<br>श्रद्धा मेधा स्वधा स्वाहा क्षुधा निद्रा दया गतिः॥ ६०<br><br>तुष्टिः पुष्टिः क्षमा लज्जा जृम्भा तन्द्रा च शक्तयः।<br>संस्थिताः सर्वतः पार्श्वे महादेव्याः पृथक्पृथक्॥ ६१वहाँ रति, भूति, बुद्धि, मति, कीर्ति, स्मृति, धृति, श्रद्धा, मेधा, स्वधा, स्वाहा, क्षुधा, निद्रा, दया, गति, तुष्टि, पुष्टि, क्षमा, लज्जा, जृम्भा, तन्द्रा—ये शक्तियाँ अलग-अलग रूपमें उन महादेवीके समीप सभी ओर खड़ी थीं॥ ६०-६१॥
वरायुधधराः सर्वा नानाभूषणभूषिताः।<br>मन्दारमालाकुलिता मुक्ताहारविराजिताः॥ ६२वे सभी श्रेष्ठ आयुध धारण किये हुए थीं, नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थीं तथा उनके हृदयपर मन्दारकी मालाएँ और मोतियोंके हार सुशोभित हो रहे थे॥ ६२॥
तां दृष्ट्वा ताश्च संवीक्ष्य तस्मिन्नेकार्णवे जले।<br>विस्मयाविष्टहृदयः सम्बभूव जनार्दनः॥ ६३उन भगवती महालक्ष्मी तथा उनकी सभी अन्यान्य सखियोंको उस प्रलयसागरके जलमें उपस्थित देखकर भगवान् विष्णुके मनमें बड़ा विस्मय हुआ॥ ६३॥
चिन्तयामास सर्वात्मा दृष्टमायोऽतिविस्मितः।<br>कुतो भूताः स्त्रियः सर्वाः कुतोऽहं वटतल्पगः॥ ६४<br><br>अस्मिन्नेकार्णवे घोरे न्यग्रोधः कथमुत्थितः।<br>केनाहं स्थापितोऽस्म्यत्र शिशुं कृत्वा शुभाकृतिम्॥ ६५इस प्रकार भगवतीकी माया देखकर अति चकित सर्वात्मा भगवान् विष्णु सोचने लगे—ये देवियाँ कहाँसे आ गयीं, मैं वटवृक्षके पत्तेपर कैसे आ गया, इस एकार्णव महासागरमें वटवृक्ष कहाँसे उत्पन्न हो गया और किसके द्वारा मैं सुन्दर स्वरूपवाला बालक बनाकर उसपर स्थापित किया गया हूँ?॥ ६४-६५॥
ममेयं जननी नो वा माया वा कापि दुर्घटा।<br>दर्शनं केनचित्त्वद्य दत्तं वा केन हेतुना॥ ६६ये मेरी माता तो नहीं हैं! अथवा यह कोई दुर्घट माया है? किसने और किस कारणसे मुझे इस समय दर्शन दिये हैं?॥ ६६॥
किं मया चात्र वक्तव्यं गन्तव्यं वा न वा क्वचित्।<br>मौनमास्थाय तिष्ठेयं बालभावादतन्द्रितः॥ ६७अब मैं इस विषयमें क्या कहूँ? मैं यहाँसे कहीं चला जाऊँ अथवा मौन धारण करके बालभावसे सावधान होकर यहीं स्थित रहूँ॥ ६७॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकवैराग्यवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥


अथ षोडशोऽध्यायः

बालरूपधारी भगवान् विष्णुसे महालक्ष्मीका संवाद, व्यासजीका शुकदेवजीसे देवीभागवतप्राप्तिकी परम्परा बताना तथा शुकदेवजीका मिथिला जानेका निश्चय करना

व्यास उवाच<br>दृष्ट्वा तं विस्मितं देवं शयानं वटपत्रके।<br>उवाच सस्मितं वाक्यं विष्णो किं विस्मितो ह्यसि॥ १व्यासजी बोले— इस प्रकार वटपत्रपर सोये हुए उन भगवान् विष्णुको आश्चर्यचकित देखकर मन्द मुसकान करती हुई देवीने यह वचन कहा—‘विष्णो! आप विस्मयमें क्यों पड़े हैं?’॥ १॥
अ० १६ ]प्रथम स्कन्ध१४९
संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
महाशक्त्याः प्रभावेण त्वं मां विस्मृतवान्पुरा।<br>प्रभवे प्रलये जाते भूत्वा भूत्वा पुनः पुनः॥ २आप उस महाशक्तिकी मायासे पूर्वकालमें भी सृष्टिकी उत्पत्ति तथा प्रलय होनेपर इसी प्रकार बार-बार जन्म लेकर मुझे भूलते रहे हैं॥ २॥
निर्गुणा सा परा शक्तिः सगुणस्त्वं तथाप्यहम्।<br>सात्त्विकी किल या शक्तिस्तां शक्तिं विद्धि मामिकाम्॥ ३वे पराशक्ति निर्गुण हैं, मैं और आप तो सगुण हैं। जो सात्त्विकी शक्ति है, उसे आप मेरी ही शक्ति समझिये॥ ३॥
त्वन्नाभिकमलाद् ब्रह्मा भविष्यति प्रजापतिः।<br>स कर्ता सर्वलोकस्य रजोगुणसमन्वितः॥ ४आपके नाभिकमलसे प्रजापति ब्रह्मा उत्पन्न होंगे। वे ही रजोगुणसे युक्त होकर समस्त ब्रह्माण्डकी सृष्टि करेंगे॥ ४॥
स तदा तप आस्थाय प्राप्य शक्तिमनुत्तमाम्।<br>रजसा रक्तवर्णञ्च करिष्यति जगत्त्रयम्॥ ५<br><br>सगुणान्यञ्चभूतांश्च समुत्पाद्य महामतिः।<br>इन्द्रियाणीन्द्रियेशांश्च मनःपूर्वान्समन्ततः॥ ६<br><br>करिष्यति ततः सर्गं तेन कर्ता स उच्यते।<br>विश्वस्यास्य महाभाग त्वं वै पालयिता तथा॥ ७वे ब्रह्मा ही तपोबलका आश्रय लेकर श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त करके रजोगुणके द्वारा त्रिभुवनको लाल वर्णका कर देंगे। गुणोंसहित पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु—इन पाँचों महाभूतोंकी एवं मनके साथ इन्द्रियों तथा उनके अधिष्ठातृदेवताओंकी रचना करके वे बुद्धिमान् ब्रह्माजी जगत्की सृष्टि करेंगे; इसी कारण वे कर्ता कहे जायेंगे और आप इस विश्वके पालक होंगे॥ ५-७॥
तद्भ्रुवोर्मध्यदेशाच्च क्रोधाद् रुद्रो भविष्यति।<br>तपः कृत्वा महाघोरं प्राप्य शक्तिं तु तामसीम्॥ ८<br><br>कल्पान्ते सोऽपि संहर्ता भविष्यति महामते।<br>तेनाहं त्वामुपायाता सात्त्विकीं त्वमवेहि माम्॥ ९<br><br>स्थास्येऽहं त्वत्समीपस्था सदाहं मधुसूदन।<br>हृदये ते कृतावासा भवामि सततं किल॥ १०उनके क्रोध करनेपर उनकी भौंहोंके मध्यभागसे रुद्र उत्पन्न होंगे। हे महामते! वे ही रुद्र घोर तप करके तामसी शक्ति प्राप्तकर कल्पान्तके समय सृष्टिके संहारकर्ता होंगे। इसी कारण मैं आपके पास आयी हूँ; आप मुझे वही सात्त्विकी शक्ति समझिये। हे मधुसूदन! मैं यहीं रहूँगी। मैं तो सर्वदा आपके ही पास रहती हूँ। आपके हृदयमें मैं निरन्तर निवास करती हूँ॥ ८-१०॥
विष्णुरुवाच<br>श्लोकस्यार्धं मया पूर्वं श्रुतं देवि स्फुटाक्षरम्।<br>तत्केनोक्तं वरारोहे रहस्यं परमं शिवम्॥ ११<br><br>तन्मे ब्रूहि वरारोहे संशयोऽयं वरानने।<br>निर्धनो हि यथा द्रव्यं तत्स्मरामि पुनः पुनः॥ १२विष्णु बोले— हे देवि! हे वरारोहे! कुछ समय पूर्व मैंने स्पष्ट अक्षरोंवाला जो आधा श्लोक सुना, वह परम कल्याणप्रद तथा रहस्यमय वाक्य किसने कहा था? हे वरारोहे! यह मुझे शीघ्र बताइये; हे सुमुखि! इस विषयमें मुझे महती शंका है। जिस प्रकार निर्धन पुरुष धनकी चिन्ता करता रहता है, उसी प्रकार मैं उसका बार-बार स्मरण किया करता हूँ॥ ११-१२॥
व्यास उवाच<br>विष्णोस्तद्वचनं श्रुत्वा महालक्ष्मीः स्मितानना।<br>उवाच परया प्रीत्या वचनं चारुहासिनी॥ १३व्यासजी बोले— विष्णुका वह वचन सुनकर मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली महालक्ष्मी मधुर हास्यके साथ अत्यन्त प्रेमसे बोलीं— ॥ १३ ॥
१५०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६

| महालक्ष्मीरूवाच<br>शृणु शौरे वचो मह्यं सगुणाऽहं चतुर्भुजा।<br>मां जानासि न जानासि निर्गुणां सगुणालयाम्॥ १४<br><br>त्वं जानीहि महाभाग तया तत्प्रकटीकृतम्।<br>पुण्यं भागवतं विद्धि वेदसारं शुभावहम्॥ १५<br><br>कृपां च महतीं मन्ये देव्याः शत्रुनिषूदन।<br>यया प्रोक्तं परं गुह्यं हिताय तव सुव्रत॥ १६<br><br>रक्षणीयं सदा चित्ते न विस्मार्यं कदाचन।<br>सारं हि सर्वशास्त्राणां महाविद्याप्रकाशितम्॥ १७<br><br>नातः परं वेदितव्यं वर्तते भुवनत्रये।<br>प्रियोऽसि खलु देव्यास्त्वं तेन ते व्याहृतं वचः॥ १८<br><br>व्यास उवाच<br>इति श्रुत्वा वचो देव्या महालक्ष्म्‍याश्चतुर्भुजः।<br>दधार हृदये नित्यं मत्वा मन्त्रमनुत्तमम्॥ १९<br><br>कालेन कियता तत्र तन्नाभिकमलोद्भवः।<br>ब्रह्मा दैत्यभयात्त्रस्तो जगाम शरणं हरेः॥ २०<br><br>ततः कृत्वा महायुद्धं हत्वा तौ मधुकैटभौ।<br>जजाप भगवान्विष्णुः श्लोकार्धं विशदाक्षरम्॥ २१<br><br>जपन्तं वासुदेवं च दृष्ट्वा देवः प्रजापतिः।<br>पप्रच्छ परमप्रीतः कञ्जजः कमलापतिम्॥ २२<br><br>किं त्वं जपसि देवेश त्वत्तः कोऽप्यधिकोऽस्ति वै।<br>यत्स्मृत्वा पुण्डरीकाक्ष प्रीतोऽसि जगदीश्वर॥ २३<br><br>हरिरुवाच<br>मयि त्वयि च या शक्तिः क्रियाकारणलक्षणा।<br>विचारय महाभाग या सा भगवती शिवा॥ २४<br><br>यस्याधारे जगत्सर्वं तिष्ठत्यत्र महार्णवे।<br>साकारा या महाशक्तिरमेया च सनातनी॥ २५ | महालक्ष्मी बोलीं—हे शौरे! मेरी बात सुनिये। मैं सगुणरूपा चतुर्भुजा भगवती हूँ। आप मुझे जानते हों या न जानते हों, किंतु मैं सब गुणोंका आलय होती हुई निर्गुणा भी हूँ॥ १४॥<br><br>हे महाभाग! आप यह जान लें कि वह अर्धश्लोक उसी पराशक्तिने कहा था। आप उसे सब वेदोंका तत्त्वस्वरूप, कल्याणकारी और पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवत समझिये। हे शत्रुमर्दिन! हे सुव्रत! मैं भगवतीकी परम कृपा मानती हूँ, जिसने ऐसा गुप्त एवं परम रहस्यमय मन्त्र आपके कल्याणके लिये कहा है॥ १५-१६॥<br><br>आप इसे सर्वदा चित्तमें रखिये और कभी भी इसे विस्मृत न कीजिये; यह सब शास्त्रोंका सार है तथा महाविद्याके द्वारा प्रकाशित किया गया है॥ १७॥<br><br>इससे बढ़कर त्रिभुवनमें कुछ भी ज्ञातव्य नहीं है। आप निश्चय ही देवीके परम प्रिय हैं, इसीलिये उन्होंने यह मन्त्र आपको बताया है॥ १८॥<br><br>व्यासजी बोले—महादेवी लक्ष्मीके इस वचनको सुनकर चतुर्भुज भगवान् विष्णुने इसे सर्वश्रेष्ठ मन्त्र समझकर सदाके लिये हृदयमें धारण कर लिया॥ १९॥<br><br>कुछ दिनोंके बाद उनके नाभिकमलसे उत्पन्न ब्रह्माजी दैत्योंके भयसे डरकर भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। तब वे भगवान् विष्णु भयंकर युद्ध करके मधु-कैटभका वधकर उस विशद अक्षरोंवाले श्लोकार्धरूप मन्त्रका जप करने लगे॥ २०-२१॥<br><br>भगवान् वासुदेवको जप करते हुए देखकर प्रजापति ब्रह्माजीने प्रेमपूर्वक कमलापतिसे पूछा—हे देवेश! हे पुण्डरीकाक्ष! हे जगदीश्वर! आप किसका जप कर रहे हैं? आपसे भी बढ़कर दूसरा कौन है, जिसका ध्यान करके आप इतने प्रसन्न हो रहे हैं?॥ २२-२३॥<br><br>विष्णु बोले—हे महाभाग! विचार कीजिये कि आपमें और मुझमें जो कार्यकारणस्वरूपा शक्ति विद्यमान है, वे ही भगवती शिवा हैं। जिनके आधारपर एकार्णव महासागरमें यह समस्त जगत् ठहरा हुआ है। जो महाशक्ति साकार, असीम तथा सनातनी भगवती हैं और यह समस्त जड-चेतन |

अ० १६ ]प्रथम स्कन्ध१५१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्।<br>सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये॥ २६संसार जिनके द्वारा रचा गया है, वे ही जब प्रसन्न होती हैं तब मनुष्योंके उद्धारके लिये वरदायिनी होती हैं॥ २४—२६॥
सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी।<br>संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी॥ २७वे ही सनातनी परमा विद्या हैं, संसारके बन्धन एवं मुक्तिकी कारणस्वरूपा हैं और वे ही सभी ईश्वरोंकी भी स्वामिनी हैं॥ २७॥
अहं त्वमखिलं विश्वं तस्याश्चिच्छक्तिसम्भवम्।<br>विद्धि ब्रह्मन् सन्देहः कर्तव्यः सर्वदानघ॥ २८मैं, आप तथा समस्त संसार उन्हींकी चैतन्य शक्तिसे उत्पन्न हुए हैं। हे ब्रह्मन्! हे निष्पाप! ऐसा आप सत्य जानिये, इसमें सन्देह नहीं है॥ २८॥
श्लोकार्धेन तया प्रोक्तं तद्वै भागवतं किल।<br>विस्तरो भविता तस्य द्वापरादौ युगे तथा॥ २९उन भगवतीने आधे श्लोकमें ही जो कहा है, वही वास्तविक श्रीमद्देवीभागवत है। द्वापरयुगके आदिमें पुनः उसका विस्तार होगा॥ २९॥
व्यास उवाच<br>ब्रह्मणा संगृहीतं च विष्णोस्तु नाभिपङ्कजे।<br>नारदाय च तेनोक्तं पुत्रायामितबुद्धये॥ ३०<br><br>नारदेन तथा मह्यं दत्तं हि मुनिना पुरा।<br>मया कृतमिदं पूर्णं द्वादशस्कन्धविस्तरम्॥ ३१व्यासजी बोले— इस प्रकार भगवान् विष्णुके नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माजीने उस भागवतका संग्रह किया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने परम बुद्धिमान् पुत्र नारदजीसे इसे कहा। पूर्वकालमें वही भागवत देवर्षि नारदजीने मुझे दिया और फिर मैंने उसे बारह स्कन्धोंमें विस्तृत करके पूर्ण किया॥ ३०-३१॥
तत्पठस्व महाभाग पुराणं ब्रह्मसम्मितम्।<br>पञ्चलक्षणयुक्तं च देव्याश्चरितमुत्तमम्॥ ३२हे महाभाग! वेदतुल्य, पाँच लक्षणोंसे युक्त तथा भगवतीके उत्तम चरितोंसे ओत-प्रोत इस ‘श्रीमद्देवीभागवत’ पुराणको पढ़ो॥ ३२॥
तत्त्वज्ञानरसोपेतं सर्वेषामुत्तमोत्तमम्।<br>धर्मशास्त्रसमं पुण्यं वेदार्थेनोपबृंहितम्॥ ३३<br><br>वृत्रासुरवधोपेतं नानाख्यानकथायुतम्।<br>ब्रह्मविद्यानिधानं तु संसारार्णवतारकम्॥ ३४तत्त्वज्ञानके रससे परिपूर्ण, वेदार्थके द्वारा उपबृंहित और धर्मशास्त्रके समान पुण्यप्रद यह भागवत सभी पुराणोंमें श्रेष्ठतम है। यह वृत्रासुरवधके कथानकसे युक्त, विविध आख्यानोपाख्यानोंसे समन्वित, ब्रह्मविद्याका निधान एवं भवसागरसे पार करनेवाला है॥ ३३-३४॥
गृहाण त्वं महाभाग योग्योऽसि मतिमत्तरः।<br>पुण्यं भागवतं नाम पुराणं पुरुषर्षभ॥ ३५अतः हे महाभाग! तुम उस भागवतको अवश्य पढ़ो; तुम अत्यन्त बुद्धिमान् और योग्य हो। हे नरश्रेष्ठ! यह श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण पुण्यप्रद है॥ ३५॥
अष्टादशसहस्त्राणां श्लोकानां कुरु संग्रहम्।<br>अज्ञाननाशनं दिव्यं ज्ञानभास्करबोधकम्॥ ३६<br><br>सुखदं शान्तिदं धन्यं दीर्घायुष्यकरं शिवम्।<br>शृण्वतां पठतां चेदं पुत्रपौत्रविवर्धनम्॥ ३७तुम इसके अठारह हजार श्लोकोंको हृदयंगम कर लो; यह पुराण पाठ तथा श्रवण करनेवालेके लिये अज्ञानका नाश करनेवाला, दिव्य ज्ञानरूपी सूर्यका बोध करानेवाला, सुखप्रद, शान्तिदायक, धन्य, दीर्घ आयु प्रदान करनेवाला, कल्याणकारी तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला है॥ ३६-३७॥
१५२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६

| शिष्योऽयं मम धर्मात्मा लोमहर्षणसम्भवः ।<br>पठिष्यति त्वया सार्धं पुराणीं संहितां शुभाम् ॥ ३८ | लोमहर्षणसे उत्पन्न मेरे शिष्य ये धर्मात्मा सूतजी भी तुम्हारे साथ इस शुभ पुराण-संहिताका अध्ययन करेंगे ॥ ३८ ॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्तं तेन पुत्राय मह्यं च कथितं किल ।<br>मया गृहीतं तत्सर्वं पुराणं चातिविस्तरम् ॥ ३९ | सूतजी बोले— हे मुनियो! व्यासजीने मुझसे और अपने पुत्रसे इस प्रकार कहा था, तब मैंने उस सम्पूर्ण विस्तृत पुराण-संहिताको विधिवत् पढ़ा था ॥ ३९ ॥ | | शुकोऽधीत्य पुराणं तु स्थितो व्यासाश्रमे शुभे ।<br>न लेभे शर्म धर्मात्मा ब्रह्मात्मज इवापरः ॥ ४० | उस समय भागवतपुराणका अध्ययन करके शुकदेवजी व्यासजीके पवित्र आश्रममें ही रहने लगे, परंतु दूसरे ब्रह्मापुत्र नारदकी भाँति उन धर्मात्माको वहाँ शान्ति न मिल सकी ॥ ४० ॥ | | एकान्तसेवी विकलः स शून्य इव लक्ष्यते ।<br>नात्यन्तभोजनासक्तो नोपवासरतस्तथा ॥ ४१ | एकान्तमें रहनेवाले तथा व्याकुलचित्त वे उदासीनकी भाँति दिखायी पड़ते थे। न वे अधिक भोजन करते थे और न उपवासपूर्वक ही रहते थे ॥ ४१ ॥ | | चिन्ताविष्टं शुकं दृष्ट्वा व्यासः प्राह सुतं प्रति ।<br>किं पुत्र चिन्त्यते नित्यं कस्माद्व्यग्रोऽसि मानद ॥ ४२ | इस प्रकार अपने पुत्र शुकदेवको चिन्तित देखकर व्यासजी बोले— हे पुत्र! तुम क्या चिन्ता करते रहते हो? हे मानद! तुम किसलिये व्याकुल रहते हो? | | आस्से ध्यानपरो नित्यमृणग्रस्त इवाधनः ।<br>का चिन्ता वर्तते पुत्र मयि ताते तु तिष्ठति ॥ ४३ | ऋणग्रस्त निर्धन व्यक्तिकी भाँति तुम सदा चिन्ता करते रहते हो। हे पुत्र! मुझ पिताके रहते तुम्हें किस बातकी चिन्ता हो रही है? ॥ ४२-४३ ॥ | | सुखं भुंक्ष्व यथाकामं मुञ्च शोकं मनोगतम् ।<br>ज्ञानं चिन्तय शास्त्रोक्तं विज्ञाने च मतिं कुरु ॥ ४४ | तुम मनकी ग्लानि छोड़ो; यथेष्टरूपसे सुखोपभोग करो, शास्त्रोक्त ज्ञानका चिन्तन करो और आत्मचिन्तनमें मन लगाओ ॥ ४४ ॥ | | न चेन्मनसि ते शान्तिर्वचसा मम सुव्रत ।<br>गच्छ त्वं मिथिलां पुत्र पालितां जनकेन ह ॥ ४५ | हे सुव्रत! यदि मेरे उपदेशसे तुम्हें शान्ति नहीं मिलती, तो राजा जनकके द्वारा पालित मिथिलापुरी चले जाओ। | | स ते मोहं महाभाग नाशयिष्यति भूपतिः ।<br>जनको नाम धर्मात्मा विदेहः सत्यसागरः ॥ ४६ | हे महाभाग! वे विदेह राजा जनक तुम्हारे मोहका नाश कर देंगे; क्योंकि वे सत्यसिन्धु तथा धर्मात्मा हैं ॥ ४५-४६ ॥ | | तं गत्वा नृपतिं पुत्र सन्देहं स्वं निवर्तय ।<br>वर्णाश्रमाणां धर्मांस्त्वं पृच्छ पुत्र यथातथम् ॥ ४७ | हे पुत्र! उन राजाके पास जाकर तुम अपना सन्देह दूर करो और वर्णाश्रम-धर्मके रहस्यको उनसे यथार्थरूपमें पूछो ॥ ४७ ॥ | | जीवन्मुक्तः स राजर्षिर्ब्रह्मज्ञानमतिः शुचिः ।<br>तथ्यवक्तातिशान्तश्च योगी योगप्रियः सदा ॥ ४८ | वे राजर्षि जीवन्मुक्त, ब्रह्मज्ञानका चिन्तन करनेवाले, पवित्र, यथार्थ वक्ता, शान्तचित्त तथा सदा योगप्रिय भी हैं ॥ ४८ ॥ | | सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य व्यासस्यामिततेजसः ।<br>प्रत्युवाच महातेजाः शुकश्चारणिसम्भवः ॥ ४९ | सूतजी बोले— परम तेजस्वी उन व्यासजीका वचन सुनकर अरणिसे उत्पन्न महातेजस्वी शुकदेवजीने उत्तर दिया। हे धर्मात्मन्! आपके द्वारा यह जो कहा |

अ० १६ ]प्रथम स्कन्ध१५३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दम्भोऽयं किल धर्मात्मन्भाति चित्ते ममाधुना।<br>जीवन्मुक्तो विदेहश्च राज्यं शास्ति मुदान्वितः॥ ५०<br><br>वन्ध्यापुत्र इवाभाति राजासौ जनकः पितः।<br>कुर्वन् राज्यं विदेहः किं सन्देहोऽयं ममाद्भुतः॥ ५१जा रहा है, उससे मेरे चित्तमें शंका उठती है कि कहीं यह दम्भ तो नहीं। जीवन्मुक्त तथा विदेह होते हुए भी राजा जनक हर्षके साथ कैसे राज्य करते हैं? हे पिताजी! यह बात तो वैसे ही असम्भव है जैसे किसी वन्ध्याको पुत्र हो! अतः वे राजा जनक राज्य करते हुए भी विदेह कैसे हैं? यह मुझे अद्भुत सन्देह हो रहा है!॥४९–५१॥
द्रष्टुमिच्छाम्यहं भूपं विदेहं नृपसत्तमम्।<br>कथं तिष्ठति संसारे पद्मपत्रमिवाम्भसि॥ ५२<br><br>सन्देहोऽयं महांस्तात विदेहे परिवर्तते।<br>मोक्षः किं वदतां श्रेष्ठ सौगतानामिवापरः॥ ५३अब मैं नृपश्रेष्ठ विदेह जनकको देखना चाहता हूँ कि वे जलमें कमलपत्रकी भाँति संसारमें कैसे रहते हैं? हे तात! उनके विदेह होनेके विषयमें मुझे बड़ा सन्देह हो रहा है! हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! सौगतोंकी भाँति वे भी मोक्षकी एक दूसरी परिभाषा तो नहीं हैं!॥ ५२–५३॥
कथं भुक्तमभुक्तं स्यादकृतं च कृतं कथम्।<br>व्यवहारः कथं त्याज्य इन्द्रियाणां महामते॥ ५४हे महामते! भला भोगा हुआ भोग अभोग और किया हुआ कर्म अकर्म कैसे हो सकता है? इन्द्रियोंका सहज व्यवहार कैसे छोड़ा जा सकता है?॥ ५४॥
माता पुत्रस्तथा भार्या भगिनी कुलटा तथा।<br>भेदाभेदः कथं न स्याद्यद्येतन्मुक्तता कथम्॥ ५५एक पुत्रका अपनी माता, पत्नी, बहन तथा किसी असती स्त्रीके साथ भेद-अभेदका सम्बन्ध क्यों नहीं होगा? और ऐसा होनेपर जीवन्मुक्तता कैसी?॥ ५५॥
कटु क्षारं तथा तीक्ष्णं कषायं मिष्टमेव च।<br>रसना यदि जानाति भुंक्ते भोगाननुत्तमान्॥ ५६<br><br>शीतोष्णसुखदुःखादिपरिज्ञानं यदा भवेत्।<br>मुक्तता कीदृशी तात सन्देहोऽयं ममाद्भुतः॥ ५७यदि जिह्वा कटु, क्षार, तीक्ष्ण, कषाय, मधुर आदि स्वादोंको जानती है तो वे अच्छे-अच्छे पदार्थोंका रसास्वादन करते ही होंगे। यदि शीत, उष्ण, सुख-दुःखका परिज्ञान उन्हें होता होगा तो भला यह मुक्तता कैसी? हे तात! मुझे यह अद्भुत सन्देह हो रहा है!॥ ५६–५७॥
शत्रुमित्रपरिज्ञानं वैरं प्रीतिकरं सदा।<br>व्यवहारे परे तिष्ठन्कथं न कुरुते नृपः॥ ५८<br><br>चौरं वा तापसं वापि समानं मन्यते कथम्।<br>असमा यदि बुद्धिः स्यान्मुक्तता तर्हि कीदृशी॥ ५९शत्रु और मित्रको पहचानकर उनके साथ वैर अथवा प्रीतिका व्यवहार किया जाता है, तो राज्यसिंहासनपर बैठे हुए राजा जनक शत्रुता या मित्रताका व्यवहार क्या नहीं रखते होंगे? उनके राज्यमें साधु और चोर समान कैसे समझे जाते हैं? यदि उनके प्रति समान बुद्धि नहीं है, तब भला वह जीवन्मुक्तता कैसी?॥ ५८–५९॥
दृष्टपूर्वो न मे कश्चिज्जीवन्मुक्तश्च भूपतिः।<br>शङ्केयं महती तात गृहे मुक्तः कथं नृपः॥ ६०ऐसा जीवन्मुक्त कोई राजा मेरे द्वारा पहले देखा नहीं गया। हे तात! यह बहुत बड़ी शंका है कि वे राजा जनक घरमें रहकर भी मुक्त कैसे हैं? उन