भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 154
अ० १५ ]प्रथम स्कन्ध१४५
तां यामि शरणं देवीं या मोहयति वै जगत्।<br>ब्रह्मविष्णुहरादींश्च कथान्येषां च कीदृशी ॥ २७इसलिये मैं उन्हीं देवी महामायाकी शरणमें जाऊँ, जो समस्त जगत् तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदिको भी मोहित कर देती हैं, तब दूसरोंकी बात ही क्या है ? ॥ २७ ॥
कोऽप्यस्ति त्रिषु लोकेषु यो न मुह्यति मायया।<br>यन्मोहं गमिताः पूर्वे ब्रह्मविष्णुहरादयः ॥ २८इन तीनों लोकोंमें कौन ऐसा है जो मायासे मोहित न होता हो ? उस मायाने तो ब्रह्मा आदि देवताओंको भी पूर्वकालमें मोहित कर दिया था ॥ २८ ॥
अहो बलमहो वीर्यं देव्या खलु विनिर्मितम्।<br>माययैव वशं नीतः सर्वज्ञ ईश्वरः प्रभुः ॥ २९अहो! उन भगवती जगदम्बाके द्वारा रचित मायाका बल तथा पराक्रम महान् आश्चर्यजनक है; उन्होंने अपनी मायाके प्रभावसे ही सर्वज्ञ और सर्वान्तर्यामी ईश्वरको भी अपने वशमें कर रखा है ॥ २९ ॥
विष्ण्वंशसम्भवो व्यास इति पौराणिका जगुः।<br>सोऽपि मोहार्णवे मग्नो भग्नपोतो वणिग्यथा ॥ ३०पौराणिकोंद्वारा कहा गया है कि व्यासजी भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए हैं; तथापि वे आज शोक-सागरमें इस प्रकार डूब रहे हैं जैसे समुद्रमें भग्न जलयानवाला वणिक् ॥ ३० ॥
अश्रुपातं करोत्यद्य विवशः प्राकृतो यथा।<br>अहो मायाबलं चैतद्दुस्त्यजं पण्डितैरपि ॥ ३१आज वे भी मायाके वशीभूत होकर एक साधारण व्यक्तिके समान आँसू बहा रहे हैं। अहो! माया बड़ी प्रबल है, जिसे बड़े-बड़े विद्वान् भी नहीं त्याग पाते ॥ ३१ ॥
कोऽयं कोऽहं कथं चेह कीदृशोऽयं भ्रमः किल।<br>पञ्चभूतात्मके देहे पितापुत्रेति वासना ॥ ३२<br><br>बलिष्ठा खलु मायेयं मायिनामपि मोहिनी।<br>ययाभिभूतः कृष्णोऽपि करोति रोदनं द्विजः ॥ ३३व्यास कौन हैं? मैं कौन हूँ? यह संसार क्या वस्तु है ? और यह कैसा भ्रम है ? इस पांचभौतिक शरीरमें पिता-पुत्रकी भावना कहाँसे आयी ? यह माया अतीव प्रबल है, जो मायावियोंको भी मोहित कर देती है, जिसके वशीभूत होकर यहाँ द्विज कृष्णद्वैपायन भी रुदन कर रहे हैं॥ ३२-३३ ॥
<center>सूूत उवाच</center>तां नत्वा मनसा देवीं सर्वकारणकारणम्।<br>जननीं सर्वदेवानां ब्रह्मादीनां तथेश्वरीम् ॥ ३४<br><br>पितरं प्राह दीनं तं शोकार्णवपरिप्लुतम्।<br>अरणीसम्भवो व्यासं हेतुमद्वचनं शुभम् ॥ ३५**सूतजी बोले—**सब कारणोंकी एकमात्र कारण, सब देवताओंकी जननी तथा ब्रह्मा आदि देवताओंकी भी स्वामिनी आदिशक्ति भगवतीको मनसे स्मरण करके शोकसागरमें डूबे हुए अपने दुःखी पिता श्रीव्यासजीसे अरणीपुत्र शुकदेवजीने इस प्रकार नीतियुक्त वचन कहा— ॥ ३४-३५ ॥
पाराशर्य महाभाग सर्वेषां बोधदः स्वयम्।<br>किं शोकं कुरुषे स्वामिन्व्यथाज्ञः प्राकृतो नरः ॥ ३६हे पराशरनन्दन! हे महाभाग! आप तो स्वयं सब लोगोंको ज्ञान देनेवाले हैं तब हे स्वामिन्! आप ऐसा शोक क्यों करते हैं, जैसा कोई अज्ञ साधारण व्यक्ति करता है ? ॥ ३६ ॥