देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| १४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| योगशास्त्रं वद मम ज्ञानशास्त्रं सुखाकरम्।<br>कर्मकाण्डेऽखिले तात न रमेऽहं कदाचन॥ १६ | इसलिये हे तात! मुझे सुखदायी ज्ञानशास्त्र और योगशास्त्रका उपदेश कीजिये। सम्पूर्ण कर्मकाण्डमें मेरा मन कभी नहीं लगता॥ १६॥ |
| वद कर्मक्षयोपायं प्रारब्धं सञ्चितं तथा।<br>वर्तमानं यथा नश्येत् त्रिविधं कर्ममूलजम्॥ १७ | अतः कर्मक्षयका कोई उपाय बताइये; जिससे संचित, प्रारब्ध एवं क्रियमाण—तीनों प्रकारके कर्मफल नष्ट हो जायँ॥ १७॥ |
| जलूकेव सदा नारी रुधिरं पिबतीति वै।<br>मूर्खस्तु न विजानाति मोहितो भावचेष्टितैः॥ १८ | स्त्री जोंकके समान सदा [पुरुषका] रक्त चूसती रहती है, जिसे बुद्धिहीन मनुष्य उसकी भावपूर्ण चेष्टाओंसे मोहित होनेके कारण नहीं जान पाता॥ १८॥ |
| भोगैर्वीर्यं धनं पूर्णं मनः कुटिलभाषणैः।<br>कान्ता हरति सर्वस्वं कः स्तेनस्तादृशोऽपरः॥ १९ | स्त्री अपने संसर्गसे उसके तेजका तथा अपनी वचनचातुरीद्वारा उसके सम्पूर्ण धन और मनका—इस प्रकार सर्वस्वका हरण कर लेती है। उससे बढ़कर दूसरा चोर कौन है?॥ १९॥ |
| निद्रासुखविनाशार्थं मूर्खस्तु दारसंग्रहम्।<br>करोति वञ्चितो धात्रा दुःखाय न सुखाय च॥ २० | इसलिये मेरे विचारमें तो मूर्ख मनुष्य ही केवल निद्रासुखका नाश करनेके लिये स्त्रीपरिणय करता है। विधाताद्वारा वह दुःखके लिये ही ठगा जाता है, सुखके लिये नहीं॥ २०॥ |
| सूत उवाच<br>एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वा व्यासः शुकस्य च।<br>सम्प्राप महतीं चिन्तां किं करोमीत्यसंशयम्॥ २१ | **सूतजी बोले—**इस प्रकार शुकदेवकी युक्तियुक्त ये बातें सुनकर व्यासजी बड़ी चिन्तामें पड़ गये। वे मन-ही-मन सोचने लगे—‘अब मैं क्या करूँ?’ |
| तस्य सुस्रुवुरश्रूणि लोचनाद्दुःखजानि च।<br>वेपथुश्च शरीरेऽभूद् ग्लानिं प्राप मनस्तथा॥ २२ | तत्पश्चात् उनकी आँखोंसे दुःखके आँसू बहने लगे, शरीर काँपने लगा और मनमें ग्लानि होने लगी॥ २१-२२॥ |
| शोचन्तं पितरं दृष्ट्वा दीनं शोकपरिप्लुतम्।<br>उवाच पितरं व्यासं विस्मयोत्फुल्ललोचनः॥ २३ | इस प्रकार शोक करते हुए अपने दीन तथा शोकाकुल पिताको देखकर आश्चर्यसे विस्मित नेत्रवाले शुकदेवजीने अपने पिता व्यासजीसे कहा— |
| अहो मायाबलं चोग्रं यन्मोहयति पण्डितम्।<br>वेदान्तस्य च कर्तारं सर्वज्ञं वेदसम्मितम्॥ २४ | अहो! माया कितनी प्रबल है, जो कि यह वेदान्तदर्शनके प्रणेता तथा वेदका सांगोपांग ज्ञान रखनेवाले सर्वज्ञ पण्डित मेरे पिताजीको भी मोहित कर रही है!॥ २३-२४॥ |
| न जाने का च सा माया किंस्वित्सातीव दुष्करा।<br>या मोहयति विद्वांसं व्यासं सत्यवतीसुतम्॥ २५ | न जाने वह कौन-सी तथा कैसी अति दुष्कर माया है, जो सत्यवतीसुत विद्वान् व्यासजीको भी मोहित कर रही है!॥ २५॥ |
| पुराणानां च वक्ता च निर्माता भारतस्य च।<br>विभागकर्ता वेदानां सोऽपि मोहमुपागतः॥ २६ | जो पुराणोंके वक्ता, महाभारतके रचयिता, वेदोंके विभागकर्ता हैं, वे भी [मायाजनित] मोहको प्राप्त हो गये हैं॥ २६॥ |