भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 152
अ० १५ ]प्रथम स्कन्ध१४३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तपन्तं तापसं दृष्ट्वा मघवा दुःखितोऽभवत्।<br>विघ्नान्बहुविधानस्य करोति च दिवस्पतिः॥ ४किसी तपस्वीको तप करते हुए देखकर स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र भी चिन्तित हो उठते हैं और उसके तपमें अनेक प्रकारके विघ्न करने लगते हैं॥ ४॥
ब्रह्मापि न सुखी विष्णुर्लक्ष्मीं प्राप्य मनोरमाम्।<br>खेदं प्राप्नोति सततं संग्रामैरसुरैः सह॥ ५<br><br>करोति विपुलान्यत्नांस्तपश्चरति दुश्चरम्।<br>रमापतिरपि श्रीमान्कस्यास्ति विपुलं सुखम्॥ ६ब्रह्मा भी सुखी नहीं हैं और मनोरम लक्ष्मीको पाकर विष्णु भी सुखी नहीं हैं; उन्हें भी दैत्योंके साथ युद्धके द्वारा निरन्तर कष्ट सहन करने पड़ते हैं। उन ऐश्वर्यशाली रमापति विष्णुको भी [सुखप्राप्तिके लिये] अनेक प्रयत्न करने पड़ते हैं और कठोर तपस्या करनी पड़ती है। [इस संसारमें] किसको बहुत सुख है?॥ ५-६॥
शङ्करोऽपि सदा दुःखी भवत्येव च वेद्म्यहम्।<br>तपश्चर्यां प्रकुर्वाणो दैत्ययुद्धकरः सदा॥ ७भगवान् शंकर भी सदैव दुःखी रहते हैं—ऐसा मैं जानता हूँ; क्योंकि वे सदैव तपस्या करते हुए भी दैत्योंसे युद्ध करते रहते हैं॥ ७॥
कदाचिन्न सुखी शेते धनवानपि लोलुपः।<br>निर्धनस्तु कथं तात सुखं प्राप्नोति मानवः॥ ८<br><br>जानन्नपि महाभाग पुत्रं वा वीर्यसम्भवम्।<br>नियोक्ष्यसि महाघोरे संसारे दुःखदे सदा॥ ९हे तात! जब धनवान् होते हुए भी लोभी मनुष्य कभी भी सुखपूर्वक सो नहीं पाता, तब भला निर्धन मनुष्य कैसे सुख पा सकता है? इसलिये हे महाभाग! यह जानते हुए भी आप अपने तेजसे उत्पन्न पुत्रको दुःखदायक तथा महाभयानक संसारमें क्यों लगा रहे हैं?॥ ८-९॥
जन्मदुःखं जरादुःखं दुःखं च मरणे तथा।<br>गर्भवासे पुनर्दुःखं विष्ठामूत्रमये पितः॥ १०<br><br>तस्मादतिशयं दुःखं तृष्णालोभसमुद्भवम्।<br>याच्ञायां परमं दुःखं मरणादपि मानद॥ ११हे पिताजी! जहाँ जन्ममें दुःख, बुढ़ापेमें दुःख, मरणमें दुःख तथा पुनः विष्ठा और मूत्रसे भरे हुए गर्भमें दुःख सहन करना पड़ता है; उससे भी अधिक दुःख तृष्णा और लोभसे उत्पन्न होता है। हे मानद! मरनेसे भी अधिक दुःख माँगनेमें होता है॥ १०-११॥
प्रतिग्रहधना विप्रा न बुद्धिबलजीवनाः।<br>पराशा परमं दुःखं मरणं च दिने दिने॥ १२ब्राह्मण प्रतिग्रहद्वारा धन प्राप्त करते हैं और वे बुद्धि-बलका उपयोग नहीं करते। दूसरेके भरोसेपर रहना परम दुःखकर है तथा वह अहर्निश मृत्युके समान होता है॥ १२॥
पठित्वा सकलान् वेदाञ्छास्त्राणि च समन्ततः।<br>गत्वा च धनिनां कार्या स्तुतिः सर्वात्मना बुधैः॥ १३<br><br>एकोदरस्य का चिन्ता पत्रमूलफलादिभिः।<br>येनकेनाप्युपायेन सन्तुष्ट्या च प्रपूर्यते॥ १४सभी वेद-शास्त्रोंका भलीभाँति अध्ययन करके भी विद्वानोंको धनिकोंके पास जाकर सब प्रकारसे उनकी प्रशंसा करनी पड़ती है। केवल पेटके लिये कोई चिन्ताकी बात नहीं; उसे तो केवल पत्र, फल एवं कन्द-मूल आदिसे किसी भी प्रकार सन्तुष्टिपूर्वक भरा जा सकता है॥ १३-१४॥
भार्या पुत्रास्तथा पौत्राः कुटुम्बे विपुले सति।<br>पूरणार्थं महद्दुःखं क्व सुखं पितरद्भुतम्॥ १५हे पिताजी! भार्या, पुत्र, पौत्र आदि बड़े कुटुम्बके पालनमें तो अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। ऐसी दशामें गृहस्थको सुख कहाँ है?॥ १५॥