भारतकोश
संग्रह पर लौटें

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० १५ ]प्रथम स्कन्ध१४३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तपन्तं तापसं दृष्ट्वा मघवा दुःखितोऽभवत्।<br>विघ्नान्बहुविधानस्य करोति च दिवस्पतिः॥ ४किसी तपस्वीको तप करते हुए देखकर स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र भी चिन्तित हो उठते हैं और उसके तपमें अनेक प्रकारके विघ्न करने लगते हैं॥ ४॥
ब्रह्मापि न सुखी विष्णुर्लक्ष्मीं प्राप्य मनोरमाम्।<br>खेदं प्राप्नोति सततं संग्रामैरसुरैः सह॥ ५<br><br>करोति विपुलान्यत्नांस्तपश्चरति दुश्चरम्।<br>रमापतिरपि श्रीमान्कस्यास्ति विपुलं सुखम्॥ ६ब्रह्मा भी सुखी नहीं हैं और मनोरम लक्ष्मीको पाकर विष्णु भी सुखी नहीं हैं; उन्हें भी दैत्योंके साथ युद्धके द्वारा निरन्तर कष्ट सहन करने पड़ते हैं। उन ऐश्वर्यशाली रमापति विष्णुको भी [सुखप्राप्तिके लिये] अनेक प्रयत्न करने पड़ते हैं और कठोर तपस्या करनी पड़ती है। [इस संसारमें] किसको बहुत सुख है?॥ ५-६॥
शङ्करोऽपि सदा दुःखी भवत्येव च वेद्म्यहम्।<br>तपश्चर्यां प्रकुर्वाणो दैत्ययुद्धकरः सदा॥ ७भगवान् शंकर भी सदैव दुःखी रहते हैं—ऐसा मैं जानता हूँ; क्योंकि वे सदैव तपस्या करते हुए भी दैत्योंसे युद्ध करते रहते हैं॥ ७॥
कदाचिन्न सुखी शेते धनवानपि लोलुपः।<br>निर्धनस्तु कथं तात सुखं प्राप्नोति मानवः॥ ८<br><br>जानन्नपि महाभाग पुत्रं वा वीर्यसम्भवम्।<br>नियोक्ष्यसि महाघोरे संसारे दुःखदे सदा॥ ९हे तात! जब धनवान् होते हुए भी लोभी मनुष्य कभी भी सुखपूर्वक सो नहीं पाता, तब भला निर्धन मनुष्य कैसे सुख पा सकता है? इसलिये हे महाभाग! यह जानते हुए भी आप अपने तेजसे उत्पन्न पुत्रको दुःखदायक तथा महाभयानक संसारमें क्यों लगा रहे हैं?॥ ८-९॥
जन्मदुःखं जरादुःखं दुःखं च मरणे तथा।<br>गर्भवासे पुनर्दुःखं विष्ठामूत्रमये पितः॥ १०<br><br>तस्मादतिशयं दुःखं तृष्णालोभसमुद्भवम्।<br>याच्ञायां परमं दुःखं मरणादपि मानद॥ ११हे पिताजी! जहाँ जन्ममें दुःख, बुढ़ापेमें दुःख, मरणमें दुःख तथा पुनः विष्ठा और मूत्रसे भरे हुए गर्भमें दुःख सहन करना पड़ता है; उससे भी अधिक दुःख तृष्णा और लोभसे उत्पन्न होता है। हे मानद! मरनेसे भी अधिक दुःख माँगनेमें होता है॥ १०-११॥
प्रतिग्रहधना विप्रा न बुद्धिबलजीवनाः।<br>पराशा परमं दुःखं मरणं च दिने दिने॥ १२ब्राह्मण प्रतिग्रहद्वारा धन प्राप्त करते हैं और वे बुद्धि-बलका उपयोग नहीं करते। दूसरेके भरोसेपर रहना परम दुःखकर है तथा वह अहर्निश मृत्युके समान होता है॥ १२॥
पठित्वा सकलान् वेदाञ्छास्त्राणि च समन्ततः।<br>गत्वा च धनिनां कार्या स्तुतिः सर्वात्मना बुधैः॥ १३<br><br>एकोदरस्य का चिन्ता पत्रमूलफलादिभिः।<br>येनकेनाप्युपायेन सन्तुष्ट्या च प्रपूर्यते॥ १४सभी वेद-शास्त्रोंका भलीभाँति अध्ययन करके भी विद्वानोंको धनिकोंके पास जाकर सब प्रकारसे उनकी प्रशंसा करनी पड़ती है। केवल पेटके लिये कोई चिन्ताकी बात नहीं; उसे तो केवल पत्र, फल एवं कन्द-मूल आदिसे किसी भी प्रकार सन्तुष्टिपूर्वक भरा जा सकता है॥ १३-१४॥
भार्या पुत्रास्तथा पौत्राः कुटुम्बे विपुले सति।<br>पूरणार्थं महद्दुःखं क्व सुखं पितरद्भुतम्॥ १५हे पिताजी! भार्या, पुत्र, पौत्र आदि बड़े कुटुम्बके पालनमें तो अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। ऐसी दशामें गृहस्थको सुख कहाँ है?॥ १५॥

| १४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
योगशास्त्रं वद मम ज्ञानशास्त्रं सुखाकरम्।<br>कर्मकाण्डेऽखिले तात न रमेऽहं कदाचन॥ १६इसलिये हे तात! मुझे सुखदायी ज्ञानशास्त्र और योगशास्त्रका उपदेश कीजिये। सम्पूर्ण कर्मकाण्डमें मेरा मन कभी नहीं लगता॥ १६॥
वद कर्मक्षयोपायं प्रारब्धं सञ्चितं तथा।<br>वर्तमानं यथा नश्येत् त्रिविधं कर्ममूलजम्॥ १७अतः कर्मक्षयका कोई उपाय बताइये; जिससे संचित, प्रारब्ध एवं क्रियमाण—तीनों प्रकारके कर्मफल नष्ट हो जायँ॥ १७॥
जलूकेव सदा नारी रुधिरं पिबतीति वै।<br>मूर्खस्तु न विजानाति मोहितो भावचेष्टितैः॥ १८स्त्री जोंकके समान सदा [पुरुषका] रक्त चूसती रहती है, जिसे बुद्धिहीन मनुष्य उसकी भावपूर्ण चेष्टाओंसे मोहित होनेके कारण नहीं जान पाता॥ १८॥
भोगैर्वीर्यं धनं पूर्णं मनः कुटिलभाषणैः।<br>कान्ता हरति सर्वस्वं कः स्तेनस्तादृशोऽपरः॥ १९स्त्री अपने संसर्गसे उसके तेजका तथा अपनी वचनचातुरीद्वारा उसके सम्पूर्ण धन और मनका—इस प्रकार सर्वस्वका हरण कर लेती है। उससे बढ़कर दूसरा चोर कौन है?॥ १९॥
निद्रासुखविनाशार्थं मूर्खस्तु दारसंग्रहम्।<br>करोति वञ्चितो धात्रा दुःखाय न सुखाय च॥ २०इसलिये मेरे विचारमें तो मूर्ख मनुष्य ही केवल निद्रासुखका नाश करनेके लिये स्त्रीपरिणय करता है। विधाताद्वारा वह दुःखके लिये ही ठगा जाता है, सुखके लिये नहीं॥ २०॥
सूत उवाच<br>एवंविधानि वाक्यानि श्रुत्वा व्यासः शुकस्य च।<br>सम्प्राप महतीं चिन्तां किं करोमीत्यसंशयम्॥ २१**सूतजी बोले—**इस प्रकार शुकदेवकी युक्तियुक्त ये बातें सुनकर व्यासजी बड़ी चिन्तामें पड़ गये। वे मन-ही-मन सोचने लगे—‘अब मैं क्या करूँ?’
तस्य सुस्रुवुरश्रूणि लोचनाद्दुःखजानि च।<br>वेपथुश्च शरीरेऽभूद् ग्लानिं प्राप मनस्तथा॥ २२तत्पश्चात् उनकी आँखोंसे दुःखके आँसू बहने लगे, शरीर काँपने लगा और मनमें ग्लानि होने लगी॥ २१-२२॥
शोचन्तं पितरं दृष्ट्वा दीनं शोकपरिप्लुतम्।<br>उवाच पितरं व्यासं विस्मयोत्फुल्ललोचनः॥ २३इस प्रकार शोक करते हुए अपने दीन तथा शोकाकुल पिताको देखकर आश्चर्यसे विस्मित नेत्रवाले शुकदेवजीने अपने पिता व्यासजीसे कहा—
अहो मायाबलं चोग्रं यन्मोहयति पण्डितम्।<br>वेदान्तस्य च कर्तारं सर्वज्ञं वेदसम्मितम्॥ २४अहो! माया कितनी प्रबल है, जो कि यह वेदान्तदर्शनके प्रणेता तथा वेदका सांगोपांग ज्ञान रखनेवाले सर्वज्ञ पण्डित मेरे पिताजीको भी मोहित कर रही है!॥ २३-२४॥
न जाने का च सा माया किंस्वित्सातीव दुष्करा।<br>या मोहयति विद्वांसं व्यासं सत्यवतीसुतम्॥ २५न जाने वह कौन-सी तथा कैसी अति दुष्कर माया है, जो सत्यवतीसुत विद्वान् व्यासजीको भी मोहित कर रही है!॥ २५॥
पुराणानां च वक्ता च निर्माता भारतस्य च।<br>विभागकर्ता वेदानां सोऽपि मोहमुपागतः॥ २६जो पुराणोंके वक्ता, महाभारतके रचयिता, वेदोंके विभागकर्ता हैं, वे भी [मायाजनित] मोहको प्राप्त हो गये हैं॥ २६॥
अ० १५ ]प्रथम स्कन्ध१४५
तां यामि शरणं देवीं या मोहयति वै जगत्।<br>ब्रह्मविष्णुहरादींश्च कथान्येषां च कीदृशी ॥ २७इसलिये मैं उन्हीं देवी महामायाकी शरणमें जाऊँ, जो समस्त जगत् तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदिको भी मोहित कर देती हैं, तब दूसरोंकी बात ही क्या है ? ॥ २७ ॥
कोऽप्यस्ति त्रिषु लोकेषु यो न मुह्यति मायया।<br>यन्मोहं गमिताः पूर्वे ब्रह्मविष्णुहरादयः ॥ २८इन तीनों लोकोंमें कौन ऐसा है जो मायासे मोहित न होता हो ? उस मायाने तो ब्रह्मा आदि देवताओंको भी पूर्वकालमें मोहित कर दिया था ॥ २८ ॥
अहो बलमहो वीर्यं देव्या खलु विनिर्मितम्।<br>माययैव वशं नीतः सर्वज्ञ ईश्वरः प्रभुः ॥ २९अहो! उन भगवती जगदम्बाके द्वारा रचित मायाका बल तथा पराक्रम महान् आश्चर्यजनक है; उन्होंने अपनी मायाके प्रभावसे ही सर्वज्ञ और सर्वान्तर्यामी ईश्वरको भी अपने वशमें कर रखा है ॥ २९ ॥
विष्ण्वंशसम्भवो व्यास इति पौराणिका जगुः।<br>सोऽपि मोहार्णवे मग्नो भग्नपोतो वणिग्यथा ॥ ३०पौराणिकोंद्वारा कहा गया है कि व्यासजी भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए हैं; तथापि वे आज शोक-सागरमें इस प्रकार डूब रहे हैं जैसे समुद्रमें भग्न जलयानवाला वणिक् ॥ ३० ॥
अश्रुपातं करोत्यद्य विवशः प्राकृतो यथा।<br>अहो मायाबलं चैतद्दुस्त्यजं पण्डितैरपि ॥ ३१आज वे भी मायाके वशीभूत होकर एक साधारण व्यक्तिके समान आँसू बहा रहे हैं। अहो! माया बड़ी प्रबल है, जिसे बड़े-बड़े विद्वान् भी नहीं त्याग पाते ॥ ३१ ॥
कोऽयं कोऽहं कथं चेह कीदृशोऽयं भ्रमः किल।<br>पञ्चभूतात्मके देहे पितापुत्रेति वासना ॥ ३२<br><br>बलिष्ठा खलु मायेयं मायिनामपि मोहिनी।<br>ययाभिभूतः कृष्णोऽपि करोति रोदनं द्विजः ॥ ३३व्यास कौन हैं? मैं कौन हूँ? यह संसार क्या वस्तु है ? और यह कैसा भ्रम है ? इस पांचभौतिक शरीरमें पिता-पुत्रकी भावना कहाँसे आयी ? यह माया अतीव प्रबल है, जो मायावियोंको भी मोहित कर देती है, जिसके वशीभूत होकर यहाँ द्विज कृष्णद्वैपायन भी रुदन कर रहे हैं॥ ३२-३३ ॥
<center>सूूत उवाच</center>तां नत्वा मनसा देवीं सर्वकारणकारणम्।<br>जननीं सर्वदेवानां ब्रह्मादीनां तथेश्वरीम् ॥ ३४<br><br>पितरं प्राह दीनं तं शोकार्णवपरिप्लुतम्।<br>अरणीसम्भवो व्यासं हेतुमद्वचनं शुभम् ॥ ३५**सूतजी बोले—**सब कारणोंकी एकमात्र कारण, सब देवताओंकी जननी तथा ब्रह्मा आदि देवताओंकी भी स्वामिनी आदिशक्ति भगवतीको मनसे स्मरण करके शोकसागरमें डूबे हुए अपने दुःखी पिता श्रीव्यासजीसे अरणीपुत्र शुकदेवजीने इस प्रकार नीतियुक्त वचन कहा— ॥ ३४-३५ ॥
पाराशर्य महाभाग सर्वेषां बोधदः स्वयम्।<br>किं शोकं कुरुषे स्वामिन्व्यथाज्ञः प्राकृतो नरः ॥ ३६हे पराशरनन्दन! हे महाभाग! आप तो स्वयं सब लोगोंको ज्ञान देनेवाले हैं तब हे स्वामिन्! आप ऐसा शोक क्यों करते हैं, जैसा कोई अज्ञ साधारण व्यक्ति करता है ? ॥ ३६ ॥

| १४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ | | :--- | :--- |

| अद्याहं तव पुत्रोऽस्मि न जाने पूर्वजन्मनि।<br>कोऽहं कस्त्वं महाभाग विभ्रमोऽयं महात्मनि॥ ३७ | हे महाभाग! इस समय मैं आपका पुत्र हूँ, परंतु यह कौन जानता है कि पूर्वजन्ममें मैं कौन था और आप कौन थे ? यह संसार तो महात्माओंके लिये एक भ्रममात्र है ॥ ३७ ॥ | | कुरु धैर्यं प्रबुध्यस्व मा विषादे मनः कृथाः।<br>मोहजालमिमं मत्वा मुञ्च शोकं महामते॥ ३८ | अतएव आप धैर्य रखें, विवेक धारण करें तथा मनमें खेद न करें। हे महामते! इसे मोहजाल समझकर आप शोकका परित्याग करें ॥ ३८ ॥ | | क्षुधानिवृत्तिर्भक्ष्येण न पुत्रदर्शनेन च।<br>पिपासा जलपानेन याति नैवात्मजेक्षणात्॥ ३९<br><br>घ्राणं सुखं सुगन्धेन कर्णजं श्रवणेन च।<br>स्त्रीसुखं तु स्त्रिया नूनं पुत्रोऽहं किं करोमि ते॥ ४० | भूख भोजनसे मिटती है, पुत्रके देखनेसे नहीं। प्यास भी जल पीनेसे मिटती है, केवल पुत्र-दर्शनसे नहीं। इसी प्रकार सुगन्धित पदार्थसे नाकको तथा अच्छी बातोंसे कानोंको एवं स्त्रीसे विषय-सुखका आनन्द मिलता है। मैं आपका पुत्र हूँ, बताइये मैं आपके लिये क्या करूँ ? ॥ ३९-४० ॥ | | अजीगर्तेन पुत्रोऽपि हरिश्चन्द्राय भूभुजे।<br>पशुकामाय यज्ञार्थे दत्तो मूल्येन सर्वथा॥ ४१<br><br>सुखानां साधनं द्रव्यं धनात्सुखसमुच्चयः।<br>धनमर्जय लोभश्चेत्पुत्रोऽहं किं करोम्यहम्॥ ४२ | किसी समय अजीगर्त नामक ब्राह्मणने धन लेकर अपने पुत्र शुनःशेपको यज्ञपशुके रूपमें राजा हरिश्चन्द्रके हाथ बेच दिया था। सुखका साधन केवल धन ही है, धन ही सुखकी राशि है। अतः यदि आपको लोभ हो, तो धनका संचय कीजिये। मैं आपका पुत्र हूँ, अतः [आपके सुखके लिये] मैं क्या करूँ ? ॥ ४१-४२ ॥ | | मां प्रबोधय बुद्ध्या त्वं दैवज्ञोऽसि महामते।<br>यथा मुच्येयमत्यन्तं गर्भवासभयान्मुने॥ ४३ | हे महामते! आप दैवज्ञ हैं। अतः हे मुने! आप मुझे अपनी बुद्धिसे ऐसा ज्ञान दीजिये, जिससे मैं गर्भवासजनित महान् भयसे मुक्त हो जाऊँ॥ ४३॥ | | दुर्लभं मानुषं जन्म कर्मभूमाविहानघ।<br>तत्रापि ब्राह्मणत्वं वै दुर्लभं चोत्तमे कुले॥ ४४ | हे पवित्रात्मन्! इस कर्मभूमिमें मनुष्य-जन्म अति दुर्लभ है, उसमें भी उत्तम कुलमें ब्राह्मणका जन्म और भी दुर्लभ है ॥ ४४ ॥ | | बद्धोऽहमिति मे बुद्धिर्नापसर्पति चित्ततः।<br>संसारवासनाजाले निविष्टा वृद्धिगामिनी॥ ४५ | ‘मैं आबद्ध हूँ’—यह बुद्धि मेरे चित्तसे नहीं हटती। संसारके वासनाजालमें यह उत्तरोत्तर बढ़ती हुई फँसती ही जाती है ॥ ४५ ॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्तस्तु तदा व्यासः पुत्रेणामितबुद्धिना।<br>प्रत्युवाच शुकं शान्तं चतुर्थाश्रममानसम्॥ ४६ | **सूतजी बोले—**असीम बुद्धिवाले अपने पुत्र शुकदेवके ऐसा कहनेपर व्यासजीने शान्त एवं संन्यास-आश्रमके लिये उत्सुक मनवाले शुकदेवजीसे कहा— ॥ ४६ ॥ | | व्यास उवाच<br>पठ पुत्र महाभाग मया भागवतं कृतम्।<br>शुभं न चातिविस्तीर्णं पुराणं ब्रह्मसम्मितम्॥ ४७ | **व्यासजी बोले—**हे महाभाग पुत्र! मेरेद्वारा रचित श्रीमद्देवीभागवतपुराणको तुम पढ़ो; वेदतुल्य यह पवित्र पुराण अधिक विस्तृत भी नहीं है ॥ ४७ ॥ |

अ० १५ ]प्रथम स्कन्ध१४७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्कन्धा द्वादश तत्रैव पञ्चलक्षणसंयुतम्।<br>सर्वेषां च पुराणानां भूषणं मम सम्मतम्॥ ४८इसमें बारह स्कन्ध हैं, यह पुराणोंके पाँचों लक्षणोंसे युक्त है। मेरे विचारमें यह पुराण सभी पुराणोंका आभूषण है॥ ४८॥
सदसज्ज्ञानविज्ञानं श्रुतमात्रेण जायते।<br>येन भागवतेनेह तत्पठ त्वं महामते॥ ४९हे महामते! जिस भागवतके सुननेमात्रसे सत् और असत् वस्तुओंका यथार्थ ज्ञान हो जाता है, उसे तुम पढ़ो॥ ४९॥
वटपत्रशयानाय विष्णवे बालरूपिणे।<br>केनास्मि बालभावेन निर्मितोऽहं चिदात्मना॥ ५०<br><br>किमर्थं केन द्रव्येण कथं जानामि चाखिलम्।<br>इत्येवं चिन्त्यमानाय मुकुन्दाय महात्मने॥ ५१<br><br>श्लोकार्धेन तया प्रोक्तं भगवत्याखिलार्थदम्।<br>सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्॥ ५२[एक बार महाप्रलयकालमें] वटपत्रपर शयन करते हुए बालरूपधारी भगवान् विष्णु वहाँ सोच रहे थे कि किस चिदात्माने, किस प्रयोजनसे तथा किस द्रव्यसे मुझे बालरूपमें उत्पन्न किया है? इन सब विषयोंका ज्ञान मुझे कैसे हो? इस प्रकार चिन्तन कर रहे महात्मा बालमुकुन्दसे उन आदिशक्ति भगवतीने सम्पूर्ण अर्थको प्रदान करनेवाले ज्ञानको आधे श्लोकमें ही इस प्रकार कहा—‘सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम्’ अर्थात् यह सब कुछ मैं ही हूँ और दूसरा कोई भी सनातन नहीं है॥ ५०—५२॥
तद्वचो विष्णुना पूर्वं संविज्ञातं मनस्यपि।<br>केनोक्ता वागियं सत्या चिन्तयामास चेतसा॥ ५३<br><br>कथं वेद्मि प्रवक्तां स्त्रीपुंसौ वा नपुंसकम्।<br>इति चिन्ताप्रपन्नेन धृतं भागवतं हृदि॥ ५४<br><br>पुनः पुनः कृतोच्चारस्तस्मिन्नेवास्तचेतसा।<br>वटपत्रे शयानः सन्नभूच्चिन्तासमन्वितः॥ ५५यह बात पहले भी भगवान् विष्णुके हृदयमें उत्पन्न हुई थी। इसलिये अब वे सोचने लगे कि इस सत्य वचनका उच्चारण किसने किया? इस कहनेवालेको मैं कैसे जानूँ? वह स्त्री है या पुरुष अथवा नपुंसक है? ऐसी चिन्तावाले भगवान् विष्णुने भागवतको हृदयमें धारण किया और उसी श्लोकार्धमें मन लगाये हुए वे बार-बार उसका उच्चारण करने लगे। इस प्रकार वटपत्रपर सोये हुए वे भगवान् विष्णु चिन्तातुर हो गये॥ ५३—५५॥
तदा शान्ता भगवती प्रादुरास चतुर्भुजा।<br>शङ्खचक्रगदापद्मवरायुधधरा शिवा॥ ५६<br><br>दिव्याम्बरधरा देवी दिव्यभूषणभूषिता।<br>संयुता सदृशीभिश्च सखीभिः स्वविभूतिभिः॥ ५७<br><br>प्रादुर्बभूव तस्याग्रे विष्णोरमिततेजसः।<br>मन्दहास्यं प्रयुञ्जाना महालक्ष्मीः शुभानना॥ ५८उसी समय शंख, चक्र, गदा, पद्म—इन श्रेष्ठ आयुधोंको धारण किये हुए, चतुर्भुजा, शान्तिस्वरूपा, शान्ता शिवा दिव्य वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित होकर अपने ही समान विभूतियोंवाली सखियोंसहित प्रादुर्भूत हुईं। वे सुन्दर मुखवाली भगवती महालक्ष्मी परम तेजस्वी भगवान् विष्णुके समक्ष मन्द-मन्द मुसकराती हुई प्रकट हुईं॥ ५६—५८॥
सूत उवाच<br>तां तथा संस्थितां दृष्ट्वा हृदये कमलेक्षणः।<br>विस्मितः सलिले तस्मिन्निराधारां मनोरमाम्॥ ५९सूतजी बोले— उस अपार प्रलय-सागरमें बिना अवलम्बके स्थित मनोरम रूपवाली उन दिव्य देवीको देखकर कमलनयन भगवान् विष्णु बड़े ही विस्मयमें पड़े॥ ५९॥
१४८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६
रतिर्भूतिस्तथा बुद्धिर्मतिः कीर्तिः स्मृतिर्धृतिः।<br>श्रद्धा मेधा स्वधा स्वाहा क्षुधा निद्रा दया गतिः॥ ६०<br><br>तुष्टिः पुष्टिः क्षमा लज्जा जृम्भा तन्द्रा च शक्तयः।<br>संस्थिताः सर्वतः पार्श्वे महादेव्याः पृथक्पृथक्॥ ६१वहाँ रति, भूति, बुद्धि, मति, कीर्ति, स्मृति, धृति, श्रद्धा, मेधा, स्वधा, स्वाहा, क्षुधा, निद्रा, दया, गति, तुष्टि, पुष्टि, क्षमा, लज्जा, जृम्भा, तन्द्रा—ये शक्तियाँ अलग-अलग रूपमें उन महादेवीके समीप सभी ओर खड़ी थीं॥ ६०-६१॥
वरायुधधराः सर्वा नानाभूषणभूषिताः।<br>मन्दारमालाकुलिता मुक्ताहारविराजिताः॥ ६२वे सभी श्रेष्ठ आयुध धारण किये हुए थीं, नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थीं तथा उनके हृदयपर मन्दारकी मालाएँ और मोतियोंके हार सुशोभित हो रहे थे॥ ६२॥
तां दृष्ट्वा ताश्च संवीक्ष्य तस्मिन्नेकार्णवे जले।<br>विस्मयाविष्टहृदयः सम्बभूव जनार्दनः॥ ६३उन भगवती महालक्ष्मी तथा उनकी सभी अन्यान्य सखियोंको उस प्रलयसागरके जलमें उपस्थित देखकर भगवान् विष्णुके मनमें बड़ा विस्मय हुआ॥ ६३॥
चिन्तयामास सर्वात्मा दृष्टमायोऽतिविस्मितः।<br>कुतो भूताः स्त्रियः सर्वाः कुतोऽहं वटतल्पगः॥ ६४<br><br>अस्मिन्नेकार्णवे घोरे न्यग्रोधः कथमुत्थितः।<br>केनाहं स्थापितोऽस्म्यत्र शिशुं कृत्वा शुभाकृतिम्॥ ६५इस प्रकार भगवतीकी माया देखकर अति चकित सर्वात्मा भगवान् विष्णु सोचने लगे—ये देवियाँ कहाँसे आ गयीं, मैं वटवृक्षके पत्तेपर कैसे आ गया, इस एकार्णव महासागरमें वटवृक्ष कहाँसे उत्पन्न हो गया और किसके द्वारा मैं सुन्दर स्वरूपवाला बालक बनाकर उसपर स्थापित किया गया हूँ?॥ ६४-६५॥
ममेयं जननी नो वा माया वा कापि दुर्घटा।<br>दर्शनं केनचित्त्वद्य दत्तं वा केन हेतुना॥ ६६ये मेरी माता तो नहीं हैं! अथवा यह कोई दुर्घट माया है? किसने और किस कारणसे मुझे इस समय दर्शन दिये हैं?॥ ६६॥
किं मया चात्र वक्तव्यं गन्तव्यं वा न वा क्वचित्।<br>मौनमास्थाय तिष्ठेयं बालभावादतन्द्रितः॥ ६७अब मैं इस विषयमें क्या कहूँ? मैं यहाँसे कहीं चला जाऊँ अथवा मौन धारण करके बालभावसे सावधान होकर यहीं स्थित रहूँ॥ ६७॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकवैराग्यवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥


अथ षोडशोऽध्यायः

बालरूपधारी भगवान् विष्णुसे महालक्ष्मीका संवाद, व्यासजीका शुकदेवजीसे देवीभागवतप्राप्तिकी परम्परा बताना तथा शुकदेवजीका मिथिला जानेका निश्चय करना

व्यास उवाच<br>दृष्ट्वा तं विस्मितं देवं शयानं वटपत्रके।<br>उवाच सस्मितं वाक्यं विष्णो किं विस्मितो ह्यसि॥ १व्यासजी बोले— इस प्रकार वटपत्रपर सोये हुए उन भगवान् विष्णुको आश्चर्यचकित देखकर मन्द मुसकान करती हुई देवीने यह वचन कहा—‘विष्णो! आप विस्मयमें क्यों पड़े हैं?’॥ १॥
अ० १६ ]प्रथम स्कन्ध१४९
संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
महाशक्त्याः प्रभावेण त्वं मां विस्मृतवान्पुरा।<br>प्रभवे प्रलये जाते भूत्वा भूत्वा पुनः पुनः॥ २आप उस महाशक्तिकी मायासे पूर्वकालमें भी सृष्टिकी उत्पत्ति तथा प्रलय होनेपर इसी प्रकार बार-बार जन्म लेकर मुझे भूलते रहे हैं॥ २॥
निर्गुणा सा परा शक्तिः सगुणस्त्वं तथाप्यहम्।<br>सात्त्विकी किल या शक्तिस्तां शक्तिं विद्धि मामिकाम्॥ ३वे पराशक्ति निर्गुण हैं, मैं और आप तो सगुण हैं। जो सात्त्विकी शक्ति है, उसे आप मेरी ही शक्ति समझिये॥ ३॥
त्वन्नाभिकमलाद् ब्रह्मा भविष्यति प्रजापतिः।<br>स कर्ता सर्वलोकस्य रजोगुणसमन्वितः॥ ४आपके नाभिकमलसे प्रजापति ब्रह्मा उत्पन्न होंगे। वे ही रजोगुणसे युक्त होकर समस्त ब्रह्माण्डकी सृष्टि करेंगे॥ ४॥
स तदा तप आस्थाय प्राप्य शक्तिमनुत्तमाम्।<br>रजसा रक्तवर्णञ्च करिष्यति जगत्त्रयम्॥ ५<br><br>सगुणान्यञ्चभूतांश्च समुत्पाद्य महामतिः।<br>इन्द्रियाणीन्द्रियेशांश्च मनःपूर्वान्समन्ततः॥ ६<br><br>करिष्यति ततः सर्गं तेन कर्ता स उच्यते।<br>विश्वस्यास्य महाभाग त्वं वै पालयिता तथा॥ ७वे ब्रह्मा ही तपोबलका आश्रय लेकर श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त करके रजोगुणके द्वारा त्रिभुवनको लाल वर्णका कर देंगे। गुणोंसहित पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु—इन पाँचों महाभूतोंकी एवं मनके साथ इन्द्रियों तथा उनके अधिष्ठातृदेवताओंकी रचना करके वे बुद्धिमान् ब्रह्माजी जगत्की सृष्टि करेंगे; इसी कारण वे कर्ता कहे जायेंगे और आप इस विश्वके पालक होंगे॥ ५-७॥
तद्भ्रुवोर्मध्यदेशाच्च क्रोधाद् रुद्रो भविष्यति।<br>तपः कृत्वा महाघोरं प्राप्य शक्तिं तु तामसीम्॥ ८<br><br>कल्पान्ते सोऽपि संहर्ता भविष्यति महामते।<br>तेनाहं त्वामुपायाता सात्त्विकीं त्वमवेहि माम्॥ ९<br><br>स्थास्येऽहं त्वत्समीपस्था सदाहं मधुसूदन।<br>हृदये ते कृतावासा भवामि सततं किल॥ १०उनके क्रोध करनेपर उनकी भौंहोंके मध्यभागसे रुद्र उत्पन्न होंगे। हे महामते! वे ही रुद्र घोर तप करके तामसी शक्ति प्राप्तकर कल्पान्तके समय सृष्टिके संहारकर्ता होंगे। इसी कारण मैं आपके पास आयी हूँ; आप मुझे वही सात्त्विकी शक्ति समझिये। हे मधुसूदन! मैं यहीं रहूँगी। मैं तो सर्वदा आपके ही पास रहती हूँ। आपके हृदयमें मैं निरन्तर निवास करती हूँ॥ ८-१०॥
विष्णुरुवाच<br>श्लोकस्यार्धं मया पूर्वं श्रुतं देवि स्फुटाक्षरम्।<br>तत्केनोक्तं वरारोहे रहस्यं परमं शिवम्॥ ११<br><br>तन्मे ब्रूहि वरारोहे संशयोऽयं वरानने।<br>निर्धनो हि यथा द्रव्यं तत्स्मरामि पुनः पुनः॥ १२विष्णु बोले— हे देवि! हे वरारोहे! कुछ समय पूर्व मैंने स्पष्ट अक्षरोंवाला जो आधा श्लोक सुना, वह परम कल्याणप्रद तथा रहस्यमय वाक्य किसने कहा था? हे वरारोहे! यह मुझे शीघ्र बताइये; हे सुमुखि! इस विषयमें मुझे महती शंका है। जिस प्रकार निर्धन पुरुष धनकी चिन्ता करता रहता है, उसी प्रकार मैं उसका बार-बार स्मरण किया करता हूँ॥ ११-१२॥
व्यास उवाच<br>विष्णोस्तद्वचनं श्रुत्वा महालक्ष्मीः स्मितानना।<br>उवाच परया प्रीत्या वचनं चारुहासिनी॥ १३व्यासजी बोले— विष्णुका वह वचन सुनकर मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली महालक्ष्मी मधुर हास्यके साथ अत्यन्त प्रेमसे बोलीं— ॥ १३ ॥
१५०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६

| महालक्ष्मीरूवाच<br>शृणु शौरे वचो मह्यं सगुणाऽहं चतुर्भुजा।<br>मां जानासि न जानासि निर्गुणां सगुणालयाम्॥ १४<br><br>त्वं जानीहि महाभाग तया तत्प्रकटीकृतम्।<br>पुण्यं भागवतं विद्धि वेदसारं शुभावहम्॥ १५<br><br>कृपां च महतीं मन्ये देव्याः शत्रुनिषूदन।<br>यया प्रोक्तं परं गुह्यं हिताय तव सुव्रत॥ १६<br><br>रक्षणीयं सदा चित्ते न विस्मार्यं कदाचन।<br>सारं हि सर्वशास्त्राणां महाविद्याप्रकाशितम्॥ १७<br><br>नातः परं वेदितव्यं वर्तते भुवनत्रये।<br>प्रियोऽसि खलु देव्यास्त्वं तेन ते व्याहृतं वचः॥ १८<br><br>व्यास उवाच<br>इति श्रुत्वा वचो देव्या महालक्ष्म्‍याश्चतुर्भुजः।<br>दधार हृदये नित्यं मत्वा मन्त्रमनुत्तमम्॥ १९<br><br>कालेन कियता तत्र तन्नाभिकमलोद्भवः।<br>ब्रह्मा दैत्यभयात्त्रस्तो जगाम शरणं हरेः॥ २०<br><br>ततः कृत्वा महायुद्धं हत्वा तौ मधुकैटभौ।<br>जजाप भगवान्विष्णुः श्लोकार्धं विशदाक्षरम्॥ २१<br><br>जपन्तं वासुदेवं च दृष्ट्वा देवः प्रजापतिः।<br>पप्रच्छ परमप्रीतः कञ्जजः कमलापतिम्॥ २२<br><br>किं त्वं जपसि देवेश त्वत्तः कोऽप्यधिकोऽस्ति वै।<br>यत्स्मृत्वा पुण्डरीकाक्ष प्रीतोऽसि जगदीश्वर॥ २३<br><br>हरिरुवाच<br>मयि त्वयि च या शक्तिः क्रियाकारणलक्षणा।<br>विचारय महाभाग या सा भगवती शिवा॥ २४<br><br>यस्याधारे जगत्सर्वं तिष्ठत्यत्र महार्णवे।<br>साकारा या महाशक्तिरमेया च सनातनी॥ २५ | महालक्ष्मी बोलीं—हे शौरे! मेरी बात सुनिये। मैं सगुणरूपा चतुर्भुजा भगवती हूँ। आप मुझे जानते हों या न जानते हों, किंतु मैं सब गुणोंका आलय होती हुई निर्गुणा भी हूँ॥ १४॥<br><br>हे महाभाग! आप यह जान लें कि वह अर्धश्लोक उसी पराशक्तिने कहा था। आप उसे सब वेदोंका तत्त्वस्वरूप, कल्याणकारी और पुण्यप्रद श्रीमद्देवीभागवत समझिये। हे शत्रुमर्दिन! हे सुव्रत! मैं भगवतीकी परम कृपा मानती हूँ, जिसने ऐसा गुप्त एवं परम रहस्यमय मन्त्र आपके कल्याणके लिये कहा है॥ १५-१६॥<br><br>आप इसे सर्वदा चित्तमें रखिये और कभी भी इसे विस्मृत न कीजिये; यह सब शास्त्रोंका सार है तथा महाविद्याके द्वारा प्रकाशित किया गया है॥ १७॥<br><br>इससे बढ़कर त्रिभुवनमें कुछ भी ज्ञातव्य नहीं है। आप निश्चय ही देवीके परम प्रिय हैं, इसीलिये उन्होंने यह मन्त्र आपको बताया है॥ १८॥<br><br>व्यासजी बोले—महादेवी लक्ष्मीके इस वचनको सुनकर चतुर्भुज भगवान् विष्णुने इसे सर्वश्रेष्ठ मन्त्र समझकर सदाके लिये हृदयमें धारण कर लिया॥ १९॥<br><br>कुछ दिनोंके बाद उनके नाभिकमलसे उत्पन्न ब्रह्माजी दैत्योंके भयसे डरकर भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। तब वे भगवान् विष्णु भयंकर युद्ध करके मधु-कैटभका वधकर उस विशद अक्षरोंवाले श्लोकार्धरूप मन्त्रका जप करने लगे॥ २०-२१॥<br><br>भगवान् वासुदेवको जप करते हुए देखकर प्रजापति ब्रह्माजीने प्रेमपूर्वक कमलापतिसे पूछा—हे देवेश! हे पुण्डरीकाक्ष! हे जगदीश्वर! आप किसका जप कर रहे हैं? आपसे भी बढ़कर दूसरा कौन है, जिसका ध्यान करके आप इतने प्रसन्न हो रहे हैं?॥ २२-२३॥<br><br>विष्णु बोले—हे महाभाग! विचार कीजिये कि आपमें और मुझमें जो कार्यकारणस्वरूपा शक्ति विद्यमान है, वे ही भगवती शिवा हैं। जिनके आधारपर एकार्णव महासागरमें यह समस्त जगत् ठहरा हुआ है। जो महाशक्ति साकार, असीम तथा सनातनी भगवती हैं और यह समस्त जड-चेतन |

अ० १६ ]प्रथम स्कन्ध१५१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम्।<br>सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये॥ २६संसार जिनके द्वारा रचा गया है, वे ही जब प्रसन्न होती हैं तब मनुष्योंके उद्धारके लिये वरदायिनी होती हैं॥ २४—२६॥
सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी।<br>संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी॥ २७वे ही सनातनी परमा विद्या हैं, संसारके बन्धन एवं मुक्तिकी कारणस्वरूपा हैं और वे ही सभी ईश्वरोंकी भी स्वामिनी हैं॥ २७॥
अहं त्वमखिलं विश्वं तस्याश्चिच्छक्तिसम्भवम्।<br>विद्धि ब्रह्मन् सन्देहः कर्तव्यः सर्वदानघ॥ २८मैं, आप तथा समस्त संसार उन्हींकी चैतन्य शक्तिसे उत्पन्न हुए हैं। हे ब्रह्मन्! हे निष्पाप! ऐसा आप सत्य जानिये, इसमें सन्देह नहीं है॥ २८॥
श्लोकार्धेन तया प्रोक्तं तद्वै भागवतं किल।<br>विस्तरो भविता तस्य द्वापरादौ युगे तथा॥ २९उन भगवतीने आधे श्लोकमें ही जो कहा है, वही वास्तविक श्रीमद्देवीभागवत है। द्वापरयुगके आदिमें पुनः उसका विस्तार होगा॥ २९॥
व्यास उवाच<br>ब्रह्मणा संगृहीतं च विष्णोस्तु नाभिपङ्कजे।<br>नारदाय च तेनोक्तं पुत्रायामितबुद्धये॥ ३०<br><br>नारदेन तथा मह्यं दत्तं हि मुनिना पुरा।<br>मया कृतमिदं पूर्णं द्वादशस्कन्धविस्तरम्॥ ३१व्यासजी बोले— इस प्रकार भगवान् विष्णुके नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माजीने उस भागवतका संग्रह किया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने परम बुद्धिमान् पुत्र नारदजीसे इसे कहा। पूर्वकालमें वही भागवत देवर्षि नारदजीने मुझे दिया और फिर मैंने उसे बारह स्कन्धोंमें विस्तृत करके पूर्ण किया॥ ३०-३१॥
तत्पठस्व महाभाग पुराणं ब्रह्मसम्मितम्।<br>पञ्चलक्षणयुक्तं च देव्याश्चरितमुत्तमम्॥ ३२हे महाभाग! वेदतुल्य, पाँच लक्षणोंसे युक्त तथा भगवतीके उत्तम चरितोंसे ओत-प्रोत इस ‘श्रीमद्देवीभागवत’ पुराणको पढ़ो॥ ३२॥
तत्त्वज्ञानरसोपेतं सर्वेषामुत्तमोत्तमम्।<br>धर्मशास्त्रसमं पुण्यं वेदार्थेनोपबृंहितम्॥ ३३<br><br>वृत्रासुरवधोपेतं नानाख्यानकथायुतम्।<br>ब्रह्मविद्यानिधानं तु संसारार्णवतारकम्॥ ३४तत्त्वज्ञानके रससे परिपूर्ण, वेदार्थके द्वारा उपबृंहित और धर्मशास्त्रके समान पुण्यप्रद यह भागवत सभी पुराणोंमें श्रेष्ठतम है। यह वृत्रासुरवधके कथानकसे युक्त, विविध आख्यानोपाख्यानोंसे समन्वित, ब्रह्मविद्याका निधान एवं भवसागरसे पार करनेवाला है॥ ३३-३४॥
गृहाण त्वं महाभाग योग्योऽसि मतिमत्तरः।<br>पुण्यं भागवतं नाम पुराणं पुरुषर्षभ॥ ३५अतः हे महाभाग! तुम उस भागवतको अवश्य पढ़ो; तुम अत्यन्त बुद्धिमान् और योग्य हो। हे नरश्रेष्ठ! यह श्रीमद्देवीभागवत नामक पुराण पुण्यप्रद है॥ ३५॥
अष्टादशसहस्त्राणां श्लोकानां कुरु संग्रहम्।<br>अज्ञाननाशनं दिव्यं ज्ञानभास्करबोधकम्॥ ३६<br><br>सुखदं शान्तिदं धन्यं दीर्घायुष्यकरं शिवम्।<br>शृण्वतां पठतां चेदं पुत्रपौत्रविवर्धनम्॥ ३७तुम इसके अठारह हजार श्लोकोंको हृदयंगम कर लो; यह पुराण पाठ तथा श्रवण करनेवालेके लिये अज्ञानका नाश करनेवाला, दिव्य ज्ञानरूपी सूर्यका बोध करानेवाला, सुखप्रद, शान्तिदायक, धन्य, दीर्घ आयु प्रदान करनेवाला, कल्याणकारी तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला है॥ ३६-३७॥
१५२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६

| शिष्योऽयं मम धर्मात्मा लोमहर्षणसम्भवः ।<br>पठिष्यति त्वया सार्धं पुराणीं संहितां शुभाम् ॥ ३८ | लोमहर्षणसे उत्पन्न मेरे शिष्य ये धर्मात्मा सूतजी भी तुम्हारे साथ इस शुभ पुराण-संहिताका अध्ययन करेंगे ॥ ३८ ॥ | | सूत उवाच<br>इत्युक्तं तेन पुत्राय मह्यं च कथितं किल ।<br>मया गृहीतं तत्सर्वं पुराणं चातिविस्तरम् ॥ ३९ | सूतजी बोले— हे मुनियो! व्यासजीने मुझसे और अपने पुत्रसे इस प्रकार कहा था, तब मैंने उस सम्पूर्ण विस्तृत पुराण-संहिताको विधिवत् पढ़ा था ॥ ३९ ॥ | | शुकोऽधीत्य पुराणं तु स्थितो व्यासाश्रमे शुभे ।<br>न लेभे शर्म धर्मात्मा ब्रह्मात्मज इवापरः ॥ ४० | उस समय भागवतपुराणका अध्ययन करके शुकदेवजी व्यासजीके पवित्र आश्रममें ही रहने लगे, परंतु दूसरे ब्रह्मापुत्र नारदकी भाँति उन धर्मात्माको वहाँ शान्ति न मिल सकी ॥ ४० ॥ | | एकान्तसेवी विकलः स शून्य इव लक्ष्यते ।<br>नात्यन्तभोजनासक्तो नोपवासरतस्तथा ॥ ४१ | एकान्तमें रहनेवाले तथा व्याकुलचित्त वे उदासीनकी भाँति दिखायी पड़ते थे। न वे अधिक भोजन करते थे और न उपवासपूर्वक ही रहते थे ॥ ४१ ॥ | | चिन्ताविष्टं शुकं दृष्ट्वा व्यासः प्राह सुतं प्रति ।<br>किं पुत्र चिन्त्यते नित्यं कस्माद्व्यग्रोऽसि मानद ॥ ४२ | इस प्रकार अपने पुत्र शुकदेवको चिन्तित देखकर व्यासजी बोले— हे पुत्र! तुम क्या चिन्ता करते रहते हो? हे मानद! तुम किसलिये व्याकुल रहते हो? | | आस्से ध्यानपरो नित्यमृणग्रस्त इवाधनः ।<br>का चिन्ता वर्तते पुत्र मयि ताते तु तिष्ठति ॥ ४३ | ऋणग्रस्त निर्धन व्यक्तिकी भाँति तुम सदा चिन्ता करते रहते हो। हे पुत्र! मुझ पिताके रहते तुम्हें किस बातकी चिन्ता हो रही है? ॥ ४२-४३ ॥ | | सुखं भुंक्ष्व यथाकामं मुञ्च शोकं मनोगतम् ।<br>ज्ञानं चिन्तय शास्त्रोक्तं विज्ञाने च मतिं कुरु ॥ ४४ | तुम मनकी ग्लानि छोड़ो; यथेष्टरूपसे सुखोपभोग करो, शास्त्रोक्त ज्ञानका चिन्तन करो और आत्मचिन्तनमें मन लगाओ ॥ ४४ ॥ | | न चेन्मनसि ते शान्तिर्वचसा मम सुव्रत ।<br>गच्छ त्वं मिथिलां पुत्र पालितां जनकेन ह ॥ ४५ | हे सुव्रत! यदि मेरे उपदेशसे तुम्हें शान्ति नहीं मिलती, तो राजा जनकके द्वारा पालित मिथिलापुरी चले जाओ। | | स ते मोहं महाभाग नाशयिष्यति भूपतिः ।<br>जनको नाम धर्मात्मा विदेहः सत्यसागरः ॥ ४६ | हे महाभाग! वे विदेह राजा जनक तुम्हारे मोहका नाश कर देंगे; क्योंकि वे सत्यसिन्धु तथा धर्मात्मा हैं ॥ ४५-४६ ॥ | | तं गत्वा नृपतिं पुत्र सन्देहं स्वं निवर्तय ।<br>वर्णाश्रमाणां धर्मांस्त्वं पृच्छ पुत्र यथातथम् ॥ ४७ | हे पुत्र! उन राजाके पास जाकर तुम अपना सन्देह दूर करो और वर्णाश्रम-धर्मके रहस्यको उनसे यथार्थरूपमें पूछो ॥ ४७ ॥ | | जीवन्मुक्तः स राजर्षिर्ब्रह्मज्ञानमतिः शुचिः ।<br>तथ्यवक्तातिशान्तश्च योगी योगप्रियः सदा ॥ ४८ | वे राजर्षि जीवन्मुक्त, ब्रह्मज्ञानका चिन्तन करनेवाले, पवित्र, यथार्थ वक्ता, शान्तचित्त तथा सदा योगप्रिय भी हैं ॥ ४८ ॥ | | सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य व्यासस्यामिततेजसः ।<br>प्रत्युवाच महातेजाः शुकश्चारणिसम्भवः ॥ ४९ | सूतजी बोले— परम तेजस्वी उन व्यासजीका वचन सुनकर अरणिसे उत्पन्न महातेजस्वी शुकदेवजीने उत्तर दिया। हे धर्मात्मन्! आपके द्वारा यह जो कहा |

अ० १६ ]प्रथम स्कन्ध१५३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दम्भोऽयं किल धर्मात्मन्भाति चित्ते ममाधुना।<br>जीवन्मुक्तो विदेहश्च राज्यं शास्ति मुदान्वितः॥ ५०<br><br>वन्ध्यापुत्र इवाभाति राजासौ जनकः पितः।<br>कुर्वन् राज्यं विदेहः किं सन्देहोऽयं ममाद्भुतः॥ ५१जा रहा है, उससे मेरे चित्तमें शंका उठती है कि कहीं यह दम्भ तो नहीं। जीवन्मुक्त तथा विदेह होते हुए भी राजा जनक हर्षके साथ कैसे राज्य करते हैं? हे पिताजी! यह बात तो वैसे ही असम्भव है जैसे किसी वन्ध्याको पुत्र हो! अतः वे राजा जनक राज्य करते हुए भी विदेह कैसे हैं? यह मुझे अद्भुत सन्देह हो रहा है!॥४९–५१॥
द्रष्टुमिच्छाम्यहं भूपं विदेहं नृपसत्तमम्।<br>कथं तिष्ठति संसारे पद्मपत्रमिवाम्भसि॥ ५२<br><br>सन्देहोऽयं महांस्तात विदेहे परिवर्तते।<br>मोक्षः किं वदतां श्रेष्ठ सौगतानामिवापरः॥ ५३अब मैं नृपश्रेष्ठ विदेह जनकको देखना चाहता हूँ कि वे जलमें कमलपत्रकी भाँति संसारमें कैसे रहते हैं? हे तात! उनके विदेह होनेके विषयमें मुझे बड़ा सन्देह हो रहा है! हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! सौगतोंकी भाँति वे भी मोक्षकी एक दूसरी परिभाषा तो नहीं हैं!॥ ५२–५३॥
कथं भुक्तमभुक्तं स्यादकृतं च कृतं कथम्।<br>व्यवहारः कथं त्याज्य इन्द्रियाणां महामते॥ ५४हे महामते! भला भोगा हुआ भोग अभोग और किया हुआ कर्म अकर्म कैसे हो सकता है? इन्द्रियोंका सहज व्यवहार कैसे छोड़ा जा सकता है?॥ ५४॥
माता पुत्रस्तथा भार्या भगिनी कुलटा तथा।<br>भेदाभेदः कथं न स्याद्यद्येतन्मुक्तता कथम्॥ ५५एक पुत्रका अपनी माता, पत्नी, बहन तथा किसी असती स्त्रीके साथ भेद-अभेदका सम्बन्ध क्यों नहीं होगा? और ऐसा होनेपर जीवन्मुक्तता कैसी?॥ ५५॥
कटु क्षारं तथा तीक्ष्णं कषायं मिष्टमेव च।<br>रसना यदि जानाति भुंक्ते भोगाननुत्तमान्॥ ५६<br><br>शीतोष्णसुखदुःखादिपरिज्ञानं यदा भवेत्।<br>मुक्तता कीदृशी तात सन्देहोऽयं ममाद्भुतः॥ ५७यदि जिह्वा कटु, क्षार, तीक्ष्ण, कषाय, मधुर आदि स्वादोंको जानती है तो वे अच्छे-अच्छे पदार्थोंका रसास्वादन करते ही होंगे। यदि शीत, उष्ण, सुख-दुःखका परिज्ञान उन्हें होता होगा तो भला यह मुक्तता कैसी? हे तात! मुझे यह अद्भुत सन्देह हो रहा है!॥ ५६–५७॥
शत्रुमित्रपरिज्ञानं वैरं प्रीतिकरं सदा।<br>व्यवहारे परे तिष्ठन्कथं न कुरुते नृपः॥ ५८<br><br>चौरं वा तापसं वापि समानं मन्यते कथम्।<br>असमा यदि बुद्धिः स्यान्मुक्तता तर्हि कीदृशी॥ ५९शत्रु और मित्रको पहचानकर उनके साथ वैर अथवा प्रीतिका व्यवहार किया जाता है, तो राज्यसिंहासनपर बैठे हुए राजा जनक शत्रुता या मित्रताका व्यवहार क्या नहीं रखते होंगे? उनके राज्यमें साधु और चोर समान कैसे समझे जाते हैं? यदि उनके प्रति समान बुद्धि नहीं है, तब भला वह जीवन्मुक्तता कैसी?॥ ५८–५९॥
दृष्टपूर्वो न मे कश्चिज्जीवन्मुक्तश्च भूपतिः।<br>शङ्केयं महती तात गृहे मुक्तः कथं नृपः॥ ६०ऐसा जीवन्मुक्त कोई राजा मेरे द्वारा पहले देखा नहीं गया। हे तात! यह बहुत बड़ी शंका है कि वे राजा जनक घरमें रहकर भी मुक्त कैसे हैं? उन
१५४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७

| दिदृक्षा महती जाता श्रुत्वा तं भूपतिं तथा।<br>सन्देहविनिवृत्त्यर्थं गच्छामि मिथिलां प्रति॥ ६१ | राजाके विषयमें सुनकर उन्हें देखनेकी बड़ी लालसा उत्पन्न हो गयी है। अतः सन्देह-निवृत्तिके लिये मैं मिथिलापुरी जा रहा हूँ॥ ६०-६१॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकं प्रति व्यासोपदेशवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥

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अथ सप्तदशोऽध्यायः

शुकदेवजीका राजा जनकसे मिलनेके लिये मिथिलापुरीको प्रस्थान तथा राजभवनमें प्रवेश

सूत उवाचसूतजी बोले—
इत्युक्त्वा पितरं पुत्रः पादयोः पतितः शुकः।<br>बद्धाञ्जलिरुवाचेदं गन्तुकामो महामनाः॥ १<br><br>आपृच्छे त्वां महाभाग ग्राह्यं ते वचनं मया।<br>विदेहान्द्रष्टुमिच्छामि पालिताञ्जनकेन तु॥ २[हे मुनियो!] पितासे यह कहकर महात्मा पुत्र शुकदेवजी उनके चरणोंपर गिर पड़े तथा हाथ जोड़कर चलनेकी इच्छासे बोले—हे महाभाग! अब आपसे आज्ञा चाहता हूँ। मुझे आपका वचन स्वीकार्य है। अतः मैं महाराज जनकद्वारा पालित मिथिलापुरी देखना चाहता हूँ॥ १-२॥
विना दण्डं कथं राज्यं करोति जनकः किल।<br>धर्मे न वर्तते लोको दण्डश्चेन्न भवेद्यदि॥ ३राजा जनक दण्ड दिये बिना ही कैसे राज्य चलाते हैं? क्योंकि यदि दण्डका भय प्रजाओंको न हो तो लोग धर्मका पालन नहीं करेंगे॥ ३॥
धर्मस्य कारणं दण्डो मन्वादिप्रहितः सदा।<br>स कथं वर्तते तात संशयोऽयं महान्मम॥ ४<br><br>मम माता त्वियं वन्ध्या तद्वद्भाति विचेष्टितम्।<br>पृच्छामि त्वां महाभाग गच्छामि च परन्तप॥ ५मनु आदिके द्वारा धर्माचरणका मूल कारण सदा दण्ड-विधान ही कहा गया है। इस राजधर्मका निर्वाह बिना दण्डके कैसे हो सकेगा? हे पिताजी! इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है। हे महाभाग! यह बात वैसी ही अनर्गल प्रतीत होती है, जैसे कोई कहे कि मेरी यह माता वन्ध्या है। हे परन्तप! अब मैं आपसे अनुमति लेता हूँ और यहाँसे जा रहा हूँ॥ ४-५॥
सूत उवाच<br>तं दृष्ट्वा गन्तुकामं च शुकं सत्यवतीसुतः।<br>आलिङ्ग्योवाच पुत्रं तं ज्ञानिनं निःस्पृहं दृढम्॥ ६**सूतजी बोले—**इस प्रकार शुकदेवजीको जनकपुर जानेका इच्छुक देखकर व्यासजीने अपने ज्ञानी एवं निःस्पृह पुत्रका दृढ़ आलिंगन करके कहा— ॥ ६॥
व्यास उवाच<br>स्वस्त्यस्तु शुक दीर्घायुर्भव पुत्र महामते।<br>सत्यां वाचं प्रदत्त्वा मे गच्छ तात यथासुखम्॥ ७<br><br>आगन्तव्यं पुनर्गत्वा ममाश्रममनुत्तमम्।<br>न कुत्रापि च गन्तव्यं त्वया पुत्र कथञ्चन॥ ८**व्यासजी बोले—**हे महामते! हे पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो, हे शुक! तुम दीर्घायु होओ। हे तात! तुम मुझे यह सत्य वचन देकर सुखपूर्वक जाओ कि यहाँसे जाकर मेरे इस उत्तम आश्रममें पुनः आओगे। हे पुत्र! तुम वहाँसे कहीं और कभी भी मत चले जाना॥ ७-८॥
सुखं जीवामि पुत्राहं दृष्ट्वा ते मुखपङ्कजम्।<br>अपश्यन्दुःखमाप्नोमि प्राणस्त्वमसि मे सुत॥ ९हे पुत्र! मैं तुम्हारा मुखकमल देखकर ही सुखपूर्वक जीता हूँ और तुम्हें न देखनेपर दुःखी रहता हूँ। हे सुत! तुम्हीं मेरे प्राण हो॥ ९॥
अ० १७ ]प्रथम स्कन्ध१५५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दृष्ट्वा त्वं जनकं पुत्र सन्देहं विनिवर्त्य च।<br>अत्रागत्य सुखं तिष्ठ वेदाध्ययनतत्परः ॥ १०हे पुत्र! वहाँ राजर्षि जनकसे मिलकर और अपना सन्देह दूर करके फिर उसके बाद यहाँ आकर वेदाध्ययनमें रत रहते हुए सुखपूर्वक रहो ॥ १० ॥
सूत उवाच<br>इत्युक्तः सोऽभिवाद्यार्थं कृत्वा चैव प्रदक्षिणाम्।<br>चलितस्तरसातीव धनुर्मुक्तः शरो यथा ॥ ११**सूतजी बोले—**व्यासजीके ऐसा कहनेपर शुकदेवजी अपने पिताको प्रणाम तथा उनकी प्रदक्षिणा करके शीघ्र ही इस प्रकार चल पड़े जैसे धनुषसे छूटा हुआ बाण ॥ ११ ॥
सम्पश्यन्विविधान्देशाँल्लोकांश्च वित्तधर्मिणः।<br>वनानि पादपांश्चैव क्षेत्राणि फलितानि च ॥ १२<br><br>तापसांस्तप्यमानांश्च याजकान्दीक्षयान्वितान्।<br>योगाभ्यासरतान्योगिवानप्रस्थान्वनौकसः ॥ १३<br><br>शैवान्पाशुपतांश्चैव सौराञ्छाक्तांश्च वैष्णवान्।<br>वीक्ष्य नानाविधान्धर्माञ्जगामातिस्मयन्मुनिः ॥ १४मार्गमें चलते हुए अनेक समृद्धिशाली देशों, नागरिकों, वनों, वृक्षों, फले-फूले खेतों, तप करते हुए तपस्वीजनों, दीक्षा लिये हुए याजकजनों, योगाभ्यासमें तत्पर योगीजनौं, वनमें रहनेवाले वानप्रस्थों, वैष्णव, पाशुपत, शैव, शाक्त एवं सूर्योपासक और अनेक धर्मा-वलम्बियोंको देखकर वे शुकदेवमुनि अति विस्मयमें पड़ गये ॥ १२—१४ ॥
वर्षद्वयेन मेरुं च समुल्लङ्घ्य महामतिः।<br>हिमाचलं च वर्षेण जगाम मिथिलां प्रति ॥ १५इस प्रकार वे महामति शुकदेवजी लगभग दो वर्षोमें मेरुपर्वत और एक वर्षमें हिमालयको पार करके मिथिला-देशमें पहुँचे ॥ १५ ॥
प्रविष्टो मिथिलां मध्ये पश्यन्सर्वर्द्धिमृत्तमाम्।<br>प्रजाश्च सुखिताः सर्वाः सदाचाराः सुसंस्थिताः ॥ १६जब वे मिथिलामें प्रविष्ट हुए, तब उन्होंने वहाँकी श्रेष्ठ ऐश्वर्यसम्पदाको देखा तथा वहाँकी सारी प्रजाको सुखी एवं सदाचारसम्पन्न देखा ॥ १६ ॥
क्षत्रा निवारितस्तत्र कस्त्वमत्र समागतः।<br>किं ते कार्यं वदस्वेति पृष्टस्तेन न चाब्रवीत् ॥ १७<br><br>निःसृत्य नगरद्वारात्स्थितः स्थाणुरिवाचलः।<br>विस्मितोऽतिहसंस्तस्थौ वचो नोवाच किञ्चन ॥ १८वहाँ द्वारपालने उन्हें रोका और पूछा—तुम कौन हो और कहाँसे आये हो, तुम्हारा क्या कार्य है; बताओ। ऐसा पूछनेपर भी शुकदेवजी मौन रहे, कुछ बोले नहीं। वे नगरद्वारसे बाहर जाकर स्थाणुकी तरह खड़े हो गये और थोड़ी देरमें आश्चर्यचकित होकर हँसते हुए वहीं स्थित हो गये, पर किसीसे कुछ बोले नहीं ॥ १७-१८ ॥
प्रतीहार उवाच<br>ब्रूहि मूकोऽसि किं ब्रह्मन्किमर्थं त्वमिहागतः।<br>चलनं च विना कार्यं न भवेदिति मे मतिः ॥ १९**द्वारपालने पूछा—**हे ब्रह्मन्! बोलिये, आप गूँगे तो नहीं हैं। आपका किस हेतु यहाँ आना हुआ है? मेरे विचारमें तो कोई कहीं भी निष्प्रयोजन नहीं जाता ॥ १९ ॥
राजाज्ञया प्रवेष्टव्यं नगरेऽस्मिन्सदा द्विज।<br>अज्ञातकुलशीलस्य प्रवेशो नात्र सर्वथा ॥ २०हे विप्र! इस नगरमें राजाकी आज्ञा पाकर ही कोई प्रवेश कर सकता है। अज्ञात कुल तथा शीलवाले व्यक्तिका प्रवेश यहाँ कदापि नहीं होता है ॥ २० ॥
तेजस्वी भासि नूनं त्वं ब्राह्मणो वेदवित्तमः।<br>कुलं कार्यं च मे ब्रूहि यथेष्टं गच्छ मानद ॥ २१हे मानद! आप निश्चय ही तेजस्वी एवं वेदवेत्ता ब्राह्मण प्रतीत हो रहे हैं। इसलिये आप अपने कुल तथा प्रयोजनके विषयमें मुझे बता दें और फिर अपने इच्छानुसार चले जायें ॥ २१ ॥
१५६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७
शुक उवाच<br>यदर्थमागतोऽस्म्यत्र तत्प्राप्तं वचनात्तव।<br>विदेहनगरं द्रष्टुं प्रवेशो यत्र दुर्लभः॥ २२**शुकदेवजी बोले—**मैं जिस कार्यके लिये यहाँ आया था, वह तुम्हारे कथनमात्रसे ही पूरा हो गया। मैं विदेहनगर देखने आया था, परंतु यहाँ तो प्रवेश ही दुर्लभ है॥ २२॥
मोहोऽयं मम दुर्बुद्धेः समुल्लङ्घ्य गिरिद्वयम्।<br>राजानं द्रष्टुकामोऽहं पर्यटन्समुपागतः॥ २३मुझ अज्ञानीकी यह भूल थी, जो दो पर्वतोंको लाँघकर महाराजसे मिलनेकी इच्छासे घूमते हुए यहाँ चला आया॥ २३॥
वञ्चितोऽहं स्वयं पित्रा दूषणं कस्य दीयते।<br>भ्रामितोऽहं महाभाग कर्मणा वा महीतले॥ २४मैं तो स्वयं अपने पिताद्वारा ही ठगा गया हूँ। इसमें किसी अन्यको ही क्या दोष दिया जाय? अथवा हे महाभाग! यह मेरे दुर्भाग्यका ही दोष है, जिसके कारण इस भूमिपर मुझे इतना चक्कर काटना पड़ा॥ २४॥
धनाशा पुरुषस्येह परिभ्रमणकारणम्।<br>सा मे नास्ति तथाप्यत्र सम्प्राप्तोऽस्मि भ्रमात्किल॥ २५इस संसारमें लोगोंका भ्रमण करनेका उद्देश्य धनोपार्जन ही है, किंतु मुझे उसकी कोई इच्छा नहीं है। मैं तो केवल भ्रमवश ही यहाँ आ गया हूँ॥ २५॥
निराशस्य सुखं नित्यं यदि मोहे न मज्जति।<br>निराशोऽहं महाभाग मग्नोऽस्मिन्मोहसागरे॥ २६आशारहित पुरुषको ही सर्वदा सुख प्राप्त होता है, यदि वह मोहमें न पड़े। किंतु हे महाभाग! मैं तो निराश होकर भी, न जानें क्यों इस मोहसागरमें निमग्न हो रहा हूँ!॥ २६॥
क्व मेरुर्मिथिला क्वेयं पद्भ्यां च समुपागतः।<br>परिश्रमफलं किं मे वञ्चितो विधिना किल॥ २७कहाँ सुमेरुपर्वत और कहाँ यह मिथिलापुरी! पैदल ही चलकर मैं यहाँ आया हूँ। इस परिश्रमका फल मुझे क्या मिला? प्रारब्धने ही मुझे ठगा है।
प्रारब्धं किल भोक्तव्यं शुभं वाप्यथवाशुभम्।<br>उद्यमस्तद्वशे नित्यं कारयत्येव सर्वथा॥ २८प्रारब्धका भोग अवश्य ही भोगना पड़ता है, चाहे वह शुभ हो या अशुभ। उद्योग भी तो सदा उसी दैवके अधीन ही रहता है; वह जैसा चाहे वैसा कराता है॥ २७-२८॥
न तीर्थं न च वेदोऽत्र यदर्थमिह मे श्रमः।<br>अप्रवेशः पुरे जातो विदेहो नाम भूपतिः॥ २९यहाँ न कोई तीर्थ है न ज्ञानप्राप्ति होनी है, जिसके लिये यह मेरा परिश्रम हुआ। मैं तो महाराज जनकका ‘विदेह’ नाम सुनकर उत्सुकतासे यहाँ आया था, किंतु उनके नगरमें तो प्रवेश करना भी निषिद्ध है॥ २९॥
इत्युक्त्वा विररामाशु मौनीभूत इव स्थितः।<br>ज्ञातो हि प्रतिहारेण ज्ञानी कश्चिद् द्विजोत्तमः॥ ३०<br><br>सामपूर्वमुवाचासौ तं क्षत्ता संस्थितं मुनिम्।<br>गच्छ भो यत्र ते कार्यं यथेष्टं द्विजसत्तम॥ ३१इतना कहकर शुकदेवजी चुप हो गये और मौन होकर खड़े रहे। द्वारपालको लगा कि ये कोई ज्ञानी श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं। तब उसने वहाँ खड़े मुनिसे शान्तिपूर्वक निवेदन किया—हे द्विजश्रेष्ठ! आपका जहाँ कार्य हो, वहाँ यथेष्ट चले जाइये॥ ३०-३१॥

अ० १७] प्रथम स्कन्ध १५७

अ० १७] प्रथम स्कन्ध १५७

अपराधो मम ब्रह्मन्नन्निवारितवानहम्।<br>तत्क्षन्तव्यं महाभाग विमुक्तानां क्षमा बलम्॥ ३२हे ब्रह्मन्! मैंने जो आपको रोका था, वह मेरा अपराध हुआ। उसके लिये आप क्षमा करें; क्योंकि हे महाभाग! मुक्तजनोंका तो क्षमा ही बल है॥ ३२॥
शुक उवाच<br>किं तेऽत्र दूषणं क्षत्तः परतन्त्रोऽसि सर्वदा।<br>प्रभुकार्यं प्रकर्तव्यं सेवकेन यथोचितम्॥ ३३<br>न भूपदूषणं चात्र यदहं रक्षितस्त्वया।<br>चोरशत्रुपरिज्ञानं कर्तव्यं सर्वथा बुधैः॥ ३४**शुकदेवजी बोले—**हे द्वारपाल! इसमें तुम्हारा क्या दोष है; तुम तो सर्वदा पराधीन हो। सेवकको तो स्वामीकी आज्ञाका यथोचित पालन करना ही चाहिये। तुमने मुझे जो रोका इसमें राजाका भी कोई दोष नहीं है; क्योंकि बुद्धिमानोंको चोर और शत्रुओंका सम्यक् ज्ञान रखना चाहिये॥ ३३-३४॥
ममैव सर्वथा दोषो यदहं समुपागतः।<br>गमनं परगेहे यल्लघुतायाश्च कारणम्॥ ३५यह सर्वथा मेरा ही दोष है, जो मैं यहाँ आ गया। [बिना बुलाये] दूसरेके घर जाना लघुताका कारण होता है॥ ३५॥
प्रतीहार उवाच<br>किं सुखं द्विज किं दुःखं किं कार्यं शुभमिच्छता।<br>कः शत्रुहितकर्ता को ब्रूहि सर्वं ममाद्य वै॥ ३६**द्वारपालने कहा—**हे विप्र! सुख क्या है, दुःख क्या है, कल्याण चाहनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है? शत्रु कौन है और मित्र कौन है? आप मुझे यह सब बताइये॥ ३६॥
शुक उवाच<br>द्वैविध्यं सर्वलोकेषु सर्वत्र द्विविधो जनः।<br>रागी चैव विरागी च तयोश्चित्तं द्विधा पुनः॥ ३७<br>विरागी त्रिविधः कामं ज्ञातोऽज्ञातश्च मध्यमः।<br>रागी च द्विविधः प्रोक्तो मूर्खश्च चतुरस्तथा॥ ३८<br>चातुर्यं द्विविधं प्रोक्तं शास्त्रजं मतिजं तथा।<br>मतिस्तु द्विविधा लोके युक्तायुक्तेति सर्वथा॥ ३९**शुकदेवजी बोले—**सभी लोकोंमें सर्वत्र द्वैविध्य रहता है। इसलिये मनुष्य भी दो प्रकारके हैं—एक रागी और दूसरा विरागी। उन दोनोंके मन भी दो प्रकारके होते हैं। उनमें भी विरागी तीन प्रकारके होते हैं—ज्ञात, अज्ञात एवं मध्यम। रागी भी दो प्रकारके कहे गये हैं—मूर्ख तथा चतुर। चातुर्य भी दो प्रकारका कहा गया है—शास्त्रजनित तथा बुद्धिजनित। इसी प्रकार लोकमें बुद्धि भी युक्त और अयुक्त-भेदसे दो प्रकारकी होती है॥ ३७–३९॥
प्रतीहार उवाच<br>यदुक्तं भवता विद्वन्नार्थज्ञोऽहं द्विजोत्तम।<br>तत्सर्वं विस्तरेणाद्य यथार्थं वद सत्तम॥ ४०**द्वारपालने कहा—**हे विद्वन्! हे विप्रवर! आपने जो कुछ कहा है, उसे मैं भलीभाँति नहीं समझ पाया। अतएव हे श्रेष्ठ! आप फिरसे विस्तारपूर्वक इस विषयको यथार्थरूपसे समझाइये॥ ४०॥
शुक उवाच<br>रागो यस्यास्ति संसारे स रागीत्युच्यते ध्रुवम्।<br>दुःखं बहुविधं तस्य सुखं च विविधं पुनः॥ ४१**शुकदेवजी बोले—**इस संसारमें जिसको राग है, वह निश्चय ही रागी कहलाता है। उस रागीको अनेक प्रकारके सुख एवं दुःख आते ही रहते हैं॥ ४१॥
धनं प्राप्य सुतान्दारान्मानं च विजयं तथा।<br>तदप्राप्य महद्दुःखं भवत्येव क्षणे क्षणे॥ ४२धन, पुत्र, कलत्र, मान-प्रतिष्ठा और विजय प्राप्त करके ही सुख प्राप्त होता है। इनके न मिलनेपर प्रतिक्षण महान् दुःख होता ही है॥ ४२॥

| १५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कार्यस्तस्य सुखोपायः कर्तव्यं सुखसाधनम्।<br>तस्यारातिः स विज्ञेयः सुखविघ्नं करोति यः॥ ४३<br><br>सुखोत्पादयिता मित्रं रागयुक्तस्य सर्वदा।<br>चतुरो नैव मुह्येत मूर्खः सर्वत्र मुह्यति॥ ४४अतः जैसे सुख प्राप्त हो सके, वैसा उपाय करना चाहिये और सुखके साधनका संग्रह करना चाहिये। जो उस सुखमें विघ्न डाले, उसे शत्रु समझना चाहिये। जो रागी पुरुषके सुखको सर्वदा बढ़ाये, वही मित्र है। चतुर मनुष्य मोहमें फँसता नहीं है; किंतु मूर्ख सर्वत्र आसक्त रहता है॥ ४३-४४॥
विरक्तस्यात्मरक्तस्य सुखमेकान्तसेवनम्।<br>आत्मानुचिन्तनं चैव वेदान्तस्य च चिन्तनम्॥ ४५<br><br>दुःखं तदेतत्सर्वं हि संसारकथनादिकम्।<br>शत्रवो बहवस्तस्य विज्ञस्य शुभमिच्छतः॥ ४६<br><br>कामः क्रोधः प्रमादश्च शत्रवो विविधाः स्मृताः।<br>बन्धुः सन्तोष एवास्य नान्योऽस्ति भुवनत्रये॥ ४७विरागी तथा आत्माराम पुरुषको एकान्तवास, आत्म-चिन्तन तथा वेदान्तशास्त्रका अनुशीलन करनेसे ही सुख होता है। सांसारिक विषयोंकी चर्चा आदि—यह सब उनके लिये दुःखरूप है। कल्याण चाहनेवाले विद्वान् पुरुषके लिये बहुत शत्रु हैं; काम, क्रोध, प्रमाद आदि अनेक प्रकारके शत्रु बताये गये हैं; किंतु व्यक्तिका सच्चा बन्धु तो एकमात्र सन्तोष ही है; तीनों लोकोंमें दूसरा कोई भी नहीं है॥ ४५-४७॥
सूत उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मत्वा तं ज्ञानिनं द्विजम्।<br>क्षत्ता प्रवेशयामास कक्षां चातिमनोरमाम्॥ ४८**सूतजी बोले—**शुकदेवजीकी बात सुनकर उन्हें ज्ञानी द्विज समझकर उसने शुकदेवजीको एक अत्यन्त रमणीय कक्षसे प्रवेश कराया॥ ४८॥
नगरं वीक्षमाणः संस्त्रैविध्यजनसङ्कुलम्।<br>नानाविपणिद्रव्याढ्यं क्रयविक्रयकारकम्॥ ४९<br><br>रागद्वेषयुतं कामलोभमोहाकुलं तथा।<br>विवदत्सजनाकीर्णं वसुपूर्णं महत्तरम्॥ ५०<br><br>पश्यन्स त्रिविधाँल्लोकान्प्रासरद् राजमन्दिरम्।<br>प्राप्तः परमतेजस्वी द्वितीय इव भास्करः॥ ५१<br><br>निवारितश्च तत्रैव प्रतीहारेण काष्ठवत्।<br>तत्रैव च स्थितो द्वारि मोक्षमेवानुचिन्तयन्॥ ५२तीन प्रकारके नागरिकजनोंसे भरे हुए; अनेक प्रकारके क्रय-विक्रयकी वस्तुओंसे सजी दूकानोंवाले; राग-द्वेष, काम, लोभ, मोहसे युक्त एवं परस्पर वाद-विवादमें संलग्न श्रेष्ठीजनोंसे सुशोभित और धन-धान्यसे परिपूर्ण विशाल नगरको देखते हुए शुकदेवजी चले। इस तरह तीन प्रकारके लोगोंको देखते हुए शुकदेवजी राजभवनकी ओर बढ़े। इस प्रकार द्वितीय सूर्यके समान परम तेजस्वी शुकदेवजी द्वारपर पहुँचे; द्वारपालने उन्हें अन्दर जानेसे रोका। तब वे काष्ठके समान वहीं द्वारपर खड़े हो गये और मोक्षसम्बन्धी विषयपर विचार करने लगे॥ ४९-५२॥
छायायामातपे चैव समदर्शी महातपाः।<br>ध्यानं कृत्वा तथैकान्ते स्थितः स्थाणुरिवाचलः॥ ५३धूप तथा छायाको समान-समझनेवाले महातपस्वी शुकदेवजी वहाँ एकान्तमें ध्यान करके इस प्रकार खड़े रहे मानो कोई अचल स्तम्भ हो॥ ५३॥
तं मुहूर्तादुपागत्य राज्ञोऽमात्यः कृताञ्जलिः।<br>प्रावेशयत्ततः कक्षां द्वितीयां राजवेश्मनः॥ ५४थोड़ी देर बाद राजमन्त्रीने हाथ जोड़े हुए स्वयं आकर उन्हें राजभवनके दूसरे कक्षमें प्रवेश कराया॥ ५४॥
अ० १७ ]प्रथम स्कन्ध१५९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्र दिव्यं मनोरम्यं पुष्पितं दिव्यपादपम्।<br>तद्वनं दर्शयित्वा तु कृत्वा चातिथिसत्क्रियाम्॥ ५५<br><br>वारमुख्याः स्त्रियस्तत्र राजसेवापरायणाः।<br>गीतवादित्रकुशलाः कामशास्त्रविशारदाः॥ ५६<br><br>ता आदिश्य च सेवार्थं शुकस्य मन्त्रिसत्तमः।<br>निर्गतः सदनात्तस्माद्व्यासपुत्रः स्थितस्तदा॥ ५७<br><br>पूजितः परया भक्त्या ताभिः स्त्रीभिर्यथाविधि।<br>देशकालोपपन्नेन नानानेनाति तोषितः॥ ५८वहाँ एक दिव्य रमणीय उपवन था, जिसमें विविध प्रकारके पुष्पोंसे लदे दिव्य वृक्ष सुशोभित हो रहे थे। उस वनको दिखाकर मन्त्रीने उनका यथोचित आतिथ्य सत्कार किया। वहाँ राजाकी सेवा करनेवाली अनेक वारांगनाएँ थीं, वे नृत्य-गानमें कुशल तथा कामशास्त्रमें निपुण थीं। शुकदेवजीकी सेवाके लिये उन्हें आदेश देकर राजमन्त्री उस भवनसे निकल गये और शुकदेवजी वहीं स्थित रहे। उन वारांगनाओंने परम भक्तिके साथ उनकी पूजा की और देशकालानुसार उपलब्ध अनेक प्रकारके भोजनसे उन्हें सन्तुष्ट किया॥ ५५–५८॥
ततोऽन्तःपुरवासिन्यस्तस्यान्तःपुरकाननम् ।<br>रम्यं संदर्शयामासुरङ्गनाः काममोहिताः॥ ५९<br><br>स युवा रूपवान्कान्तो मृदुभाषी मनोरमः।<br>दृष्ट्वा ता मुमुहुः सर्वास्तं च काममिवापरम्॥ ६०तत्पश्चात् अन्तःपुरनिवासिनी कामिनी स्त्रियोंने उन्हें अन्तःपुरका वन दिखाया, जो अत्यन्त रमणीय था। वे युवा, रूपवान्, कान्तिमान्, मृदुभाषी एवं मनोरम थे। दूसरे कामदेवके समान उन शुकदेवजीको देखकर वे सभी मुग्ध हो गयीं॥ ५९–६०॥
जितेन्द्रियं मुनिं मत्वा सर्वाः पर्यचरंस्तदा।<br>आरणेयस्तु शुद्धात्मा मातृभावमकल्पयत्॥ ६१मुनिको जितेन्द्रिय जानकर वे सब उनकी परिचर्या करने लगीं। अरणिनन्दन शुद्धात्मा शुकदेवजीने उन्हें माताके समान समझा॥ ६१॥
आत्मारामो जितक्रोधो न हृष्यति न तप्यति।<br>पश्यंस्तासां विकारांश्च स्वस्थ एव स तस्थिवान्॥ ६२वे आत्माराम तथा क्रोधको जीतनेवाले शुकदेवजी न हर्षित होते थे और न दुःखी। उनकी चेष्टाओंको देखकर भी वे शान्तचित्त होकर स्थित रहे॥ ६२॥
तस्मै शय्यां सुरम्यां च ददुर्नार्यः सुसंस्कृताम्।<br>परार्ध्यास्तरणोपेतां नानोपस्करसंवृताम्॥ ६३<br><br>स कृत्वा पादशौचं च कुशपाणिरतन्द्रितः।<br>उपास्य पश्चिमां सन्ध्यां ध्यानमेवान्वपद्यत॥ ६४तब उन स्त्रियोंने उनके लिये सुरम्य, कोमल तथा बहुमूल्य आस्तरण और नानाविध उपकरणोंसे सुसज्जित शय्या बिछायी। शुकदेवजी हाथ-पाँव धोकर हाथमें कुश लेकर सावधान हो सायंकालीन सन्ध्योपासन सम्पन्न करके भगवान्के ध्यानमें लग गये॥ ६३–६४॥
याममेकं स्थितो ध्याने सुष्वाप तदनन्तरम्।<br>सुप्त्वा यामद्वयं तत्र चोदतिष्ठत्ततः शुकः॥ ६५<br><br>पाश्चात्यं यामिनीयामं ध्यानमेवान्वपद्यत।<br>स्नात्वा प्रातःक्रियाः कृत्वा पुनरास्ते समाहितः॥ ६६इस प्रकार एक प्रहरतक ध्यानावस्थित होकर वे शयन करने लगे। दो प्रहर शयन करके पुनः वे शुकदेवजी उठ गये। रात्रिके चौथे प्रहरमें वे पुनः ध्यानमें स्थित रहे; तदनन्तर स्नान करके प्रातःकालीन क्रियाएँ सम्पन्न करके पुनः समाधिस्थ हो गये॥ ६५–६६॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
शुकस्य राजमन्दिरप्रवेशवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥

१६०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १८

अथाष्टादशोऽध्यायः

शुकदेवजीके प्रति राजा जनकका उपदेश

सूत उवाचसूतजी बोले—
श्रुत्वा तमागतं राजा मन्त्रिभिः सहितः शुचिः।<br>पुरः पुरोहितं कृत्वा गुरुपुत्रं समभ्यगात्॥ १शुकदेवजीको आया हुआ सुनकर पवित्रात्मा राजा जनक अपने पुरोहितको आगे करके मन्त्रियोंसहित उन गुरुपुत्रके पास गये॥ १॥
कृत्वार्हणां नृपः सम्यग् दत्तासनमनुत्तमम्।<br>पप्रच्छ कुशलं गां च विनिवेद्य पयस्विनीम्॥ २महाराज जनकने उन्हें बड़े आदरसे उत्तम आसन देकर विधिवत् सत्कार करनेके पश्चात् एक दूध देनेवाली गौ प्रदान करके उनसे कुशल पूछा॥ २॥
स च तां नृपपूजां वै प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि।<br>पप्रच्छ कुशलं राज्ञे स्वं निवेद्य निरामयम्॥ ३शुकदेवजीने भी राजाकी पूजाको यथाविधि स्वीकार किया और अपना कुशल बताकर राजासे भी कुशल-मंगल पूछा॥ ३॥
कृत्वा कुशलसंप्रश्नमुपविष्टं सुखासने।<br>शुकं व्याससुतं शान्तं पर्यपृच्छत पार्थिवः॥ ४<br>किं निमित्तं महाभाग निःस्पृहस्य च मां प्रति।<br>जातं ह्यागमनं ब्रूहि कार्यं तन्मुनिसत्तम॥ ५इस प्रकार कुशल-प्रश्न करके सुखदायी आसनपर बैठे हुए शान्तचित्तवाले व्यासपुत्र शुकदेवजीसे महाराज जनकने पूछा—हे महाभाग! मेरे यहाँ आप निःस्पृहका आगमन किस कारण हुआ? हे मुनिश्रेष्ठ! उस प्रयोजन को बताइये?॥ ४-५॥
शुक उवाचशुकदेवजी बोले—
व्यासेनोक्तो महाराज कुरु दारपरिग्रहम्।<br>सर्वेषामाश्रमाणां च गृहस्थाश्रम उत्तमः॥ ६<br>मया नाङ्गीकृतं वाक्यं मत्वा बन्धं गुरोरपि।<br>न बन्धोऽस्तीति तेनोक्तो नाहं तत्कृतवान्पुनः॥ ७महाराज! मेरे पिता व्यासजीने मुझसे कहा कि विवाह कर लो; क्योंकि सब आश्रमोंमें गृहस्थ-आश्रम ही श्रेष्ठ है। गुरुरूप पिताकी आज्ञाको बन्धनकारक मानकर मैंने उसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने समझाया कि गृहस्थाश्रम बन्धन नहीं है, फिर भी मैंने उसे स्वीकार नहीं किया॥ ६-७॥
इति सन्दिग्धमनसं मत्वा स मुनिसत्तमः।<br>उवाच वचनं तथ्यं मिथिलां गच्छ मा शुचः॥ ८<br>याज्योऽस्ति जनकस्तत्र जीवन्मुक्तो नराधिपः।<br>विदेहो लोकविदितः पाति राज्यमकण्टकम्॥ ९इस प्रकार मुझे संशययुक्त चित्तवाला समझकर मुनिश्रेष्ठ व्यासने तथ्ययुक्त वचन कहा—तुम मिथिला चले जाओ, खेद न करो। वहाँ राजर्षि जनक रहते हैं, वे याज्ञिक एवं जीवन्मुक्त राजा हैं। संसारमें विदेह नामसे विख्यात वे वहाँ निष्कण्टक राज्य कर रहे हैं॥ ८-९॥
कुर्वन् राज्यं तथा राजा मायापाशैर्न बध्यते।<br>त्वं बिभेषि कथं पुत्र वनवृत्तिः परन्तप॥ १०हे पुत्र! महाराज जनक राज्य करते हुए भी मायाके जालमें नहीं बँधते, तब हे परन्तप! तुम वनवासी होते हुए भी क्यों भयभीत हो रहे हो?॥ १०॥
पश्य तं नृपशार्दूलं त्यज मोहं मनोगतम्।<br>कुरु दारान्महाभाग पृच्छ वा भूपतिं च तम्॥ ११<br>सन्देहं ते मनोजातं कथयिष्यति पार्थिवः।<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मामेहि तरसा सुत॥ १२उन नृपश्रेष्ठ विदेहको देखो और अपने मनमें उठते हुए मोहका त्याग करो। हे महाभाग! विवाह करो, अन्यथा जाकर उन राजासे ही पूछो। वे राजा तुम्हारे मनमें उत्पन्न सन्देहका समाधान कर देंगे। तत्पश्चात् हे पुत्र! उनकी बात सुनकर तुम शीघ्र ही मेरे पास चले आना॥ ११-१२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 A

अ० १८ ]प्रथम स्कन्ध१६१

| सम्प्राप्तोऽहं महाराज त्वत्पुरे च तदाज्ञया।<br>मोक्षकामोऽस्मि राजेन्द्र ब्रूहि कृत्यं ममानघ॥ १३<br><br>तपस्तीर्थव्रतेज्याश्च स्वाध्यायस्तीर्थसेवनम्।<br>ज्ञानं वा वद राजेन्द्र मोक्षं प्रति च कारणम्॥ १४ | हे महाराज! मैं उन्हींके आदेशसे आपकी पुरीमें आया हूँ। हे राजेन्द्र! हे अनघ! मैं मोक्षका अभिलाषी हूँ, अतः जो कार्य मेरे लिये उचित हो, वह बताइये॥ १३॥<br>हे राजेन्द्र! तप, तीर्थ, व्रत, यज्ञ, स्वाध्याय, तीर्थसेवन और ज्ञान—इनमेंसे जो मोक्षका साक्षात् साधन हो, वह मुझे बताइये॥ १४॥ | | जनक उवाच<br>शृणु विप्रेण कर्तव्यं मोक्षमार्गाश्रितेन यत्।<br>उपनीतो वसेदादौ वेदाभ्यासाय वै गुरौ॥ १५<br><br>अधीत्य वेदवेदान्तान्दत्त्वा च गुरुदक्षिणाम्।<br>समावृत्तस्तु गार्हस्थ्ये सदारो निवसेन्मुनिः॥ १६<br><br>न्यायवृत्तिस्तु सन्तोषी निराशी गतकल्मषः।<br>अग्निहोत्रादिकर्माणि कुर्वाणः सत्यवाक्शुचिः॥ १७<br><br>पुत्रं पौत्रं समासाद्य वानप्रस्थाश्रमे वसेत्।<br>तपसा षड्रिपूञ्जित्वा भार्यां पुत्रे निवेश्य च॥ १८<br><br>सर्वानग्नीन्यथान्यायमात्मन्यारोप्य धर्मवित्।<br>वसेत्तुर्याश्रमे श्रान्तः शुद्धे वैराग्यसम्भवे॥ १९<br><br>विरक्तस्याधिकारोऽस्ति संन्यासे नान्यथा क्वचित्।<br>वेदवाक्यमिदं तथ्यं नान्यथेति मतिर्मम॥ २० | **जनकजी बोले—**मोक्षमार्गावलम्बी विप्रको जो करना चाहिये, उसे सुनिये। उपनयनसंस्कारके बाद सर्वप्रथम वेदशास्त्रका अध्ययन करनेहेतु गुरुके सांनिध्यमें रहना चाहिये। वहाँ वेद-वेदान्तोंका अध्ययन करके दीक्षान्त गुरुदक्षिणा देकर वापस लौटे मुनिको विवाह करके पत्नीके साथ गृहस्थीमें रहना चाहिये। [गृहस्थाश्रममें रहते हुए] न्यायोपार्जित धनका अर्जन करे, सर्वदा सन्तुष्ट रहे और किसीसे कोई आशा न रखे। पापोंसे मुक्त होकर अग्निहोत्र आदि कर्म करते हुए सत्यवचन बोले और [मन, वचन, कर्मसे सदा] पवित्र रहे। पुत्र-पौत्र हो जानेपर [समयानुसार] वानप्रस्थ-आश्रममें रहे। वहाँ तपश्चर्याद्वारा [काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मात्सर्य—इन] छहों शत्रुओंपर विजय प्राप्त करके अपनी स्त्रीरक्षाका भार पुत्रको सौंप देनेके पश्चात् वह धर्मात्मा सब अग्नियोंका अपनेमें न्यायपूर्वक आधान कर ले और सांसारिक विषयोंके भोगसे शान्ति मिल जानेके बाद हृदयमें विशुद्ध वैराग्य उत्पन्न होनेपर चौथे आश्रमका आश्रय ले ले। विरक्तको ही संन्यास लेनेका अधिकार है, अन्य किसीको नहीं—यह वेदवाक्य सर्वथा सत्य है, असत्य नहीं—ऐसा मेरा मानना है॥ १५—२०॥ | | शुकाष्टचत्वारिंशद्वै संस्कारा वेदबोधिताः।<br>चत्वारिंशद् गृहस्थस्य प्रोक्तास्तत्र महात्मभिः॥ २१<br><br>अष्टौ च मुक्तिकामस्य प्रोक्ताः शमदमादयः।<br>आश्रमादाश्रमं गच्छेदिति शिष्टानुशासनम्॥ २२ | हे शुकदेवजी! वेदोंमें कुल अड़तालीस संस्कार कहे गये हैं। उनमें गृहस्थके लिये चालीस संस्कार महात्माओंने बताये हैं। मुमुक्षुके लिये शम, दम आदि आठ संस्कार कहे गये हैं। एक आश्रमसे ही [क्रमशः] दूसरे आश्रममें जाना चाहिये, ऐसा शिष्टजनोंका आदेश है॥ २१-२२॥ | | शुक उवाच<br>उत्पन्ने हृदि वैराग्ये ज्ञानविज्ञानसम्भवे।<br>अवश्यमेव वस्तव्यमाश्रमेषु वनेषु वा॥ २३ | **शुकदेवजी बोले—**चित्तमें वैराग्य और ज्ञान-विज्ञान उत्पन्न हो जानेपर अवश्य ही गृहस्थादि आश्रमोंमें रहना चाहिये अथवा वनोंमें॥ २३॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 A

१६२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १८
जनक उवाचजनकजी बोले—
इन्द्रियाणि बलिष्ठानि न नियुक्तानि मानद।<br>अपक्वस्य प्रकुर्वन्ति विकारांस्ताननेकंशः॥ २४हे मानद! इन्द्रियाँ बड़ी बलवान् होती हैं, वे वशमें नहीं रहतीं। वे अपरिपक्व बुद्धिवाले मनुष्यके मनमें नाना प्रकारके विकार उत्पन्न कर देती हैं॥ २४॥
भोजनेच्छां सुखेच्छां च शय्येच्छामात्मजस्य च।<br>यती भूत्वा कथं कुर्याद्विकारे समुपस्थिते॥ २५यदि मनुष्यके मनमें भोजनकी, शयनकी, सुखकी और पुत्रकी इच्छा बनी रहे तो वह संन्यासी होकर भी इन विकारोंके उपस्थित होनेपर क्या कर पायेगा?॥ २५॥
दुर्जयं वासनाजालं न शान्तिमुपयाति वै।<br>अतस्तच्छमनार्थाय क्रमेण च परित्यजेत्॥ २६वासनाओंका जाल बड़ा ही कठिन होता है, वह शीघ्र नहीं मिटता। इसलिये उसकी शान्तिके लिये मनुष्यको क्रमसे उसका त्याग करना चाहिये॥ २६॥
ऊर्ध्वं सुप्तः पतत्येव न शयानः पतत्यधः।<br>परिव्रज्य परिभ्रष्टो न मार्गं लभते पुनः॥ २७ऊँचे स्थानपर सोनेवाला मनुष्य ही नीचे गिरता है, नीचे सोनेवाला कभी नहीं गिरता। यदि संन्यास-ग्रहण कर लेनेपर भ्रष्ट हो जाय तो पुनः वह कोई दूसरा मार्ग नहीं प्राप्त कर सकता॥ २७॥
यथा पिपीलिका मूलाच्छाखायामधिरोहति।<br>शनैः शनैः फलं याति सुखेन पदगामिनी॥ २८<br><br>विहङ्गमस्तरसा याति विघ्नशङ्कामुदस्य वै।<br>श्रान्तो भवति विश्रम्य सुखं याति पिपीलिका॥ २९जिस प्रकार चींटी वृक्षकी जड़से चढ़कर शाखापर चढ़ जाती है और वहाँसे फिर धीरे-धीरे सुखपूर्वक पैरोंसे चलकर फलतक पहुँच जाती है। विघ्न-शंकाके भयसे कोई पक्षी बड़ी तीव्र गतिसे आसमानमें उड़ता है और [परिणामतः] थक जाता है, किंतु चींटी सुखपूर्वक विश्राम ले-लेकर [अपने अभीष्ट स्थानपर] पहुँच जाती है॥ २८-२९॥
मनस्तु प्रबलं काममजेयमकृतात्मभिः।<br>अतः क्रमेण जेतव्यमाश्रमानुक्रमेण च॥ ३०मन अत्यन्त प्रबल है; यह अजितेन्द्रिय पुरुषोंके द्वारा सर्वथा अजेय है। इसलिये आश्रमोंके अनुक्रमसे ही इसे क्रमशः जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये॥ ३०॥
गृहस्थाश्रमसंस्थोऽपि शान्तः सुमतिरात्मवान्।<br>न च हृष्येन्न च तपेल्लाभालाभे समो भवेत्॥ ३१गृहस्थ-आश्रममें रहते हुए भी जो शान्त, बुद्धिमान् एवं आत्मज्ञानी होता है, वह न तो प्रसन्न होता है और न खेद करता है। वह हानि-लाभमें समान भाव रखता है॥ ३१॥
विहितं कर्म कुर्वाणस्त्यजंश्चिन्तान्वितं च यत्।<br>आत्मलाभेन सन्तुष्टो मुच्यते नात्र संशयः॥ ३२जो पुरुष शास्त्रप्रतिपादित कर्म करता हुआ, सभी प्रकारकी चिन्ताओंसे मुक्त रहता हुआ आत्मचिन्तनसे सन्तुष्ट रहता है; वह निःसन्देह मुक्त हो जाता है॥ ३२॥
पश्याहं राज्यसंस्थोऽपि जीवन्मुक्तो यथानघ।<br>विचरामि यथाकामं न मे किञ्चित्प्रजायते॥ ३३हे अनघ! देखिये, मैं राजकार्य करता हुआ भी जीवन्मुक्त हूँ; मैं अपने इच्छानुसार सब काम करता हूँ, किंतु मुझे शोक या हर्ष कुछ भी नहीं होता॥ ३३॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—6 B