देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| १५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ |
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| दिदृक्षा महती जाता श्रुत्वा तं भूपतिं तथा।<br>सन्देहविनिवृत्त्यर्थं गच्छामि मिथिलां प्रति॥ ६१ | राजाके विषयमें सुनकर उन्हें देखनेकी बड़ी लालसा उत्पन्न हो गयी है। अतः सन्देह-निवृत्तिके लिये मैं मिथिलापुरी जा रहा हूँ॥ ६०-६१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे शुकं प्रति व्यासोपदेशवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
<p align="center">~~~*~~~</p>अथ सप्तदशोऽध्यायः
शुकदेवजीका राजा जनकसे मिलनेके लिये मिथिलापुरीको प्रस्थान तथा राजभवनमें प्रवेश
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| इत्युक्त्वा पितरं पुत्रः पादयोः पतितः शुकः।<br>बद्धाञ्जलिरुवाचेदं गन्तुकामो महामनाः॥ १<br><br>आपृच्छे त्वां महाभाग ग्राह्यं ते वचनं मया।<br>विदेहान्द्रष्टुमिच्छामि पालिताञ्जनकेन तु॥ २ | [हे मुनियो!] पितासे यह कहकर महात्मा पुत्र शुकदेवजी उनके चरणोंपर गिर पड़े तथा हाथ जोड़कर चलनेकी इच्छासे बोले—हे महाभाग! अब आपसे आज्ञा चाहता हूँ। मुझे आपका वचन स्वीकार्य है। अतः मैं महाराज जनकद्वारा पालित मिथिलापुरी देखना चाहता हूँ॥ १-२॥ |
| विना दण्डं कथं राज्यं करोति जनकः किल।<br>धर्मे न वर्तते लोको दण्डश्चेन्न भवेद्यदि॥ ३ | राजा जनक दण्ड दिये बिना ही कैसे राज्य चलाते हैं? क्योंकि यदि दण्डका भय प्रजाओंको न हो तो लोग धर्मका पालन नहीं करेंगे॥ ३॥ |
| धर्मस्य कारणं दण्डो मन्वादिप्रहितः सदा।<br>स कथं वर्तते तात संशयोऽयं महान्मम॥ ४<br><br>मम माता त्वियं वन्ध्या तद्वद्भाति विचेष्टितम्।<br>पृच्छामि त्वां महाभाग गच्छामि च परन्तप॥ ५ | मनु आदिके द्वारा धर्माचरणका मूल कारण सदा दण्ड-विधान ही कहा गया है। इस राजधर्मका निर्वाह बिना दण्डके कैसे हो सकेगा? हे पिताजी! इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है। हे महाभाग! यह बात वैसी ही अनर्गल प्रतीत होती है, जैसे कोई कहे कि मेरी यह माता वन्ध्या है। हे परन्तप! अब मैं आपसे अनुमति लेता हूँ और यहाँसे जा रहा हूँ॥ ४-५॥ |
| सूत उवाच<br>तं दृष्ट्वा गन्तुकामं च शुकं सत्यवतीसुतः।<br>आलिङ्ग्योवाच पुत्रं तं ज्ञानिनं निःस्पृहं दृढम्॥ ६ | **सूतजी बोले—**इस प्रकार शुकदेवजीको जनकपुर जानेका इच्छुक देखकर व्यासजीने अपने ज्ञानी एवं निःस्पृह पुत्रका दृढ़ आलिंगन करके कहा— ॥ ६॥ |
| व्यास उवाच<br>स्वस्त्यस्तु शुक दीर्घायुर्भव पुत्र महामते।<br>सत्यां वाचं प्रदत्त्वा मे गच्छ तात यथासुखम्॥ ७<br><br>आगन्तव्यं पुनर्गत्वा ममाश्रममनुत्तमम्।<br>न कुत्रापि च गन्तव्यं त्वया पुत्र कथञ्चन॥ ८ | **व्यासजी बोले—**हे महामते! हे पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो, हे शुक! तुम दीर्घायु होओ। हे तात! तुम मुझे यह सत्य वचन देकर सुखपूर्वक जाओ कि यहाँसे जाकर मेरे इस उत्तम आश्रममें पुनः आओगे। हे पुत्र! तुम वहाँसे कहीं और कभी भी मत चले जाना॥ ७-८॥ |
| सुखं जीवामि पुत्राहं दृष्ट्वा ते मुखपङ्कजम्।<br>अपश्यन्दुःखमाप्नोमि प्राणस्त्वमसि मे सुत॥ ९ | हे पुत्र! मैं तुम्हारा मुखकमल देखकर ही सुखपूर्वक जीता हूँ और तुम्हें न देखनेपर दुःखी रहता हूँ। हे सुत! तुम्हीं मेरे प्राण हो॥ ९॥ |