भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० १६ ]प्रथम स्कन्ध१५३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दम्भोऽयं किल धर्मात्मन्भाति चित्ते ममाधुना।<br>जीवन्मुक्तो विदेहश्च राज्यं शास्ति मुदान्वितः॥ ५०<br><br>वन्ध्यापुत्र इवाभाति राजासौ जनकः पितः।<br>कुर्वन् राज्यं विदेहः किं सन्देहोऽयं ममाद्भुतः॥ ५१जा रहा है, उससे मेरे चित्तमें शंका उठती है कि कहीं यह दम्भ तो नहीं। जीवन्मुक्त तथा विदेह होते हुए भी राजा जनक हर्षके साथ कैसे राज्य करते हैं? हे पिताजी! यह बात तो वैसे ही असम्भव है जैसे किसी वन्ध्याको पुत्र हो! अतः वे राजा जनक राज्य करते हुए भी विदेह कैसे हैं? यह मुझे अद्भुत सन्देह हो रहा है!॥४९–५१॥
द्रष्टुमिच्छाम्यहं भूपं विदेहं नृपसत्तमम्।<br>कथं तिष्ठति संसारे पद्मपत्रमिवाम्भसि॥ ५२<br><br>सन्देहोऽयं महांस्तात विदेहे परिवर्तते।<br>मोक्षः किं वदतां श्रेष्ठ सौगतानामिवापरः॥ ५३अब मैं नृपश्रेष्ठ विदेह जनकको देखना चाहता हूँ कि वे जलमें कमलपत्रकी भाँति संसारमें कैसे रहते हैं? हे तात! उनके विदेह होनेके विषयमें मुझे बड़ा सन्देह हो रहा है! हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ! सौगतोंकी भाँति वे भी मोक्षकी एक दूसरी परिभाषा तो नहीं हैं!॥ ५२–५३॥
कथं भुक्तमभुक्तं स्यादकृतं च कृतं कथम्।<br>व्यवहारः कथं त्याज्य इन्द्रियाणां महामते॥ ५४हे महामते! भला भोगा हुआ भोग अभोग और किया हुआ कर्म अकर्म कैसे हो सकता है? इन्द्रियोंका सहज व्यवहार कैसे छोड़ा जा सकता है?॥ ५४॥
माता पुत्रस्तथा भार्या भगिनी कुलटा तथा।<br>भेदाभेदः कथं न स्याद्यद्येतन्मुक्तता कथम्॥ ५५एक पुत्रका अपनी माता, पत्नी, बहन तथा किसी असती स्त्रीके साथ भेद-अभेदका सम्बन्ध क्यों नहीं होगा? और ऐसा होनेपर जीवन्मुक्तता कैसी?॥ ५५॥
कटु क्षारं तथा तीक्ष्णं कषायं मिष्टमेव च।<br>रसना यदि जानाति भुंक्ते भोगाननुत्तमान्॥ ५६<br><br>शीतोष्णसुखदुःखादिपरिज्ञानं यदा भवेत्।<br>मुक्तता कीदृशी तात सन्देहोऽयं ममाद्भुतः॥ ५७यदि जिह्वा कटु, क्षार, तीक्ष्ण, कषाय, मधुर आदि स्वादोंको जानती है तो वे अच्छे-अच्छे पदार्थोंका रसास्वादन करते ही होंगे। यदि शीत, उष्ण, सुख-दुःखका परिज्ञान उन्हें होता होगा तो भला यह मुक्तता कैसी? हे तात! मुझे यह अद्भुत सन्देह हो रहा है!॥ ५६–५७॥
शत्रुमित्रपरिज्ञानं वैरं प्रीतिकरं सदा।<br>व्यवहारे परे तिष्ठन्कथं न कुरुते नृपः॥ ५८<br><br>चौरं वा तापसं वापि समानं मन्यते कथम्।<br>असमा यदि बुद्धिः स्यान्मुक्तता तर्हि कीदृशी॥ ५९शत्रु और मित्रको पहचानकर उनके साथ वैर अथवा प्रीतिका व्यवहार किया जाता है, तो राज्यसिंहासनपर बैठे हुए राजा जनक शत्रुता या मित्रताका व्यवहार क्या नहीं रखते होंगे? उनके राज्यमें साधु और चोर समान कैसे समझे जाते हैं? यदि उनके प्रति समान बुद्धि नहीं है, तब भला वह जीवन्मुक्तता कैसी?॥ ५८–५९॥
दृष्टपूर्वो न मे कश्चिज्जीवन्मुक्तश्च भूपतिः।<br>शङ्केयं महती तात गृहे मुक्तः कथं नृपः॥ ६०ऐसा जीवन्मुक्त कोई राजा मेरे द्वारा पहले देखा नहीं गया। हे तात! यह बहुत बड़ी शंका है कि वे राजा जनक घरमें रहकर भी मुक्त कैसे हैं? उन