भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 164
अ० १७ ]प्रथम स्कन्ध१५५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दृष्ट्वा त्वं जनकं पुत्र सन्देहं विनिवर्त्य च।<br>अत्रागत्य सुखं तिष्ठ वेदाध्ययनतत्परः ॥ १०हे पुत्र! वहाँ राजर्षि जनकसे मिलकर और अपना सन्देह दूर करके फिर उसके बाद यहाँ आकर वेदाध्ययनमें रत रहते हुए सुखपूर्वक रहो ॥ १० ॥
सूत उवाच<br>इत्युक्तः सोऽभिवाद्यार्थं कृत्वा चैव प्रदक्षिणाम्।<br>चलितस्तरसातीव धनुर्मुक्तः शरो यथा ॥ ११**सूतजी बोले—**व्यासजीके ऐसा कहनेपर शुकदेवजी अपने पिताको प्रणाम तथा उनकी प्रदक्षिणा करके शीघ्र ही इस प्रकार चल पड़े जैसे धनुषसे छूटा हुआ बाण ॥ ११ ॥
सम्पश्यन्विविधान्देशाँल्लोकांश्च वित्तधर्मिणः।<br>वनानि पादपांश्चैव क्षेत्राणि फलितानि च ॥ १२<br><br>तापसांस्तप्यमानांश्च याजकान्दीक्षयान्वितान्।<br>योगाभ्यासरतान्योगिवानप्रस्थान्वनौकसः ॥ १३<br><br>शैवान्पाशुपतांश्चैव सौराञ्छाक्तांश्च वैष्णवान्।<br>वीक्ष्य नानाविधान्धर्माञ्जगामातिस्मयन्मुनिः ॥ १४मार्गमें चलते हुए अनेक समृद्धिशाली देशों, नागरिकों, वनों, वृक्षों, फले-फूले खेतों, तप करते हुए तपस्वीजनों, दीक्षा लिये हुए याजकजनों, योगाभ्यासमें तत्पर योगीजनौं, वनमें रहनेवाले वानप्रस्थों, वैष्णव, पाशुपत, शैव, शाक्त एवं सूर्योपासक और अनेक धर्मा-वलम्बियोंको देखकर वे शुकदेवमुनि अति विस्मयमें पड़ गये ॥ १२—१४ ॥
वर्षद्वयेन मेरुं च समुल्लङ्घ्य महामतिः।<br>हिमाचलं च वर्षेण जगाम मिथिलां प्रति ॥ १५इस प्रकार वे महामति शुकदेवजी लगभग दो वर्षोमें मेरुपर्वत और एक वर्षमें हिमालयको पार करके मिथिला-देशमें पहुँचे ॥ १५ ॥
प्रविष्टो मिथिलां मध्ये पश्यन्सर्वर्द्धिमृत्तमाम्।<br>प्रजाश्च सुखिताः सर्वाः सदाचाराः सुसंस्थिताः ॥ १६जब वे मिथिलामें प्रविष्ट हुए, तब उन्होंने वहाँकी श्रेष्ठ ऐश्वर्यसम्पदाको देखा तथा वहाँकी सारी प्रजाको सुखी एवं सदाचारसम्पन्न देखा ॥ १६ ॥
क्षत्रा निवारितस्तत्र कस्त्वमत्र समागतः।<br>किं ते कार्यं वदस्वेति पृष्टस्तेन न चाब्रवीत् ॥ १७<br><br>निःसृत्य नगरद्वारात्स्थितः स्थाणुरिवाचलः।<br>विस्मितोऽतिहसंस्तस्थौ वचो नोवाच किञ्चन ॥ १८वहाँ द्वारपालने उन्हें रोका और पूछा—तुम कौन हो और कहाँसे आये हो, तुम्हारा क्या कार्य है; बताओ। ऐसा पूछनेपर भी शुकदेवजी मौन रहे, कुछ बोले नहीं। वे नगरद्वारसे बाहर जाकर स्थाणुकी तरह खड़े हो गये और थोड़ी देरमें आश्चर्यचकित होकर हँसते हुए वहीं स्थित हो गये, पर किसीसे कुछ बोले नहीं ॥ १७-१८ ॥
प्रतीहार उवाच<br>ब्रूहि मूकोऽसि किं ब्रह्मन्किमर्थं त्वमिहागतः।<br>चलनं च विना कार्यं न भवेदिति मे मतिः ॥ १९**द्वारपालने पूछा—**हे ब्रह्मन्! बोलिये, आप गूँगे तो नहीं हैं। आपका किस हेतु यहाँ आना हुआ है? मेरे विचारमें तो कोई कहीं भी निष्प्रयोजन नहीं जाता ॥ १९ ॥
राजाज्ञया प्रवेष्टव्यं नगरेऽस्मिन्सदा द्विज।<br>अज्ञातकुलशीलस्य प्रवेशो नात्र सर्वथा ॥ २०हे विप्र! इस नगरमें राजाकी आज्ञा पाकर ही कोई प्रवेश कर सकता है। अज्ञात कुल तथा शीलवाले व्यक्तिका प्रवेश यहाँ कदापि नहीं होता है ॥ २० ॥
तेजस्वी भासि नूनं त्वं ब्राह्मणो वेदवित्तमः।<br>कुलं कार्यं च मे ब्रूहि यथेष्टं गच्छ मानद ॥ २१हे मानद! आप निश्चय ही तेजस्वी एवं वेदवेत्ता ब्राह्मण प्रतीत हो रहे हैं। इसलिये आप अपने कुल तथा प्रयोजनके विषयमें मुझे बता दें और फिर अपने इच्छानुसार चले जायें ॥ २१ ॥